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Agricultural Exports Robust Logistics Expansion Of Cooperative Institutions Will Make Villages Self Reliant
साझी नीति से गांवों का विकास: कृषि निर्यात, लॉजिस्टिक्स व सहकारी संस्थाओं के विस्तार से गांव बनेंगे आत्मनिर्भर
पी.एस.ओझा, पूर्व समन्वयक - यू.पी. राज्य जैव-ऊर्जा विकास बोर्ड
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 20 Mar 2026 12:55 PM IST
सार
वैश्विक टैरिफ वॉर के दौर में केंद्र एवं राज्यों के बीच तालमेल से खेती को तकनीक, बाजार और निर्यात से जोड़कर गांवों को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। कृषि निर्यात, मजबूत लॉजिस्टिक्स और सहकारी संस्थाओं के विस्तार से ग्रामीण भारत और किसानों की बेहतर आय सुनिश्चित हो सकती है।
राज्यों में मूल्य संवर्धन, भंडारण व निर्यात ढांचा बेहतर होगा, तो किसानों की आय स्थिर बनी रह सकती है।
- फोटो : गांव जंक्शन
आज दुनिया में व्यापार केवल सामान का लेनदेन नहीं, बल्कि रणनीति और शक्ति का खेल बन चुका है। जब बड़े देश आयात शुल्क बढ़ाते हैं या व्यापारिक शर्तें कड़ी करते हैं, तो इसका असर सीधे उन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है जो निर्यात पर निर्भर हैं। ऐसे माहौल में भारत के सामने भी चुनौतियां हैं - निर्यात में गिरावट, कच्चे माल की बढ़ती लागत, रोजगार पर असर और मुद्रा पर दबाव जैसी स्थितियां किसी भी समय पैदा हो सकती हैं। ऐसे दौर में सबसे बड़ा हथियार है - सहकारी संघवाद, यानी केंद्र और राज्यों का मिलकर मजबूती से काम करना। दुनिया भर में बढ़ती व्यापारिक होड़ (टैरिफ वॉर) के बीच देश की अर्थव्यवस्था सुरक्षित रखने के लिए सहकारी संघवाद जैसी एकजुटता अधिक जरूरी हो गई है।
साझेदारी और समन्वय के साथ काम करने की बेहतरीन मिसाल सहकारिता मंत्रालय द्वारा बनाई गई 3 नई राष्ट्रीय समितियां हैं। भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (बीबीएसएसएल), राष्ट्रीय सहकारी निर्यात निगम लिमिटेड (एनसीईएल) और राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक लिमिटेड (एनसीओएल) समेत ये तीनों समितियां किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए बनाई गई हैं। जब केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर खेती, व्यापार और सड़कों जैसी योजनाएं बनाती हैं, तो देश के संसाधनों का सही इस्तेमाल होता है।
एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना इसका उदाहरण है, जो स्थानीय चीजों को देश-दुनिया के बड़े बाजारों से जोड़ती है। जीएसटी भी केंद्र और राज्यों के मिलकर काम करने का बड़ा उदाहरण है। अब जीएसटी काउंसिल में केंद्र और राज्य मिलकर टैक्स की दरें तय करते हैं। इससे टैक्स भरना आसान हुआ, व्यापार में सुविधा बढ़ी और पूरे देश के लिए एक ही बाजार तैयार हो गया। योजना आयोग के मुकाबले वर्ष 2015 में पुनर्गठित नीति आयोग में भी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को देश का विकास एजेंडा तय करने का सीधा मौका अधिक मिलता है।
आज दुनिया में टैरिफ युद्ध और संरक्षणवाद की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अगर प्रमुख व्यापारिक साझेदार आयात शुल्क बढ़ा दें तो भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है और निर्यात में गिरावट आती है। आयातित कच्चे माल पर शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिससे उद्योगों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
इसका सीधा असर निर्यात-उन्मुख उद्योगों में रोजगार पर पड़ सकता है और व्यापार घाटा बढ़ने से विनिमय दर पर भी दबाव आता है। साफ है कि टैरिफ युद्ध सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक स्थिरता का सवाल है। ऐसे समय में भारत के लिए सबसे प्रभावी रास्ता है - सहकारी संघवाद, यानी केंद्र और राज्यों का मिलकर काम करना।
कृषि क्षेत्र का बुनियादी विकास
राज्यों में मूल्य संवर्धन, भंडारण और निर्यात अवसंरचना बेहतर होगी, तो वैश्विक अस्थिरता के बावजूद किसानों की आय स्थिर बनी रह सकती है। इसलिए, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को मजबूत करना जरूरी है। वित्त आयोग की भूमिका यहां महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व संतुलन तय करता है। यदि टैरिफ युद्ध के कारण किसी राज्य की आय घटती है, तो विशेष सहायता पैकेज के जरिये संतुलन बनाए रखा जा सकता है। साथ ही, आईटीआई और स्किल डेवलपमेंट मिशनों के जरिये उद्योगों को कुशल श्रमिक उपलब्ध कराना भी जरूरी है, ताकि उत्पादन और निर्यात क्षमता बढ़ाई जा सके।
निर्यात रणनीति में राज्यों की साझेदारी
भारत के हर राज्य की अपनी अलग आर्थिक ताकत है। महाराष्ट्र ऑटोमोबाइल, गुजरात रसायन उद्योग, यूपी खाद्य प्रसंस्करण और हस्तशिल्प, तमिलनाडु इलेक्ट्रॉनिक्स, कर्नाटक आईटी सेवाओं और पंजाब बासमती व इंजीनियरिंग उत्पादों में मजबूत है। केंद्र निर्यात नीति बनाते समय राज्यों के साथ तालमेल बैठाए, तो वैश्विक झटकों का असर कम किया जा सकता है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और नीति आयोग मिलकर राज्य-विशिष्ट निर्यात नीति तैयार करें, जिसमें हर राज्य की क्षमता के आधार पर लक्ष्य तय हों। विदेश व्यापार महानिदेशालय के आंकड़ों के आधार पर जिलों को “डिस्ट्रिक्ट एक्सपोर्ट हब” के रूप में विकसित किया जा सकता है, ताकि स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिले और एमएसएमई को सीधे बाजार से जोड़ने का रास्ता खुले।
स्थानीय उद्योगों से समृद्ध बनेंगे गांव
किसी एक देश या बाजार पर निर्भरता कम करना जरूरी है ताकि एक बाजार में टैरिफ बढ़े तो दूसरे में अवसर तलाशे जा सकें। यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खोजे जा सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत की सोच तभी सफल होगी जब स्थानीय विनिर्माण मजबूत होगा। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं को राज्यों की औद्योगिक विशेषताओं के अनुरूप लागू करना चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल और सौर उपकरण जैसे क्षेत्रों में केंद्र व राज्य मिलकर निवेश आकर्षित करें तो अधिक लाभ होगा। भूमि, बिजली, पानी और लॉजिस्टिक्स की जिम्मेदारी राज्यों की है, जबकि व्यापार समझौते और राष्ट्रीय नीति का दायित्व केंद्र का है। जब दोनों स्तर पर नीति और क्रियान्वयन साथ चलेंगे, तभी योजनाओं का वास्तविक लाभ जमीन पर दिखेगा।
आपूर्ति शृंखला और लॉजिस्टिक्स
महामारी और भू-राजनीतिक तनावों ने यह साफ कर दिया है कि मजबूत आपूर्ति शृंखला आर्थिक सुरक्षा की रीढ़ है। अगर कच्चा माल समय पर न मिले या लॉजिस्टिक्स महंगा हो, तो उत्पादन और निर्यात दोनों प्रभावित होते हैं। राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति का लक्ष्य लागत को जीडीपी के लगभग 13–14 प्रतिशत से घटाकर 8–9 प्रतिशत तक लाना है।
इसके लिए मल्टी-मॉडल परिवहन, वेयरहाउसिंग, ड्राई पोर्ट, कोल्ड स्टोरेज और डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली पर जोर देना होगा। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा और चेन्नई-बेंगलुरु कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट उत्पादन केंद्रों को बंदरगाहों से जोड़कर निर्यात लागत कम कर सकते हैं। एमएसएमई को बड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ना भी जरूरी है, ताकि आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं का घरेलू विकल्प तैयार हो सके।
साझा व्यापार वार्ता मंच की जरूरत
आज विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के तहत होने वाली वार्ताएं और मुक्त व्यापार समझौते सीधे राज्यों के उद्योगों और किसानों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में एक साझा व्यापार वार्ता मंच बनाया जाना चाहिए, जिसमें केंद्र और राज्यों के प्रतिनिधि मिलकर व्यापार समझौतों का पूर्व-प्रभाव विश्लेषण करें। यह मंच तय करे कि किस समझौते से किन राज्यों को फायदा या नुकसान होगा और किन क्षेत्रों को संरक्षण की जरूरत है। जीएसटी परिषद की तरह यह मंच पारदर्शिता और समन्वय का उदाहरण बन सकता है।
हाल के वर्षों में प्रतिस्पर्धी संघवाद की बात
हुई है, जिसमें राज्य निवेश आकर्षित करने की होड़ में रहते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन टैरिफ युद्ध जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समन्वय भी जरूरी है। इसलिए, भारत को ऐसा मॉडल अपनाना होगा, जिसमें प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों साथ चलें। साझा लक्ष्य, साझा संसाधन और साझा जवाबदेही - यही भविष्य की कुंजी है।
कैसा हो भविष्य का रोडमैप
राज्य अपनी निर्यात क्षमता पहचान कर पांच-वर्षीय लक्ष्य तय करें, जिला स्तर पर डेटा मॉनिटरिंग हो, लॉजिस्टिक्स लागत घटाने का स्पष्ट रोडमैप बने और महिला व ग्रामीण उद्यमियों को प्रोत्साहन मिले, तो भारत टैरिफ युद्ध जैसी चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है। सहकारी संघवाद केवल संवैधानिक अवधारणा नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की रणनीति है। जब केंद्र और राज्य मिलकर नीति बनाते और लागू करते हैं, तो भारत न केवल वैश्विक अनिश्चितताओं से सुरक्षित रहता है, बल्कि आत्मनिर्भर और समृद्ध राष्ट्र बनने की दिशा में तेज कदम बढ़ाता है।
टैरिफ युद्ध से निर्यात, रोजगार, उत्पादन लागत और मुद्रा स्थिरता पर खतरा बढ़ता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र व राज्यों के बीच तालमेल जरूरी है। राज्य-विशिष्ट निर्यात नीति, साझा व्यापार वार्ता मंच, मजबूत स्थानीय विनिर्माण, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला और बेहतर लॉजिस्टिक्स भारत को वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच सुरक्षित और प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मार्च 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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