नदियों और पहाड़ों की गोद में पनपी हमारी संस्कृति केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि लोक आस्था की वह जीवंत धारा है जो पीढ़ियों से हमारे मन को सींचती आ रही है। आकोला की माटी और बेड़च नदी के तट पर रचा-बसा यह दीपदान पर्व इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वजों ने जल, जंगल और जीवन को सम्मान देते हुए कितनी पवित्रता से सहेजा है ।
राजस्थान के मेवाड़ अंचल में बहती बेड़च नदी ऐसी ही एक प्राचीन जलधारा है, जिसके साथ यहां के भूगोल, लोक विश्वास, कृषि संस्कृति और धार्मिक अनुष्ठानों के अनेक सूत्र जुड़े हैं। उसके घाटों पर कार्तिक स्नान और दीपदान की परंपरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, जल के प्रति श्रद्धा और सामूहिक जीवन की आत्मीयता का साक्षात लोकपर्व है।
कार्तिक का महीना आते ही मेवाड़ की धरती पर भोर का उजास एक विशिष्ट सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। नदी की ओर बढ़ते स्त्री-पदचाप, जल में उतरती दीपछवियां, लोकगीतों में गूंजती मंगलकामनाएं और मंदिरों में प्रज्वलित दीप सब मिलकर उस लोक विश्वास को जीवंत करते हैं, जिसमें जल की समृद्धि को जीवन की समृद्धि माना गया है। यहां दीपदान किसी एक धार्मिक विधान तक सीमित नहीं, बल्कि जल, धरती, अन्न, पशुधन और मनुष्य के परस्पर संबंधों का उत्सव है। इसी व्यापक लोक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में बेड़च नदी के तटवर्ती गांव आकोला की दीपदान परंपरा अपनी विशिष्ट स्मृतियों, स्थानीय मान्यताओं और पीढ़ियों से संजोए लोकाचार के साथ हमारे सामने आती है।
कार्तिक महीने में बहुधा दीपदान के लिए ऐसे स्थान याद आते हैं। जैसे : नंदी के ढावे, नाल आगे, घाटी चढ़ता, मंगरी उतार, चंवरा में, पटेला के पाड़ा, ब्राह्मणों की पुरी, छीपों के पछोर, बंजारों की बालद में! इस क्षेत्र का उदयपुर जिला हो या चित्तौड़गढ़, सलूंबर हो या राजनगर अथवा भीलवाड़ा जिला, सभी जगह एक जैसी स्मृतियां हैं। दीपदान की जैसी विधियां और रीतियां मैंने पिछली सदी में देखीं, वे इस सदी बहुत कुछ बदल गई हैं।
आकोला मेरा गांव है। उदयपुर और चित्तौड़ के बीच समान दूरी पर बसा हुआ। स्वरूप में एक छोटा भारत, बेड़च जैसी संसार की बहुत पुरानी नदी उसके दक्षिण में बहती हुई पांव पखारती है तो मानसरोवर जैसी तलैया वाले गायरियावास और सुरताखेड़ा उसके उत्तरी शीर्ष मुकुट बने लगते हैं। मालियों की भागले भक्ति करती लगती हैं। भागल वे गांव के बीच गांव हैं जो कुछ हिस्सों में खेत और कुछ में घर के रूप में विकसित हुए।
एक और बात है। गाड़ीभाटा और जांबूघाटा उसकी भुजाएं हैं जो गांव और गांववासियों को स्नान का सुख देती हैं। इनके बीच में डालूघाटा, आड़ीचाट, वछली चाट आदि ऐसे छोर हैं जहां कार्तिक स्नान का व्रत रखने वाली नारियां मुंहअंधेरे नहाती हैं और नदी के सम्मान में सागर को भरने वाली धारा जैसा सम्मान देती हुई गीत गाती हैं:
गांव गोर में बेड़च नदी,
गंगाजी को पायो, मैया म्हें काती नहायो।
आजू-बाजू खेड़ा-भागलां,
अन्नकूट साग उगाया, मैया म्हें काती नहायो।।
नदी के घाट पर कार्तिक की सुबह में भी दीपक जगमगाते हैं। दिवाली की संध्या का तो कहना ही क्या! हमने बचपन में यहां सुलगे और बुझे दीपक गिनने में बड़ी समझदारी दिखाई। आतिशबाजी की। आकाशदीप चलाए। नदी पर दीपदान आज की धारणा से कहीं ज्यादा कीमती रही क्योंकि तब पानी को कुबेर का धन जैसा माना जाता था और भाव था कि जलधन की धारा को रोशन करने से अगले बरस सुकाल होगा।
यहां के चारभुजा मंदिर पर पूरे मास दीपदान होता है। यहां पिछली दो शताब्दियों से कार्तिक की कथा होती आई है। हर घर अपनी श्रद्धा दिखाता है और शाम होते ही पेटक (आटा, दाल, घी आदि का थाल) मंदिर लेकर जाता है और सुखवाल महाराज को भेंटकर उनसे कार्तिक की कथा सुनता है। दीवट पर दीपदान से ही कथा शुरू होती है। यहां दिवाली पर हर घर से दीपक जलाकर लाया जाता है और उसके उजास में भगवान नारायण के बाएं पार्श्व में विराजित लक्ष्मी का दर्शन किया जाता है। यह ऐसा मंदिर है जहां जेम्स टॉड को पांच शिलालेख मिले। दो मुझे भी मिले और दोनों बड़े काम के निकले।
यहां के शिवालय में भी गांव की हर सुहागिन दीपदान करती हैं क्योंकि उमा को शिव जैसे कालजयी नाथ जो मिले। पिताश्री को आत्म साक्षात्कार इसी लघु रुद्रालय में हुआ था और उन्होंने "अनुभव प्रकाश" की रचना की। यह मंदिर कार्तिक की कई स्मृतियां लिए हुए हैं। कुछ वर्षों से अन्नकूट यहां का प्रधान उत्सव हो गया।
अखाड़ा चौक संत हनुमानदासजी के नृसिंहद्वारा के कारण जाना जाता है लेकिन यह स्थान "घांस बावजी" के कारण लगभग दो हजार वर्ष पीछे का होना चाहिए। घांस यानी जक्ख अर्थात् यक्ष, जो संपदा के अधिकारी माने जाते हैं। एक विशाल पाषाण के रूप में यक्ष यहां दिवाली पर आलोकित होते हैं। गांव के लगभग हर घर से दीपक जलाकर लाया जाता है। अखाड़ा पर भी दीपदान होता है। यहां के तुलसी क्यारे पर, पावड़ियां, राम दरबार, गुरु स्थल, महाराज की कुई, बुर्ज, पेड़ आदि भी जगमगाते। यह अखाड़ा महाराणा भीमसिंह के काल से है जबकि उदयपुर में नरसिंह द्वारा बना।
यहां पता चलता है कि यक्ष कितने महत्वपूर्ण थे! कितना रोचक है कि देश में दीपदान की परंपरा यक्षों ने दी। यक्षरात्रि यूं ही नहीं कहा गया। यक्ष हर संपदा के अधिकारी थे और मोटी तोंद लेकर हाट वणिक पथ पर नजर रखते थे। उनको खेत से ज्यादा बीज भंडार, जलस्रोत, पत्थर की खानें, धातु के दरीबा आदि रास आए। निकट का जोयडा, मुरला दरीबा, नीलोद, बढ़वाई, बड़ी, लुनेरा आदि में खानों के कारण यक्ष की मान्यता रही है।
आकोला में सुबह जब खेंखरा उत्सव ( गो क्रीड़न) होता है, गमेती ग्वाल के हाथ में लगुड़ देकर गोस्वामी उसका सम्मान करते हैं। सजी-धजी गायों को दौड़ाया जाता है और गांव की ओर लाया जाता है, उनके श्वेत-श्याम वर्ण के आधार पर अगले साल के सुख-दुख और अकाल-सुकाल का अनुमान किया जाता है। यहां भी दीपदान होता है। शाम को गोली पर दीपदान के साथ बैलों का पूजन किया जाता। गोली यानी जहां पर गोधन निर्विघ्न खड़ा किया जा सके। हर गोली पटेलों की। वे गांव की समृद्धि का आधार गोधन को ही मानते और नैवेद्य-लपसी, सुहाली देकर उनको मान-सम्मान देते।
आकोला में दीपदान हमने पीपल के तले किया और करवाया। यह भी अखाड़ा चौक पर है। इसके नीचे जो आलवाल है, उस पर गोलाई में दिए रखे जाते और देर तक उनको देखा जाता। मंद बयार में भी सिर उठाकर जलने का संकल्प वाले दीपक।
कार्तिक प्रतिपदा की सुरम्य भोर में गांव की गलियां एक पावन लोक ध्वनि से गुंजायमान हो उठती हैं। जिन-जिन घरों के गोधन को ग्वाले चराने ले जाते हैं, उन सभी के आंगनों में जाकर वे गो महिमा के गीतों की मिठास घोलते हैं। इन गीतों को लोक संस्कृति में 'हीड़ गीत' कहा जाता है। ‘हीड़' का सीधा अर्थ है- दिवाली की पावन दीवट पर जलता हुआ दीपक और हीड़ गाने का भाव है - रोशनी और कृतज्ञता का उजास फैलाना। इन गीतों में केवल गायों की महिमा का गान ही नहीं होता, बल्कि लोक-देवता भगवान धर्मराज (श्री देवनारायणजी) की भक्ति और अनुकंपा का स्मरण भी रचा-बसा होता है। गुर्जर संस्कृति के आधार-स्तंभ देवनारायणजी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हुए ग्वाले उसी सेवा भाव और समर्पण से गो सेवा करते हैं।
इस अवसर पर गांव के लोग ग्वालों का सहर्ष अभिनंदन करते हैं और उन्हें आदरपूर्वक 'नेग' (उपहार व दक्षिणा) भेंट करते हैं। वास्तव में, यह परंपरा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दीपों के आलोक और उससे जुड़े हर श्रमसाधक व संरक्षक के प्रति लोक मन के सम्मान और अटूट कृतज्ञता की एक अनुपम रीति है।
दीपदान आंवली के पेड़ तले महाराज की बाड़ी में, खाकलजी के देवरे में भोपाजी की बाड़ी में और आमलिया बाग में, नदी के सहयोगी नाला (वाला) के मुहाने पर भी। एक दीपक भैरूजी बावजी को, एक हनुमानजी को, अणता वीरा को, गाड़ीभाटा की गाड़ी और एक दीप जोतनाथ के बंगला को। जो-जो भी कार्तिक नहाए, वे बैकुंठी चौदस को तालाब पर जाकर जहाजी दीप तैराते हैं। वे अपने व्रत की सफलता का परचा यह देखते हुए लेते हैं कि जल की लहरों और पवन की भंवरों के बीच दीपक कहां तक जलता है!
सच में गांव के दीयों की बाती ही अपने मन की पाती लिखती है : वहां वैभव भले ही न हो लेकिन मन के भाव नित नव है। खेड़ाखूंट, छापर, मगरिया, तलैया, देवरे, चंवरे, मंदिर, बाड़ी और नदी का किनारा सबके सब दीयों की दीवट ही लगते हैं।
इन दीयों का उजास अंततः लोक जीवन की उसी सहज समृद्धि का उजास है, जो भौतिक वैभव से नहीं, साझा विश्वास, आत्मीयता और स्मृतियों की संपन्नता से मापी जाती है। बेड़च के तट पर जलते दीप हमें बताते हैं कि लोकपरंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं, वे वर्तमान को उसकी जड़ों से जोड़ने वाली जीवंत कड़ियाँ हैं। जब तक गांव की मिट्टी, नदी का जल और मनुष्य की श्रद्धा एक-दूसरे से संवाद करते रहेंगे, तब तक इन दीपों की लौ लोक संस्कृति के आंगन में जलती रहेगी।