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सहकारिता 2.0: सहकार से समृद्धि के मंत्र और नए तेवर के साथ आगे बढ़ रहा है भारत का सहकारी आंदोलन

डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 22 Dec 2025 09:19 PM IST
सार

किसानों को सूदखोरों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए 25 मार्च 1904 के कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट के साथ भारत के सहकारी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई। पीएम नरेंद्र मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ मंत्र के साथ अाज सहकारिता 2.0 नए तेवर के साथ आगे बढ़ रहा है। सहकारिता मंत्रालय के गठन और राष्ट्रीय सहकारी नीति जैसे सुधारों ने सहकारी क्षेत्र को 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का भरोसेमंद इंजन बना दिया है। डॉ. उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट...

पीएम नरेंद्र मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ मंत्र के साथ अाज सहकारिता 2.0 नए तेवर के साथ आगे बढ़ रहा है।
पीएम नरेंद्र मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ मंत्र के साथ अाज सहकारिता 2.0 नए तेवर के साथ आगे बढ़ रहा है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गुजरात के सहकारी डेयरी ब्रांड अमूल से जुड़ी 10 बड़ी डेयरियों में हर दिन लाखों पशुपालक दूध भेजते हैं। बनासकांठा जिले के कसरा गांव की 65 वर्षीय मणिबेन जेसुंगभाई चौधरी भी दुनिया के इस सबसे बड़े डेयरी नेटवर्क का हिस्सा हैं। 8 गायों के साथ दुग्ध कारोबार का सफर शुरू करने वाली मणिबेन अपनी मेहनत और आधुनिक तकनीक के सहारे 300 से ज्यादा मवेशियों की मालकिन बन चुकी हैं। 
गुजरात के बनासकांठा जिले की मणिबेन सहकारी दुग्ध कारोबार में एक मिसाल बन गई हैं।
गुजरात के बनासकांठा जिले की मणिबेन सहकारी दुग्ध कारोबार में एक मिसाल बन गई हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
मणिबेन की डेयरी से रोज लगभग 1100 लीटर दूध गांव की सहकारी मंडली में जाता है। वर्ष 2024-25 में मणिबेन ने करीब 1.94 करोड़ रुपये का दूध बेचा। दूध दुहने के लिए मणिबेन मशीनों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिलता है। उनका लक्ष्य अगले साल 3 करोड़ रुपये का दूध बेचने का है। मणिबेन जैसी हजारों महिलाएं गुजरात की 16,000 सहकारी डेयरी समितियों में से 4,150 समितियां चलाती हैं। ये महिलाएं डेयरी किसान और सफल उद्यमी के रूप में हजारों परिवारों को रोजगार भी दे रही हैं। 
समय के साथ बदल गई राजस्थान के कोटा जिले की बोरखेड़ा ग्राम सेवा सहकारी समिति।
समय के साथ बदल गई राजस्थान के कोटा जिले की बोरखेड़ा ग्राम सेवा सहकारी समिति। - फोटो : गांव जंक्शन

'सहकार से समृद्धि' की मिसाल बोरखेड़ा सहकारी समिति 

गांवों में सहकारी गतिविधियों के तहत लोग मिलकर काम करते हैं, जिससे ग्रामीण भारत 'सहकार से समृद्धि' का लक्ष्य साकार करने की ओर बढ़ रहा है। राजस्थान के कोटा जिले की बोरखेड़ा ग्राम सेवा सहकारी समिति इसकी जीवंत मिसाल है। वर्ष 1954 में शुरू हुई यह समिति आज 8,299 से अधिक सदस्यों और 107.54 लाख रुपये के शेयर के साथ एक संपन्न समिति के रूप में विकसित हो चुकी है। कृषि-आधारित सेवाओं से आगे बढ़ते हुए यह समिति तीन शाखाओं के साथ मिनी बैंक चलाती है।

समिति की तीनों शाखाओं पर मिनी बैंक के करीब 10,000 सदस्य हैं। इनमें 62 करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि है, जबकि जीसीसी में कुल 110 करोड़ रुपये जमा हैं। इसमें से करीब 50 करोड़ रुपये ऋण के रूप में बांटे गए हैं। यह समिति बीमा, आधार सेवाएं, प्रमाण-पत्र, बिल भुगतान आदि नागरिक सुविधाएं भी देती है। इसे एनसीडीसी राष्ट्रीय सहकारी उत्कृष्टता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। बोरखेड़ा कोई एकाकी उदाहरण नहीं है, बल्कि देशभर में सहकारिता की उपलब्धियों के ऐसे कई प्रयास देखने को मिलते हैं।
भारत का सहकारी आंदोलन दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल बन चुका है।
भारत का सहकारी आंदोलन दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल बन चुका है। - फोटो : गांव जंक्शन

दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल भारत का सहकारी क्षेत्र 

भारत का सहकारी आंदोलन वर्ष 1904 के कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट के गठन के साथ औपचारिक रूप शुरू होकर आज दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक मॉडल बन चुका है। गुजरात की सहकारी डेयरी समितियों से लेकर महाराष्ट्र के सहकारी बैंकों, यूपी की चीनी मिलों, पंजाब की ड्रोन अकादमी और राजस्थान की बहुउद्देशीय ग्रामीण समितियों तक इसका दायरा विविध एवं विस्तृत है। दुनिया की 27% सहकारी समितियां अकेले भारत में हैं, जिससे यह विश्व का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क बन जाता है। यह डेयरी, चीनी एवं ईथेनॉल उत्पादन, ग्रामीण बैंकिंग, खाद, बीज एवं कीटनाशकों के वितरण, कृषि उत्पादन, कृषि उपज मार्केटिंग, प्रोसेसिंग एवं निर्यात और हस्तशिल्प समेत विविध गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। 
पीएम नरेंद्र मोदी
पीएम नरेंद्र मोदी - फोटो : गांव जंक्शन

सहकारिता भारत के लिए एक जीवन शैली - पीएम मोदी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भविष्य में सहकारी समितियों की बड़ी भूमिका को स्वीकार करते हैं। उन्होंने एक वक्तव्य में बताया है कि सहकारी बैंकों में करीब 12 लाख करोड़ रुपये की राशि जमा है। सहकारी समितियों की 60 फीसदी सदस्य महिलाएं हैं और सहकारी समितियों के प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया जा रहा है। दुनिया के लिए, सहकारिता एक मॉडल है, भारत के लिए यह संस्कृति का आधार है, जीवन शैली है। भारत के अनुभव वैश्विक सहकारी आंदोलन को 21वीं सदी के नए उपकरण और भावना प्रदान करेंगे। 
'उन्नति बहन सेल्स मॉडल’ और सहकारी ड्रोन ट्रेनिंग अकादमी दोनों स्थानीय समुदाय की ताकत बनकर उभरे हैं।
'उन्नति बहन सेल्स मॉडल’ और सहकारी ड्रोन ट्रेनिंग अकादमी दोनों स्थानीय समुदाय की ताकत बनकर उभरे हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

देश की पहली सहकारी ड्रोन ट्रेनिंग अकादमी

बायोटेक वैज्ञानिक से सामाजिक उद्यमी बने ज्योति सरूप कोऑपरेटिव संस्था उन्नति के संस्थापक हैं, जो पंजाब के शिवालिक के निचले इलाके कंडी में काम करती है। इसका 'उन्नति बहन सेल्स मॉडल’ और सहकारी ड्रोन ट्रेनिंग अकादमी दोनों स्थानीय समुदाय की ताकत बनकर उभरे हैं। ज्योति सरूप कहते हैं - गांव के लोग सोने की खान पर बैठे गरीब हैं, बस उन्हें एकजुट करने की जरूरत थी। सहकारिता ने उन्हें ग्राहक नहीं, बल्कि मालिक बना दिया है। यहां हजारों किसान, महिलाएं और युवा मिलकर ऐसा मॉडल संचालित करते हैं, जो खेती, रोजगार और तकनीक - तीनों को एक साथ जोड़ता है। आंवला, एलोवेरा, औषधीय पौधे, खाद्य उत्पाद, डिजिटल कौशल और ड्रोन टेक्नोलॉजी सहित हमारी संस्था हर उस क्षेत्र में काम करती है, जिससे गांव की आमदनी बढ़ाई सकती है और लोगों को अपने ही घर के पास काम मिल सकता है। एनसीईएल, एनसीओएल, बीबीएसएसएल और एनसीडीसी जैसे राष्ट्रीय संस्थानों से जुड़कर उन्नति ने भरोसे और बड़े अवसरों की नई राहें खोली हैं। उन्नति के मॉडल ने साबित किया है कि जब गांव की ताकत, तकनीक और मेहनत एक साथ जुड़ जाते हैं - तो ग्रामीण भारत खुद अपनी तरक्की की कहानी लिख सकता है।
नाबार्ड और एनसीडीसी जैसे सरकारी संस्थान सहकारी संस्थाओं को समर्थन देते हैं।
नाबार्ड और एनसीडीसी जैसे सरकारी संस्थान सहकारी संस्थाओं को समर्थन देते हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

क्या होती हैं सहकारी समितियां?

  • सहकारी समितियां स्वायत्त संगठन हैं, जिसमें सदस्य साझा आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं को लोकतांत्रिक नियंत्रण और साझा स्वामित्व वाले उद्यम से पूरा करते हैं।
  • सहकारी समितियों में 'एक सदस्य, एक मत' का सिद्धांत लागू होता है, जिसमें पूंजी योगदान कितना भी हो, हर सदस्य को बराबर मताधिकार मिलता है। स्वतंत्रता के बाद सहकारिता भारत के विकास मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
  • नाबार्ड और एनसीडीसी जैसे सरकारी संस्थान सहकारी संस्थाओं को समर्थन देते हैं। भारत में सहकारी बैंकों का विस्तृत ढांचा है। लगभग 1,457 शहरी सहकारी बैंक और 386 ग्रामीण बैंक हैं, जो सहकारिता के वित्तीय आयाम को सुदृढ़ करते हैं।

पंचायतों में 2 लाख पैक्स गांवों में देंगे 300 सेवाएं 

भारत के लगभग 7 लाख गांवों में प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पैक्स) आज कृषि इन्पुट उपलब्ध कराने से लेकर डेयरी जैसी प्रमुख गतिविधियों तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रही हैं। पैक्स के माध्यम से ग्रामीणों को आवश्यक वस्तुएं, सेवाएं और आय के नए अवसर मिल रहे हैं। सरकार पैक्स के दायरे को बढ़ाकर 25 से अधिक व्यवसायों के तहत 300 ज्यादा सेवाएं गांवों तक पहुंचाने में जुटी है। पिछले 70 वर्षों में पैक्स की संख्या 97,000 तक पहुंची थी, जिसे अगले 5 वर्षों में 2 लाख तक बढ़ाया जा रहा है। इससे गांवों में आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी और गांव अधिक आत्मनिर्भर बनेंगे।

पैक्स को पीएम-किसान सहित कई केंद्रीय योजनाओं से जोड़कर बहुउद्देश्यीय सेवा केंद्र बनाया जा रहा है। अब ये डेयरी, मत्स्य पालन, भंडारण, उर्वरक एवं बीज वितरण, पीडीएस, जन औषधि केंद्र, जल आपूर्ति, सीएससी, एलपीजी और पेट्रोल वितरण जैसी सेवाएं भी प्रदान करेंगे। इन सभी कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए नए मॉडल उपनियम लागू किए गए हैं। पैक्स के कम्प्यूटरीकरण के तहत एकीकृत ईआरपी प्लेटफॉर्म बनाया गया है, जिससे कामकाज में जवाबदेही, पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी। 
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह। - फोटो : गांव जंक्शन

विकसित भारत का सबसे मजबूत स्तंभ है सहकारी क्षेत्र - सहकारिता मंत्री 

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का कहना है कि भारत में सहकारिता नई बात नहीं, बल्कि वैदिक काल से चली आ रही परंपरा है - पंचायत, लंगर, चौपाल, सांझा चूल्हा और सहभोज इसका जीवंत रूप रहे हैं। इसी संस्कार को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2021 में अलग सहकारिता मंत्रालय बनाया। सहकारिता को विज्ञान से जोड़कर कृषि को मुनाफे का धंधा बनाया जा रहा है। पैक्स के जरिए ग्रामीण आबादी तक आर्थिक लाभ पहुंचाने से लेकर सहकारी संस्थाओं के बीच आपसी सहकार बढ़ाने और नेफेड, इफको, कृभको जैसे बड़े संगठनों का टर्नओवर 25% बढ़ाने का लक्ष्य रखते हुए, सहकारिता अब विकसित भारत का सबसे भरोसेमंद इंजन बन रही है।
25 से 30 नवंबर को नई दिल्ली के भारत मंडमप में आयोजित किया गया सहकारिता का महाकुंभ।
25 से 30 नवंबर को नई दिल्ली के भारत मंडमप में आयोजित किया गया सहकारिता का महाकुंभ। - फोटो : गांव जंक्शन

जारी किए गए मानक दिशा-निर्देश (एसओपी) 

पंचमहल और बनासकांठा जिलों में पायलट परियोजना के अनुभवों के आधार पर सितंबर, 2024 में मानक दिशा-निर्देश (एसओपी) जारी किए गए हैं। 
  • ये एसओपी 2 लाख नई बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (एम-पैक्स) और गांवों अथवा पंचायतों में डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों के गठन से उन्हें सुदृढ़ बनाने में भूमिका निभाएंगे। 
  • इसके तहत एएमसीयू (स्वचालित दूध संग्रह यूनिट), डीपीएमसीयू (डाटा प्रोसेसिंग दुग्ध संग्रह यूनिट), परीक्षण उपकरण, बल्क मिल्क कूलर जैसा बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे दुग्ध मूल्य शृंखला मजबूत होगी और संबंधित क्षेत्र के विकास, घरेलू मांग और निर्यात के लिए दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। 
  • सहकारी समितियों और उनके सदस्यों के सहकारी बैंकों में खाते खोलना इस अभियान का हिस्सा है।
  • सहकारी क्षेत्र का पैसा सहकारी बैंकिंग प्रणाली में ही रहेगा, जिससे सहकारी बैंकों में जमा राशि बढ़ेगी। 
  • सहकारी बैंक सस्ती ब्याज दरों पर अधिक धन उधार दे सकेंगे, जिससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। 
  • इस कड़ी में सहकारी समितियों एवं उनके सदस्यों का सहकारी बैंकों में खाता खोला जा रहा है। 
डेयरी किसानों को रूपे-किसान क्रेडिट कार्ड दिए जा रहे हैं, जिससे वे 4% ब्याज पर आसान ऋण ले सकेंगे। डेयरी सहकारी समितियों को माइक्रो-एटीएम से त्वरित लेनदेन एवं नकदी प्रवाह की सुविधा दी जा रही है। 
वर्ष 2025 तक एनसीडीसी द्वारा सहकारी क्षेत्र के लगभग 1,900 एफपीओ का गठन किया गया।
वर्ष 2025 तक एनसीडीसी द्वारा सहकारी क्षेत्र के लगभग 1,900 एफपीओ का गठन किया गया। - फोटो : गांव जंक्शन

सहकारिता के क्षेत्र में शुरू की गई भारत की नई पहलें  

  • पैक्स (प्राथमिक कृषि ऋण समितियां): मॉडल उपनियम लागू किए गए हैं, जिससे पैक्स में एकरूपता व पारदर्शिता बढ़ेगी, संचालन प्रभावी एवं लोकतांत्रिक होगा।
  • किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ): वर्ष 2025 तक राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) द्वारा सहकारी क्षेत्र के लगभग 1,900 एफपीओ का गठन किया गया।
  • मत्स्य किसान उत्पादक संगठन (एफएफपीओ): छोटे मछुआरों को बेहतर संसाधन, प्रशिक्षण व ऋण प्रदान करने के लिए एफएफपीओ को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। 
  • राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (एनसीओएल): यह वर्ष 2023 में पंजीकृत राष्ट्रीय सहकारी संस्था है, जो जैविक उत्पादों का एकत्रीकरण, प्रमाणीकरण, ब्रांडिंग और विपणन करती है।
  • श्वेत क्रांति 2.0: वर्ष 2024 में शुरू इस पहल के तहत 5 वर्षों में दुग्ध संग्रहण 50% बढ़ाने का लक्ष्य है। 9,000 से अधिक डेयरी सहकारी समितियों का पंजीकरण हो चुका है।
  • सहकारी बैंकिंग: शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को नई शाखाएं खोलने की अनुमति मिल गई है। इसके साथ ही, ग्रामीण सहकारी बैंक अब वाणिज्यिक अचल संपत्तियों को ऋण दे सकते हैं।
  • GeM पोर्टल: समितियां पारदर्शी व लागत-प्रभावी खरीद के लिए GeM पोर्टल पर खरीदार के रूप में पंजीकरण करा सकती हैं। वर्ष 2024 तक 550 से अधिक समितियां इससे जुड़ चुकी हैं।
  • स्विगी से साझेदारी: सहकारिता मंत्रालय की स्विगी इंस्टामार्ट से डेयरी एवं अन्य उत्पादों को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए साझेदारी हुई है। सहकारी ब्रांडों को विपणन व क्षमता निर्माण में स्विगी से सहयोग मिलेगा।
  • भारत ऑर्गेनिक्स: यह एनसीओएल का ब्रांड है, जिसके तहत दाल, चावल, चीनी जैसे ऑर्गेनिक उत्पाद बेचे जाते हैं। इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर मूल्य दिलाना है।

देशभर में फैले 1 लाख से अधिक पैक्स के नेटवर्क के जरिये किसानों तक सब्सिडी युक्त खाद, बीज और कीटनाशक
देशभर में फैले 1 लाख से अधिक पैक्स के नेटवर्क के जरिये किसानों तक सब्सिडी युक्त खाद, बीज और कीटनाशक - फोटो : गांव जंक्शन

सहकार शक्ति : वैश्विक सहकारी रैंकिंग में भारत अव्वल

इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस (आईसीए) की वैश्विक रैंकिंग में अमूल को प्रथम और इफको को द्वितीय स्थान मिला है। अमूल अपने 36 लाख से अधिक सदस्यों, 18,000 ग्राम समितियों और 18 जिला संघों के माध्यम से रोज लगभग 3 करोड़ लीटर से अधिक दूध संग्रहित करता है। वर्ष 2024-25 में अमूल का कारोबार 90,000 करोड़ रुपये को पार कर गया। वहीं, इफको ने 41,000 करोड़ रुपये का कारोबार किया। इफको के अनुसंधान एवं विकास प्रयासों में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे नवाचार शामिल हैं, जो ब्राजील, अमेरिका, ओमान, जॉर्डन सहित 65 देशों में भेजे जा रहे हैं।

 
हर ग्राम पंचायत में कृषि, डेयरी या फिशरीज की एक सहकारी समिति या पैक्स बनाने का लक्ष्य है।
हर ग्राम पंचायत में कृषि, डेयरी या फिशरीज की एक सहकारी समिति या पैक्स बनाने का लक्ष्य है। - फोटो : गांव जंक्शन

भारत की हर पंचायत में होगी कृषि, डेयरी या फिशरीज समिति - मीनेश शाह

एनडीडीबी के चेयरमैन मीनेश सी. शाह बताते हैं, दुग्ध उत्पादन के जरिये हमारी कोशिश गांव के लोगों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान है। हम गांवों में सहकारी सोसायटीज बनाते हैं, जो मिलकर जिला स्तर पर यूनियन बनाती हैं, इन सबको मिलाकर राज्य स्तरीय फेडरेशन बनता है। ऑपरेशन फ्लड के दौरान उभरे गुजरात के सहकारी मॉडल को एनडीडीबी ने देशभर में फैलाया। वर्ष 1970 में ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत हुई, 1996 तक इसके 3 फेज चलाए गए और 1998 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बन गया। आज भारत का दुग्ध उत्पादन करीब 230 मिलियन मीट्रिक टन पहुंच चुका है। सहकारिता मंत्रालय के साथ मिलकर हमने प्लान बनाया है कि हर ग्राम पंचायत में कृषि, डेयरी या फिशरीज की एक सहकारी समिति या पैक्स बनाएंगे।

ये समितियां इन तीनों क्षेत्रों के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भी काम करेंगी। पशुओं की उत्पादकता बढ़ाना और किसानों को सहकारी नेटवर्क से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने पर हम प्रमुखता से काम करते हैं। जिन गांवों में पहले से पैक्स हैं, वहां डेयरी चालू करा रहे हैं, जहां पैक्स नहीं हैं, वहां पैक्स का गठन कराकर उन्हें डेयरी से जोड़ रहे हैं। अगले 4-5 साल में इन समितियों की संख्या तेजी से बढ़ाई जाएगी। फोकस कम पशुओं से ज्यादा उत्पादकता प्राप्त करने पर है। इससे किसानों की लागत घटेगी और पर्यावरण को फायदा होगा। किसान कुल उत्पादित दूध का 40 फीसदी हिस्सा खुद रखते हैं और 60 फीसदी मार्केट में आता है। कुल दुग्ध उत्पादन का ज्यादा हिस्सा संगठित क्षेत्र में आए तो उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद मिलेंगे। कार्बन न्यूट्रल और नेट जीरो डेयरी की ओर हम बढ़ रहे हैं। हमारा दुग्ध उत्पादन 6 फीसदी की दर से बढ़ रहा है, जिसके लिए बाजार की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।  
पैक्स के स्तर पर विकेन्द्रीकृत गोदाम स्थापित किए जा रहे हैं।
पैक्स के स्तर पर विकेन्द्रीकृत गोदाम स्थापित किए जा रहे हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

भारत में विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना

केंद्रीय सहकारिता सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी बताते हैं कि केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना चला रहा है। पैक्स के स्तर पर विकेन्द्रीकृत गोदाम स्थापित किए जा रहे हैं। किसानों को अब कम कीमत पर अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। बिक्री के लिए वे सही समय का इंतजार कर सकेंगे और फसल का उचित मूल्य प्राप्त कर सकेंगे। फसल कटाई के बाद नुकसान भी कम किया जा सकेगा। नाफेड को इसके तहत कई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इलेक्ट्रॉनिक वेयरहाउस रसीद और वेयरहाउसिंग (विकास एवं विनियमन) प्राधिकरण से मान्यता दिलाना इनमें शामिल है। साथ ही, मूल्य संवर्धन और रिटेल फ्रेंचाइज मॉडल को बढ़ावा देकर सहकारी समितियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है।

इस योजना का पायलट प्रोजेक्ट वर्ष 2023 में 11 राज्यों - यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और तेलंगाना - में शुरू किया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पैक्स को बहु-सेवा केंद्रों में बदलना है, जिसमें गोदाम, कस्टम हायरिंग सेंटर, प्रसंस्करण इकाइयां और उचित मूल्य की दुकानें शामिल हैं। यह भारत सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है, जिसके तहत देशभर में पैक्स के स्तर पर विकेंद्रीकृत गोदाम बनाए जाएंगे।

भूटानी बताते हैं, पायलट प्रोजेक्ट एनसीडीसी के नेतृत्व में नाबार्ड, एफसीआई, सीडब्ल्यूसी और नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज (नाबकॉन्स) के सहयोग से चल रहा है। एनसीसीएफ, एनबीसीसी और राज्य सरकारों के साथ मिलकर पैक्स की संख्या बढ़ाई जा रही है। इस योजना के तहत 441 पैक्स की पहचान की गई है, 214 हायरिंग लेटर जारी किए गए हैं और 745 पुराने गोदामों को योजना में कन्वर्जेंस के तहत शामिल किया गया है। इसके साथ ही, चयनित पैक्स के लिए रिटेल सर्टिफिकेट पहल भी प्रारंभ की गई है ताकि समितियों को खुदरा व्यापार में भी मजबूत बनाया जा सके।
ऑपरेशन फ्लड के 50 साल के काम को अगले 5-10 वर्षों में पूरा करने की तैयारी।
ऑपरेशन फ्लड के 50 साल के काम को अगले 5-10 वर्षों में पूरा करने की तैयारी। - फोटो : गांव जंक्शन

भारत को बनाएंगे पूरी दुनिया की डेयरी 

अमूल के प्रबंध निदेशक जयेन मेहता बताते हैं, अमूल को दुनिया की सबसे बड़ी सहकारी संस्था बनने में 80 साल लगे। अब देशभर में सहकारी समितियों का विस्तार हो रहा है। गुजरात में 18,000 गांवों में दुग्ध समितियां हैं, जबकि देश के 2 लाख गांवों में ऐसी समितियां मौजूद हैं। देश के 5 लाख गांवों में अभी भी दुग्ध मंडलियां नहीं हैं, जिसके पीछे कम उत्पादन और व्यवहार्यता जैसी चुनौतियां हैं।

सहकारिता मंत्रालय अगले 5 वर्षों में 2 लाख गांवों में दुग्ध समितियां बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है - जो ऑपरेशन फ्लड के 50 साल के काम को अगले 5-10 वर्षों में पूरा करने जैसा है। इससे किसानों, खासकर महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और अधिक दूध संगठित क्षेत्र में आएगा। नस्ल सुधार, फीड गुणवत्ता, पशु स्वास्थ्य सेवाओं जैसे सहकारी मॉडल के अनेक लाभ गांव-गांव तक पहुंचेंगे।

दुनिया के कुल दुग्ध उत्पादन का 25% भारत में पैदा होता है, जो अगले दशक में 33% तक बढ़ने का अनुमान है। दूध भारत का सबसे बड़ा कृषि उत्पाद है, जहां प्रतिदिन 65 करोड़ लीटर उत्पादन का वार्षिक मूल्य लगभग 12 लाख करोड़ रुपये है, जो गेहूं, धान और तिलहन की कुल उपज से भी अधिक है। नई दुग्ध मंडलियां बनाने, अधिक महिलाओं को इससे जोड़ने और डेयरी के बुनियादी ढांचे के विकास का जो काम निचले स्तर पर हो रहा है, वो तेजी से बढ़ेगा और भारत दुनिया की डेयरी बनेगा।

मेहता बताते हैं, सहकारी समितियां किसानों की लागत कम करने, आय बढ़ाने और उनके जीवन स्तर में सुधार लाने का प्रभावी माध्यम हैं। अमूल किसानों के स्वामित्व वाली संस्था है और दुग्ध संग्रह से मार्केटिंग तक पूरा नियंत्रण किसानों के हाथ में है। यह मॉडल आर्थिक सशक्तिकरण के साथ गरीबी उन्मूलन, लैंगिक समानता और सतत विकास लक्ष्यों को भी आगे बढ़ाता है।
नेफेड की पहल पर 170 से अधिक मूल्य-संवर्धित उत्पाद लॉन्च किए जा चुके हैं।
नेफेड की पहल पर 170 से अधिक मूल्य-संवर्धित उत्पाद लॉन्च किए जा चुके हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

एफपीओ से एक्सपोर्ट तक नेफेड की उड़ान 

नेफेड के प्रबंध निदेशक दीपक अग्रवाल बताते हैं कि किसानों को उचित मूल्य एवं बाजार दिलाने और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के 10,000 एफपीओ के सशक्तिकरण से जुड़े कार्यक्रम में नेफेड सक्रिय योगदान दे रहा है। यह वर्तमान में 1,200 एफपीओ के साथ सीधे काम कर रहा है। नेफेड इन एफपीओ को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और प्रोसेसिंग सुविधाएं प्रदान करता है तथा उनके उत्पादों की नेफेड ब्रांड के तहत प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग करता है। 170 से अधिक मूल्य-संवर्धित उत्पाद लॉन्च किए जा चुके हैं, जिनमें मिलेट्स से बना डोसा मिक्स, पास्ता, नूडल्स तथा शहद प्रमुख हैं। ये उत्पाद नेफेड के ऑनलाइन स्टोर, संगठित रिटेल चेन, डिस्ट्रीब्यूटर्स और निर्यात के जरिये बेचे जा रहे हैं, जिसका अच्छा रिस्पॉन्स मिला है।

सरकार की 100 फीसदी दलहन खरीद नीति के तहत नेफेड एमएसपी पर किसानों से दालें खरीद रहा है, जिससे उनको सीधा लाभ पहुंच रहा है। एफपीओ और सहकारी समितियों को क्लस्टर आधारित प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग व वैश्विक बाजार तक पहुंच दिलाकर नेफेड किसानों की आय बढ़ाने में योगदान दे रहा है।
निर्यात से होने वाला मुनाफा पैक्स के जरिये किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
निर्यात से होने वाला मुनाफा पैक्स के जरिये किसानों तक पहुंचाया जाएगा। - फोटो : गांव जंक्शन

पैक्स के जरिये किसानों तक पहुंचेगा मुनाफा

कृभको के चेयरमैन चंद्रपाल सिंह यादव बताते हैं, हर पंचायत में पैक्स बनाए जा रहे हैं। पंचायतें विकास कार्य करेगी और पैक्स व्यावसायिक एवं आर्थिक गतिविधियां संभालेंगे। किसानों को अच्छे बीज, गुणवत्तापूर्ण उर्वरक और कीटनाशक समय पर उचित कीमत पर मिलेंगे।

चंद्रपाल सिंह बताते हैं, कृभको सहकारी समितियों के जरिये पूरे देश में उर्वरक उपलब्ध कराता है। यूरिया उत्पादन में भारत लगभग आत्मनिर्भर है। फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए कच्चा माल आयात करना पड़ता है, लेकिन सरकार की कोशिश रहती है कि आयात के बावजूद किसानों को इनकी निर्बाध आपूर्ति उचित दर पर मिलती रहे। वहीं, नेफेड, एनसीसीएफ और राज्य विपणन संघ किसानों की उपज को एमएसपी या उससे अधिक दर पर खरीदकर बाजार उपलब्ध कराते हैं।

सिंह बताते हैं, कृषि उत्पादों को प्रसंस्कृत कर निर्यात करने के लिए नई सहकारी संस्थाएं बनाई गई हैं, जिससे किसानों को लाभकारी मूल्य मिल रहा है। बेहद कम समय में 6,000 से अधिक समितियां राष्ट्रीय एक्सपोर्ट कोऑपरेटिव की सदस्य बन गई थीं और 16,000 से अधिक समितियां राष्ट्रीय बीज सहकारी समिति की सदस्य हैं। निर्यात से होने वाला मुनाफा पैक्स के जरिये किसानों तक पहुंचाया जाएगा। 
एफपीओ कृषि से लेकर प्रोसेसिंग तक कई तरह के काम कर रहे हैं।
एफपीओ कृषि से लेकर प्रोसेसिंग तक कई तरह के काम कर रहे हैं। - फोटो : गांव जंक्शन

एक एफपीओ पर 58 लाख रुपये खर्च करती है सरकार 

किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) सहकारी संस्था का आधुनिक रूप है, जो कंपनी एक्ट या सहकारी एक्ट के तहत गठित होते हैं। मैदानी क्षेत्र में 300 तथा पर्वतीय क्षेत्र में 100 सदस्यों के साथ जिला सहकारिता कार्यालय में पंजीकरण कराया जाता है, जिसके बाद सीबीबीओ लोगों को जागरूक करके एफपीओ से जोड़ते हैं। सरकार एफपीओ को सदस्यों के इक्विटी अंशदान के बराबर 15 लाख रुपये तक अनुदान, प्रबंधन एवं ऑफिस सेटअप के लिए 18 लाख रुपये, तीन साल तक सीईओ-अकाउंटेंट की सैलरी तथा ऑफिस किराया देती है, जिससे कुल औसतन 58 लाख रुपये की सहायता मिलती है। सदस्यों को सस्ते इन्पुट, मशीनरी, प्रशिक्षण, प्रोसेसिंग सुविधा, मार्केट लिंकेज तथा नाबार्ड के क्रेडिट गारंटी फंड से 2 करोड़ रुपये तक बिना गारंटी ऋण भी मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस मनाने की शुरुआत हुई।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस मनाने की शुरुआत हुई। - फोटो : गांव जंक्शन
  • 8,44,000 - सहकारी समितियां भारत में 30 से अधिक क्षेत्रों में कार्य करती हैं। 
  • 73,492  - पैक्स के कम्प्यूटरीकरण के प्रस्ताव अब तक देशभर से मिले हैं। 
  • 23,173 - नई बहुउद्देशीय पैक्स सहकारी समितियां पंजीकृत की गई हैं। 
  • 59,920 - पैक्स को एकीकृत ईआरपी प्लेटफॉर्म पर जोड़ा गया है। 
  • 667 - सहकारी समितियां GeM पोर्टल पर खरीदार के रूप में पंजीकृत हैं। 
  • 319.02 - करोड़ रुपये के 2,986 लेनदेन GeM पोर्टल पर सहकारी समितियों द्वारा किए गए हैं।  

ब्रिटिश सरकार ने सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम वर्ष 1904 में बनाया।
ब्रिटिश सरकार ने सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम वर्ष 1904 में बनाया। - फोटो : गांव जंक्शन

प्रारंभिक सुधार (1901-1947)

  • 1904: ब्रिटिश सरकार ने सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम वर्ष 1904 में बनाया, जिसका उद्देश्य सूदखोरों से किसानों को मुक्ति दिलाना था।
  • 1912: मैकलेगन समिति की रिपोर्ट के बाद सहकारी समिति अधिनियम, 1912 लागू हुआ, जिसमें गैर-क्रेडिट सहकारी संस्थाओं को शामिल किया गया।
  • 1919: भारत सरकार ने कानूनी तौर पर सहकारिता को प्रांतीय विषय बनाया, जिसके परिणामस्वरूप 1925 का बॉम्बे सहकारी समिति कानून पारित हुआ, जो किसी प्रांतीय सरकार द्वारा पारित पहला सहकारी कानून था।
  • 1942: सर माल्कम डार्लिंग की रिपोर्ट ने सहकारी आंदोलन की कमजोरियों को उजागर किया। भारत सरकार ने एक खास कानून बनाया – मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, जिसके तहत एक से ज्यादा राज्यों में काम करने वाली सहकारी संस्थाओं के लिए अलग-अलग पंजीकरण की बाध्यता खत्म हो गई। केंद्र ने पावर राज्य के रजिस्ट्रार को दे दी, ताकि काम आसान और तेज हो जाए। 

स्वतंत्र भारत में विकास (1947-1990)

  • 1951: प्रथम पंचवर्षीय योजना में सहकारिता को ग्रामीण विकास, ग्रामीण ऋण और कृषि की मजबूती का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया। 
  • 1954: रिजर्व बैंक द्वारा गठित ऑल-इंडिया रूरल क्रेडिट सर्वे कमेटी की रिपोर्ट के बाद सहकारी बैंकों का पुनर्गठन हुआ।
  • 1963: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) का गठन हुआ। 

दुग्ध सहकारिता का स्वर्णकाल (1960-70) 

  • 1970: डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में एनडीडीबी द्वारा शुरू ऑपरेशन फ्लड ने अमूल के तीन-स्तरीय सहकारी मॉडल को पूरे देश में लागू किया। इसने भारत को
  • 1970 के 20 मिलियन टन दुग्ध उत्पादन से 2023-24 में 230 मिलियन टन उत्पादन तक पहुंचा दिया। 
  • 1982: नाबार्ड की स्थापना होने के साथ सहकारी बैंकों एवं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को वित्तीय सहायता की नई शुरुआत हो गई। 
  • 1984: राज्यों में सहकारी समितियों को नियंत्रित करने वाले कानूनों को सुव्यवस्थित करने के लिए बहु-राज्य सहकारी संगठन कानून बना।
  • 1991: सहकारी बैंकों और संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु सुझाव। 

आधुनिक सुधार (2000 से अब तक)

  • 2002: राष्ट्रीय सहकारिता नीति घोषित।
  • 2011: 97वां संविधान संशोधन, अनुच्छेद 19(1)(सी) नागरिकों को संघ बनाने का अधिकार देता है, जिसमें सहकारी समितियां भी शामिल हैं।
  • 2021: केंद्र सरकार ने अलग सहकारिता मंत्रालय बनाया, अमित शाह बने पहले केंद्रीय सहकारिता मंत्री।
  • 2023: भारत सरकार ने 31 मई 2023 को सहकारी क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मंजूरी दी।
  • 2023: तीन नई राष्ट्रीय सहकारी समितियां गठित - राष्ट्रीय सहकारी जैविक संघ (एनसीओएल), राष्ट्रीय सहकारी निर्यात संघ (एनसीईएल) और राष्ट्रीय सहकारी बहु-उद्देशीय संघ (एनसीएमपीएफ)।
  • 2024: बजट में पैक्स को डेयरी, मत्स्य पालन एवं अनाज भंडारण से जोड़ने की योजना पेश की गई; 2 लाख नए पैक्स / डेयरी / फिशरीज कोऑपरेटिव बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 

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