मौसम, मिट्टी और कई पीढ़ियों के अनुभव पर आधारित किसानों के परंपरागत ज्ञान को अब कृत्रिम मेधा (एआई) का साथ मिल रहा है। यह जुगलबंदी विज्ञान व खेती के पारंपरिक अनुभवों के बीच सेतु बनकर कृषि अनुसंधान, कीट व रोगों की पहचान और फसल प्रबंधन का नया स्वरूप गढ़ रही है।
कृत्रिम मेधा (एआई) कृषि अनुसंधान को नई दिशा दे रही है। रोग पहचान से लेकर कीट नियंत्रण तक वैज्ञानिक ऐसे एआई मॉडल विकसित कर रहे हैं, जो फसल को नुकसान होने से पहले किसानों को चेतावनी दे सकते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं ने हाल के वर्षों में एक उन्नत डीप-लर्निंग मॉडल विकसित किया है, जो 17 फसलों में 34 प्रकार की बीमारियों की पहचान करने में सक्षम है।
कन्वोल्यूशन न्यूरल नेटवर्क (सीएनएन) आधारित यह तकनीक हजारों पत्तियों की तस्वीरों का विश्लेषण कर बीमारी के शुरुआती संकेत पहचानती है। गेहूं, धान, टमाटर, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों पर प्रशिक्षित इस एआई मॉडल ने परीक्षणों में 99.81 प्रतिशत तक सटीक रोग पहचान कर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि सीएनएन आधारित एआई प्रणालियां किसी फसल या रोग तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में ट्रांसफर लर्निंग और सीएनएन की मदद से ऐसी प्रणाली विकसित की गई, जो विभिन्न फसलों में कई प्रकार की बीमारियों की शुरुआती पहचान कर सकती है। वहीं, वर्ष 2026 की एक समीक्षा में पाया गया कि प्लांटविलेज जैसे बड़े डेटासेट पर आधारित सीएनएन मॉडल 95 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ रोग पहचान करने में सक्षम हैं। इन शोधों के आधार पर विकसित तकनीकें अब प्रयोगशालाओं से निकलकर किसानों के मोबाइल फोन तक पहुंच रही हैं।
क्रॉप डॉक्टर और वीजीजी-16 की भूमिका
क्रॉप डॉक्टर एक एआई आधारित डिजिटल प्रणाली है, जो फसल की तस्वीर देखकर तुरंत रोग और कीट की पहचान करती है तथा किसानों को आवश्यक सलाह देती है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म 70 से अधिक फसलों में रोग और कीट पहचानने में सक्षम है और लाखों किसान इसका उपयोग कर चुके हैं।
इसी प्रकार वीजीजी-16 एक सीएनएन आधारित एआई मॉडल है, जिसमें 16 परतें होती हैं। यह तस्वीर को छोटे हिस्सों में विभाजित करके पैटर्न का विश्लेषण करता है और अंत में यह तय करता है कि तस्वीर में क्या छिपा हुआ है। कृषि क्षेत्र में इसका उपयोग पत्तियों की तस्वीरों से रोगों की पहचान, पौधों के स्वास्थ्य का विश्लेषण तथा मोबाइल एप और ड्रोन आधारित निगरानी प्रणालियों में किया जा रहा है।
यह प्रणाली किसान द्वारा खींची गई पत्ती या फसल की तस्वीर का विश्लेषण कर कुछ ही सेकंड में बता देती है कि पौधा स्वस्थ है या किसी रोग अथवा कीट से प्रभावित है। यह प्रक्रिया वैसे ही काम करती है जैसे कोई प्रशिक्षित कृषि वैज्ञानिक खेत में पौधे का मूल्यांकन करता है।
योलो-वी5 से रोग और कीटों की पहचान
भारत में YOLO-V5 जैसे उन्नत ऑब्जेक्ट डिटेक्शन मॉडल पर भी तेजी से काम हुआ है। 'यू ओनली लुक वन्स' सिद्धांत पर आधारित यह तकनीक खेतों की तस्वीर को एक नजर में देखकर बता सकती है कि कीट कहां मौजूद है या बीमारी किस हिस्से में फैल रही है। वर्ष 2023-24 के प्रदर्शन विश्लेषण अध्ययनों में भारतीय शोधकर्ताओं ने सोयाबीन सहित कई फसलों में कीट और रोग पहचान के लिए एआई मॉडल विकसित किए, जिनकी सटीकता 97 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है। इन प्रणालियों को धूल, छाया, असमान रोशनी और जटिल पृष्ठभूमि जैसी वास्तविक खेत परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
कई अध्ययनों में स्पष्ट हुआ है कि कृषि-एआई अब केवल प्रयोगशाला तक सीमित विषय नहीं रहा है। वर्ष 2026 में प्रकाशित अध्ययन 'ए कॉम्प्रिहेन्सिव रिव्यू ऑन प्लांट लीफ डिजीज डिटेक्शन सिस्टम्स यूजिंग मशीन लर्निंग एंड डीप लर्निंग टेक्नीक्स' में सीएनएन, सपोर्ट वेक्टर मशीन (एसवीएम) और हाइब्रिड मशीन लर्निंग मॉडल को पौध रोग पहचान की प्रमुख तकनीकों के रूप में रेखांकित किया गया है।
एसवीएम को सरल शब्दों में एआई का "फैसला करने वाला दिमाग" कहा जा सकता है, जो स्वस्थ और संक्रमित पत्तियों के बीच सूक्ष्म अंतर पहचानने में मदद करता है। वर्ष 2025 में इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन ने संकेत दिया कि एआई आधारित रोग पहचान तकनीकें आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि व्यवस्था को गहराई से प्रभावित करेंगी।
कई अध्ययनों में कैमरा आधारित रोग पहचान, ड्रोन से निगरानी और प्रिसीजन एग्रीकल्चर को भविष्य की खेती की आधारशिला बताया गया है। प्रिसिजन एग्रीकल्चर ऐसी तकनीक है, जिसमें खेत के हर हिस्से की जरूरत के अनुसार पानी, उर्वरक और दवाओं का सटीक उपयोग किया जाता है, जिससे लागत घटती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
रियल टाइम डिजिटल फार्म हेल्थ सिस्टम
वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य की कृषि केवल कैमरा आधारित पहचान तक सीमित नहीं रहेगी। एआई, सेंसर, जैविक परीक्षण और क्लाउड डेटा को जोड़कर रियल टाइम डिजिटल फार्म हेल्थ सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। इस बदलाव का केंद्र केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि फसल जोखिम को पहले से पहचानकर नुकसान को रोकना है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह परिवर्तन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे किसानों के लिए समय पर रोग पहचान ही उत्पादन और आय बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।
हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग से बदलेगी खेती
भारत का वर्तमान एआई शोध मुख्यतः दिखाई देने वाले लक्षणों पर आधारित है, लेकिन दुनिया अब उससे आगे बढ़ रही है। एशिया के कई देशों में हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग और मशीन लर्निंग की मदद से ऐसी तकनीकें विकसित की जा रही हैं, जो बीमारी के लक्षण दिखने से पहले ही पौधों में होने वाले सूक्ष्म जैविक परिवर्तनों को पहचान सकती हैं। यह तकनीक खेती की एक्स-रे मशीन की तरह काम करती है।
सामान्य कैमरा केवल वही देखता है, जो आंखों को दिखाई देता है, जबकि हाइपर-स्पेक्ट्रल तकनीक पौधे के भीतर हो रहे सूक्ष्म बदलावों को भी दर्ज कर सकती है। इससे फसल में बीमारी दिखाई देने से पहले ही खतरे का संकेत मिल सकता है।
सीजीआईएआर का तुमैनी एप
अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह (सीजीआईएआर) द्वारा विकसित 'तुमैनी' एप स्मार्टफोन आधारित एआई कृषि निदान प्रणाली का महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह किसानों द्वारा मोबाइल से खींची गई तस्वीरों के आधार पर केले की फसल में कीट और रोगों की पहचान करता है। इस परियोजना का परीक्षण भारत, चीन सहित कई एशियाई देशों में किया गया, जहां इसने लगभग 90 प्रतिशत तक पहचान सटीकता दर्ज की।
ऐसी मोबाइल आधारित एआई प्रणालियां ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विशेषज्ञों की कमी को काफी हद तक पूरा कर सकती हैं। सीजीआईएआर और उसके साझेदार संस्थान अब खेत स्तर पर मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स तथा एआई आधारित स्मार्टफोन पहचान प्रणाली को आपस में जोड़ने पर भी काम कर रहे हैं।
प्री-सिम्प्टोमैटिक डिटेक्शन तकनीक
रूस की पीटर द ग्रेट सेंट पीटर्सबर्ग पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी और ऑल-रूसी पौध संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिकों ने गेहूं में काला रतुआ रोग की प्रारंभिक पहचान के लिए एआई और हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग आधारित प्रणाली विकसित की है। इस शोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह रोग को उसके 'अदृश्य चरण में पहचानने की क्षमता प्रदर्शित करता है, यानी तब जब कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते।
इस प्रणाली में पहले हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग का उपयोग होता है। सामान्य कैमरा केवल हरी पत्ती, पीले दाग या सूखे हिस्से को देख सकता है, लेकिन हाइपर-स्पेक्ट्रल तकनीक पौधे से परावर्तित होने वाले अदृश्य प्रकाश संकेतों को भी पढ़ती है। इसके साथ जुड़ता है प्री-सिम्प्टोमैटिक डिटेक्शन, यानी लक्षण दिखाई देने से पहले ही बीमारी की पहचान। एआई और स्पेक्ट्रल डेटा मिलकर पौधे में होने वाले सूक्ष्म जैविक बदलावों को पकड़ लेते हैं और बीमारी के शुरुआती संकेतों का पता लगा लेते हैं।
जब ये दोनों तकनीकें एक साथ काम करती हैं
तो 'हाइपर-स्पेक्ट्रल-फर्स्ट और प्री-सिम्प्टोमैटिक डिटेक्शन' प्रणाली बनती है, जो यह तय कर सकती है कि खेत पूरी तरह स्वस्थ दिखने के बावजूद उसमें बीमारी का जोखिम मौजूद है या नहीं। इस अध्ययन की दीर्घकालिक योजना इसे उपग्रह और ड्रोन आधारित निगरानी प्रणालियों से जोड़ने की है, जिससे बड़े कृषि क्षेत्रों के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सके।
कुल मिलाकर, जहां भारत और एशिया में एआई आधारित कृषि अभी मुख्यतः दृश्य लक्षणों और स्मार्टफोन इमेजिंग पर केंद्रित है, वहीं रूस का यह शोध 'हाइपर-स्पेक्ट्रल-फर्स्ट और प्री-सिम्प्टोमैटिक डिटेक्शन' की दिशा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में एआई, सेंसर, ड्रोन, क्लाउड डेटा और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग का समन्वय वैश्विक कृषि निगरानी प्रणाली को नई दिशा दे सकता है। इससे खेती अधिक सुरक्षित होगी, फसल नुकसान कम होगा, किसानों को बेहतर उपज मिलेगी और उनकी कमाई बढ़ेगी।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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