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45 करोड़ प्रवासियों का देश : सिकुड़ते गांव - पसरते शहर; आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की ग्रामीण पलायन पर चेतावनी

संतोष कुमार पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 19 Mar 2026 02:32 PM IST
सार

Migration from Rural India: गांवों में कौशल विकास, रोजगार के अवसर और बुनियादी सुविधाएं बढ़ानी होंगी ताकि युवा पीढ़ी के लिए पलायन विवशता के बजाय चयनित विकल्प बन सके। गांवों से तरुणाई का पलायन रुकेगा तभी भारत के गांव विकास के मॉडल से जुड़ें सकेंगे। 
 

45 करोड़ आंतरिक प्रवासियों का आंकड़ा 2011 की जनगणना में दर्ज है।
45 करोड़ आंतरिक प्रवासियों का आंकड़ा 2011 की जनगणना में दर्ज है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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Migration from Rural India: बिहार के सीवान जिले के छोटे से गांव की 72 वर्षीय सलेहरा खाट पर बैठकर धूप सेंकते 59 वर्षीय भवसागर से किसी फोन के विषय में पूछती हैं। उनका बेटा 15 साल पहले कपड़ा मिल में काम करने सूरत गया था। गाहे-बगाहे फोन पर बात कर लेता है, पर तीन साल से घर नहीं आया। 'गांव उजाड़ हो गया है,' सलेहरा आसपास के घरों को देखते हुए कहती हैं - 'जवान लोग, लड़के सब शहर चले गए। यहां हम जैसे बूढ़े ही बचे हैं।' सलेहरा की कहानी कोई अपवाद नहीं है। 

बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों के गांव चुपचाप खाली हो रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षणों ने स्पष्ट किया है कि रोजगार प्रेरित ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में प्रवासन हिंदी हृदय प्रदेश के राज्यों में सबसे अधिक है।

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गांव से शहर की ओर मौन विदाई
भारत के गांव केवल रहने की जगह न होकर सामाजिक संबंधों, साझा श्रम और सामूहिक स्मृतियों की सांस्कृतिक प्रणाली रहे हैं। यहां खेती सिर्फ आजीविका नहीं, बल्कि जीवन का आधार रही है। लेकिन बीते तीन दशकों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। यह बदलाव 1991 के बाद शुरू हुई उस आर्थिक प्रगति का नतीजा है, जिसने भारत को खुले बाजार से जोड़ा, लेकिन विकास के तंत्र को शहरों तक सीमित कर दिया। उदारीकरण के बाद सेवा क्षेत्र, निर्माण और उद्योग आधारित शहरी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। 

दिल्ली, मुंबई, सूरत, बेंगलुरु और लुधियाना जैसे शहर अवसर और रोजगार के नए केंद्र बने। उधर गांव में एकमात्र खेती पर निर्भरता जस की तस बनी रही। जोत छोटी होती गई, जलवायु जोखिम बढ़ने के साथ खेती में लागत बढ़ी और आमदनी अनिश्चित हो गई। विशेषकर हिंदी पट्टी के ग्रामीण अंचलों से शहरों की ओर निकलना एक रणनीति बन गया - अपने कमाए पैसे भेजकर परिवार को सहारा देने की रणनीति। गांव से युवाओं, विशेषकर पुरुषों का झुंड शहरों का रुख करने लगा। 

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पीछे गांव में बच गए बूढ़े माता-पिता, महिलाएं और बच्चे। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 45 करोड़ लोग आंतरिक प्रवासी थे, जो उस समय भारत की कुल जनसंख्या का 37% थे। इनमें एक बड़ा हिस्सा गांवों से शहरों की ओर जाने वालों का था।

एक जैसा संकट, एक जैसी मजबूरी
उत्तर प्रदेश, बिहार-झारखंड, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और राजस्थान भारत की ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा समेटे हुए हैं और यहीं से सबसे अधिक पलायन होता है। उत्तर प्रदेश से बाहर जाने वाले प्रवासियों की संख्या देश में सबसे अधिक है, जहां से हर साल लाखों लोग रोजी-रोटी के लिए दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के शहरों का रुख करते हैं। 

2011 की जनगणना बिहार की लगभग 28 प्रतिशत आबादी के प्रवासी होने की बात करती है, जिसमें बड़ी संख्या उन लोगों की रही है, जो रोजगार के लिए राज्य से बाहर गए। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी तस्वीर अलग नहीं है। राजस्थान के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों से मौसमी और दीर्घकालिक पलायन दशकों से जारी है, जो अब लगभग स्थायी स्वरूप ले चुका है। 

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मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और मालवा क्षेत्र में खेती की अनिश्चितता और नगण्य औद्योगिक विकास ने पलायन को आजीविका की रणनीति बना दिया है। इन राज्यों का साझा संकट है - कृषि पर अधिक निर्भरता, छोटी जोत और गैर-कृषि रोजगार के सीमित स्थानीय अवसर। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, इन राज्यों से प्रवासन का प्रमुख कारण रोजगार और उससे जुड़ी आय है, न कि केवल विवाह या शिक्षा।
डेढ़ से से दो गुना अधिक आय का लालच गांव से शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण है। 
डेढ़ से से दो गुना अधिक आय का लालच गांव से शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण है।  - फोटो : गांव जंक्शन
बूढ़े हाथों में गांव, युवाओं बिन पंचायतें
युवा आबादी की बड़ी संख्या में पलायन का सबसे गहरा प्रभाव गांव की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर पड़ा है। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़ गया है। खेतों में श्रम की कमी महसूस होने लगी है, जिससे खेती या तो मशीनी होती जा रही है या जमीन परती छोड़ी जा रही है। 

पंचायतों और सहकारी संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी घट रही है क्योंकि निर्णय लेने वाली उम्र और ऊर्जा गांव से बाहर खिसक चुकी है। तीज-त्योहारों में अब पहले जैसी उमंग नहीं दिखती। ढोलक, झाल और करताल की थाप पर गांव गूंजा देने वाली सामूहिक लोक-गायकी दम तोड़ने के कगार पर है। 

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जब आय शहरों से होती है, तो खर्च भी वहीं होता है। ‘कमाऊ’ खरीदार की अनुपस्थिति में ग्रामीण उपभोक्ता बाजार और गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था, दोनों प्रभावित होते हैं। स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य सार्वजनिक सेवाएं मौजूद होते हुए भी उनकी गुणवत्ता और पहुंच सीमित है, जिससे पलायन का दुश्चक्र और मजबूत होता है।

सिकुड़ते गांव, पसरते शहर
भारत में प्रवासन और पलायन कोई नई घटना नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 इस प्रवृत्ति को संरचनात्मक मानता है। सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि क्षेत्र में आय वृद्धि की सीमाएं, ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार के नगण्य अवसर और केवल शहरी क्षेत्र में सेवा और निर्माण क्षेत्र का विस्तार - इन तीनों ने मिलकर ग्रामीण पलायन को मजबूरी बना दिया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम भागीदारी बनी हुई है, लेकिन वास्तविक आय और अवसरों का अंतर शहरों के पक्ष में निरंतर बढ़ा है। एक आकलन के अनुसार, समान काम के लिए गांव की तुलना में शहर में डेढ़ से लेकर दोगुना अधिक पारिश्रमिक मिलता है। लेकिन प्रवासियों की लगातार बढ़ती संख्या से शहर भी हांफने लगे हैं। आज भारत की लगभग 24 प्रतिशत शहरी आबादी झुग्गियों में रहती है। इसमें सबसे बड़ी संख्या प्रवासियों की है। शहरी युवा बेरोजगारी दर 15-18 प्रतिशत तक आंकी जाती है। 

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बड़े शहरों में पानी की मांग के मुकाबले आपूर्ति के अनुपात में 20-40 प्रतिशत की कमी आसन्न जल-संकट की स्पष्ट घोषणा है। लगातार गिरती जा रही वायु गुणवत्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्वीकार्य सीमा का 4 से 6 गुना तक खतरनाक अतिक्रमण कर चुकी है। आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, शहर अब सतत प्रवासन का बोझ नहीं उठा सकते, विशेषकर तब, जब देश की 65 प्रतिशत आबादी अभी भी गांवों में रहती हो। 

शहर प्रवासियों को रोजगार तो देते हैं, लेकिन सुरक्षित व सम्मानजनक जीवन की गारंटी नहीं। गांवों से आने वाले अधिकांश लोगों के लिए यहां न तो घर स्थायी हैं, न ही अच्छी आय व सामाजिक सुरक्षा। कोविड-19 महामारी के दौरान व्यापक ‘रिवर्स माइग्रेशन’ इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारत के शहरी विकास का मॉडल प्रवासी श्रम पर निर्भर है, लेकिन इसके लिए कोई समर्थन या सुरक्षा ढांचा शहरों के पास नहीं है। यह अनुभव ग्रामीण-शहरी संबंधों की मार्मिक संवेदना भी सामने लाता है।

नीति की चुनौती, विकल्प का सवाल
एक बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए श्रम का निर्बाध प्रवाह और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित होनी ही चाहिए। द्रुत गति से आगे बढ़ते भारत में प्रवासन को रोकना न तो संभव है और न ही आवश्यक है। लेकिन, यह ‘प्रवासन’ चयनित विकल्प होना चाहिए, विवशता में किया गया ‘पलायन’ नहीं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 इस दिशा में गांव में ही सम्मानजनक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित करने पर बल देता है। 

खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के साथ ही गांव की गैर-कृषि अर्थव्यवस्था - जैसे छोटे उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और स्थानीय सेवा क्षेत्र को मज़बूत करना होगा। भारत का भविष्य अगर शहरों में लिखा जाएगा, तो उसकी ‘स्याही’ गांवों से ही आएगी। इसीलिए, ताजा आर्थिक सर्वेक्षण ग्रामीण निवेश बढ़ाने तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास और शहरीकरण की बेहतर योजना बनाने की आवश्यकता को मजबूती से रेखांकित करता है।

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जब गांव खाली होते हैं, तो सिर्फ घर नहीं छूटते - इतिहास, हुनर और उम्मीदें भी पलायन कर जाती हैं। भारत का ग्रामीण-शहरी पलायन केवल रोजगार की तलाश की कहानी नहीं, बल्कि विकास की दिशा पर एक कठोर सवाल भी है। जब गांव से लोग नहीं, बल्कि उसकी तरुणाई, श्रम और भविष्य बाहर निकलने लगंे, तो उसे स्वाभाविक प्रवृत्ति कहकर टालना ‘आत्ममुग्धता’ होगी। असली चुनौती प्रवासन रोकने की नहीं, बल्कि उसे मजबूरी के पलायन से मुक्त करने की है। 

यदि आगे भी नीति निर्माण का केंद्र शहर ही बने रहे, तो ग्रामीण भारत सिर्फ श्रम-आपूर्ति क्षेत्र बनकर रह जाएगा। भारत क्या अपने विकास मॉडल को इस तरह ढाल पाएगा कि उसके गांव पीछे न छूटें, बल्कि देश के भविष्य में बराबर के साझेदार बनें - या फिर इतिहास दर्ज करेगा कि विकास की दौड़ में भारत ने अपने गांव चुपचाप खो दिए। जिस मिट्टी ने भारत को पाला, अगर वही सूनी रह गई, तो प्रगति का उत्सव अधूरा रहेगा।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मार्च 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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