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Cotton Farmer: कपड़े महंगे, फिर भी कपास सस्ती... आखिर कहां अटक रही किसान की कमाई?

विजय जावांधिया, कृषि अर्थशास्त्री Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 02 Nov 2026 05:48 PM IST
सार

  • कपास के दाम गिरने पर किसान को नुकसान होता है, लेकिन कपड़े की कीमतें उसी अनुपात में कम नहीं होतीं।

  • बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी की बढ़ती लागत से कपास किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर भारतीय कपास किसानों पर भी पड़ता है।

  • सिर्फ एमएसपी घोषित करना काफी नहीं, किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिलना भी जरूरी है।

कपास सस्ता, कपड़ा महंगा: मुनाफे की कड़ी कहां है?
कपास सस्ता, कपड़ा महंगा: मुनाफे की कड़ी कहां है? - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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किसान खेत में कपास उगाता है, लेकिन उसकी कमाई का फैसला अक्सर ऐसे बाजार में होता है, जिस पर उसका सीधा नियंत्रण नहीं है। बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी का खर्च लगातार बढ़ रहा है। दूसरी ओर, कपास के बाजार भाव में उतार-चढ़ाव से किसान की आमदनी अनिश्चित बनी रहती है। सवाल यह है कि जब कपास के दाम गिरते हैं, तब कपड़ा सस्ता क्यों नहीं होता? और जब कपड़े के बाजार में तेजी आती है, तो उसका फायदा कपास उगाने वाले किसान तक कितना पहुंचता है?

कपास किसान को केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करके नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो खेती की बढ़ती लागत, बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव, मौसम की मार और किसानों की आमदनी में अनिश्चितता को ध्यान में रखे। कपास की समस्या केवल खेत तक सीमित नहीं है। इसका संबंध बीज उद्योग, कपड़ा उद्योग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सरकारी सब्सिडी और कृषि बीमा से भी है। अगर इन सभी कड़ियों को किसान के हित में नहीं जोड़ा गया, तो कपास उत्पादन करने वाले किसानों की आर्थिक मुश्किलें बनी रहेंगी।

कपास के दाम तय करने में किसान की हो अहम भूमिका
कपास की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की अहम भूमिका होती है। अमेरिका जैसे बड़े उत्पादक देशों में कीमतों में होने वाले बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का नुकसान भारतीय किसान को उठाना पड़ता है, तो उसकी आमदनी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी कौन लेगा? जब बाजार में तेजी होती है, तब किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं, लेकिन गिरावट आने पर उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है। खेती की लागत पहले ही लग चुकी होती है, इसलिए कीमतों में गिरावट किसान के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकती है।

यहां एमएसपी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार कपास के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन किसान के सामने वास्तविक चुनौती यह है कि उसे अपनी उपज बेचते समय उस कीमत का लाभ मिल भी रहा है या नहीं। यदि बाजार में किसानों को एमएसपी नहीं मिल रही, तो केवल घोषणा से क्या हासिल होगा? उनके अनुसार, सरकार को खरीद व्यवस्था को प्रभावी बनाने के साथ-साथ यह भी देखना चाहिए कि किसानों को उत्पादन लागत के अनुरूप लाभकारी मूल्य मिले।

कपास सस्ता, कपड़ा महंगा: मुनाफे की कड़ी कहां है?
जवाब- कपास से कपड़ा बनने तक कई चरण आते हैं। खेत से निकली कपास जिनिंग इकाइयों तक पहुंचती है, जहां से रुई और बिनौला अलग किए जाते हैं। इसके बाद रुई से धागा और धागे से कपड़ा तैयार होता है। फिर कपड़ा प्रसंस्करण, तैयार परिधान और खुदरा बाजार तक पहुंचता है।

हर चरण पर लागत, श्रम, परिवहन और कारोबार से जुड़े दूसरे खर्च जुड़ते हैं। इसलिए कच्चे माल की कीमत घटने पर तैयार कपड़े की कीमत तुरंत उसी अनुपात में घटे, यह जरूरी नहीं है। हालांकि, कपास उत्पादकों की चिंता यह है कि कीमतों में गिरावट का पूरा दबाव किसान पर क्यों आता है, जबकि तैयार कपड़े के बाजार में उसका लाभ उपभोक्ता या किसान तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुंचता। सरकार को यह बताना चाहिए कि कपड़ा उद्योग के विस्तार और निर्यात से कपास उत्पादकों को कितना लाभ मिला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच-एफ विजन- फार्म, फाइबर, फैब्रिक, फैशन और फॉरेन- खेत से विदेशी बाजार तक की इस पूरी शृंखला में किसान की आय को स्थिर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। कपड़ा उद्योग को मजबूत करने की नीति तभी सफल मानी जाएगी, जब उसका फायदा कच्चा माल पैदा करने वाले किसानों तक भी पहुंचे।

खेती की लागत बढ़ी, जोखिम भी बढ़ा
कपास की खेती में किसान को बुवाई से लेकर कटाई तक कई तरह के खर्च उठाने पड़ते हैं। अच्छे बीज, उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई और मजदूरी पर होने वाला खर्च उसकी लागत बढ़ाता है। मौसम की अनिश्चितता इस जोखिम को और बढ़ा देती है। कई इलाकों में खेतों से खरपतवार हटाने और कपास चुनने के लिए मजदूर जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। मजदूरी महंगी होने से किसानों का खर्च बढ़ता है। दूसरी तरफ, बारिश में बदलाव, सूखा और दूसरे मौसमी जोखिम उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं।

कपास की खेती में किसान को पहले ही पर्याप्त पूंजी लगानी पड़ती है। यदि फसल कमजोर रह जाए या बाजार में उचित दाम न मिले, तो उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है। ऐसे में केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उत्पादन के साथ लागत, बाजार और जोखिम प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा। कपास उत्पादकों के लिए ऐसी आर्थिक सुरक्षा जरूरी है, जिससे खराब मौसम या बाजार में गिरावट के कारण उनकी पूरी कमाई खत्म न हो जाए।

मजबूत हो फसल बीमा व्यवस्था
फसल बीमा का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं और निर्धारित जोखिमों से होने वाले फसल नुकसान की भरपाई में मदद करना है। कपास किसानों को उत्पादन घटने के साथ-साथ बाजार भाव गिरने का भी जोखिम उठाना पड़ता है। यदि फसल बीमा केवल निर्धारित परिस्थितियों में हुए नुकसान की भरपाई करता है, तो बाजार में कीमतें गिरने से होने वाली आर्थिक परेशानी का समाधान अलग से तलाशना होगा।

ऐसी बीमा व्यवस्था की जरूरत है, जो किसानों को अधिक प्रभावी सुरक्षा दे सके। हालांकि, उत्पादन में कमी और बाजार मूल्य में गिरावट दो अलग-अलग जोखिम हैं। इन्हें एक ही बीमा योजना के तहत कवर करने के लिए नियम, पात्रता और मुआवजे की व्यवस्था अलग-अलग स्पष्ट करनी होगी। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसान की सुरक्षा केवल फसल बचाने तक सीमित नहीं हो सकती। फसल तैयार होने के बाद उसे लाभकारी दाम पर बेच पाना भी उसकी आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।
 
एमएसपी से आगे बढ़कर आय सुरक्षा की जरूरत
एमएसपी से आगे बढ़कर आय सुरक्षा की जरूरत - फोटो : सोशल मीडिया
कपास के बीज की कीमत और गुणवत्ता की जानकारी हो स्पष्ट
कपास के बीजों के बाजार में किसानों को महंगे बीज खरीदने पड़ते हैं और उन्हें उनकी गुणवत्ता तथा उत्पादन क्षमता के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। कम कीमत वाले बीज महंगे दाम पर किसानों को बेचे जाते हैं। बीज की कीमत के साथ उसकी किस्म भी महत्वपूर्ण है। संकर बीजों और दूसरी पीढ़ी के बीजों के प्रदर्शन में अंतर हो सकता है।

इसलिए किसान को यह जानना चाहिए कि वह कौन-सी किस्म खरीद रहा है, उससे किस तरह के परिणाम की उम्मीद की जा सकती है और उसकी खेती के लिए कौन-सी तकनीक उपयुक्त है। सरकार को बीज बाजार की निगरानी और किसानों को सही जानकारी उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

बीजों की किस्मों और तकनीक को मिले बढ़ावा
कपास की खेती में मजदूरों की कमी एक बड़ी चुनौती बन रही है। जब किसानों को खेतों में मजदूर नहीं मिल रहे, तो संकर कपास के बीज तैयार करने में लगने वाले श्रम की उपलब्धता पर भी विचार होना चाहिए। ऐसी किस्मों और तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत है, जो किसानों की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हों।

खरपतवारनाशक सहनशील तकनीक को अनुमति देनी चाहिए। लेकिन ऐसी तकनीक के लाभ, पर्यावरणीय प्रभाव, खरपतवार प्रतिरोध, बीज की लागत और किसानों की निर्भरता का आकलन वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए। सिर्फ मजदूरों की कमी के आधार पर किसी तकनीक को अपनाना या खारिज करना उचित नहीं होगा। जरूरत ऐसी नीति की है, जिसमें किसानों की लागत, श्रम की उपलब्धता, पर्यावरण और दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता को एक साथ देखा जाए।

कपास की सघन खेती जरूरत 
कपास की सघन खेती यानी हाई डेंसिटी प्लांटेशन पद्धिति में सामान्य तरीके की तुलना में अधिक पौधे लगाए जाते हैं। हालांकि, अधिक पौधे लगाने के लिए बीज, पौधों के बीच दूरी, पोषण, पानी, कीट नियंत्रण और फसल प्रबंधन की योजना भी बदलनी पड़ सकती है। इसलिए केवल पौधों की संख्या बढ़ाने से उत्पादन या मुनाफा बढ़ने की गारंटी नहीं है।

यदि किसान को अधिक पौधे लगाने के लिए महंगे बीज खरीदने पड़ें, तो उसकी लागत कितनी बढ़ेगी? साथ ही, बीज की गुणवत्ता और किस्म की शुद्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। सघन खेती को बढ़ावा देने से पहले स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षण, प्रति एकड़ लागत, उपज, गुणवत्ता और शुद्ध लाभ का आकलन होना चाहिए। किसान के लिए असली पैमाना यह है कि सभी खर्च निकालने के बाद उसकी आय कितनी बढ़ती है।

एमएसपी से आगे बढ़कर आय सुरक्षा की जरूरत
कपास किसानों की समस्याओं का समाधान किसी एक फैसले से नहीं होगा। इसके लिए मूल्य नीति, बीज व्यवस्था, फसल बीमा, श्रम उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी नीतियों में तालमेल जरूरी है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के तहत किसानों को उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत लाभ के आधार पर कीमत मिलनी चाहिए। कपास जैसी व्यावसायिक फसलों के मामले में भी किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने पर गंभीरता से विचार किया जाए।

अमेरिका में कपास किसानों को जिस तरह सहायता दी जाती है, भारत में भी किसानों को आर्थिक सुरक्षा दी जाए। साथ ही, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में विकासशील देशों के किसानों के हितों को मजबूती से उठाने की जरूरत है। इन सुझावों पर विचार करते समय अंतरराष्ट्रीय सब्सिडी के आंकड़ों, व्यापार नियमों और भारत की मौजूदा योजनाओं की तथ्यात्मक जांच आवश्यक है। लेकिन व्यापक सवाल साफ है- क्या किसान को केवल बाजार के भरोसे छोड़ देना चाहिए, या ऐसी नीतियां बननी चाहिए जो उसे कीमतों में तेज गिरावट से बचा सकें?

सरकारी खरीद और बाजार व्यवस्था हो मजबूत
सरकारी खरीद और बाजार व्यवस्था को इस तरह मजबूत किया जाए कि पात्र किसानों को घोषित न्यूनतम मूल्य का वास्तविक लाभ मिल सके। बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और दूसरी लागतों के आधार पर लाभकारी मूल्य तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। मौसम और उत्पादन के नुकसान के साथ बाजार भाव में गिरावट से निपटने के लिए अलग-अलग उपाय विकसित किए जाएं।

बीजों की गुणवत्ता, कीमत, किस्म और लेबल संबंधी नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए। सघन खेती, खरपतवार नियंत्रण और दूसरी तकनीकों को अपनाने से पहले उनके लाभ और जोखिम का आकलन किया जाए।कपास उत्पादन, जिनिंग, कताई, कपड़ा निर्माण और निर्यात से जुड़ी नीतियों में किसान की आय को भी महत्वपूर्ण मानदंड बनाया जाए।
 
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