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बहराइच की महिला का कमाल: न प्लास्टिक, न लोहे का ड्रम... मिट्टी की इस डेहरी में अनाज रखने का देसी तरीका है खास

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 22 Oct 2026 04:42 PM IST
सार

बहराइच के मिर्जापुर गांव की जलवर्षा अम्मा ने मिट्टी और भूसे से अनोखी डेहरी बनाई है। इसमें करीब 5 क्विंटल अनाज रखने और अलग-अलग उपज सुरक्षित रखने की व्यवस्था है।

मिट्टी की डेहरी
मिट्टी की डेहरी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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आज के दौर में अनाज रखने के लिए प्लास्टिक और लोहे के ड्रमों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर गांव में मिट्टी से बना अनाज रखने का एक पारंपरिक पात्र लोगों का ध्यान खींच रहा है। गांव की 60 वर्षीय जलवर्षा अम्मा ने करीब 20 साल पहले अपने हाथों से मिट्टी की ऐसी डेहरी बनाई थी, जिसमें करीब पांच क्विंटल अनाज रखने की क्षमता बताई जाती है। इस डेहरी की खासियत इसकी बनावट और अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की पारंपरिक तकनीक है।

मिट्टी की डेहरी में दो साल तक अनाज सुरक्षित रखने का दावा
न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, जलवर्षा अम्मा के घर में रखी यह डेहरी देखने में पारंपरिक मिट्टी की कोठी जैसी है। हालांकि, इसकी बनावट और इस्तेमाल का तरीका इसे खास बनाता है। दावा है कि इसमें रखा अनाज बिना किसी रासायनिक संरक्षक के करीब दो साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

ग्रामीण इलाकों में पहले अनाज को लंबे समय तक संभालकर रखने के लिए मिट्टी की कोठियों और डेहरियों का इस्तेमाल किया जाता था। इन्हें स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध सामग्री और लोगों के अनुभव के आधार पर बनाया जाता था। जलवर्षा अम्मा की डेहरी भी इसी पारंपरिक हुनर का उदाहरण है।

डेहरी में छिपा है सामान रखने का गुप्त हिस्सा
इस डेहरी की एक और खासियत इसका गुप्त हिस्सा है। बताया जाता है कि इसकी बनावट में ऐसी जगह बनाई गई है, जिसका बाहर से आसानी से पता नहीं चलता। पुराने समय में इस तरह की छिपी जगहों का इस्तेमाल जरूरी सामान, नकदी, गहने और कपड़े रखने के लिए भी किया जाता था।

डेहरी की बाहरी बनावट सामान्य होने के कारण अंदर छिपी जगह का अंदाजा लगाना आसान नहीं होता। बिना आधुनिक उपकरणों के इस तरह की बनावट तैयार करना पारंपरिक कारीगरी और सूझबूझ को दर्शाता है।

एक डेहरी में अनाज, दूसरी में दो तरह की उपज
जलवर्षा अम्मा के घर में एक दूसरी डेहरी भी है, जिसे दो हिस्सों में बांटकर बनाया गया है। इसके अंदर मिट्टी की एक मजबूत दीवार खड़ी की गई है, जिससे दोनों हिस्से अलग हो जाते हैं। एक हिस्से में अनाज और दूसरे में सरसों जैसे तिलहन रखे जा सकते हैं।

इस डेहरी में नीचे की ओर एक छोटा छेद भी बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर इसी रास्ते से थोड़ा-थोड़ा अनाज निकाला जा सकता है। इस्तेमाल न होने पर इस छेद को बंद कर दिया जाता है। इस व्यवस्था से अलग-अलग उपज को एक ही पात्र में अलग रख पाना आसान होता है।

चिकनी मिट्टी और भूसे से तैयार होती है डेहरी
जलवर्षा अम्मा के मुताबिक, इस तरह की डेहरी बनाने के लिए चिकनी मिट्टी और भूसे को अच्छी तरह मिलाकर गूंथा जाता है। इसके बाद हाथों से आकार देते हुए दीवारें और तली तैयार की जाती हैं। जोड़ मजबूत रखने और बनावट को टिकाऊ बनाने पर खास ध्यान दिया जाता है।

पारंपरिक मिट्टी के भंडारण पात्र स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से बनाए जाते रहे हैं। हालांकि, उनकी मजबूती और अनाज को सुरक्षित रखने की क्षमता मिट्टी की गुणवत्ता, निर्माण के तरीके, नमी और रखरखाव पर निर्भर करती है।

पारंपरिक हुनर को सहेजने की जरूरत
आज गांवों में भी अनाज रखने के लिए प्लास्टिक और धातु के ड्रमों का इस्तेमाल बढ़ा है। इसके बावजूद मिट्टी की डेहरी जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं ग्रामीण जीवन के अनुभव और स्थानीय ज्ञान की अहमियत बताती हैं।

जलवर्षा अम्मा की बनाई डेहरी इस बात का उदाहरण है कि सीमित संसाधनों के बीच भी लोग अपनी जरूरतों के अनुसार उपयोगी और अलग तरह के समाधान तैयार करते रहे हैं। ऐसे पारंपरिक हुनर को दर्ज करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि ग्रामीण जीवन से जुड़ा यह ज्ञान समय के साथ खो न जाए।
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