वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच खाद्य तेल की आत्मनिर्भरता अहम मुद्दा बन गई है। सरकार के मिशन, बढ़ते उत्पादन और तकनीकी प्रयासों के बावजूद आयात पर निर्भरता अभी भी अधिक है, जिसे घटाने के लिए तिलहन की खेती का विस्तार, बेहतर बीज और किसानों का समर्थन जरूरी है।
आज दुनिया ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां खाद्यान्न, ऊर्जा और जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं भू-राजनीतिक दबाव का हथियार बनते जा रहे हैं। कोविड-19 महामारी से लेकर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव तक हर संकट ने यही दिखाया है कि आयात पर अत्यधिक निर्भर देश सबसे पहले आर्थिक अस्थिरता का सामना करते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए यह जोखिम और बड़ा है क्योंकि यहां खाद्य कीमतों में मामूली वृद्धि भी करोड़ों परिवारों के घरेलू बजट को व्यापक रूप से प्रभावित करती है।
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कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति और खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बावजूद भारत आज भी अपनी खाद्य-तेल खपत का बहुत बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों के बीच लोगों से डीजल-पेट्रोल के साथ-साथ खाद्य तेल की खपत में भी संयम बरतने के लिए अपील की है। यह अपील केवल बचत का संदेश नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक दौर में आत्मनिर्भर भारत की नई आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता का एक नया संकेत है।
उत्पादन के साथ खपत में भी उछाल
भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी खाद्य तेल अर्थव्यवस्था है। नीति आयोग की अगस्त 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत धान की भूसी के तेल, अरंड के बीज, कुसुम तेल और नाइजर के उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है। फिर भी, उसे अपनी रसोई का आधे से ज्यादा तेल बाहर से मंगाना पड़ता है। ऊपर से देखने पर यह स्थिति विरोधाभासी लगती है, लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
वर्ष 2015-16 में हम स्वयं अपनी जरूरत का केवल 37 प्रतिशत तेल पैदा कर पाते थे, शेष 63 प्रतिशत आयात होता था। वर्ष 2024-25 तक यह आयात निर्भरता घटकर 56 प्रतिशत रह गई। यह सुधार तब हुआ, जब इसी दौरान हमारी घरेलू मांग 234 लाख टन से बढ़कर 285 लाख टन तक पहुंच गई। बढ़ती आबादी और बढ़ती खपत की चुनौतियों के बीच भारत के खेत अब पहले से अधिक तिलहन पैदा कर रहे हैं। स्पष्ट है कि हम धीरे-धीरे ही सही, सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
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राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन से उम्मीदें
भारत के कुल खाद्य तेल आयात का आधे से अधिक हिस्सा अकेले पाम तेल का है। सरकार ने वर्ष 2021 में 11,040 करोड़ रुपये परिव्यय के साथ राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन ऑयल पाम (एनएमईओ- ओपी) शुरू किया। ऑयल पाम की खेती की सबसे बड़ी खूबी इसकी बेजोड़ उपज है। सरसों या सोयाबीन से एक हेक्टेयर में जितना तेल मिलता है, ऑयल पाम उससे 5 गुना अधिक देता है। नतीजे जमीन पर दिखने लगे हैं।
वर्ष 2014-15 में देश में कच्चे पाम तेल का उत्पादन 1.91 लाख टन था। 10 साल में यह लगभग दोगुना होकर 3.80 लाख टन तक पहुंच चुका है। वर्ष 2029-30 तक इसे बढ़ाकर 2.8 मिलियन टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उल्लेखनीय बात यह है कि ऑयल पाम की खेती अब पहले की तरह सिर्फ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तक सीमित न होकर, पूर्वोत्तर राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, त्रिपुरा और नागालैंड तक पसर चुकी है।
ऑयल पाम किसानों के लिए सरकार ने एक अनोखा कदम उठाया। ऑयल पाम के ताजा फलों के गुच्छों के लिए व्यवहार्यता मूल्य तय किया गया है। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे पाम तेल के दाम चाहे जितना गिरे-उठे, किसान को उसकी उपज का सुनिश्चित दाम मिलेगा।
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पारंपरिक तिलहन की नई कहानी
भारत की रसोई केवल ऑयल पाम के भरोसे आत्मनिर्भर नहीं बन सकती। असली दारोमदार सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, और सूरजमुखी जैसी तिलहन फसलों पर है। इन फसलों के साथ चुनौती यह है कि देश का लगभग 76 प्रतिशत तिलहन क्षेत्र बारानी है। वर्षा-आधारित खेती में उत्पादन कम और जोखिम अधिक होता है।
वर्ष 2024 में 7 साल की अवधि के लिए शुरू किए गए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन का दूसरा हिस्सा ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन तिलहन (एनएमईओ -ओएस)’ इसी अंतराल को पाटने पर केंद्रित है। 10,103 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय वाले तिलहन मिशन का उद्देश्य प्रमुख प्राथमिक तिलहन फसलों, जैसे सरसों, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, नाइजर, अलसी और अरंडी का उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कपास, नारियल, धान की भूसी, और वृक्ष-जनित तिलहन जैसे द्वितीयक स्रोतों से संग्रह और निष्कर्षण दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है।
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इसका लक्ष्य भी स्पष्ट है- तिलहन की औसत उपज को वर्तमान 1400-1500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 2,112 किलोग्राम तक ले जाना, और कुल उत्पादन को मौजूदा 39 मिलियन टन से बढ़ाकर, वर्ष 2030-31 तक 69.7 मिलियन टन तक पहुंचाना। लक्ष्य को लेकर सरकार कमर कस चुकी है। देशभर में 600 से अधिक मूल्य-शृंखला क्लस्टर बनाए गए हैं हर क्लस्टर में किसान उत्पादक संगठन और सहकारी समितियां तिलहन किसानों का हाथ थामे हुए हैं। उन्हें मुफ्त उन्नत बीज मिल रहे हैं, मौसम और बीज प्रबंधन पर विशेषज्ञ सलाह मिल रही है, और फसल को सही दाम पर बेचने के लिए बाजार से जुड़ाव कराया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त कई राज्यों में धान और आलू की कटाई के बाद खाली पड़ी रहने वाली लगभग 40 लाख हेक्टेयर जमीन पर भी तिलहन उगाने की योजना है।
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तिलहन की 432 नई किस्मों से बढ़ी उम्मीद
किसी भी फसल क्रांति की जड़ बीज में होती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पिछले 11 वर्षों में, नौ प्रमुख तिलहनों की 432 नई, उन्नत, और जलवायु-सहनशील किस्में विकसित की हैं। यह किस्में खेत तक पहुंचे, इसके लिए साथी पोर्टल के जरिये पंचवर्षीय बीज योजना बनाई गई है और 65 नए बीज केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क में भारी वृद्धि द्वारा बाजार का पलड़ा भी किसान के पक्ष में झुकाया गया है। पीएम-आशा योजना के तहत सरसों, मूंगफली, सोयाबीन जैसी प्रमुख तिलहन फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद का जाल बिछाया गया है।
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खाद्य-तेल आत्मनिर्भरता से आर्थिक सुरक्षा
भारत ने वर्ष 2025 में अकेले खाद्य तेलों के आयात पर 1.54 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च की। यह राशि कई राज्यों के वार्षिक कृषि बजट से भी अधिक है। वैश्विक बाजार में जरा-सी हलचल भी देश के भीतर व्यापार-असंतुलन, महंगाई, और विदेशी मुद्रा-भंडार पर अप्रत्याशित दबाव की स्थिति बना देती है। यही कारण है कि भारत के लिए खाद्य-तेल आत्मनिर्भरता का प्रश्न अब केवल कृषि या उपभोक्ता मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का विषय बन चुका है।
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ऐसे में सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक सकल घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को 254.5 लाख टन तक पहुंचाने का है, जो हमारी अनुमानित जरूर का लगभग 72% होगा। यह पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं है, फिर भी एक ऐसा मुकाम जरूर है, जहां से आपूर्ति-शृंखला में अवरोध या विदेशी बंदरगाहों की उथल-पुथल भारत की रसोई का स्वाद नहीं बिगाड़ पाएगी।
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खेतों तक पहुंचानी होंगी नीतियां
खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की राह आसान नहीं है। जलवायु परिवर्तन का बढ़ता संकट, बारानी खेती का विशाल दायरा, उपभोक्ताओं की बदलती पसंद, ऑयल पाम की खेती से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएं, और छोटे किसानों की सीमित क्षमता - ये सब ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब लगातार तलाशने होंगे। लेकिन दिशा तय है, इरादा स्पष्ट है, और शुरुआती नतीजे उम्मीद जगाने वाले हैं।
भारत के पास पर्याप्त भूमि है, विशाल कृषि तंत्र है, वैज्ञानिक क्षमता है, और सबसे महत्वपूर्ण, मेहनत के धनी किसानों का अनुभव है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि नीतियां लगातार खेत तक पहुंचें और किसानों को भरोसा मिले कि देश उनके उत्पादन के साथ खड़ा है।
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खाद्य तेल संप्रभुता का यह अभियान भारतीय कृषि के उस सामर्थ्य की कहानी है, जो सही नीति और कर्मठ किसानों के भरोसे किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकती है। इसीलिए, आज देश का किसान जब खेत में तिलहन बोता है, तो वह सिर्फ एक फसल नहीं उगा रहा होता, बल्कि वह राष्ट्र की आर्थिक सुरक्षा की नींव भी मजबूत कर रहा होता है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)