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असम में चुनावी मौसम: 30 से 35 सीटों पर निर्णायक भूमिका में चाय बागान मजदूर, लेकिन ST दर्जे की मांग अब भी अधूरी
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 03 Apr 2026 07:31 PM IST
सार
असम में 9 अप्रैल को होने वाले मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चाय बागानों का दौरा और महिला चाय मजदूरों से बातचीत यह बताता है कि राज्य की राजनीति में चाय की भूमिका आखिर कितनी अहम है।
असम विधानसभा की 126 सीटों में से 30 से 35 सीटों पर चाय बागान श्रमिकों का सीधा प्रभाव है।
- फोटो : @narendramodi
असम विधानसभा चुनाव 2026 की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, राज्य की राजनीति का केंद्र एक बार फिर चाय बागान बन रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 अप्रैल को जब डिब्रूगढ़ के मनोहारी चाय बागान में जाकर महिला श्रमिकों के साथ चाय पत्ती तोड़ते हुए दिखे और उनके साथ सेल्फी लेते नजर आए, तो इसे महज भावनात्मक पल के तौर पर नहीं देखा गया, बल्कि इसे सुविचारित राजनीतिक संदेश की तरह देखा गया।
35 सीटों पर अहम चाय बागान मजदूर
असम विधानसभा की 126 सीटों में से 30 से 35 सीटों पर चाय बागान श्रमिकों का सीधा प्रभाव है। राज्य की कुल आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा चाय जनजातियों का है, जो मुख्यतः छोटा नागपुर पठार के आदिवासी समुदायों के वंशज हैं। अंग्रेज उन्हें 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बागानों में काम करने के लिए असम लाए थे।
ऊपरी असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, गोलाघाट, जोरहाट, शिवसागर, लखीमपुर और सोनितपुर जिलों में चाय बागान मुख्य रूप से फैले हुए हैं। इन इलाकों में रहने वाली चाय जनजातियों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी और हाशिए पर रहकर सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को झेला है, लेकिन चुनावी राजनीति में इनकी ताकत को कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सका।
चाय जनजातियों के वोट की ताकत
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए ने ऊपरी और उत्तरी असम के इन जिलों की 42 में से 36 सीटें जीती थीं। तब एनडीए ने कुल 126 में से 75 सीटें जीती थीं। वर्ष 2016 में पहली बार सत्ता में आई भाजपा ने तब 60 सीटें जीती थीं। चाय जनजातियों के समुदाय के इस मजबूत समर्थन के पीछे कल्याणकारी योजनाओं और सामुदायिक पहचान की राजनीति का बड़ा योगदान रहा है।
भारतीय चाय बोर्ड के अध्यक्ष पी.के. बेजबरुआ के अनुसार, वर्ष 2016 से भाजपा सरकार ने चाय बागान क्षेत्रों में विकास कार्य किए हैं और पहले सरकारी नियमों की आड़ में योजनाओं को रोका जाता था, जो अब नहीं हो रहा।
जमीन का पट्टा - बड़ा चुनावी दांव
इस चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा दांव है - चाय बागान श्रमिकों को उनकी आवासीय भूमि का स्वामित्व देना। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने मिशन बसुंधरा के तहत चाय बागान परिवारों को भूमि पट्टे देने की पहल की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 760 बागानों की 3.5 लाख से अधिक परिवारों को भूमि अधिकार मिलने हैं, जिनमें से अब तक 28,241 परिवारों को पट्टे वितरित किए जा चुके हैं।
13 मार्च को गुवाहाटी में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल रूप से लाभार्थियों को पट्टे वितरित किए और इसे ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का कदम बताया। डिब्रूगढ़ के दिनजोय चाय बागान में काम करने वाले कुठारती भूमिज, जिन्हें प्रधानमंत्री ने खुद गले लगाकर पट्टा सौंपा, चाय श्रमिकों के बीच उम्मीद के प्रतीक बन गए हैं। उनका कहना है कि 200 साल बाद मोदी जी ने जमीन का अधिकार दिया, जिससे उनकी गरिमा बढ़ेगी।
30 रुपये मजदूरी बढ़ी, 500 की मांग बरकरार
दूसरी बड़ी घोषणा है - चाय बागान श्रमिकों की दैनिक मजदूरी में वृद्धि। ब्रह्मपुत्र घाटी में चाय श्रमिकों की दैनिक मजदूरी 250 रुपये थी, जिसे सरकार ने 1 अप्रैल से 30 रुपये बढ़ाकर 280 रुपये कर दिया है। श्रमिक 500 रुपये प्रतिदिन की मांग कर रहे हैं और 30 रुपये की बढ़ोतरी को बहुत कम मानते हैं, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस घोषणा का भावनात्मक असर जरूर पड़ा है।
इसके अलावा, सरकार ने 'मुख्यमंत्री एती कोली दुती पात योजना' के तहत हर चाय श्रमिक को 5,000 रुपये की एकमुश्त सहायता और ओरुनोदोई नकद योजना के तहत महिलाओं को 9,000 रुपये देने की व्यवस्था की है।
चाय मजदूरों की मांग - एसटी का दर्जा
चुनाव की लोक-लुभावन घोषणाओं के बीच चाय श्रमिकों के असल मुद्दे गहरे और दीर्घकालिक हैं। डिब्रूगढ़ क्षेत्र के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों का कहना है कि मजदूरी, बढ़ती महंगाई और बुनियादी सुविधाओं का अभाव उनकी सबसे बड़ी चिंताएं हैं। महिला श्रमिकों ने काम के लंबे घंटे, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं और बढ़ते घरेलू खर्च को प्रमुख समस्याओं के रूप में उठाया है।
इन सबके बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा है - अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा, जो दशकों से इस समुदाय की मांग रही है। पानीतोला चाय बागान के श्रमिक अजय कलुंडी कहते हैं कि भाजपा ने पहले 351 रुपये मजदूरी का वादा किया था, जो पूरा नहीं हुआ, एसटी दर्जे का वादा भी अधूरा है और पट्टे के फॉर्म मिले हैं, लेकिन असल में मिलेगा या नहीं, इसको लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
बागान मालिकों का विरोध - अदालत पहुंचा मामला
भूमि पट्टे की पहल सहज नहीं रही। सरकार ने पिछले नवंबर में भूमि की सीमा से जुड़े कानून में संशोधन करके श्रमिक आवासीय क्षेत्रों को अधिशेष भूमि घोषित करने का रास्ता बनाया, जिससे बागान मालिकों के संगठन अदालत पहुंच गए। बागान प्रबंधकों का तर्क है कि चाय बागानों के लिए श्रमिक आवास एक वैधानिक कल्याण आवश्यकता है, और इस भूमि के अधिग्रहण से यह बाधित होगा। हालांकि, सरकार ने इसे चुनाव से पहले धकेल दिया।
प्रतीकात्मक राजनीति के लगे आरोप
कांग्रेस ने भाजपा की इन पहलों को चुनावी स्टंट करार दिया है। चाबुआ-लाहोवाल सीट से कांग्रेस प्रत्याशी प्रांजल घाटोवर कहते हैं कि भूमि पट्टा चाय जनजातियों की एक दीर्घकालिक मांग रही है, लेकिन इसे अव्यवस्थित तरीके से चुनाव से ठीक पहले प्रतीकात्मक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी उठाया कि विधानसभा में चाय जनजातियों का प्रतिनिधित्व 10 से अधिक विधायकों से घटकर मात्र पांच रह गया है। कांग्रेस शिक्षा, स्वास्थ्य और एसटी दर्जे जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर इस समुदाय को लुभाने की कोशिश कर रही है।
चाय वोट किसके पाले में जाएंगे!
फिलहाल जमीनी हकीकत यह है कि भूमि पट्टे की घोषणा ने चाय बागान क्षेत्रों में भाजपा के लिए सकारात्मक माहौल बनाया है। सीलकोटी चाय बागान में काम करने वाली 35 वर्षीय रेखा नायक बाल कहती हैं कि कुछ लोगों को पट्टा मिला है और लोग यह सोच रहे हैं कि अगर वही सरकार आएगी तो बाकियों को भी मिलेगा। हालांकि, अधूरे वादों, कम मजदूरी और एसटी दर्जे की लंबित मांग को लेकर असंतोष भी काफी गहरा है।
प्रधानमंत्री मोदी का चाय बागान दौरा और महिला श्रमिकों के साथ उनकी सेल्फी चाय बागान मजदूरों के साथ इसी भावनात्मक जुड़ाव को और पक्का करने का प्रयास माना जा रहा है। हालांकि, असम के चाय बागानों में कमल खिलेगा या नहीं - इसका जवाब 4 मई को मतगणना के दिन ही मिल सकेगा।
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