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अरावली के अस्तित्व पर संकट: ढह रही है रेगिस्तान और राजधानी के बीच आखिरी जीवनदायी दीवार

डॉ. उमाशंकर मिश्र Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 21 Dec 2025 02:10 PM IST
सार

गुजरात से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली 250 करोड़ साल से अधिक पुरानी अरावली की पुरातन पर्वतमाला सिर्फ पत्थरों के ऊंचे टीलों से नहीं बनी है, बल्कि इसमें जीवन बसता है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नई कानूनी परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद अब अरावली के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। 

अरावली की नई परिभाषा से इस पुरातन पर्वतमाला के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
अरावली की नई परिभाषा से इस पुरातन पर्वतमाला के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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अरावली पर्वतमाला भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में फैली लगभग 692 किलोमीटर लंबी प्राचीन पर्वत शृंखला है, जो गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक फैली हुई है। यह सिर्फ एक भौगोलिक संरचना ही नहीं है, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की हवा, पानी और जैव विविधता को संतुलित रखने वाला प्राकृतिक ढाल (ग्रीन शील्ड) है।

जीवनदायी रही है अरावली की भूमिका 
अरावली पर्वतमाला ने हजारों वर्षों से रेगिस्तान की ऊष्मा और धूल के फैलाव को रोककर, मानसून की बारिश को मोड़कर भूजल रिचार्ज और वायु गुणवत्ता के सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अरावली मनुष्य से लेकर जंगलों, जीव-जंतुओं पेड़-पौधों, खेती और जलाश्यों को जीवन देती है। थार मरुस्थल से आने वाले रेतीली आंधियों को रोककर यह उत्तर भारत को कई बड़ी परेशानियों से बचाती है। खनन, निर्माण कार्य और मानवीय गतिविधियों के कारण अरावली लगातार सिमट रही है।

पर्यावरण से जुड़े अध्ययन बताते हैं कि अरावली क्षेत्र वर्षा जल को सोखकर भूजल को रिचार्ज करने में सहायक है और लगभग 20 लाख लीटर प्रति हेक्टेयर तक भूजल पुनर्भरण क्षमता रखता है। इसके बिना उप-हिमालयी और मैदानों में भूजल का संकट और गहरा सकता है। यह शृंखला दिल्ली-एनसीआर के लिए वायु प्रदूषण को रोकने वाला पहला प्राकृतिक अवरोध भी है, खासकर थार रेगिस्तान से उड़ती धूल को रोककर यह रेत भरी आंधियों को फैलने से रोकता है।

दुनिया की पुरातन पर्वत शृंखलाओं में शामिल
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरातन पर्वत शृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु विभिन्न भूवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार लगभग 2.5 से 3.2 अरब वर्ष (250-320 करोड़ वर्ष) मानी जाती है। इसकी चट्टानों का आधार आर्कियन युग (3.2 अरब वर्ष पुराना) का है, जबकि मुख्य वलन (फोल्डिंग) और उठान पेलियोप्रोटेरोजोइक युग (लगभग 1.8-2.2 अरब वर्ष पूर्व) में हुआ। कुछ स्रोत इसे 1.5-1.8 अरब वर्ष पुराना बताते हैं, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इसे 3 अरब वर्ष से अधिक पुरानी मानते हैं, जो हिमालय से बहुत पुरानी है। बता दें कि हिमालय केवल 5 करोड़ वर्ष पुराना माना जाता है। वहीं, अरावली पर्वत शृंखला प्राचीन होने के कारण अब बहुत अपरदित हो चुकी है और इसकी ऊंची चोटियां कम रह गई हैं। 

क्या है अरावली की नई परिभाषा  
20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नई कानूनी परिभाषा को मंजूर कर लिया, जिसके अनुसार अब “अरावली हिल्स” वह भू-आकृतियां मानी जाएंगी, जो आसपास के भू-स्तर से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठी हुई हों, और “अरावली रेंज” में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के भीतर हों। 

नई परिभाषा से पर्यावरणिदों की चिंताएं 
अरावली की नई परिभाषा और तकनीकी मापदंड पर्यावरण समुदाय के लिए चिंता का विषय बनकर उभरा है क्योंकि यह मानक अरावली की कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों और रिज क्षेत्र को संरक्षण से बाहर करता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंतरिक डेटा के अनुसार, 20 मीटर से ऊंची 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ लगभग 8.7% ही 100 मीटर की शर्त पूरी करती हैं, यानी करीब 90% अरावली क्षेत्र संरक्षण की परिभाषा से बाहर हो सकता है।

खनन, निर्माण जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा
अरावली की नई परिभाषा से पर्यावरणविद चिंतिंत हैं कि इससे खनन, निर्माण और अन्य मानव गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पारिस्थितिक संतुलन पर नकारात्मक असर हो सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने खनन पर संतुलित आदेश जारी किया है। व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और वैज्ञानिक मानचित्रण पूरा होने तक नई खनन पट्टियां जारी नहीं होंगी और संरक्षित क्षेत्रों जैसे वन्यजीव आवास, जल स्रोतों और महत्वपूर्ण रिचार्ज क्षेत्रों में प्रतिबंध जारी रहेगा।

गंभीर क्यों हैं विशेषज्ञ चेतावनियां?
  • छोटी पहाड़ियों का पारिस्थितिक महत्व: पर्यावरण कार्यकर्ता और वैज्ञानिक इस फैसले को परियावरण के लिए जोखिम मानते हैं, क्योंकि छोटी पहाड़ियों का पारिस्थितिक कार्य महत्वपूर्ण है। ये हवा की गति को तोड़ती हैं, धूल और रेत के भार को कम करती हैं, और रेगिस्तान के फैलाव को धीमा करती हैं। 
  • जल संकट और भूजल रिचार्ज पर असर: पहाड़ियों के ढलानों पर वर्षा का संग्रह और उसे भूमि में सोखने की क्षमता बहुत महत्वपूर्ण है; यदि ये ढलान कानूनी संरक्षण से बाहर होंगे तो भूजल का स्तर और गिर सकता है। 
  • जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन: अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि अनेक प्रजातियों का आवास है, जिनमें बड़े स्तनधारी, पक्षी और पशु शामिल हैं-वह वैध संरक्षण वाले और गलियारे जुड़े हुए हैं। 
  • मानव स्वास्थ्य पर भी पडे़गा असर: बिना पारिस्थितिक अवरोधों के थार रेगिस्तान की धूल बड़े क्षेत्र में फैल सकती है, जिससे वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। एक विश्लेषण के अनुसार दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगरों में वायु गुणवत्ता भारी कणों (PM2.5/PM10) के कारण खराब होती है, और प्राकृतिक ढाल की कमी इस समस्या को और बढ़ा सकती है। 
क्या है सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया 
नई परिभाषा को लेकर पूरे उत्तर भारत में #SaveAravalli आंदोलन तेज हो गया है। गुरुग्राम, उदयपुर और राजस्थान के अन्य हिस्सों में पर्यावरण कार्यकर्ताओं, वकीलों और नागरिकों के विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिसमें मांग यह की जा रही है कि अरावली को सार्वभौमिक, पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाए और 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर सीमा सीमित न रखी जाए। 

राजस्थान जैसे राज्यों में जहां यह पर्वतमाला लगभग 15 जिलों में फैली हुई है, विरोध केवल संरक्षण का नहीं, आजीविका, जल सुरक्षा और पारंपरिक जीवनशैली के बचाव का भी मामला बन गया है। आदिवासी समुदायों ने अरावली को अपनी पहचान का हिस्सा बताते हुए इसके संरक्षण की मांग की है, यह जताते हुए कि उनके संसाधनों और अधिकारों पर अतिक्रमण और पर्यावरणीय क्षरण का सीधा प्रभाव हो रहा है। 

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और आम जनता भी आंदोलन में शामिल हैं, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श और सामाजिक चेतना का हिस्सा बनकर उभरा है।

सियासी विपक्ष और नीतिगत पहलू 
राजनीतिक स्तर पर भी यह विवाद गहरा रहा है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री ने इस फैसले को पर्यावरणीय विनाश के लिए खुला निमंत्रण बताया है और कहा है कि यह विवाद पर्यावरण संतुलन और राज्य की पहचान के लिए खतरनाक है। कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने इस फैसले पर कहा है कि केंद्र सरकार को तत्काल समीक्षा याचिका दायर करनी चाहिए। वहीं, सरकार का पक्ष है कि नई परिभाषा से एक समान नीति और स्पष्टता आएगी, जिससे संरक्षण और विकास के बीच संतुलन संभव होगा, विशेष रूप से खनन लाइसेंस और जमीन उपयोग के मामलों में बदलाव आएगा।

अब भी वैज्ञानिकों और प्रशासन के बीच यह प्रयास जारी है कि कैसे पारिस्थितिक लाभ जैसे वायु गुणवत्ता नियंत्रण, भूजल रिचार्ज, जैव विविधता संरक्षण को सुनिश्चित किया जाए, जबकि आर्थिक गतिविधियों को भी ध्यान में रखा जाए। अरावली का यह विवाद पर्यावरणीय निर्णयों में डेटा-आधारित नीति बनाम तकनीकी परिभाषा की टकराहट का उदाहरण बन गया है।

अरावली विवाद केवल “ऊंचाई का सवाल” नहीं है। यह जल सुरक्षा, वायु गुणवत्ता, पारिस्थितिक संतुलन, समाजिक न्याय और राजनीतिक निर्णय सबका मिश्रण है। यदि अरावली की अधिकांश भूमियां संरक्षण से बाहर चली गईं, तो नागरिक नीतियों, कृषि, जलवायु अनुकूलन और शहरों की स्वास्थ्य नीति पर यह निर्णय गंभीर असर डालेगा।

अरावली विवाद केवल “ऊंचाई का सवाल” नहीं है। यह जल सुरक्षा, वायु गुणवत्ता, पारिस्थितिक संतुलन, समाजिक न्याय और राजनीतिक निर्णय सबका मिश्रण है। यदि अरावली की अधिकांश भूमियां संरक्षण से बाहर चली गईं, तो दक्षिणी भारत की नागरिक नीतियों, कृषि, जलवायु अनुकूलन और शहरों की स्वास्थ्य नीति पर यह निर्णय दशक भर तक असर डालेगा।
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