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IIT Madras Study: स्वच्छ ऊर्जा के लिए दोगुना निवेश जरूरी, तेज निवेश के बिना 2050 तक नेट-जीरो लक्ष्य कठिन

डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 09 Apr 2026 01:58 PM IST
सार

भारत को नेट जीरो लक्ष्यों, आर्थिक विकास, ग्रामीण विद्युतीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा की जरूरत है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। लेकिन, IIT Madras के ताजा अध्ययन में पता चला है कि नेट जीरो लक्ष्यों और ऊर्जा उपयोग में बदलाव के लिए आवश्यक निवेश में कमी इस लक्ष्य को प्राप्त करने में बड़ी बाधा बन सकती है। 

प्रो. जितेंद्र संगवाई (दाएं) व रजत देहुरी (बाएं) के अध्ययन में मिले नेट जीरो से जुड़े अहम संकेत।
प्रो. जितेंद्र संगवाई (दाएं) व रजत देहुरी (बाएं) के अध्ययन में मिले नेट जीरो से जुड़े अहम संकेत। - फोटो : आईआईटीएम
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विस्तार
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जीवाश्म ईंधन के सीमित भंडार और इसके उपयोग के चलते पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को देखते हुए, दुनिया अब नेट जीरो उत्सर्जन की ओर बढ़ रही है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों को अपनाया जाना जरूरी है। लेकिन, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (Indian Institute of Technology Madras) के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, नवीकरणीय ऊर्जा मौजूदा वृद्धि दर के साथ 2050 तक जीवाश्म ईंधन को पीछे नहीं छोड़ पाएगी।

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि केवल अत्यधिक आक्रामक निवेश और तेजी से विस्तार किए जाने पर ही नवीकरणीय ऊर्जा 2040 के दशक के अंत तक वैश्विक ऊर्जा के क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर सकती है। 

पिछले दशक के आंकड़ों के आधार पर अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि यदि नवीकरणीय ऊर्जा की वृद्धि दर लगभग 5.48% सालाना बनी रहती है, तो यह 2047 से 2053 के बीच ही वैश्विक ऊर्जा मिश्रण का 50% पार कर पाएगी, जो 2050 के नेट-जीरो लक्ष्य से पीछे है। वहीं, यदि वृद्धि दर दोगुनी होकर करीब 10.96% हो जाती है, तो यह लक्ष्य 2035–2037 के बीच हासिल किया जा सकता है।

आईआईटी मद्रास (IIT Madras) के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर जीतेंद्र एस. संगवाई और शोधार्थी रजत देहुरी का यह अध्ययन शोध पत्रिका इंडियन नेशनल एकेडेमी ऑफ इंजीनियरिंग में प्रकाशित किया गया है। अध्ययनकर्ताओं की मानें तो सबसे धीमी प्रगति वाली परिस्थितियों में नवीकरणीय ऊर्जा वर्ष 2074 तक भी जीवाश्म ईंधनों को पीछे नहीं छोड़ पाएगी, बल्कि संभव है कि सदी के अंत तक भी उनसे आगे न निकल सके।

भारत का 485 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता का लक्ष्य
रिपोर्ट में भारत की स्थिति को जटिल लेकिन अहम बताया गया है। एक ओर भारत कुल उत्सर्जन के मामले में बड़े देशों में शामिल है, वहीं प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम है। देश को आर्थिक विकास, ग्रामीण विद्युतीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा की जरूरत है। भारत ने वर्ष 2030 तक 485 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता का लक्ष्य रखा है, जिसमें 293 गीगावॉट सौर ऊर्जा, 100 गीगावॉट पवन ऊर्जा, 78 गीगावॉट जलीय ऊर्जा और 15 गीगावॉट जैव ऊर्जा शामिल है।

वैश्विक स्तर पर 2014 से 2023 के बीच नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 128% बढ़कर 3,869.7 गीगावॉट हो गई है, फिर भी यह कुल ऊर्जा खपत का केवल 14.56% ही है, जबकि जीवाश्म ईंधन अब भी 81% से अधिक ऊर्जा आपूर्ति करते हैं और 95% से ज्यादा कार्बनडाईऑक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।

बिजली ग्रिड-ऊर्जा भंडारण पर 73% बढ़ाना होगा खर्च 
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2023 (COP 28) के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तुरंत दोगुना करना होगा और बिजली ग्रिड व ऊर्जा भंडारण पर खर्च में लगभग 73% की बढ़ोतरी जरूरी है। शोध यह भी चेतावनी देता है कि यदि निवेश, नीति सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की गति नहीं बढ़ाई गई, तो आने वाले दशकों के अधिकांश जलवायु लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएंगे।

विविध प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित दृष्टिकोण की जरूरत 
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि केवल नवीकरणीय ऊर्जा से 2050 तक नेट-जीरो हासिल करना संभव नहीं है। अगले 20–30 वर्षों तक कोयला, तेल और गैस की भूमिका बनी रहेगी, खासकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में। इसलिए ऊर्जा संक्रमण के लिए बहु-तकनीकी दृष्टिकोण जरूरी है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शोधकर्ताओं ने कुछ मुख्य पूरक उपाय भी बताए हैं:
  • कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण 
  • उन्नत ऊर्जा भंडारण (बैटरी, पंप्ड हाइड्रो, ग्रीन हाइड्रोजन)
  • सभी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता में सुधार
  • स्मार्ट ग्रिड का आधुनिकीकरण

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