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ETHANOL ECONOMY: किसानों की आय में बढ़ोतरी और भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ऊर्जा बनकर उभर रहा ईथेनॉल
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 13 Oct 2025 08:19 PM IST
सार
भारत पेट्रोल में 20 फीसदी ईथेनॉल मिश्रण के साथ इस जैव ईंधन का वैश्विक निर्यातक बनने की ओर अग्रसर है। खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत और पर्यावरणीय चुनौतियों से लड़ने में ईथेनॉल की भूमिका अहम मानी जा रही है। ईथेनॉल बनाने में मक्का और गन्ना जैसी फसलों का सबसे अधिक उपयोग हो रहा है, जिससे किसानों की आय बढ़ी है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
ईथेनॉल फीडस्टॉक के रूप में उपयोगी मक्का और गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों की आय इससे बढ़ रही है।
- फोटो : गांव जंक्शन
ईथेनॉल उद्योग का दायरा केवल जैव रासायनिक उत्पादकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय वृद्धि, ग्रामीण रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाला एक शक्तिशाली इंजन बनकर उभरा है। आंकड़ों के अनुसार, प्रत्येक एक करोड़ लीटर ईथेनॉल उत्पादन से कृषि मूल्य शृंखला में 290 प्रत्यक्ष और 1,280 अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होते हैं।
ईथेनॉल फीडस्टॉक के रूप में उपयोगी मक्का और गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों की आय भी इससे बढ़ रही है। कुल मिलाकर, यह उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में विकास को गति दे रहा है। ईथेनॉल संयंत्र भी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में ही स्थापित हो रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद की जा रही है।
कृषि के साथ ही इस जैव ईंधन का उत्पादन परिवहन, भंडारण, ऑटोमोबाइल्स और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर रहा है। इन बदलावों से ग्रामीण पलायन कम हो सकता है। हालांकि, यह अभियान संतुलित और टिकाऊ तरीके से आगे बढ़ता रहे, इसके लिए नीतिगत सुधार, केंद्र एवं राज्य सरकारों और विभिन्न मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
हमारे किसानों को इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में अच्छे दाम नहीं मिल रहे, ईथेनॉल से किसानों की आय बढ़ेगी।
- फोटो : गांव जंक्शन
कृषि के विविधीकरण से किसानों को अच्छे दाम
नितिन गडकरी केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री
चीनी की कीमत ब्राजील, तेल की कीमत मलेशिया, मक्के की कीमत अमेरिका और सोयाबीन की कीमत अर्जेंटीना तय करता है। हमारे किसानों को इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में अच्छे दाम नहीं मिल रहे। भारत की 65% आबादी कृषि में लगी है, जबकि यह क्षेत्र जीडीपी में केवल 14% योगदान देता है। ग्रामीण और आदिवासी अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए कृषि को बढ़ावा देना और ऊर्जा क्षेत्र में इसका विविधीकरण जरूरी है। भारत सालाना 22 लाख करोड़ रुपये के जीवाश्म ईंधन आयात करता है, जो प्रदूषण बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। सिर्फ मक्का आधारित ईथेनॉल ने किसानों की आय में 50,000 करोड़ रुपये की वृद्धि की है, महंगे जीवाश्म ईंधन आयात को कम किया है, और 40% प्रदूषण के लिए जिम्मेदार परिवहन क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में भी कटौती की है।
ईथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से किसान सशक्त हो रहे हैं, तेल आयात कम हुआ है, हरित रोजगार सृजित हो रहा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
11 वर्षों में किसानों को मिलें 1.21 लाख करोड़
हरदीप सिंह पुरी केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री
ईथेनॉल मिश्रण वर्ष 2014 में 1.53% था, जो 2022 में बढ़कर 10% और 2025 में 20% हो गया। गारंटीकृत मूल्य, विविध फीडस्टॉक और बढ़ती आसवन क्षमता जैसे नीतिगत सुधारों ने इसे संभव बनाया। पानीपत और नुमालीगढ़ में 2जी रिफाइनरीज पराली और बांस को ईथेनॉल में बदल रही हैं, जिससे स्वच्छ ईंधन उत्पादन व प्रदूषण नियंत्रण के साथ ही किसानों की आय बढ़ी है। ईथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से किसान सशक्त हो रहे हैं, तेल आयात कम हुआ है, हरित रोजगार सृजित हो रहा है और जलवायु लक्ष्यों की ओर भारत बढ़ रहा है। 11 वर्षों में किसानों को ₹1.21 लाख करोड़ मिले, 238.68 लाख टन तेल आयात कम हुआ और करीब ₹1.40 लाख करोड़ की बचत हुई है।
110 अरब डॉलर वाली इंडियन ऑयल जैसी कंपनी ईथेनॉल खरीद रही है, जहां भुगतान का संकट नहीं है।
- फोटो : गांव जंक्शन
ग्रामीण भारत के लिए नई उम्मीद ईथेनॉल
नरेंद्र तनेजा ऊर्जा संबंधी मामलों के विशेषज्ञ
ईथेनॉल बनाने में मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और कुछ अन्य फसलों का इस्तेमाल होता है। गन्ने का उपयोग ईथेनॉल बनाने में बढ़े, तो किसानों की कई समस्याएं हल हो सकती हैं। ज्यादातर चीनी मिलें छोटी या मझोली हैं, जिन्हें पैसे, श्रमिकों और आधुनिक तकनीक की कमी का सामना करना पड़ता है। इसका असर किसानों पर भी पड़ता है। उन्हें कई बार समय पर भुगतान नहीं मिलता। वहीं, ईथेनॉल को 110 अरब डॉलर की इंडियन ऑयल (आईओसी) और 60 अरब डॉलर की हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपी) जैसी बड़ी कंपनियां खरीद रही हैं, जहां भुगतान की समस्या नहीं है।
वर्ष 2025-16 से 2024-25 तक ईथेनॉल मिश्रण।
- फोटो : गांव जंक्शन
सरकार धीरे-धीरे पेट्रोल में ईथेनॉल मिश्रण का हिस्सा बढ़ा रही है। डीजल में भी 5% ईथेनॉल मिश्रण की योजना है। लिक्विड पेट्रोलियम ईंधन में डीजल की 45% और पेट्रोल की सिर्फ 14% हिस्सेदारी है। डीजल में ईथेनॉल मिश्रण होता है तो गन्ने की मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों को ज्यादा फायदा होगा। गांवों में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे लोगों की क्रयशक्ति बढ़ेगी। चीनी मिलों पर भी समय पर भुगतान का दबाव बढ़ेगा, जिससे उनका आधुनिकीकरण होगा। शराब उद्योग, रसायन और फार्मा जैसे उद्योगों में भी सुधार होगा, जहां अल्कोहल का इस्तेमाल होता है।
भारत में पेट्रोल की खपत हर साल 4-5% बढ़ रही है। ऐसे में, नई फसलों और तकनीकों से ईथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की कोशिश हो रही है। इससे पर्यावरण, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। साथ ही, खाद्य सुरक्षा, ईथेनॉल की वैश्विक स्थिति और पर्यावरणीय चिंताओं को भी संबोधित करना होगा।
ईथेनॉल मिश्रण 20% से ज्यादा बढ़ाने से पहले मौजूदा तंत्र को मजबूत करना होगा। कच्चे तेल का अर्थशास्त्र विशाल कंपनियों पर आधारित है, जबकि ईथेनॉल का अर्थशास्त्र किसानों से जुड़ा है। यह दो अर्थव्यवस्थाओं का संगम है, जिसके आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहन मंथन जरूरी है।
इस साल 12 अरब लीटर ईथेनॉल की जरूरत है, जिसमें चीनी उद्योग 4.5-4.8 अरब लीटर दे रहा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
विदेशी मुद्रा की बचत के साथ किसानों का सशक्तिकरण
प्रो. सुशील सोलोमन पूर्व कुलपति, चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि
भारत ने ईथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम के तहत महत्वपूर्ण प्रगति की है। 20% ईथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य, जो वर्ष 2030 के लिए निर्धारित था, उसे 2025 में ही हासिल कर लिया गया। अब सरकार वर्ष 2030 तक 25% मिश्रण (ई-25) का लक्ष्य लेकर चल रही है।
इस कार्यक्रम ने चीनी उद्योग और डिस्टिलरीज को बढ़ावा दिया है, जिससे ईथेनॉल उत्पादन 4.3 अरब लीटर से बढ़कर 9 अरब लीटर हो गया है। इस साल 12 अरब लीटर की जरूरत है, जिसमें चीनी उद्योग 4.5-4.8 अरब लीटर (लगभग 40%) का योगदान दे रहा है। शेष ईथेनॉल मक्का और अन्य अनाजों से बनेगा। इससे 55 लाख किसानों को लाभ मिल रहा है, जिन्हें गन्ने का भुगतान समय पर मिल रहा है।
पिछले 10 वर्षों में 98,000 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान हुआ, जो पहले देरी से होता था। पिछले पांच वर्षों में इस कार्यक्रम से लगभग 1.34 लाख करोड़ रुपये से अधिक विदेशी मुद्रा की बचत हुई, और 73.6 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन कम हुआ, जो 300 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है। गन्ना उत्पादन बढ़ाने के लिए देशव्यापी अभियान चल रहा है। वर्तमान में, 450 करोड़ टन गन्ना उत्पादन हो रहा है, जिसे वर्ष 2030 तक 650-700 करोड़ टन करने का लक्ष्य है।
इस साल 35 करोड़ टन चीनी उत्पादन की संभावना है, जिसमें से 28.5 करोड़ टन घरेलू खपत होगी, और शेष ईथेनॉल में परिवर्तित होगा। प्रति हेक्टेयर 100 टन से अधिक पैदावार और 7.5% चीनी रिकवरी का लक्ष्य है। इसके लिए, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान और अन्य शुगर इंस्टीट्यूट्स के साथ मिलकर उच्च-उपज वाली प्रजातियों और एआई का उपयोग किया जा रहा है। यह कार्यक्रम विदेशी मुद्रा बचत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। डिस्टिलरीज और वैल्यू चेन बढ़ने से रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं और किसानों की आय में वृद्धि हो रही है।
45% ईथेनॉल उत्पादन मक्का, और शेष हिस्सा गन्ना, चावल एवं अन्य फीडस्टॉक से हो रहा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
मक्का-आधारित ईथेनॉल : ऊर्जा आत्मनिर्भरता और समृद्धि का ईंधन
डॉ. एच.एस. जाट निदेशक, आईसीएआर-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान
ईथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2024-25 (नवंबर से अक्तूबर) में भारत ने 70 लाख टन मक्का उपयोग कर 350 करोड़ लीटर ईथेनॉल बनाया। कुल 4.2 करोड़ टन मक्का उत्पादन का 20% हिस्सा बीते साल ईथेनॉल में उपयोग हुआ। मक्का पर फोकस अधिक है, क्योंकि यह खाद्य सुरक्षा के लिए मुख्य फसल नहीं है।
50% मक्का पोल्ट्री फीड, 8-10% पशु चारा, 20% ईथेनॉल, 8-10% स्टार्च और शेष प्रोसेस्ड फूड व बीज के रूप में उपयोग होता है। मक्का साल में दो-तीन बार उगा सकते हैं। ईथेनॉल बनाने में उपयोगी गन्ने का उत्पादन मुख्य रूप से यूपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु तक सीमित है, जबकि मक्का देशभर में पैदा हो सकता है। मक्का में गन्ना या चावल की तुलना में कम पानी की खपत होती है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी कम होता है। पिछले दो वर्षों में मक्का का क्षेत्र 20-25 लाख हेक्टेयर बढ़ा है, क्योंकि खरीद के मामले में ईथेनॉल इकाइयों ने पोल्ट्री सेक्टर के एकाधिकार को तोड़ा है।
पहले किसानों को 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल मक्का का दाम मिलता था, अब 2200-2500 रुपये मिल रहे हैं, जिससे इसकी खेती में रुझान बढ़ा है। ई-30 लक्ष्य को पूरा करने के लिए, 1500-1600 करोड़ लीटर ईथेनॉल चाहिए। ऐसे में, सिर्फ ईथेनॉल के लिए 2 करोड़ टन मक्का की जरूरत होगी। अभी ईथेनॉल के लिए, जहां मक्का की कमी पड़ती है, उसकी भरपाई चावल से हो जाती है।
ईथेनॉल के लिए, पहले 2.5 मिलियन टन चावल उपयोग की अनुमति थी, जिसे बढ़ाकर 5.2 मिलियन टन किया गया है। डुअल डिस्टिलरीज काे बढ़ाकर गन्ना कम होने की स्थिति में मक्का या अन्य अनाजों से ईथेनॉल बना सकते हैं। देश में करीब 55 लाख हेक्टेयर गन्ने का क्षेत्र है और लगभग 500 चीनी मिलें हैं, जहां गन्ने के साथ मक्का लगा सकते हैं। इससे पूरे साल चीनी मिलें चलती रहेंगी, जिसका सीधा फायदा किसानों को होगा।
ईबीपी कार्यक्रम के तहत फीडस्टॉक के रूप में मक्का का उपयोग हाल के वर्षों में बढ़ा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
किसानों की आय बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपनाना होगा संतुलित दृष्टिकोण
डॉ. गोपाल सारंगी एसोसिएट प्रोफेसर, टेरी यूनिवर्सिटी
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 95 फीसदी हिस्सा आयात करता है। पेट्रोल या फिर डीजल में ईथेनॉल मिश्रण करने से आयात पर निर्भरता कम हो रही है। इसके साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य सुदृढ़ होगा। गन्ना, मक्का, खराब आलू और जला हुआ ऑयल जैसे फीडस्टॉक से ईथेनॉल बनाना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाएगा। इसमें छोटे पैमाने की डिस्टिलरीज की भूमिका अहम होगी, जो फसल उत्पादन से लेकर परिवहन और वितरण तक वैल्यू-चेन बनाएंगी, जिसका फायदा मिलेगा।
ई-20 से आगे बढ़ते हैं तो डिस्टिलरीज बढ़ानी होंगी, भंडारण-वितरण का ढांचा मजबूत करना होगा।
- फोटो : गांव जंक्शन
मक्का का बाजार मूल्य अभी 25-30 रुपये प्रति किलो है। परती भूमि पर इसकी खेती को बढ़ावा देना किसानों के लिए आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद हो सकता है। ऊर्जा उत्पादन वाली फसलों के कारण खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी देखने को मिली हैं। लेकिन, सरकार संतुलित दृष्टिकोण लेकर चल रही है। ई-20 का लक्ष्य 5 साल पहले पूरा होने के बावजूद, ई-27 की ओर धीरे-धीरे बढ़ना खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने का ही प्रयास है।
गन्ने के बजाय कम पानी वाले फीडस्टॉक, जैसे- मक्का व खराब अनाज का उपयोग पानी की खपत को कम कर सकता है। बुनियादी ढांचे की कमी भी एक चुनौती है। एक धारणा ये रही है कि ईथेनॉल से वाहनों को नुकसान होता है। वास्तव में, वाहनों में तकनीकी बदलाव की जरूरत है। इन बदलावों को लागू करने के लिए जागरूकता और निवेश जरूरी है। मौजूदा लक्ष्य के लिहाज से देखें तो ईथेनॉल उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर है और निर्यात की स्थिति में है। इसलिए, फीडस्टॉक की कमी की चिंता भी नहीं है। ई-20 से आगे बढ़ते हैं, तो डिस्टिलरीज की संख्या बढ़ाने के साथ ही भंडारण और वितरण के लिए मजबूत ढांचा चाहिए।
सरकार पोर्टफोलियो दृष्टिकोण अपनाकर ईथेनॉल के साथ बायोगैस और नवीकरणीय ऊर्जा को भी बढ़ावा दे रही है, ताकि ऊर्जा मिश्रण संतुलित रहे। केंद्र व राज्यों के साथ ही विभिन्न मंत्रालयों - पेट्रोलियम मंत्रालय, कृषि मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय भी जरूरी है। छोटे किसानों को एफपीओ के जरिये शामिल करने और मक्का जैसी फसलें उगाने के लिए उन्हें प्रोत्साहन देने से ग्रामीण आजीविका को बल मिल सकता है। जमीनी स्तर पर पूरी मैपिंग और नीतिगत समन्वय के साथ यह कार्यक्रम वर्ष 2030 तक भारत को ऊर्जा और ग्रामीण विकास में अग्रणी बना सकता है।
नाफेड व एनसीसीएफ एमएसपी पर मक्का खरीदकर डिस्टिलरीज को देते हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
ईथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम
ईबीपी कार्यक्रम के तहत तेल विपणन कंपनियां ईथेनॉल मिश्रित पेट्रोल बेचती हैं। गन्ने का रस, शर्करा युक्त सामग्री (चीनी चुकंदर, ज्वार), स्टार्च युक्त सामग्री (मक्का, कसावा, टूटा गेहूं-चावल, सड़े आलू) और अधिशेष खाद्यान्न से ईथेनॉल उत्पादन कर सकते हैं।
पहली पीढ़ी का ईथेनॉल (1जी) खाद्य फसलों (गन्ना, चीनी, चुकंदर, अनाज, जैसे- चावल, गेहूं, मक्का) से बनता है, जिसमें शर्करा या स्टार्च को यीस्ट किण्वन द्वारा ईथेनॉल में बदला जाता है।
दूसरी पीढ़ी का ईथेनॉल (2जी) लिग्नो-सेल्यूलोसिक या कृषि अवशेषों (गेहूं का भूसा, मक्के का डंठल, गन्ने की खोई) से बनता है, जिसमें सेल्यूलोज और हेमीसेल्यूलोज शर्करा स्रोत होते हैं।
ईबीपी कार्यक्रम के तहत वर्ष 2018 से 2022 तक नई डिस्टिलरी स्थापना, मौजूदा डिस्टिलरी के विस्तार, शीरा-आधारित डिस्टिलरी को दोहरे फीड में बदलने और शून्य तरल प्रवाह के लिए योजनाएं शुरू की गईं।
नाफेड व एनसीसीएफ एमएसपी पर मक्का खरीदकर डिस्टिलरीज को देते हैं। तेल विपणन कंपनियों ने 1 जनवरी, 2024 को मक्का-आधारित ईथेनॉल की कीमत ₹66.07/लीटर से बढ़ाकर ₹71.86/लीटर कर दी है।
गन्ना व मक्का आधारित ईथेनॉल से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पेट्रोल के मुकाबले क्रमशः 65% व 50% कम होता है
- फोटो : गांव जंक्शन
ईथेनॉल के चरणबद्ध उपयोग के लिए राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति जरूरी
नरेंद्र मोहन पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शर्करा संस्थान, कानपुर
भारत ने जैव ईंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, विशेष रूप से ईथेनॉल मिश्रण के साथ, जो वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य के अनुरूप एक व्यवहार्य और बड़े परिवर्तन का प्रतीक है। भारत ने 20% ईथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य, जो 2030 के लिए निर्धारित था, उसे 2025 में ही हासिल करके बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह चीनी उद्योग और गन्ना किसानों के लिए बड़ी राहत की बात है।
गन्ना और मक्का आधारित ईथेनॉल से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पेट्रोल की तुलना में क्रमशः 65% और 50% कम होता है, जिससे इसके पर्यावरणीय लाभ स्पष्ट हैं। साथ ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन, रोजगार सृजन, गन्ना भुगतान और मक्का की खेती में सुधार जैसे कई लाभ मिल रहे हैं।
इसी वर्ष की बात करें, तो गन्ना किसानों को करीब 40,000 करोड़ रुपये का भुगतान किए जाने का अनुमान है, जिससे उनकी आय दोगुनी करने का लक्ष्य मजबूत हुआ है। ईथेनॉल मिश्रण के इस प्रमुख कार्यक्रम के साथ कच्चे तेल पर खर्च होने वाला पैसा उन किसानों के पास जा रहा है, जो ‘अन्नदाता’ होने के साथ ही ऊर्जादाता भी कर रहे हैं।
ईथेनॉल मिश्रण की पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिए सरकार को एक राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति लागू करनी चाहिए
- फोटो : गांव जंक्शन
चीनी और अनाज-आधारित उद्योगों ने ईथेनॉल उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारी निवेश किया है। इस लिहाज से वर्तमान व आगामी परियोजनाओं के साथ, भारत के पास ई-27 मिश्रण स्तरों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त क्षमता होगी। इस वर्ष 340-350 लाख टन चीनी उत्पादन और बढ़ते मक्का उत्पादन के कारण फीडस्टॉक की कोई कमी नहीं है। हालांकि, यदि नए ईथेनॉल संयंत्र मिश्रण लक्ष्यों में स्पष्टता की कमी के कारण पूर्ण क्षमता पर काम नहीं कर पाते, तो वे अव्यवहार्य हो सकते हैं, जिससे बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में वृद्धि का जोखिम बढ़ सकता है।
ईथेनॉल मिश्रण की पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिए सरकार को एक राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति लागू करनी चाहिए। इसमें ई-22, ई-25 और ई-27 के लिए चरणबद्ध रोडमैप, फ्लेक्सी-ईंधन वाहनों की उपलब्धता, सतत विमानन ईंधन को बढ़ावा, पारदर्शी ईथेनॉल खरीद मूल्य निर्धारण, अंतरराज्यीय ईथेनॉल परिवहन के लिए सरलीकृत नीतियों और कम कराधान, तथा तेल विपणन कंपनियों के लिए बेहतर टैंकेज और भंडारण क्षमता में सुधार जैसे पहलू शामिल होने चाहिए।
भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि के बीच ईथेनॉल और अन्य जैव ईंधन देश की ऊर्जा मांगों को पूरा करने और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यूपी, महाराष्ट्र, बिहार और एमपी में गन्ना और मक्का की खेती में वृद्धि की संभावना है। लेकिन, यह फसल विविधीकरण को प्रभावित कर सकता है। इससे मृदा स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। फिर भी, ईथेनॉल फीडस्टॉक की खेती करने वाले किसानों को गैर-ईथेनॉल फसलों की तुलना में अधिक लाभप्रदता मिल रही है और स्थिर खरीद मूल्यों से उनकी आय बढ़ी है।
ईथेनॉल से जुड़ी खेती से आय स्थिरता, ऋण स्तर और बाजार अस्थिरता पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना सरकारी सहायता कार्यक्रमों को बेहतर बनाने और इनसे ग्रामीण समुदायों के लिए वास्तविक लाभ सुनिश्चित करने में उपयोगी हो सकता है।
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