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ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया इंजन : पशुपालन और मत्स्यपालन से छोटे किसान करेंगे कमाई, गांव भरेंगे उड़ान

संतोष कुमार पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 04 May 2026 09:15 PM IST
सार

पशुपालन और मत्स्यपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए इंजन बनकर उभर रहे हैं। बीते दशक में पशुधन क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन लगभग 195 फीसदी और मछली उत्पादन 140 फीसदी बढ़ा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इन क्षेत्रों के लिए 8,915 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

भारत के 80 फीसदी छोटे-सीमांत किसानों के लिए पशुपालन और मत्स्यपालन बेहद अहम हैं। 
भारत के 80 फीसदी छोटे-सीमांत किसानों के लिए पशुपालन और मत्स्यपालन बेहद अहम हैं।  - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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पशुपालन और मत्स्यपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए इंजन बनकर उभर रहे हैं। बीते दशक में पशुधन क्षेत्र का सकल मूल्यवर्द्धन लगभग 195 फीसदी और मछली उत्पादन 140 फीसदी बढ़ा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इन क्षेत्रों के लिए 8,915 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है। बंटती जोतें, जलवायु परिवर्तन और बाजार के उतार-चढ़ाव ने पारंपरिक खेती को कमजोर किया है और यह स्पष्ट हो चुका है कि समृद्ध ग्रामीण भारत का सपना अब केवल फसल उत्पादन के सहारे पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में पशुपालन व मत्स्यपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए स्तंभ बनकर उभरे हैं। 

विगत 7 मार्च को कृषि और ग्रामीण विकास वेबिनार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि किसानों की आय बढ़ाने का सबसे प्रभावी रास्ता कृषि विविधीकरण और उच्च मूल्य वाली संबद्ध गतिविधियों से होकर जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारतीय कृषि की विकास दर सिर्फ फसल उत्पादन से ही नहीं, बल्कि पशुधन और मत्स्यपालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों से प्रेरित हो रही है। 

पिछले 5 वर्षों में कृषि और संबद्ध क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.4 प्रतिशत रही। वर्ष 2015 से 2024 के बीच पशुपालन क्षेत्र का सकल मूल्यवर्द्धन 195 प्रतिशत बढ़ा, जो 12.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है। कृषि से संबद्ध किसी अन्य क्षेत्र में इतनी तीव्र वृद्धि नहीं देखी गई। वर्ष 2014 से 2025 की अवधि में मछली उत्पादन 140 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है, जो 88.14 लाख टन के अतिरिक्त उत्पादन के बराबर है।

पशुपालन (7.01%) और मत्स्यपालन (8.8%) के मजबूत प्रदर्शन के कारण ही पिछले दशक (2016-2025) में कृषि की 4.45 फीसदी वृद्धि दर संभव हो सकी, जो विगत दशकों में सबसे अधिक है।

भारत के 80 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे या सीमांत हैं, जिनके लिए सीमित भूमि पर पारंपरिक खेती से आय बढ़ाना कठिन होता जा रहा है। पशुपालन और मत्स्यपालन सीमित संसाधनों में भी संभव हैं और नियमित नकद आय देते हैं। इसीलिए, इन क्षेत्रों की कृषि क्षेत्र में हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। आज पशुधन भारतीय कृषि का सबसे स्थिर और भरोसेमंद हिस्सा बन चुका है। 

वैश्विक दुग्ध उत्पादन में लगभग एक चौथाई हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और 2024-25 तक देश का दुग्ध उत्पादन लगभग 250 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। पशुधन संख्या और दूध, मांस, अंडा तथा मछली उत्पादन में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है।

पशुपालन से करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका जुड़ी है और डेयरी क्षेत्र अकेले करोड़ों लोगों को रोजगार देता है। फसल से साल में एक-दो बार आय होती है, जबकि दूध, अंडा और मछली से हर दिन या हर सप्ताह नकद आय मिलती है। इसीलिए, यह क्षेत्र छोटे व सीमांत किसानों और ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार बन गया है।


पशुपालन में रोग की पहचान और फसल उपज बढ़ाने में योगदान दे रही है एआई तकनीक।
पशुपालन में रोग की पहचान और फसल उपज बढ़ाने में योगदान दे रही है एआई तकनीक। - फोटो : AI
ग्रामीण विकास का उभरता पावरहाउस
पिछले दशक में मत्स्य क्षेत्र की तीव्र वृद्धि ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है। वर्तमान में देश के जलाशयों और तालाबों में लगभग 4.5 लाख टन मछली का उत्पादन हो रहा है। जलाशयों के वैज्ञानिक मानचित्रण, क्लस्टर आधारित योजना एवं हैचरी, फीड, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग तथा लॉजिस्टिक्स आधारित बिजनेस मॉडल से अतिरिक्त 20 लाख टन उत्पादन की अपार क्षमता मौजूद है।

मत्स्यपालन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे सीमित संसाधनों में भी किया जा सकता है। छोटे किसान सामुदायिक जलाशय, चवर, झील या खेत के किनारे तालाब बनाकर उसमें मछली पालन से नियमित आय प्राप्त कर सकते हैं। इससे जुड़ी भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन जैसी संबद्ध गतिविधियां ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करती हैं। भारत के पास 31.5 लाख हेक्टेयर में फैले अंतर्देशीय जलाशयों की विशाल शृंखला इस क्षेत्र की असीम संभावनाओं का प्रमाण है। 

गढ़ा जा रहा ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत सैकड़ों करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत की जा चुकी हैं। यह योजना केवल मछली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका मूल उद्देश्य देश में हैचरी से भंडारण, वितरण और विपणन तक मत्स्यपालन पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन और राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाओं से पशुधन नस्ल संवर्द्धन, चारा विकास और पशु चिकित्सा सेवाओं को मजबूत किया जा रहा है।

पशुपालन और संरचना विकास कोष के माध्यम से डेयरी, मांस प्रसंस्करण और चारा एवं पशु आहार उद्योग में निवेश बढ़ाया जा रहा है ताकि गांवों के पास ही आर्थिक गतिविधियां विकसित हो सकें। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए 8,915.26 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले बजट से लगभग 26 प्रतिशत अधिक है। इसमें पशुपालन और डेयरी क्षेत्र के लिए 6,153.46 करोड़ रुपये और मत्स्यपालन के लिए 2,761.80 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जो अब तक का सर्वाधिक बजट है। स्पष्ट है कि सरकार किसानों को खेती के अलावा पशुपालन और मत्स्यपालन जैसे नियमित आय के विकल्प देने को लेकर गंभीर है।

बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी
तीव्र वृद्धि के बावजूद पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं, जिनकी ओर आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी संकेत किया है। पशुपालन क्षेत्र में चारे की भारी कमी सबसे बड़ी बाधा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अध्ययन के हवाले से सर्वेक्षण में बताया गया है कि हरे चारे में 11 से 32 प्रतिशत, सूखे चारे में 30 प्रतिशत और सांद्र चारे में 28 से 40 प्रतिशत तक मांग और आपूर्ति के बीच अंतर है।  

चारा और दाना की हिस्सेदारी दुग्ध उत्पादन की कुल लागत में 70 प्रतिशत से अधिक होती है, जिससे यह कमी किसान की जेब पर भारी पड़ती है। पशुओं की विशाल संख्या के मुकाबले पशु चिकित्सालयों और विशेषज्ञों की उपलब्धता अभी भी अपर्याप्त है।

मत्स्यपालन क्षेत्र में भी बढ़े हुए उत्पादन के अनुपात में भंडारण, कोल्ड-चेन और प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था न होने से बड़ी मात्रा में उत्पादन नष्ट हो जाता है, जो मत्स्यपालकों की आय पर आघात पहुंचाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश और निजी भागीदारी अभी अपेक्षित स्तर के आसपास भी नहीं पहुंची है, जबकि इन क्षेत्रों की क्षमता कहीं अधिक है।

अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और जल स्रोतों में कमी जैसी जलवायु परिवर्तन जन्य चुनौतियों का सीधा असर पशुधन और मत्स्य उत्पादन पर पड़ रहा है। यदि इन संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो तीव्र वृद्धि के बावजूद ये क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाएंगे। 

पशुधन-तालाबों से गांवों में आएगी क्रांति
आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों ने साफ संकेत किया है कि पिछले दशक की सबसे बड़ी कृषि-कहानी खेतों की पैदावार नहीं, बल्कि पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र की असाधारण वृद्धि है। आज ग्रामीण परिवारों के लिए पशुपालन, खासकर डेयरी, रोजमर्रा की आमदनी का सबसे भरोसेमंद जरिया बनकर उभरा है। आज यह क्षेत्र अनुमानित 8 करोड़ किसानों और महिलाओं को रोजगार दे रहा है। 

इसी प्रकार, मत्स्य क्षेत्र अनुमानित 3 करोड़ लोगों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आजीविका का साधन है। ग्रामीण महिलाएं बकरी पालन, पोल्ट्री और डेयरी गतिविधियों से बड़ी संख्या में जुड़ रही हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार भर नहीं, बल्कि स्वयं सहायता समूहों के जरिये आर्थिक आजादी और महिला सशक्तिकरण का कारगर मॉडल भी बन गया है। अब चुनौती इन क्षेत्रों की क्षमता के मूल्यांकन-विश्लेषण की नहीं, बल्कि इसकी है कि हम समय रहते उनके लिए मजबूत ढांचा, आवश्यक निवेश, तकनीक और बाजार उपलब्ध करा पाते हैं या नहीं। 

अगर पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन को उसी गंभीरता से लिया गया जिस तरह कभी हरित क्रांति के समय फसल उत्पादन को लिया गया था, तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी। सच यही है कि आने वाले वर्षों में ग्रामीण भारत की प्रगति सिर्फ किसान के खेत की पैदावार से नहीं, बल्कि उसकी मुर्गियों-बतखों की संख्या, उसकी पशुशाला में बंधी गाय-भैंसों और उसके तालाब में तैरती मछलियों से तय होगी। 

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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