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कट गिरे ब्रह्मपिशाच, गुम हुआ अगिया बैताल : गांव के 'अदृश्य प्रहरियों' के अवसान की कहानी

संतोष कुमार पांडेय (स्तंभकार), नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 17 Sep 2026 08:30 PM IST
सार

पीपल, बरगद, बंसवारी और चवर की छांव में पला वह गांव, लालटेन की मद्धम लौ तले रहस्यमयी सन्नाटा ओढ़े रहता था, जहां ब्रह्मपिशाच, चुरअइल और अगिया बैताल जैसे अदृश्य किरदार रात के अंधेरे में गांव की मर्यादा के मूक प्रहरी थे। ये भूत-प्रेत बिना वर्दी-अदालत समाज को अनुशासित रखने वाली अलिखित व्यवस्था थे। 

आज बच्चे दिनभर कार्टून-एनीमेशन देखते हैं, जहां भूत जोकर लगते हैं या मुसीबत में काम आने वाले दोस्त।
आज बच्चे दिनभर कार्टून-एनीमेशन देखते हैं, जहां भूत जोकर लगते हैं या मुसीबत में काम आने वाले दोस्त। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
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विस्तार
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गांव ब्रह्मस्थान, पोस्ट-भीखमपुर (भीष्मपुर कहते न तो किसी को सुना, न लिखते देखा), जिला सिवान, बिहार! मेरा गांव अंतस में वैसे ही अंकित है जैसे किसी पुराने पीले-नीले पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र पर लिखी चिट्ठी, जिसकी स्याही जर्जर होते कागज के साथ धुंधली तो पड़ती है, पर मिटती नहीं।

रामननन (रामनंदन) बाबा के घर से ठीक पहले, द्वारपाल-सा तना खड़ा था पीपल का विशाल पेड़, जिसकी दूर तक छितराई जड़ों से गाय-बैल बंधे रहते थे। इसी पीपल की छांव में गांव की तीन पीढ़ियां बैठकर जेठ की तपती दुपहरी को उसकी औकात बताया करती थीं।

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सन्नाटे में बसे अदृश्य किरदार
वे भी क्या दिन थे जब शाम ढलते ही गांवों में लालटेन की मद्धम रोशनी में रहस्यमयी सन्नाटा तैरने लगता था। मेरे घर के पूरब में एक गड्ढा बरसात में छोटा तालाब बन जाता, जिसके एक छोर पर जामुन तो दूसरे पर बरगद का विशाल वृक्ष खड़ा था। 

बरगद से सटी थी बांसों की सघन बंसवारी। अंधेरा होते ही बरगद के हिलते पत्ते दादी के बताए 'ब्रह्मपिशाच' की जटाएं झटकते जान पड़ते, तो बंसवारी से उठती सरसराहट 'चुरअइल' का वही क्रंदन लगती, जिसे गांव पीढ़ियों से सुनता आया था।

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भय और सम्मान का तिलिस्म
पश्चिम के चवर में टिमटिमाती रोशनी को 'अगिया बैताल' समझ लोग हनुमान चालीसा जपने लगते। नवरंगी-पनीसरा की सुनसान गाछी (बड़े पेड़ों की सघन शृंखला) के पास भरी दुपहरी में भी 'तेलिया मसान' के खौफ से पैर तेज हो जाते। भरोसा था तो बस गांव के रक्षक बरहम (ब्रह्म) बाबा का। चवर, पोखर और ऊंचे पेड़ों से घिरे गांव में भय-सम्मान का यह तिलिस्म हमारी लोक-संस्कृति की धमनियों में लहू सा दौड़ता था।

चकाचौंध में गुम भूतों का ताना-बाना
आज उसी गांव की शाम एलईडी, सोलर और वेपर की रोशनी से चकाचौंध है। डरावने सन्नाटे की जगह घर-घर में टीवी सीरियल्स और न्यूज एंकरों का शोर है। बरगद, पीपल, नीम, पकड़ी, कुआं, चापाकल और खूंटा सब गायब! चवर के समानांतर दौड़ती पक्की सड़क पर रातभर गाड़ियों की हैडलाइट चमकती है।

विकास के इस चमचमाते तीर ने गांवों के अंधेरे-सन्नाटे को ऐसा चीरा है कि भूतों का पूरा पुश्तैनी ताना-बाना ही ध्वस्त हो गया। आधुनिक 'साइंटिफिक टेंपर' के लिए यह गर्व की बात हो सकती है, पर गंवई संस्कृति के लिए भूतों का यूं उजड़ जाना एक अनूठी लोक धरोहर के समाप्त होने जैसा है।

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सिर्फ भूत नहीं, गांव के अदृश्य प्रहरी
इसे समझने के लिए हमें 'साइंटिफिक' चश्मा उतारना होगा। गांव के भूत गांव के देवी-देवताओं जैसे ही थे, मेरे गांव के ब्रह्म बाबा की तरह, जो कोई भगवान नहीं बल्कि पीपल की जड़ में स्थापित, अकाल मृत्यु को प्राप्त कोई पुण्यात्मा पुरखा होते हैं।

साक्षात् कभी दिखाई न देकर भी उनकी अदृश्य उपस्थिति इतनी गहरी थी कि गांव का नैतिक-सामाजिक जीवन उसी से अनुशासित रहता। समाज के अप्रत्यक्ष प्रहरी के रूप में वे वर्दी, पुलिस या अदालत के बिना समाज को अनकही मर्यादा में बांधे रखते थे।

जिद्दी बच्चे को कौर खिलाना हो या रात को चुपचाप सुलाना हो, मां के पास इस 'अदृश्य कम्युनिटी वर्कर' से बड़ा मददगार कोई नहीं था। उस दौर में घर में ढिबरी और बाहर लालटेन ही अंधेरे से लड़ाई लड़ती थी। घुप्प अंधेरे में कुएं- तालाब में गिरने या सांप पर पैर पड़ जाने से बचाने वाला न कोई साधन था, न डॉक्टर और डिस्पेंसरी।

यही 'भूत का खौफ' लोगों के पैरों में सुरक्षा की बेड़ियां डालता था। यह डर न होता तो न जाने कितने लोग दुर्घटनाओं में अपाहिज होते या असमय काल-कवलित हो जाते। प्रेत, पिशाच, राकस, जिन्न जैसे नामों वाले ये डरावने किरदार वास्तव में इंसानों को उनकी ही नासमझी से बचाने वाले सामाजिक सुरक्षा कवच थे।

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शालीन और अनुशासित सोशल प्रोटोकॉल
इन भूतों का अपना गरिमामय उसूल उनकी अपनी शालीनता थी। वे कभी किसी निर्दोष को नाहक न सताते। उनका सीधा प्रोटोकॉल था - पेड़ की जड़ के पास शंका समाधान मत करिए, उस पर डंडा-पत्थर मत चलाइए, कुएं में कुछ मत गिराइए, दुपहरी में अकेले पेड़ पर मत चढ़िए, पोखर में अकेले मत नहाइए, बड़ों की बात मानिए, लालटेन-दीये की रोशनी के दायरे में रहिए, ब्रह्म बाबा का नाम लीजिए - बस, आप सुरक्षित हैं।

यही भूत-भय, तपती दोपहरी हो या आंधी-तूफान, फलदार पेड़ों के मालिकों के लिए एक मुस्तैद, बिना वेतन के 'वॉचमैन' की भूमिका निभाता था। फल तोड़ने पर आमादा बच्चों के माता-पिता के लिए यह डर एक रक्षक था, जो नौनिहालों को पेड़ से गिरकर चोटिल होने से बचाता था।

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ठिकाना उजड़ा, प्रतिष्ठा भी ढही
विकास की आंधी ने सबसे पहले उन्हीं पुराने पीपल, बरगद, महुआ, पकड़ी के पेड़ों को उखाड़ फेंका, जो इन शालीन प्रहरियों के पुश्तैनी बसेरे थे। यह मार सिर्फ ठिकानों पर नहीं, प्रतिष्ठा पर भी पड़ी। रात में पायल की छनकार सुनकर अब शक मोबाइल की 'रील' या पड़ोस के टीवी सीरियल पर जाता है, चुड़ैल पर नहीं।

कोई बचा-खुचा भूत डराने की सोचे भी, तब तक सामने वाला ईयरफोन लगाए नेटफ्लिक्स या आईपीएल में डूबा होता है। सदियों पुरानी हनक की ऐसी अनदेखी एक स्वाभिमानी भूत का मनोबल तोड़ देने वाली बात है। आज के बच्चे उस दौर के नहीं जो 'हरनाकुस' का नाम सुनते ही कंबल में दुबक जाते थे।

अब हर हाथ में मोबाइल और घर-घर बिजली और टीवी है। बच्चे दिनभर कार्टून-एनीमेशन देखते हैं, जहां भूत या तो जोकर लगते हैं या मुसीबत में काम आने वाले दोस्त। रही-सही कसर वीडियोगेम्स ने पूरी कर दी, जहां बच्चे खुद अपने हाथों बड़े-बड़े सींग वाले, आग उगलते दैत्यों-मॉन्स्टर्स का हँसते-हंसते संहार करते हैं।

जब बचपन ही रोज ऐसे विकराल राक्षसों को 'वर्चुअली' मारकर बड़ा हो रहा हो, तो बिना काया वाले पारंपरिक भूतों की क्या बिसात? यानी, उनके डर और सम्मान का 'टावर' बचपन में ही ध्वस्त! ...और बेचारे भूत नेटवर्क कवरेज से बाहर!

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भूतों की जरूरत ही क्यों है?
अब सवाल उठता है कि सड़क, बिजली, टीवी, मोबाइल, डिस्पेंसरी सब आ गए, तो भूतों का प्रयोजन ही क्या रह गया? उनके विलुप्त होने का अफसोस क्यों? इसका जवाब पाने के लिए आज दुनिया पर मंडरा रहे सबसे बड़े संकट को समझना होगा।

यह युद्ध, आर्थिक मंदी या महामारी नहीं, बल्कि धरती पर जीवन के अस्तित्व का संकट है। ग्लोबल वार्मिंग, महासागरीय ताप वृद्धि और मौसमी-चक्र के अप्रत्याशित बदलावों ने पर्यावरण को भयावह अनिश्चितता में धकेल दिया है।

स्थिति की गंभीरता देखते हुए युद्ध स्तर पर विकास के ‘पेड़-काटू’ व ‘कुआं-जलाशय उजाड़ू’ मॉडल के विनाशकारी नतीजों पर दुनियाभर में गंभीर बहस छिड़ी है।

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पुरखों की छांव में पर्यावरण-विज्ञान
कमाल की बात यह कि इस भयावह संकट के समाधान के लिए आधुनिक पर्यावरण विज्ञान घूम-फिरकर उसी बरगद, नीम, पकड़ी, पीपल की छांव पर आ टिका है, जिन्होंने हजारों वर्षों तक धरती पर ताप को सिर उठाने नहीं दिया था।

आज के पर्यावरणविद् फिर उन्हीं आम, जामुन, महुए के पेड़ों को सहेजने और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने की वकालत कर रहे हैं, जिन्हें हमारे पुरखों ने ब्रह्म बाबा और भूतों के सहारे इंसानी कुल्हाड़ियों और लालची नज़रों से पीढ़ियों तक बचाए रखा।

कल तक जो 'भूत का डर' कहलाता था, वह असल में प्रकृति, पेड़ों-जलाशयों और जैव-विविधता के संरक्षण की एक मौलिक, अघोषित, समग्र और संवेदनशील पर्यावरण नीति थी।

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मिट चुका हरित आत्मा का फॉर्मूला
अब गांव जाने पर मन भीतर से कचोटता है। पोस्टकार्ड पर पता तो वही है, पर उस पर लिखा गांव की ‘हरित आत्मा’ का गूढ़ फॉर्मूला मिट चुका है, जिसे कई पीढ़ियों ने ब्रह्म बाबा के ‘कंडे’ और ब्रह्मपिशाच की ‘स्याही’ से सदियों में लिखा था।

मेरी स्मृतियों में अंकित गांव का अब चिह्न तक नहीं बचा। गांवों में सुख-सुविधाएं बढ़ें, गांव विकसित-समृद्ध हों, इस पर भला किसी को क्या आपत्ति! पर, देर-सबेर गांवों को इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा कि बिजली, सड़क और पक्के मकान, क्या कुएं-पोखर-बंसवारी और आम-महुआ-पकड़ी की बलि चढ़ाकर ही संभव थे?

तब तक विकास के इस ‘ठूंठ’ पर सीटी-ताली वही बजा सकते हैं, जिन्हें इल्म नहीं कि उनके गांव की पहचान मोबाइल टावर से नहीं, बल्कि आसमान में सिर उठाए खड़े उस विशाल पीपल से थी, जो कोसों दूर से बिना पूछे-कहे बता देता था : मैं हूं ब्रह्मस्थान!

(यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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