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दृष्टिकोण: नकली बीजों की मार से किसान परेशान, नए बीज विधेयक से भरोसा बहाली की उम्मीद
संतोष कुमार पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 26 Jan 2026 02:13 PM IST
सार
खेती की बुनियाद बीज हैं, जो खाद्यान्न संप्रभुता से लेकर किसानों की आय के निर्धारण और बदलती जलवायु के साथ तालमेल स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन, नकली बीज, कमजोर निगरानी तंत्र और असंतुलित बाजार इस बुनियाद को कमजोर कर रहे हैं।
बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं की भूमिका अहम है।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत का खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के 246.42 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 353.96 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इसी अवधि में फल-सब्जियों का उत्पादन 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 367.72 मिलियन टन हो गया है। 3.7% कृषि विकास दर के साथ भारत विश्व में अग्रणी है। संसद के शीतकालीन सत्र में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 2025-26 के लिए 362 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य घोषित किया है। गुणवत्तापूर्ण बीज खेती की नींव हैं, जो खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय, जलवायु अनुकूलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। उन्नत बीज उत्पादन बढ़ाते हैं, जबकि नकली और घटिया बीज किसानों की मेहनत, पूंजी और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं।
खेती से भरोसा घटाते हैं नकली बीज
हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में नकली बीजों के मामले सामने आए हैं। छापेमारी में नामी कंपनियों के लेबल में पैक नकली बीज और पिछले मौसम के अनुपयुक्त बीज बड़ी मात्रा में जब्त किए गए हैं। नकली और खराब बीजों से कपास, धान, सब्जियों और मिर्च जैसी फसलों को भारी नुकसान हुआ। नकली और घटिया बीजों की सबसे बड़ी मार छोटे व सीमांत किसानों पर पड़ती है। सीमित पूंजी, महंगा कृषि ऋण और फसल विफलता उन्हें कर्ज और हताशा में धकेल देती है। बीज खराब निकलने पर न तो विक्रेता जल्दी पकड़ में आते हैं और न ही किसानों को समय पर मुआवजा मिलता है। खराब बीज फसल के साथ-साथ किसान की लागत, पूरा साल और श्रम बर्बाद कर देते हैं।
बीज बाजार की सच्चाई
देश का बीज बाजार तेजी से आधुनिक हो रहा है, लेकिन करोड़ों किसान आज भी पारंपरिक या स्वयं संरक्षित बीजों पर निर्भर हैं। हाइब्रिड बीजों का चलन बढ़ा है, पर उनकी कीमत और समय पर उपलब्धता छोटे किसानों की पहुंच से बाहर रहती है, जिससे वे अक्सर सस्ते और संदिग्ध विकल्प चुनने को मजबूर होते हैं। ग्रामीण इलाकों में असली-नकली बीज की सही पहचान भी एक मुश्किल है, क्योंकि पैकेट, ब्रांड और दावे एक जैसे दिखते हैं। इससे साफ है कि समस्या आपूर्ति के साथ-साथ नियमन और निगरानी की भी है। नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश में नकली बीज के कारण करीब 200 एकड़ कपास की फसल नष्ट हुई और किसानों को प्रति एकड़ 40–50 हजार रुपये का नुकसान हुआ, जिससे विरोध प्रदर्शन हुए। वहीं, जुलाई में राजस्थान में 30 से अधिक फैक्ट्रियां पकड़ी गईं, जो कैंसरकारक रंगों से उपचारित पुराने बीजों को ताजा स्टॉक बताकर पुनः पैक कर रही थीं और नकली खाद व कीटनाशक भी बना रही थीं।
अपर्याप्त बीज-परीक्षण तंत्र
बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं की भूमिका अहम है। अनुमान है कि स्थानीय बाजारों में बिकने वाले लगभग 20% बीज नकली हो सकते हैं। वर्ष 2024-25 में देशभर से लिए गए 2.53 लाख बीज नमूनों में से 32,525 (करीब 13%) परीक्षण में घटिया पाए गए, और जांच का दायरा बढ़ने पर यह संख्या और बढ़ सकती है। वर्तमान में देश भर में करीब 178 अधिसूचित बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं केंद्र और राज्यों के अधीन कार्यरत हैं, जो अंकुरण क्षमता, शुद्धता और नमी जैसे मानकों की जांच करती हैं। देश की विशाल बीज जरूरतों के मुकाबले यह संख्या अपर्याप्त है। कई राज्यों में कर्मियों और आधुनिक उपकरणों की कमी तथा बुआई के मौसम में जांच में देरी से नकली बीज समय पर पकड़े नहीं जा पाते। निजी और एनएबीएल/आईएसटीए मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएं उन्नत डीएनए परीक्षण की सुविधा देती हैं, लेकिन उनकी संख्या सीमित और शहरी क्षेत्रों तक सिमटी हुई है। क्षेत्रीय असमानता, तकनीकी पिछड़ापन और सीमित क्षमता बीज परीक्षण व्यवस्था की बड़ी कमजोरियां हैं, जिन्हें दूर किए बिना नकली और घटिया बीजों पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है।
किसानों तक पहुंचाने होंगे उन्नत-प्रमाणित बीज
भारत में धान, गेहूं, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की खेती के लिए आज भी बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक बीजों का उपयोग करते हैं। पारंपरिक या देसी बीज स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुकूल तो होते हैं, लेकिन हाइब्रिड बीजों की तुलना में कम उत्पादक माने जाते हैं। इसके विपरीत, हाइब्रिड बीजों की पैठ कपास में लगभग 95%, मक्का में 60–65%, श्रीअन्न / मिलेट्स में 60–70% और सब्जियों में करीब 80% तक पहुंच चुकी है। खाद्यान्न उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत और प्रमाणित बीजों तक किसानों की पहुंच जरूरी है।
सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, बीज एवं रोपण सामग्री उप-मिशन, बीज ग्राम कार्यक्रम, आईसीएआर और राज्य बीज निगमों के माध्यम से उन्नत किस्मों के विकास, उत्पादन और सब्सिडी पर वितरण का प्रयास कर रही है। फिर भी, किसानों के लिए इन बीजों की मांग के अनुरूप पर्याप्त और समय पर उपलब्धता बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाइब्रिड बीजों पर सीमित सब्सिडी और निजी कंपनियों का दबदबा इन्हें महंगा बनाता है, जबकि विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में एक ही किस्म का समान प्रदर्शन भी सुनिश्चित नहीं हो पाता। इन चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय उत्पादन और विकेंद्रीकृत वितरण, क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान, बीज निगमों की क्षमता वृद्धि, बीमा व मूल्य समर्थन तथा सख्त गुणवत्ता निगरानी और नकली बीजों पर नियंत्रण जैसी बहुस्तरीय रणनीति आवश्यक है।
नए बीज कानून से नई उम्मीदें
बीज अधिनियम 1966 और बीज नियंत्रण आदेश 1983 जैसे प्रावधान देश में अब तक बीज गुणवत्ता नियंत्रण की आधारशिला रहे हैं। बदलते बाजार और आधुनिक तकनीकी परिवेश में यह प्रावधान पर्याप्त नहीं है। बीज अधिनियम 1966 निजी क्षेत्र और आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से जुड़ी चुनौतियों को निर्देशित नहीं करता। पौध किस्म और किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001 और हाल के वर्षों में प्रस्तावित अन्य कृषि सुधार कानून बाजार सुधार और गुणवत्ता नियंत्रण तक सीमित हैं।
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं कल्याण विभाग ने वर्तमान की चुनौतियों के अनुरूप बीज विधेयक (2025) का मसौदा तैयार किया है, जो फिलहाल सलाह-सुझाव के लिए सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध है। इसका मुख्य उद्देश्य है- बीज क्षेत्र में गुणवत्ता, पारदर्शिता, और किसान हितों में संतुलन बनाना। नया विधेयक सभी बीज किस्म- हाइब्रिड और उन्नत- के अनिवार्य पंजीकरण और मानकीकरण का प्रावधान करता है ताकि बीज की शुद्धता और प्रदर्शन सुनिश्चित हो सके। बीज के अपेक्षित परिणाम न देने पर मुआवजे का अधिकार इस विधेयक को किसान-केंद्रित बनाता है। निजी क्षेत्र के लिए स्पष्ट नियम, उत्पादन और वितरण शृंखला की जवाबदेही के लिए डिजिटल ट्रेसेबिलिटी और लेबलिंग जैसे प्रावधानों से बीज बाजार में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी तथा किसान बीज खरीद को लेकर सूचित निर्णय ले सकेंगे। नकली और घटिया बीज उत्पादन और वितरण करने वालों के लिए यह विधेयक कठोर दंड और जुर्माने का प्रावधान करता है।
नए अधिनियम को लेकर विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं। किसान संगठन अनिवार्य पंजीकरण को पारंपरिक बीज प्रणालियों पर दबाव के रूप में देख रहे हैं। इससे निजी कंपनियों के प्रभाव बढ़ाने और बीजों के महंगे हो जाने की आशंका भी जताई जा रही है। केंद्रीय कृषि और कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर द्वारा लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब में यह स्पष्ट किया गया है कि यह विधेयक किसानों के स्वयं से उगाए गए बीजों को बोने, बचाने, और आपस में साझा करने और बेचने के अधिकार को सुरक्षित रखता है। बीज विधेयक (2025) के संसद के आगामी बजट सत्र में पारित हो जाने की पूरी संभावना है। कोई भी बीज नीति तभी सफल होगी जब वह जमीन, मौसम, और किसान के जोखिम को केंद्र में रखे। इस मामले में बीज नहीं, भरोसा बोना होगा।
किसानों तक पहुंचाने होंगे प्रमाणित बीज
भारत में धान, गेहूं, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की खेती के लिए आज भी बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक बीजों का उपयोग करते हैं। पारंपरिक या देसी बीज स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुकूल तो होते हैं, लेकिन हाइब्रिड बीजों की तुलना में कम उत्पादक माने जाते हैं। इसके विपरीत, हाइब्रिड बीजों की पैठ कपास में लगभग 95%, मक्का में 60–65%, श्रीअन्न / मिलेट्स में 60–70% और सब्जियों में करीब 80% तक पहुंच चुकी है। खाद्यान्न उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत और प्रमाणित बीजों तक किसानों की पहुंच जरूरी है।
सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, बीज एवं रोपण सामग्री उप-मिशन, बीज ग्राम कार्यक्रम, आईसीएआर और राज्य बीज निगमों के माध्यम से उन्नत किस्मों के विकास, उत्पादन और सब्सिडी पर वितरण का प्रयास कर रही है। फिर भी, किसानों के लिए इन बीजों की मांग के अनुरूप पर्याप्त और समय पर उपलब्धता बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाइब्रिड बीजों पर सीमित सब्सिडी और निजी कंपनियों का दबदबा इन्हें महंगा बनाता है, जबकि विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों में एक ही किस्म का समान प्रदर्शन भी सुनिश्चित नहीं हो पाता। इन चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय उत्पादन और विकेंद्रीकृत वितरण, क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान, बीज निगमों की क्षमता वृद्धि, बीमा व मूल्य समर्थन तथा सख्त गुणवत्ता निगरानी और नकली बीजों पर नियंत्रण जैसी बहुस्तरीय रणनीति आवश्यक है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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