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दशहरा : मेले में सिंदूर बेचते अच्छेलाल, मिठास घोलती गुड़ही जलेबी और खेल तमाशों की वो रंग-बिरंगी दुनिया
देवेन्द्र नाथ तिवारी, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Thu, 02 Oct 2025 10:34 AM IST
सार
दशहरे का मेला केवल बाजार नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह हमें हर साल गुड़ही जलेबी की मिठास, अच्छेलाल के गीत और देवी की विदाई की करुणा के साथ जोड़ता है। बाहर का मेला मिट्टी में थम जाता है, लेकिन भीतर का मेला हमारी स्मृतियों में हर साल हरा हो उठता है।
दशहरे का मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज है। यह अपने भीतर ग्रामीण जीवन की सामूहिकता, उत्साह और स्मृतियों को समेटे रहता है। यहां खेल-तमाशे, भालू वाला, गुड़ही जलेबी और सिंदूर जैसे तत्व लोकजीवन के विविध आयामों को साथ ही साथ संजोते हैं। समय की धारा में भी फलते-फूलते रहते हैं। यह मेला लोकजीवन का वह अनुपम चश्मदी लेख है, जो हर वर्ष लौटकर गांव के चेहरे पर वही पुरानी छाप छोड़ जाता है।
सप्तमी की सुबह
मंदिर की घंटियां जब पहली बार कुहासा चीरतीं, तो लगता मानो मौन में कहीं दबा जीवन फिर से बोल उठा हो। चौखट पर दीये जलते। आँगन में बालिकाएँ रोली-सिंदूर से थाल सजातीं। और ढोलक-झाल, मृदंग के साथ गांव का श्वास एक लय में बंध जाता। नवरात्र का यह पड़ाव गांव के मन को रोजमर्रापन से बाहर निकाल देता। हर घर, हर गली अचानक मेला बनने लगता।
तीन दिवसीय उत्सव
मसरख का दशहरा तब अपने रंग में आता जब गाछी की ओर सबका रुख होता। गाछी- यानि गांव का बड़ा बाग, जो उस एक दिन केवल वृक्षों की छांव न होकर पूरे लोकजीवन का संगम दिखता। आंखों के सामने श्रेणी-दर-श्रेणी पीढ़ियां चलती नजर आतीं। बड़े-बूढ़ों का ढंग। बच्चों की टोली-छुअन जिद। महिलाओं का समूह। मेले तक पहुंचने का रास्ता मानो अपने आप ही उत्सव का हिस्सा बन जाता। भीड़ में एक खास जगह बनी रहती।
सिंदूर बेचते अच्छेलाल
अच्छेलाल के सिर पर गमछा। बोरा बिछाकर बैठते। सामने छोटी संदूकची। संदूकची में रखा सोनखर सिंदूर। वस्तुतः केवल एक रंग नहीं था; वह संस्कार की अनुश्रुति थी। लोकगीत की तान थी। रिश्तों का अनकहा बंधन था। अच्छेलाल जब किसी गीत की लड़ी जोड़ देते- “कहवां के सिन्दुरिया…” तो उसमें केवल स्वर नहीं गूंजता था, बल्कि गांव-गाछी का पूरा परिवेश स्मृति में उतर आता था। इस प्रकार, सिंदूरी पुड़िया प्रत्येक नेह की तरह समय-समय तक टिकी रहती।
गुड़ही जलेबी की मिठास
पर यदि दशहरे के मेले को किसी एक रस ने बांधा, तो वह था, गुड़ही जलेबी का रस। गरमागरम जलेबी जब दोने में रखकर दी जाती, उस क्षण मिठास और आत्मीयता साथ-साथ उतर आती। गुड़ की भूरी चाशनी, उसका कसैलापन और मीठा गाढ़ापन- यही दोनों मिलकर स्वाद के भीतर रिश्तों की गंध भर देते। बच्चे बार-बार उंगली डालकर तापमान परखते- “खाने लायक ठंडी हुई या नहीं।” और घर की बड़े-बुजुर्गों की वही आवाज, वही हिदायत- “गरम है अभी”- दोहराती हुई।
गुड़ही जलेबी ही वह सूत्र था, जो मेले को पारिवारिक भी बनाता और सांस्कृतिक भी। बच्चे अपने-अपने गोल की तुलना करते, हंसते-खेलते। औरतें अपने गहनों-परिधानों की चमक आंगन में न दिखाकर, इसी मेले में परोक्ष प्रतियोगिता करतीं। इस सबके बीच जलेबी केवल मिठाई नहीं रह जाती; वह जीवन के तालमेल और गाँव के साझा भावों का प्रतीक बन जाती।
खेल-तमाशों की दुनिया
गाछी के मेले में खेल-तमाशों की भी अपनी एक दुनिया होती। अकाशीय झूले। कठपुतलियों का खेल। बांस पर चढ़ते नट। भीड़ की ताली। इसी भीड़ में कभी-कभी भालू वाला भी आता। अधेड़ उम्र का कसा शरीर। हाथ में रस्सी की डोर। उस डोर से बंधा भालू। भालू दो पैरों पर चलता। ढोल की ताल पर नाचने लगता। हम बच्चे हंसते, बड़ों के चेहरे पर विस्मय कौंधता। जंगल की उदासी और गांव की हलचल एक ही धरातल पर उतर आती।
उस भालू के नाच में केवल तमाशा नहीं था, उसमें किसी बीते युग की गंध थी- जब मनुष्य और पशु, दोनों लोक-संस्कृति में साझा भूमिका निभाते थे। भालू वाला अपनी आवाज में खड़खड़ाहट लाता- “देखी, भालू कैसे सलाम करेला।” और सचमुच, थुलथुल शरीर वाला भालू झुककर सिर हिलाता, तो भीड़ ठहाके में बदल जाती। बच्चे खाते-पीते सब छोड़कर उसके पीछे हो लेते। सब मिलकर मेले को और भी रंगीन बना देता।
विदाई का मौन
पर, एक दिन ऐसा भी आता, मेले में संगीत और हलचल ठहरने लगती। दशमी की विदाई सामने खड़ी हो जाती। देवी की प्रतिमा घाट तक ले जाते समय गाछी में धीरे-धीरे शून्यता उतरने लगती। ढोल-शंख, नगाड़ों के बीच भी हर किसी का मन मौन हो उठता। हलवाइयों की खाली कड़ाहियां, झूला वालों की थमी रस्सियां, अच्छेलाल की संदूकची का बंद हो जाना- ये सब संकेत देते कि मेला सिरक रहा है।
देवी की विदाई गांव के मन में बेटी की विदाई की तरह रस घोलती। और फिर गाछी शांत हो जाती। पीछे रह जाते केवल मिट्टी की गंध, चाशनी की महक, कहीं झूलों की झनझनाहट, कहीं अच्छेलाल का स्वर। दिन बीत जाता है, पर दशहरे का मेला अपने आप में गहरी छाप छोड़ जाता है। यह बाजार नहीं, लोक का अदृश्य संकलन है। यह खरीद-फरोख्त नहीं, स्मृति का उत्सव है।
गंध और स्मृति का शेष रह जाना
दशहरा हर साल लौटता है, मेला हर साल सजता है, और हर साल उसी के साथ हमारे भीतर फिर स्मृतियों की एक गाछी हरी हो जाती है। बाहर का मेला मिट्टी में थमता है, भीतर का मेला समय में टिका रहता है- गुड़ही जलेबी के स्वाद, अच्छेलाल के गीत, और देवी की विदाई की करुण लहर में।
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