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Indian Agriculture In A Volatile World Beyond Production Shaping The Future Of Farming
युद्ध, व्यापारिक बाधाएं और जलवायु परिवर्तन : भारत को लचीली व आत्मनिर्भर खेती के लिए चाहिए कृषि का नया रोडमैप
डॉ. उमाशंकर मिश्र, मोहम्मद आमिल और देवेश सारस्वत
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 28 Apr 2026 07:36 PM IST
सार
कभी डब्ल्यूटीओ के नियम बाधा बनते हैं, तो कभी टैरिफ और व्यापारिक समझौते चुनौती खड़ी करते हैं। पहले कोविड-19 और अब पश्चिम एशिया युद्ध संकट ने आपूर्ति शृंखला को बार-बार झकझोरा है, जिसकी मार किसानों, कृषि बाजार और उपभोक्ताओं पर सबसे अधिक पड़ती है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि संकट के समय ही समाधान की राह निकली है। वैश्विक अस्थिरता के झटके झेलने के लिए भारतीय कृषि को लचीला और आत्मनिर्भर बनाने से जुड़ी एक पड़ताल...
वैश्विक खाद्य तंत्र जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव के दोहरे दबाव में है।
- फोटो : गांव जंक्शन
1966 की हरित क्रांति अकाल की कोख से जन्मी थी और 1991 के आर्थिक संकट ने उदारीकरण के द्वार खोल दिए। संकट के दौर ने भारत को पहले से अधिक मजबूत बनाया है। पहले टैरिफ की मार और पश्चिम एशिया संकट के कारण आपूर्ति बाधित होने का असर भारत के कृषि क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। भारत इस संकट से उबरकर मजबूती से आगे बढ़ने की क्षमता रखता है, क्योंकि हमारे देश में जमीन, श्रम, विविधता और नीतिगत इच्छाशक्ति है - बस जरूरत है समग्र दृष्टि और त्वरित क्रियान्वयन की।
कृषि में अस्थिरता की एक बड़ी वजह कमजोर वैल्यू चेन है, जिस पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
- फोटो : गांव जंक्शन
सिर्फ कीमत नहीं, नीति के केंद्र में हो जोखिम प्रबंधन
पिछले पांच दशकों में भारतीय कृषि ने एक असाधारण सफर तय किया है। वर्ष 1960 के दशक में खाद्यान्नों की कमी से उबरकर आज भारत 33 करोड़ टन से अधिक उत्पादन के साथ दुनिया के प्रमुख अनाज उत्पादकों में शामिल हो गया है। यह उपलब्धि नीतिगत दूरदर्शिता, वैज्ञानिक प्रगति और किसानों की मेहनत का परिणाम है। लेकिन, इस सफलता के पीछे एक असहज सच्चाई भी है - भारत का खाद्य तंत्र अभी भी बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है।
नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान से जुड़े कृषि अर्थशास्त्री डॉ. अंजनी कुमार बताते हैं, कोविड-19 ने सप्लाई चेन को झकझोर दिया, रूस-यूक्रेन युद्ध ने खाद्य, ईंधन और उर्वरक की कीमतों में उछाल ला दिया और पश्चिम एशिया में हालिया तनाव ने ऊर्जा और आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितता को और गहरा कर दिया है। यह अब स्पष्ट हो चुका है कि भारत के लिए चुनौती सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि एक ऐसे खाद्य तंत्र के निर्माण की भी है, जो इन झटकों को झेल सके।
पुरानी नीति और नई चुनौतियां : भारत की कृषि नीतियां लंबे समय तक उत्पादन बढ़ाने और कीमतों को सहारा देने पर केंद्रित रही हैं। एमएसपी, इनपुट सब्सिडी और सरकारी खरीद इस ढांचे के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। यह मॉडल उस समय तो कारगर था, जब देश खाद्यान्नों की कमी से जूझ रहा था, लेकिन आज वैश्विक अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसकी सीमाएं स्पष्ट दिखने लगी हैं। आज की खाद्य व्यवस्था वैश्विक तंत्र और जलवायु से जुड़ी हुई है, जहां अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर घरेलू बाजार पर सीधे पड़ता है। ऐसे में, तीन बड़ी कमजोरियां सामने आती हैं :-
अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर : आयात पर निर्भर खाद्य तेल व दालों जैसी वस्तुओं की कीमतें वैश्विक बाजार के अनुसार बदलती रहती हैं, जिससे किसानों व उपभोक्ताओं को कठिनाई झेलनी पड़ती है।
आयात पर निर्भरता : उर्वरक, ऊर्जा व खाद्य तेल जैसे संसाधनों की आयात निर्भरता खेती की लागत को बाहरी परिस्थितियों के हवाले कर देती है। सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ता है।
तात्कालिक नीतिगत फैसले : निर्यात पर रोक, भंडारण सीमा या शुल्क में बदलाव अल्पकालिक राहत देते हैं, लेकिन किसानों को प्रोत्साहन व वैश्विक विश्वसनीयता को नुकसान होता है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि नीति का फोकस कीमतों के प्रबंधन से हटाकर जोखिम प्रबंधन पर लाना जरूरी है।
आय स्थिरता पर फोकस : एमएसपी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह हर स्थिति में सुरक्षा नहीं देता। ऐसे में, मूल्य अंतर भुगतान और लक्षित आय सहायता जैसे उपाय किसानों को बेहतर सुरक्षा दे सकते हैं।
स्थिर व्यापार नीति : निर्यात व आयात से जुड़े फैसलों के लिए स्पष्ट और नियम-आधारित ढांचा बनाने से भारत की वैश्विक साख मजबूत होगी।
आयात निर्भरता में कमी : जैव उर्वरकों का उपयोग, मिलेट्स (श्री अन्न) एवं दलहन जैसी कम लागत वाली फसलों को बढ़ावा और कृषि में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग लागत तथा जोखिम को कम कर सकता है।
आज की खाद्य व्यवस्था वैश्विक तंत्र और जलवायु से जुड़ी हुई है।
- फोटो : गांव जंक्शन
मजबूत वैल्यू चेन और बेहतर संतुलन जरूरी
डॉ. अंजनी कुमार बताते हैं, कृषि में अस्थिरता की एक बड़ी वजह कमजोर वैल्यू चेन है, जिस पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। स्टोरेज की कमी, बिखरे बाजार और सीमित प्रोसेसिंग क्षमता के कारण किसानों को सही दाम नहीं मिल पाता, जबकि उपभोक्ताओं को अधिक दाम चुकाने पड़ते हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करना, कोल्ड चेन में निवेश बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग को प्रोत्साहन देना जरूरी है। साथ ही, कृषि डेटा और बाजार की जानकारी को एकीकृत करने की आवश्यकता है, ताकि नीतिगत फैसले समय पर और सटीक रूप से हो सकें।
किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाना भी एक बड़ी चुनौती है। खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने के उपाय अक्सर किसानों को मिलने वाले दाम घटा देते हैं, जबकि ऊंची कीमतें उपभोक्ताओं पर बोझ डालती हैं। ऐसे में, लक्षित आय सहायता के जरिये उपभोक्ताओं और बाजार संकेतों को बनाए रखना अधिक व्यावहारिक समाधान है।
डॉ. अंजनी कुमार बताते हैं, आज वैश्विक खाद्य तंत्र जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव के दोहरे दबाव में है और वैश्विक अनिश्चितताएं आगे भी बनी रहेंगी। ऐसे में, भारत की खेती का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने किसानों, बाजार और संस्थाओं को कितना मजबूत और सक्षम बना पाता है।
पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत के कृषि निर्यात पर भी खतरा बढ़ा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
दलहन-तिलहन और जैविक मॉडल से मजबूत होगी खेती
गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के सतत नाइट्रोजन और पोषक तत्व प्रबंधन केंद्र के प्रमुख प्रो. एन. रघुराम कहते हैं, वर्ष 2017 के नवंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम में देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों से यूरिया की खपत को वर्ष 2022 तक आधा करने के लिए आह्वान किया था। प्रधानमंत्री की यह अपील मांग और प्रबंधन से जुड़े बड़े दृष्टिकोण पर आधारित थी, क्योंकि मांग कम होने से आपूर्ति, सब्सिडी और आयात पर पड़ने वाला बोझ खुद कम हो जाता। पर, वर्ष 2026 में इस रासायनिक उर्वरक की खपत कम होने के बजाय बढ़ गई है।
प्रो. एन. रघुराम कहते हैं, सरकार का दृष्टिकोण सही है, लेकिन नीति में निरंतरता और क्रियान्वयन का अभाव दिखाई देता है। पिछले बजट में दलहन व तिलहन मिशन को पुनर्जीवित करने की बात शामिल थी, लेकिन इस साल के बजट दस्तावेज में दलहन और तिलहन जैसे शब्द तक गायब हैं।
योजनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता जरूरी : हम सीजन-दर-सीजन योजनाएं तो बनाते हैं, लेकिन उनकी दीर्घकालिक स्थिरता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। हमारी अधिकतर ऊर्जा जरूरतें आयात पर टिकी हुई हैं। यहां तक कि यूरिया बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल भी बड़ी मात्रा में आयात किया जाता है।
धान-गेहूं के चक्र से 10% क्षेत्र निकालकर दलहन और तिलहन की ओर ले जाना होगा।
- फोटो : गांव जंक्शन
प्रो. एन. रघुराम के मुताबिक, इस निर्भरता को कम करने की जरूरत है। वह कहते हैं, हमें धान-गेहूं के चक्र से 10% क्षेत्र निकालकर दलहन और तिलहन की ओर ले जाना होगा। दालें हवा से नाइट्रोजन खींचती हैं, जिससे यूरिया की 90% की जरूरत खत्म हो जाएगी। इससे न केवल उर्वरक आयात बचेगा, बल्कि देश की पोषण सुरक्षा भी बढ़ेगी।
दूसरा बड़ा समाधान एनडीडीबी का मॉडल है, जहां गोबर और पशुओं के मलमूत्र से स्लरी बनाकर बायोगैस मिलती है और बचे हुए हिस्से से बायोचार बनाया जाता है। 15 राज्यों में इसकी सैकड़ों यूनिट्स काम कर रही हैं। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता का रास्ता है। इसके अलावा, उर्वरक उत्पादों में हरित अमोनिया को बढ़ावा देने से विदेशी एलनजी पर निर्भरता कम होने का रास्ता खुल सकता है। वहीं, खाद्य प्रसंस्करण ढांचे को मजबूती देना काफी अहम हो गया है।
निर्यात हमेशा अधिशेष होने का संकेत नहीं होता : पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत के कृषि निर्यात पर भी खतरा बढ़ा है। लेकिन, असल संकट हमारी मुद्रा की वैश्विक स्थिति से जुड़ा है, चूंकि भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा नहीं है। हमें विदेशों से कच्चा तेल और गैस खरीदने के लिए डॉलर की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
डॉलर की जरूरत को पूरा करने के लिए हमें अपने कृषि उत्पादों को विश्व के बाजार में निर्यात करना पड़ता हैं। आज हम अपनी वास्तविक खाद्य सुरक्षा की जरूरत से अधिक अनाज पैदा कर रहे हैं। लेकिन, हमारा निर्यात हमेशा अधिशेष होने का संकेत नहीं होता, कई बार हम निर्यात इसलिए करते हैं, क्योंकि देश के भीतर एक बड़े वर्ग के पास उस अनाज को खरीदने की क्रयशक्ति नहीं होती।
बिना डॉलर के लेनदेन के विकल्पों का कूटनीतिक उपयोग : अगर हमने रूस, ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों के साथ रुपये में व्यापार या बिना डॉलर के लेनदेन के विकल्पों को कूटनीतिक रूप से मजबूती से पकड़ा होता, तो डॉलर कमाने के लिए कृषि निर्यात का यह भारी दबाव काफी कम हो सकता था।
प्रो. एन. रघुराम के मुताबिक, हमें अपनी निर्यात नीति को आयात घटाने की रणनीति के साथ संतुलित करना होगा। जब हम विदेशी मुद्रा पर आधारित ऊर्जा आयात की निर्भरता को कम करेंगे, तभी हम इस निर्यात की मजबूरी वाले दुष्चक्र से बाहर निकल पाएंगे और अपनी उपजाऊ जमीन का बेहतर उपयोग निर्यात के बजाय देश की वास्तविक पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में कर सकेंगे।
भारत को अपने निर्यात ढांचे को अधिक विविध और लचीला बनाना होगा।
- फोटो : गांव जंक्शन
लागत घटाने, निर्यात बढ़ाने के लिए नई रणनीति की जरूरत
मशहूर बाजार विशेषज्ञ अजय केडिया बताते हैं, पश्चिम एशिया में युद्ध संकट का असर तीन स्तरों पर साफ दिखता है - ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और उर्वरक आपूर्ति। होर्मुज स्ट्रेट के जरिये सप्लाई प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई, जिससे परिवहन और कृषि लागत बढ़ने की चुनौती उभर सकती है।
साथ ही, उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव भी किसानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है। ईरान भारत का अहम व्यापारिक साझेदार है, जहां अस्थिरता के चलते बासमती चावल जैसे उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ सकता है। रुपये में होने वाला व्यापार भी प्रभावित होगा, जिससे सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा।
निर्यात ढांचे को अधिक विविध और लचीला बनाना होगा: अजय केडिया आगे कहते हैं, भारत को अपने निर्यात ढांचे को अधिक विविध और लचीला बनाना होगा। भविष्य में कृषि की लागत बढ़ना तय है - ईंधन महंगा होगा, उर्वरक महंगे और सीमित होंगे। अल-नीनो के कारण बारिश कम हुई तो स्थिति और जटिल हो सकती है।
ऐसे में, केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लागत को नियंत्रित करना और उत्पादकता बढ़ाना जरूरी है। अब तक अमेरिका और यूरोप के बाजारों पर निर्भरता रही है, लेकिन भविष्य में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे नए बाजारों पर ध्यान देना होगा।
मुक्त व्यापार समझौते लेकर आए नए अवसर: अजय केडिया बताते हैं कि मुक्त व्यापार समझौते नए अवसर प्रदान कर रहे हैं। वैश्विक बाजार की मांग को देखते हुए एकीकृत कीट प्रबंधन और कम रसायन वाले उत्पादों पर फोकस बढ़ाना होगा, लेकिन पूरी तरह ऑर्गेनिक की ओर जाने के बजाय संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
दूसरी ओर, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को मजबूत किए बिना न तो नुकसान कम होगा और न ही निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। बिजली, मजदूरी और इनपुट्स की बढ़ती लागत के बीच अब तकनीक आधारित खेती - जैसे एआई और ड्रोन - को अपनाना समय की मांग बन चुका है। यही कदम भारतीय कृषि को वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।
भारत को अपने निर्यात ढांचे को अधिक विविध और लचीला बनाना होगा।
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खाद्य प्रसंस्करण और नए बाजारों की खोज पर अब बढ़े फोकस
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व उप-महानिदेशक प्रो. एन.एस. राठौर बताते हैं, पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष और असुरक्षा के कारण स्वेज नहर और लाल सागर मार्ग में नौवहन कंटेनरों का किराया बढ़ा है और परिवहन में अधिक समय लग रहा है, जिससे ताजा फल-सब्जियों जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।
कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ने से उर्वरक व खेती की लागत भी बढ़ रही है। पश्चिम एशिया भारत के बासमती चावल, मसालों और मांस का प्रमुख बाजार है, जहां अस्थिरता से मांग कम हुई है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के टैरिफ और नॉन-टैरिफ बाधाएं भी कृषि निर्यात के लिए चुनौती बनी हैं।
प्रो. एन.एस. राठौर बताते हैं, कीटनाशक अवशेषों के नाम पर भारतीय खेप अक्सर वापस कर दी जाती हैं और भारी टैरिफ के कारण भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे पड़ते हैं। भारत की लगभग 85% खेती छोटी जोतों पर निर्भर है, जहां प्रति इकाई खेती की लागत हमेशा ऊंची बनी रहती है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों को महंगा और कम प्रतिस्पर्धी बना देती है। साथ ही, ऑर्गेनिक व ट्रेसेबिलिटी की वैश्विक मांग को पूरा करना भी कठिन हो जाता है।
प्रो. राठौर बताते हैं, मुक्त व्यापार समझौतों के चलते फल, सब्जियों, मसालों व समुद्री उत्पादों को विदेशी बाजारों में शून्य या कम टैरिफ पर पहुंच मिलती है और आधुनिक कृषि तकनीक आने का रास्ता खुलता है। दूसरी ओर, डेयरी, खाद्य तेल और रबड़ जैसे क्षेत्रों में विकसित देशों से सस्ते आयात से घरेलू किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
नए बाजारों की खोज यह मुश्किल हल कर सकती है। जीसीसी देशों में जैविक उत्पाद और बाजरा, आसियान देशों में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, अफ्रीकी देशों में दालें और अनाज तथा मध्य एशिया में चाय, मसाले और डेयरी उत्पादों की अपार संभावनाएं हैं।
वहीं, भारत में 15-20% फल-सब्जियां आपूर्ति शृंखला की कमी से खराब हो जाती हैं, जिसे खाद्य प्रसंस्करण से रोक सकते हैं। साथ ही, डिजिटल ट्रेसेबिलिटी व गुणवत्ता प्रमाणीकरण को प्राथमिकता देकर तथा विशिष्ट भौगोलिक पहचान (जीआई) वाले उत्पादों और कीटनाशक मुक्त खेती को बढ़ावा देकर भारत प्रीमियम यूरोपीय बाजार में भी बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
नए बाजार खोजने होंगे। अफ्रीकी देशों जैसे उभरते बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की संभावनाएं हैं।
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खेती को वैश्विक अस्थिरता से बचाने के लिए फसल विविधीकरण महत्वपूर्ण
वरिष्ठ कृषि अर्थशास्त्री प्रो. प्रमोद कुमार जोशी बताते हैं, वैश्विक संकट और युद्ध को आमतौर पर खतरे के रूप में देखा जाता है, लेकिन भारतीय कृषि के संदर्भ में यह एक बड़े अवसर के रूप में भी उभर सकता है। ईरान का अमेरिका-इस्राइल के साथ युद्ध से पैदा हुए तनाव ने उर्वरक आपूर्ति और खेती की लागत पर दबाव जरूर बढ़ाया है, लेकिन इसी के साथ ये परिस्थितियां किसानों और सरकार को नैनो उर्वरकों और सटीक खेती जैसी आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाने से जुड़ी नए सबक लेकर भी आया है।
प्रो. प्रमोद कुमार जोशी आगे कहते हैं, यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, तो रासायनिक उर्वरकों पर हमारी निर्भरता घटेगी और विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने का रास्ता भी खुलेगा। कृषि निर्यात के मोर्चे पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है। वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भरता की बढ़ती प्रवृत्ति और विकसित देशों का हस्तक्षेप व्यापार को प्रभावित कर रहा है। हालांकि, इसे बाधा मानने के बजाय भारत के लिए यह नए बाजारों की तलाश का अवसर है। विशेष रूप से अफ्रीकी देशों जैसे उभरते बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की बड़ी संभावनाएं हैं। इसके साथ ही, फूड प्रोसेसिंग उद्योग को मजबूत करना अब और भी जरूरी हो गया है, ताकि मूल्य संवर्धन के जरिये किसानों की आय बढ़ाई जा सके।
प्रो. जोशी बताते हैं, आज खेती को वैश्विक अस्थिरताओं से सुरक्षित बनाने के लिए फसल विविधीकरण को महत्वपूर्ण उपाय माना जा रहा है, लेकिन यह पूरी तरह बाजार आधारित प्रक्रिया है और किसान भी तुरंत फसलों के चयन में परिवर्तन नहीं कर सकते। इसीलिए किसानों तक सही जानकारी और बाजार से जुड़े संकेतों को पहुंचाना जरूरी है। इस संदर्भ में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिग एक प्रभावी मॉडल बनकर सामने आता है, जहां किसानों को जोखिम कम होता है और उन्हें अपनी उपज का तय दाम व सुनिश्चित बाजार मिलता है।
प्रो. प्रमोद कुमार जोशी कहते हैं, युद्ध के कारण बाधित सप्लाई चेन और जहाजों की आवाजाही रुकना ऐसी अनिश्चित स्थिति है, जिस पर किसी एक देश का नियंत्रण नहीं होता। ऐसे समय में निर्यात पर निर्भरता कम करते हुए घरेलू रणनीति को मजबूत करना ही सबसे व्यवहारिक विकल्प हो सकता है। कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं के जरिये उत्पादों को सुरक्षित रखना और घरेलू बाजार को सशक्त बनाना इस दिशा में बेहद अहम कदम हो सकते हैं।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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