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Home› Sehat Tola› World Health Day 2026 Climate Action Heals Gujarat Village Shows How Green Energy Can Transform Rural Health

विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 : गांव हरा-भरा हो तो सेहत भी सुधरती है - गुजरात के इस गांव से मिली उम्मीद की नई किरण

डॉ उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 07 Apr 2026 09:52 AM IST
सार

7 अप्रैल - विश्व स्वास्थ्य दिवस (World Health Day)। हर साल इस दिन दुनिया स्वास्थ्य (Health) के बड़े-बड़े संकल्प लेती है। लेकिन, भारत के उन 6 करोड़ से ज्यादा परिवारों के लिए, जो गांवों में मिट्टी के चूल्हे के धुएं में सांस लेते हैं, और तपती छत के नीचे रातें गुजारते हैं - ये संकल्प अक्सर शहरों तक ही सिमटकर रह जाते हैं। इस बार एक अध्ययन ने उस खामोश सच्चाई को आवाज दी है।

गुजरात के  नागानो माठ का यह अनुभव छोटा जरूर है, लेकिन इसकी गूंज बड़ी है।
गुजरात के नागानो माठ का यह अनुभव छोटा जरूर है, लेकिन इसकी गूंज बड़ी है। - फोटो : एआई
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विस्तार
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भारत की जलवायु नीति का अधिकांश फोकस शहरों पर रहा है - राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम हों या नगर निगमों द्वारा बनाए गए हीट एक्शन प्लान, ये सब मुख्यतः शहरी ढांचे को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। जबकि देश की 60 फीसदी से अधिक आबादी आज भी गांवों में रहती है।

भारत की यह ग्रामीण आबादी भीषण गर्मी और वायु प्रदूषण दोनों झेलती है, लेकिन इससे निपटने के साधन उसके पास नहीं हैं।गुजरात के एक छोटे से गांव - नागानो माठ - से मिले अनुभव बताते हैं कि जलवायु अनुकूल तकनीकें न सिर्फ पर्यावरण बचाती हैं, बल्कि इन्सान की सेहत भी सुधारती हैं। 

नेचुरल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल (Natural Resources Defense Council), न्यूयॉर्क के विजय एस. लिमये और उनके सहयोगियों - येल यूनिवर्सिटी की समीहा हुसैन तथा भारत के राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (NRDC) के अध्ययनकर्ताओं - रितिका कपूर, दिशा जुबैर, और चारूलता - ने इसी अंतर को समझने और पाटने की कोशिश की है। 

शोध पत्रिका द जर्नल ऑफ क्लाइमेट चेंज एंड हेल्थ (The Journal of Climate Change and Health) में प्रकाशित उनका हालिया अध्ययन ग्रामीण भारत में जलवायु कार्रवाई (Climate Action) और ग्रामीण स्वास्थ्य (Rural Health) के बीच के संबंध को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

नागानो माठ - एक छोटा गांव, एक बड़ा प्रयोग
गुजरात के अरावली जिले में बसा नागानो माठ एक साधारण गांव है - करीब 256 घर, खेती पर निर्भर जीवन। गेहूं, कपास, मक्का, अरंडी, बाजरा, मूंगफली और सब्जियां यहां की मुख्य फसलें हैं। अधिकांश परिवारों के पास पांच बीघे से कम जमीन है। वर्ष 2019 में, गैर सरकारी संस्था SEWA और NRDC ने मिलकर यहां हरियाली ग्राम (Green Village) पहल शुरू की।

इस पहल के तहत ऊर्जा दक्ष इनडोर लाइटिंग और पंखे, बायोगैस संयंत्र, सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंप और कूल रूफ (ठंडी छत) लगाई गईं - सब कुछ इस एक लक्ष्य के साथ कि गांव की ऊर्जा के मामले में विपन्नता घटे और जलवायु कार्रवाई जमीन तक पहुंचे। मार्च 2024 में, SEWA के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने 90 घरों में सर्वे किया, जिनमें से 86 घरों से पूरे जवाब मिले। इन्हीं नतीजों पर आधारित है यह अध्ययन।

धुएं से मुक्ति-बायोगैस ने दी सांस लेने की आजादी
सर्वे में शामिल 86 में से 51 फीसदी घरों में कोई न कोई सदस्य दिल की बीमारी, अस्थमा या फेफड़ों की किसी बीमारी से पीड़ित था। 21 फीसदी घरों को यह भी पता नहीं था कि उनके परिवार में ऐसी कोई बीमारी है या नहीं - यह आंकड़ा अपने आप में ग्रामीण स्वास्थ्य जागरूकता की दशा बयान करता है।

जिन 9 घरों में बायोगैस संयंत्र लगाए गए, उनमें से आठ यानी 88 फीसदी परिवारों ने माना कि पारंपरिक ठोस ईंधन से खाना पकाने पर घर के अंदर हवा प्रदूषित होती है। सात घरों (78 फीसदी) ने कहा कि बायोगैस अपनाने के बाद घर के अंदर की हवा साफ हुई। छह घरों (66 फीसदी) ने बाहरी हवा में भी सुधार महसूस किया। पांच घरों (56 फीसदी) ने सीधे तौर पर खुद या परिवार के किसी सदस्य को स्वास्थ्य लाभ मिलने की बात स्वीकरा की।

तपती छत को ठंडक-कूल रूफ का अनुभव
गर्मियों में भारत के गांवों में घरों के अंदर का तापमान असहनीय हो जाता है, खासकर उन घरों में जहां न ढंग का वेंटिलेशन है, न इन्सुलेशन। कार्यक्रम के तहत 19 घरों में कूल रूफ लगाई गईं। इनमें से सात घरों (37 फीसदी) ने घर के अंदर बेहतर तापीय आराम महसूस किया। यह आंकड़ा भले ही मामूली लगे, लेकिन शोधकर्ताओं ने इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा है। यह भी उल्लेखनीय है कि इन सभी घरों में पंखे भी लगाए गए थे।

शोधकर्ताओं ने अपने नतीजों को लेकर पूरी तरह सावधान रहते हुए कई सीमाएं भी स्वीकार की हैं। यह सर्वे केवल एक गांव में, केवल एक महीने - मार्च 2024 - में किया गया। अध्ययन के नतीजे पहले और बाद की की तुलना पर नहीं, बल्कि स्वयं-रिपोर्ट आधारित हैं। कोई नियंत्रण समूह नहीं था। कूल रूफ और पंखे एक साथ लगाए गए, इसलिए तापीय आराम का श्रेय किसे दिया जाए, यह तय करना कठिन था।

इसके बावजूद, अध्ययन का महत्व इसमें है कि यह ग्रामीण भारत में जलवायु कार्रवाई के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को मापने का एक शुरुआती, ईमानदार प्रयास है।

गांवों में कैसी हो भविष्य की तैयारी 
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि भविष्य में इस तरह के कार्यक्रमों को लागू करने से पहले और बाद के सर्वे, हवा की गुणवत्ता की वैज्ञानिक निगरानी, इनडोर तापमान की माप, और अस्थमा व सीओपीडी जैसी बीमारियों के मामलों की गिनती जरूरी है। साथ ही, बुजुर्गों, दिव्यांगों और पहले से बीमार लोगों के घरों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इस अध्ययन का मूल संदेश यही है कि जलवायु कार्रवाई यानी क्लाइमेट एक्शन और स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जब गांव हरा-भरा होता है और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाया जाता है, तो गांव के लोग भी स्वस्थ होते हैं।

आज जब पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस (World Health Day 2026) मना रही है, तो यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि भारत की असली स्वास्थ्य चुनौती किसी बड़े अस्पताल या शहरी क्लिनिक में नहीं, बल्कि हमारे गांवों के उन रसोईघरों में है, जहां महिलाएं धुएं में खाना पका रही हैं। उस छत के नीचे है, जहां रात को नींद नहीं आती, क्योंकि गर्मी असहनीय है। 
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