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Rural India In E Commerce Millions Of Buyers But Where Are The Sellers
ग्रामीण ई-कॉमर्स की अधूरी कहानी: खरीदार ज्यादा, विक्रेता कम; ऑनलाइन बाजार में गांवों की कैसे बनेगी जगह
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 30 Apr 2026 08:46 AM IST
सार
Rural E-Commerce: 30 करोड़ ऑनलाइन खरीदारों के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ऑनलाइन खुदरा बाजार बनकर उभरा है। इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई ये है कि शहरों के उत्पाद तो गांवों में पहुंच रहे हैं, मगर गांव के उत्पाद डिजिटल बाजार तक नहीं पहुंच पा रहे।
84 लाख करोड़ रुपये है ग्रामीण भारत के खुदरा बाजार का आकार, जो तेजी से बढ़ रहा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
उत्तर प्रदेश के संभल जिले के किसान मोहम्मद गुलरेज पिछले 10-12 वर्षों से 10 एकड़ में स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं और एपल एग्रो कंपनी के जरिये वह ऑनलाइन बाजार से जुड़े हैं। ई-कॉमर्स के जरिये गुलरेज की स्ट्रॉबेरी सीधे दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और गुवाहाटी जैसे शहरों के उपभोक्ताओं तक पहुंच रही है।
सितंबर-अक्तूबर में बोई गई यह फसल करीब चार महीने में तैयार होती है और 300 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। टिशू पेपर में पैक करके गुलरेज स्ट्रॉबेरी कंपनी के गोदाम पर पहुंचा देते हैं, जहां उपभोक्ता ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं। ऑर्डर मिलते ही मात्र चार से पांच घंटे में शहरी ग्राहकों तक स्ट्रॉबेरी पहुंच जाती है।
गुलरेज जैसे किसान ग्रामीण ई-कॉमर्स की उस संभावना को साकार कर रहे हैं, जहां डिजिटल बाजार सीधे खेत से उपभोक्ता की थाली तक का रास्ता बना रहा है। लेकिन, ऐसे किसान बहुत कम हैं। वास्तव में भारत के ई-कॉमर्स बाजार की कहानी दो हिस्सों में विभाजित है।
एक हिस्से में चमकदार आंकड़े हैं - 27 करोड़ ऑनलाइन खरीदारों के साथ 2024 में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ई-रिटेल बाजार बन गया।
दूसरे हिस्से में कड़वी सच्चाई है - अमेजॉन, फ्लिपकार्ट और मीशो गांव तक पहुंच रहे हैं, लेकिन गांव का उत्पाद ऑनलाइन बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा। यह एकतरफा डिजिटल व्यापार ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी आर्थिक विडंबना है।
कनेक्टिविटी-खरीदार बढ़े, विक्रेता नदारद
दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अनुसार, मार्च 2024 तक ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 39.83 करोड़ हो गई थी, जो मार्च 2020 में 28.59 करोड़ थी। नवंबर 2025 में देश का कुल ब्रॉडबैंड आधार 100 करोड़ का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर गया। अंतरराष्ट्रीय डेटा निगम के अनुसार, वर्ष 2024 में 15.1 करोड़ स्मार्टफोन बिके।
भारतनेट और डिजिटल इंडिया मिशन ने मिलकर ग्रामीण उपभोक्ताओं को इंटरनेट से जोड़ा है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभी 30 करोड़ ऑनलाइन खरीदार हैं, जो 2030 तक 44 करोड़ होने का अनुमान है और इनमें ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी 30 फीसदी है।
भारत में अभी तक की डिजिटल लहर गांवों में केवल खरीदार बना रही है - विक्रेता नहीं। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (आईबीईएफ) के अनुसार, ग्रामीण खुदरा बाजार का आकार करीब 84 लाख करोड़ रुपये है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 बताता है कि ग्रामीण-शहरी उपभोक्ता व्यय का अंतर 2011-12 के 84 फीसदी से घटकर 2023-24 में 70 फीसदी रह गया है, जो ग्रामीण क्रयशक्ति की बढ़ती ताकत का संकेत है।
वर्ष 2019 से ग्रामीण ऑनलाइन खरीदारी 22 फीसदी सालाना बढ़कर 2026 तक 8.8 करोड़ उपभोक्ताओं तक पहुंचने का अनुमान है। यह वृद्धि उपभोक्ताओं के रूप में अधिक है - विक्रेताओं और उद्यमियों तक पहुंच सीमित है।
8.8 करोड़ भारत में ग्रामीण ऑनलाइन खरीदारों की संख्या वर्ष 2026 तक होने का अनुमान है।
- फोटो : गांव जंक्शन
ऑनलाइन कारोबार का सफर - शहर से गांव तक
डेलॉयट के अनुसार, भारत का ई-कॉमर्स बाजार 2021 में 67 अरब डॉलर था, जो 2030 तक 325 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 25.3 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है। रेडसीर के अनुसार, वर्ष 2023 के दौरान भारत के खुदरा बाजार में ऑनलाइन रिटेल की हिस्सेदारी मात्र 8 फीसदी थी, जो 2028 तक 14 फीसदी होने का अनुमान है।
भारत में ई-कॉमर्स की शुरुआत 2000 के दशक में हुई, लेकिन असली रफ्तार 2010 के दशक में फ्लिपकार्ट और स्नैपडील से मिली। वर्ष 2013 में अमेजॉन के आने से प्रतिस्पर्धा तेज हुई और लॉजिस्टिक तथा तकनीक में भारी निवेश हुआ।
कोविड-19 ने इस प्रक्रिया को और तेज किया। अब ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं में सेवाएं दे रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एल्गोरिदम से हर उपभोक्ता की पसंद के अनुसार सुझाव दे रहे हैं। बेन एंड कंपनी की हाउ इंडिया शॉप्स ऑनलाइन-2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2021 के बाद से 60 फीसदी से अधिक नए ई-कॉमर्स विक्रेता टियर-2 और छोटे शहरों से आए हैं - लेकिन वास्तविक ग्रामीण उत्पादक, किसान और दस्तकार डिजिटल बाजार में अभी भी नगण्य हैं।
जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण समुदाय डिजिटल अर्थव्यवस्था में केवल उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादक और उद्यमी के रूप में भी मजबूत भागीदारी दर्ज कराएं।
प्रमुख कंपनियों की ग्रामीण पहल
अमेजॉन सहेली ने 2017 में ग्रामीण महिला उद्यमियों को विपणन सहायता, भंडारण और शिपिंग की सुविधा देकर उन्हें ऑनलाइन बाजार से जोड़ा। फ्लिपकार्ट ने 2023 तक 50,000 से अधिक किराना दुकानों के साथ साझेदारी करके अंतिम छोर तक डिलीवरी की समस्या हल की। मीशो ने वाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम के जरिये ग्रामीण महिलाओं को रिसेलर बनाकर आर्थिक स्वतंत्रता दी।
एकीकृत भुगतान प्रणाली के लेनदेन 2017-18 में 92 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 8,375 करोड़ हो गए, जो 147 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है, जिसने ग्रामीण डिजिटल भुगतान में भरोसा बढ़ाया। इस सिलसिले को तेज करके ग्रामीण उद्यमियों को लाभान्वित कर सकते हैं।
30 फीसदी ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी भारत के ऑनलाइन खरीदारों में है, जो बढ़ रही है।
- फोटो : AI
ओएनडीसी और GeM - अधूरा अमल
सरकार ने ओएनडीसी की परिकल्पना एकीकृत भुगतान प्रणाली की तर्ज पर की थी - एक खुला नेटवर्क, जो अमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स मंचों के एकाधिकार को तोड़ सके। दिसंबर 2024 तक ओएनडीसी से सात लाख से अधिक विक्रेता जुड़ चुके थे, यह 600 से अधिक शहरों व कस्बों में सक्रिय हुआ और 15 करोड़ से अधिक लेनदेन हुए।
कुछ केस स्टडी में पाया गया कि भोपाल और कोच्चि के छोटे किराना विक्रेताओं ने ओएनडीसी से जुड़ने के बाद कम कमीशन और बेहतर बाजार पहुंच के कारण लाभ में 15 से 25 फीसदी तक सुधार दर्ज किया। लेकिन, जमीनी हकीकत अलग है।
अक्तूबर 2024 में खुदरा ऑर्डर 65 लाख के शिखर से गिरकर फरवरी 2025 में 46 लाख रह गए, क्योंकि मासिक प्रोत्साहन तीन करोड़ से घटाकर 30 लाख रुपये कर दिया गया। एक सर्वे में 83 फीसदी उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्होंने ओएनडीसी का उपयोग कभी नहीं किया और उपयोग करने वालों में से 54 फीसदी ने इसे जटिल बताया। दूसरी ओर, ओएनडीसी अभी भी महानगरों तक सिमटा हुआ है - टियर-2, टियर-3 और ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी पहुंच नगण्य है।
ग्रामीण विक्रेताओं के लिए ओएनडीसी समेत दो सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं। सरकारी ई-बाजार (GeM) पर केवल सरकारी संस्थाएं खरीदार हैं, जिसका उद्देश्य सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाना है। जो ग्रामीण उद्यमी सरकार को उत्पाद बेचना चाहते हैं, उनके लिए यह बेहतर विकल्प है। वहीं, ओएनडीसी पर आम उपभोक्ता खरीदार हैं, जो विक्रेता सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचना चाहते हैं, उनके लिए यह उपयुक्त मंच है।
22 फीसदी सालाना वृद्धि दर से बढ़ रहा है ग्रामीण भारत में ऑनलाइन खरीदारी का चलन।
- फोटो : AI
जीआई उत्पादों की अनछुई संभावना
मार्च 2025 तक भारत में 658 से अधिक पंजीकृत भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पाद हैं - दार्जिलिंग चाय, बनारसी साड़ी, कांगड़ा चाय, नागपुर संतरा, कश्मीर केसर इनमें शामिल हैं। इनमें से अधिकांश ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों से हैं।
अमेजॉन कारीगर, फ्लिपकार्ट समर्थ और आईटोकरी जैसे प्लेटफॉर्म्स ने मधुबनी चित्रकारों, वारली कलाकारों और कच्छ व वाराणसी के बुनकरों को राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच दी है। लेकिन, भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों की ऑनलाइन ब्रांडिंग अभी भी बेहद कमजोर है। ग्रामीण उत्पादकों में इस टैग के फायदों की जागरूकता नहीं है और नकली उत्पादों पर नियंत्रण भी अपर्याप्त है।
गांवों में ऑनलाइन कारोबार की दीवारें
आईएसएफ एडवाइजर्स की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, कृषि व्यापार की मौसमी प्रकृति, छोटे लेनदेन और बिखरी आपूर्ति शृंखला डिजिटल मंचों को कृषि क्षेत्र में सफल नहीं होने देती। भाषाई बाधाएं, डिजिटल साक्षरता की कमी, बिचौलियों पर निर्भरता, गुणवत्ता प्रमाणपत्र की जटिलता, लॉजिस्टिक की कमजोरी, ऑनलाइन धोखाधड़ी का डर और नीतिगत जटिलताएं मिलकर ग्रामीण विक्रेताओं को डिजिटल बाजार से दूर रखती हैं।
30 करोड़ ऑनलाइन खरीदार भारत में, जिनके 2030 तक 44 करोड़ होने का अनुमान है।
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भविष्य के लिए जरूरी हैं ये ठोस कदम
दूरसंचार विभाग के तहत सार्वभौमिक सेवा दायित्व कोष (यूएसओएफ), प्रसार भारती और ओएनडीसी के बीच मार्च 2024 में त्रिपक्षीय समझौते को जमीनी स्तर पर तेजी से लागू करके हर कॉमन सर्विस सेंटर्स (सीएससी) को ग्रामीण डिजिटल विक्रेता केंद्र बनाया जाए।
ओएनडीसी को ब्लॉक स्तर तक ले जाकर इस बहुभाषी विक्रेता एप को ग्रामीण स्तर पर प्रशिक्षण के साथ लागू करके लाभ हो सकता है।
658 से अधिक जीआई उत्पादों के लिए एपीडा और राज्य सरकारें समर्पित डिजिटल विक्रय मंच बनाएं। हर उत्पाद की उत्पत्ति, परंपरा व कारीगर की कहानी को डिजिटल विपणन का हिस्सा बनाया जाए तो उत्पादों को वैश्विक बाजार में अलग पहचान और बेहतर दाम मिल सकते हैं।
राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की 1,522 मंडियों के मॉडल पर ग्रामीण लॉजिस्टिक के लिए किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) आधारित सूक्ष्म आपूर्ति केंद्र बनाए जाएं।
कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में डिजिटल विक्रय का व्यावहारिक प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
ग्रामीण भारत का डिजिटल बाजार एक ऐसी नदी है, जो अभी केवल एक ही दिशा में बह रही है। जब तक यह नदी दोनों दिशाओं में नहीं बहेगी - जब तक बस्तर का आदिवासी शिल्पकार और वाराणसी का बुनकर अपना उत्पाद सीधे दिल्ली, मुंबई या विदेश के खरीदार को बेच नहीं सकेगा - तब तक डिजिटल इंडिया का सपना अधूरा रहेगा।
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