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Potato Glut Policy Gaps And Political Stakes How Bengal S Farm Crisis Shapes 2026 Elections
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : आलू के खेतों से निकलेगा 2026 का जनादेश, सत्ता की पटकथा लिखेंगे किसान
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 06 Apr 2026 01:40 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल में आलू किसानों का संकट किसी एक सीजन की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस कृषि मॉडल की पोल खोलता है, जहां उत्पादन बढ़ाने को सफलता का पैमाना मान लिया गया, लेकिन बाजार, भंडारण और मूल्य तंत्र को विकसित नहीं किया गया। ऐसे में, वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में आलू उत्पादक किसानों की मतदान के समय दी गई प्रतिक्रिया यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी कि सत्ता के सिंहासन पर कौन बैठेगा।
पश्चिम बंगाल में 130–150 लाख टन आलू उत्पादन का अनुमान है, खपत 60 लाख टन और भंडारण क्षमता सिर्फ 70–75
- फोटो : एआई (सांकेतिक तस्वीर)
देश के अधिकतर राज्यों में भी कृषि नीतियां लंबे समय से ज्यादा उत्पादन और ज्यादा लाभ के सिद्धांत पर टिकी रही हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल में आलू के बंपर उत्पादन के बाद यह धारणा धराशायी होती नजर आ रही है। इस साल पश्चिम बंगाल में लगभग 130–150 लाख टन आलू उत्पादन का अनुमान है, जबकि राज्य की खपत करीब 60 लाख टन ही है और भंडारण क्षमता भी सिर्फ 70–75 लाख टन की है। नतीजा साफ था - कीमतें गिरेंगी, किसान दबाव में आएंगे और फसल सस्ते में बिकेगी, और परिणाम वही हुआ।
अतिरिक्त आलू के लिए किसानों को नए बाजार और बेहतर दाम चाहिए थे, जो नहीं मिले। हर साल यही चक्र चलता रहता है और उपज का बड़ा हिस्सा बाजार के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाता है। यही संरचनात्मक कमी देश में प्याज, टमाटर और दालों में भी दिखती है - जहां उत्पादन बढ़ाने पर जोर रहता है, लेकिन किसानों को उचित मूल्य दिलाने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
कोल्ड स्टोरेज मॉडल की सीमाएं
अधिक आलू उत्पादन की स्थिति में कोल्ड स्टोरेज सहारा बनते हैं, जहां भंडारण करके किसान बेहतर मूल्य पाने के लिए इंतजार कर सकते हैं। पश्चिम बंगाल में करीब 580 कोल्ड स्टोरेज होने के बावजूद भंडारण क्षमता सीमित है। निजी भंडारण सुविधाएं हैं, मगर लागत अधिक होने के कारण वे छोटे किसानों की पहुंच से दूर हैं।
परेशान किसानों को कुछ राहत देने के लिए, राज्य सरकार ने 13 मार्च को एक अधिसूचना जारी की, जिसके तहत राज्य के कोल्ड स्टोरेज की 30% जगह छोटे आलू किसानों के लिए आरक्षित कर दी गई। इस तरह के कदम अस्थायी राहत तो दे सकते हैं, मगर इन्हें समाधान नहीं कह सकते। कई जगह भंडारण सुविधाएं होने के बावजूद उनकी समान पहुंच नहीं होना भी बड़ी समस्या रही है।
किसानों को ₹4-5 प्रति किलो के भाव पर आलू बेचने को मजबूर होना पड़ा, जबकि लागत ₹7–8 प्रति किलो के आसपास थी।
- फोटो : AI Image
मूल्य संकट से ज्यादा मूल्य तंत्र का संकट
बंगाल में आलू उत्पादन, राज्य की खपत, भंडारण सुविधाएं, किसानों की लागत व बाजार मूल्य का अंतर और अंतरराज्यीय व्यापार पर बंदिशें चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं। इसकी सबसे अधिक मार उन किसानों को झेलनी पड़ती है, जो गरीब हैं और अपना खून-पसीना व जमा-पूंजी लगाकर खेती करते हैं। लेकिन, इन किसानों को ₹4-5 प्रति किलो के भाव पर आलू बेचने को मजबूर होना पड़ा, जबकि लागत ₹7-8 प्रति किलो के आसपास थी। यह अंतर सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि बाजार के ध्वंस का सूत्र है, जो किसानों को बर्बाद कर देता है।
आर्थिक संकट से मानसिक बढ़ता संकट
कृषि निवेश और बाजार मूल्य के बीच का अंतर दिखाता है कि मूल्य निर्धारण किसान के हाथ में नहीं है, आपूर्ति शृंखला असंतुलित है और बिचौलियों का नियंत्रण आज भी मजबूत है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि बाजार प्रबंधन की विफलता से पैदा हुई। जब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी, हर फसल के साथ ऐसे संकट बार-बार पैदा होते रहेंगे।
किसानों पर कर्ज का बोझ, फसल का न बिकना, लागत न निकलना - ये केवल आर्थिक संकेतक नहीं हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे निराशा में बदल जाती है और किसानों पर पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ सामाजिक दबाव बढ़ता है। विवश होकर कई मामलों में किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। किसानों की असमय मौतों पर राजनीतिक बहस हो सकती हैं, लेकिन यह नकारा नहीं जा सकता कि किसान असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
किसान और उपभोक्ता दोनों असंतुष्ट
यह संकट एक और गहरी बात उजागर करता है कि किसान और उपभोक्ता दोनों ही असंतुष्ट हैं। किसान को कम दाम मिलते हैं, तो उपभोक्ता को ज्यादा दाम चुकाने पड़ते हैं। खेत से बाजार के बीच इस शृंखला में उन बिचौलियों को फायदा मिलता है, जिन्हें हटाने के लिए सरकार तमाम दावे करती रही है। यह भारतीय कृषि बाजार की पुरानी समस्या है, जो यहां आज भी साफ दिखाई देती है।
बंगाल का ‘सोना’ कहा जाने वाला आलू अब किसानों के लिए ‘फांसी का फंदा’ बन गया है।
- फोटो : AI Image
बंगाल के चुनाव में बड़ा मुद्दा बना आलू
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कवायद में जुटी भाजपा ने राज्य के कृषि संकट को बड़ा मुद्दा बनाते हुए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सरकार पर निशाना साधा है। राज्य में भाजपा के प्रवक्ता देवजीत सरकार ने दावा किया कि बंगाल का ‘सोना’ कहा जाने वाला आलू अब किसानों के लिए ‘फांसी का फंदा’ बन गया है।
देवजीत सरकार ने आरोप लगाया कि पिछले डेढ़ दशक में 136 आलू किसानों ने आत्महत्या की, जबकि हाल के हफ्तों में पश्चिम मेदिनीपुर में भी कई किसानों की जान गई है। उन्होंने इन घटनाओं का सरकार से जवाब मांगा। जाहिर है कि आलू बंगाल के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है।
चुनावी राजनीति और नैरेटिव की लड़ाई
सत्तारूढ़ पक्ष का नैरेटिव है कि 'हम राहत दे रहे हैं', 'हम खरीद करेंगे' और 'किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है।' दूसरी ओर विपक्ष का नैरेटिव रहता है कि 'सरकार नीतिगत के मोर्चे पर विफल रही है', 'किसानों को निर्मम बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है' और 'किसानों की मौतों के लिए सरकार जिम्मेदार है।'
नीतियों-बाजार के टकराव से बिगड़ी स्थिति
सिर्फ उत्पादन ज्यादा होने की बात कहना पर्याप्त नहीं है, सवाल यह है कि बाजार के विस्तार की तैयारी कितनी थी। लागत से कम दाम और दूसरे राज्यों में बिक्री पर रोक ने किसानों को नुकसान पहुंचाया, जबकि ऐसे फैसलों से व्यापारियों का भरोसा भी कमजोर हुआ और बाहरी बाजारों ने नए विकल्प खोज लिए। नतीजतन बंगाल एक अलग-थलग बाजार बन गया और उत्पादन बढ़ने पर बिक्री के लिए पर्याप्त अवसर नहीं रहे, जो स्पष्ट रूप से नीतिगत विफलता को दर्शाता है।
दक्षिण बंगाल का हुगली, पूर्व बर्धमान, पश्चिम मेदिनीपुर और आंशिक रूप से बांकुरा जिला मुख्यतः आलू बेल्ट में शामिल हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
आलू पट्टी चुनाव में बनेगी साइलेंट गेमचेंजर
दक्षिण बंगाल का हुगली, पूर्व बर्धमान, पश्चिम मेदिनीपुर और आंशिक रूप से बांकुरा जिला मुख्यतः आलू बेल्ट में शामिल हैं। इन क्षेत्रों आलू का उच्च फसल उत्पादन होता है, और इस फसल पर किसानों की निर्भरता भी अधिक है। बाजार मूल्य गिरने पर किसानों पर सबसे अधिक आर्थिक दबाव और असंतोष भी इन्हीं इलाकों में देखने को मिलता है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में यह स्थिति 'स्विंग फैक्टर' बन सकती है। यहां वोटर सिर्फ जाति या पार्टी को देखकर नहीं, बल्कि अपनी फसल के अनुभव के आधार पर वोट करेंगे।
राहत या फिर स्थाई समाधान
अभी जो हो रहा है, उसे प्रतिक्रियावादी कदम कहते हैं - यानी संकट आया और राहत दे दी गई। लेकिन, आज समस्या पैदा होने के पहले ही सुविचारित योजना बनाकर और समय रहते कार्रवाई की जरूरत है। उत्पादन के साथ ही बाजार लिंकेज की पुख्ता योजना जरूरी है। निर्यात और अंतरराज्यीय व्यापार की स्थिर नीति सुनिश्चित करनी होगी। इसके साथ ही, राज्य में फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और प्रभावी कृषि बीमा योजना को पुख्ता तरीके से लागू करने की जरूरत है, ताकि किसानों को फसल के अच्छे दाम के साथ ही नुकसान होने पर त्वरित रूप से मुआवजा मिल सके।
किसानों के लिए प्रत्यक्ष बाजार के मॉडल तैयार करने होंगे, जिसमें किसान बिचौलियों के बिना सीधे उपभोक्ताओं या खरीदारों को अपनी उपज बेचते हैं। कंपनियां या संस्थाएं भी किसानों से सीधे खरीद कर सकती हैं। एप या वेबसाइट के जरिये सीधी बिक्री सुनिश्चित करके भी किसान लाभ कमा सकते हैं। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलता है, उपभोक्ताओं को ताजा व सस्ते उत्पाद मिलते हैं और बिचौलियों पर निर्भरता कम होती है। यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने और बाजार को पारदर्शी बनाने का कारगर तरीका हो सकता है
खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) का विस्तार
बंगाल का आलू संकट एक बड़ा सवाल उठाता है कि क्या हम अभी भी 20वीं सदी के कृषि मॉडल पर चल रहे हैं, जहां उत्पादन ही लक्ष्य हुआ करता था और किसान को बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाता है? अगर हां, तो हर साल नई फसल, नया संकट बनकर आती रहेगी। यह चुनाव तय करेगा कि क्या मतदाता हर साल राहत को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं या फिर वे नई और टिकाऊ कृषि नीति चाहते हैं? यहां समस्या आलू नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है, जो किसान को हर बार अकेला छोड़ देती है।
खेती से जुड़ी नीतियों और योजनाओं या व्यवस्थाओं पर किसानों एवं ग्रामीण समाज की राय, अनुभव और प्रतिक्रिया चुनाव के दौरान बड़ी कसौटी बनती है। ऐसे में, पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में आलू उत्पादक किसानों की मतदान के समय दी गई प्रतिक्रिया बहुत कुछ तय करेगी।
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