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Four Anna Telescope In Dussehra Fair
ग्रामयुग: दाहा के किनारे दशहरा मेला, चार आने के बाइस्कोप में झांकता बचपन और एक रुपये की जलेबी की मीठी वो यादें
आशुतोष कुमार सिंह, सिवान
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 15 Oct 2026 04:38 PM IST
सार
गांव में पूरे शारदीय नवरात्रि के दौरान दुर्गा पूजा का उत्सव और दशहरा मेला की रौनक आज भी मन मेें ताजा बनी हुई है। मेले में एक रुपये की जलेबी खाकर पूरी टोली का पेट भर जाता और चार आना का बाइस्कोप देखकर हम मदमस्त हो जाते।
बाइस्कोप में हीरो-हीरोइनो और रामायण के पात्रों की फोटो देखा करते थे।
- फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
दुनिया में सबसे सुंदर और संवेदनाओं के समुद्र को समेटे हुए कोई शब्द है, वह है गांव। जैसे ही गांव शब्द मन मस्तिष्क पर चित्रित होता है, एक चलचित्र की भांति गांव के सभी दृश्य एक-एक करके आंखों के सामने तैरने लगते है। गांव एक ग्लोब की तरह है, ग्लोब आकार में छोटा होता है, लेकिन दुनिया के भूगोल को अपने आप में समेटे रहता है। ठीक उसी तरह, गांव दुनिया की एक छोटी इकाई है, जिसमें तमाम तरह के रंग भरे हुए हैं।
हर बार वापस बुला लेता है गांव
वर्ष 2001 में मैट्रिक पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मुझे अपना गांव छोड़ना पड़ा। तब से लेकर अब तक पिछले 22 वर्षों में तीज-त्योहार, शादी-विवाह या अन्य किसी विशेष अवसर पर ही गांव जाना होता है। इसके बावजूद, गांव से जो स्नेह है, जो संवेदना है, जो अपनत्व है, वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के समान जस का तस बना हुआ है। चाहे आप अपने जीवन रूपी आकाश में जितनी भी ऊंचाई तय कर लें, हृदय को ठंडक अपने गांव में ही मिलती है।
दाहा नदी के तट पर बसा रजनपुरा
बिहार के सीवान जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दक्षिण में दाहा नदी के तट पर मेरा गांव है रजनपुरा। स्थानीय बोलचाल में लोग इस गांव को राज-रजनपुरा कहते हैं। आखिर रजनपुरा से पहले राज लगा होने के पीछे क्या राज है? ये गुत्थी आज तक ठीक से सुलझ नहीं सकी है। बुजुर्गों से जानने की कोशिश की, लेकिन जितने मुंह, उतनी बातें। इन तमाम बातों में जो बात सबसे अच्छी लगती है, वह है गांव का माहौल, एकता और सद्भाव। छोटे-मोटे लड़ाई झगड़े तो सभी जगह होते हैं, उससे मेरा गांव भी अछूता नहीं है। लेकिन, सामाजिक सौहार्द की भावना गांव के लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई है।
गांव की दुर्गा-पूजा और दशहरा मेले की रौनक
गांव की जीवंतता का एक उदाहरण रजनपुरा की दुर्गा-पूजा (Durga Puja) और यहां का दशहरा मेला (Dussehra Mela) है। गांव के चट्टी (बाजार) के निकट ही यादवों का टोला है। हमारे यहां दुर्गा-पूजा (Durga Puja) का प्रबंधन शुरू से ही यादव टोले के लोग करते आए हैं। दुबले-पतले, आंखों पर चश्मा लगाए बीडीओ चाचा का चेहरा आज भी मेरे जेहन में उमड़-घुमड़ रहा है। गांव के चट्टी या फिर अपने दोचारे में वह दुर्गा मां की मूर्ति बनवाते थे।
हम तब बहुत-सारे बच्चे जमा हो जाते थे। पहले हम गांव के स्कूल में पढ़ने जाते और छुट्टी होने पर दुर्गा मां (Durga Mata) की मूर्ति कैसे बन रही है, यह देखने चले जाते। देर होने पर कई बार पिताजी की डांट भी खानी पड़ी। कुआर (अश्विन मास) में बच्चों के लिए एक खुशनुमा उत्सव का माहौल रहता था। सभी को सप्तमी का इंतजार रहता था। इस दिन दुर्गा माई की आंख खुलती और घर में पकवान बनता। मुझे खाने में पुआ बहुत पसंद रहा है और सप्तमी को घर में पुआ भी बनता था।
दुर्गा मां के विसर्जन के बाद गांव में एक उदासी का माहौल छा जाता।
- फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
रामलीला, नाच और नाटक की रंगत
सप्तमी से ही गांव के चट्टी पर रोज रंगारंग कार्यक्रम होते। रामलीला (Ramlila) से लेकर नाच-गाना (Dance & Singing) और ड्रामा (Drama) का आयोजन सभी कुछ इस दौरान देखने को मिलता। यह 90 के दशक के शुरुआती वर्षों की बात है। शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri) शुरू होने के साथ ठंड बढ़ने लगती थी। मेरी ईया यानी दादी शाम को ही गांति बांध देती थी, ताकि हमें ठंड न लगे। गांति बंधवाकर हम सीधे गांव के चट्टी पर पहुंच जाते रंगारंग कार्यक्रम देखने। देर रात लौटने के बाद भी सुबह जल्दी जागना पड़ता था, क्योंकि फूल तोड़कर लाना होता था। हमारे गांव में पूरे नवरात्र और दशहरा तक शंकर भगवान को जल चढ़ाने की परंपरा रही है। मैं भी दस दिनों तक जल चढ़ाने जाता। इसीलिए, फूल चुनकर लाने की जिम्मेदारी मेरी ही होती थी। गांव के बड़े लोग तो महेन्द्रनाथ धाम तक जल चढ़ाने जाते थे।
दुर्गा पूजा (Durga Puja) के भसान का दिन
सबसे ज्यादा आनंद दुर्गा पूजा के भसान के दिन आता था। कार्तिक की तीज को गांव में दुर्गाजी का भसान यानी विसर्जन होता है। उस दिन एक बड़ा मेला लगता है। नए कपड़े पहनकर सभी बच्चे मेला देखने जाते थे। मेला जाने के लिए हमें घर से दो रुपये से लेकर पांच रुपये तक मिल जाते थे। तब एक रुपये में भी जलेबी (Jalebi) इतनी आ जाती थी कि पेट भर जाए। मेरा जोर जलेबी और आलू-चाप पर रहता था। मेला में पूपूही (बांसुरी), डमरू और बैलून हमारे लिए आकर्षण के केन्द्र रहते।
बाइस्कोप में फिल्मों और रामायण के पात्र (Characters from films and Ramayana in Bioscope)
दशहरा (Dussehra) मेले में, सिर्फ चार आने में हम बाइस्कोप भी देखते थे। बाइस्कोप (Bioscope) में हीरो-हीरोइनो की फोटो देखा करते थे। मुझे मिथुन, धर्मेन्द्र, जितेंद्र और गोविंदा बहुत पसंद थे। बाइस्कोप में रामायण के पात्रों को भी देखने को मिलता। लगभग 500 मीटर से भी ज्यादा दूरी तक फैले मेले को उन दिनों देखना हम जैसे के लिए पूरी दुनिया को देखने के समान ही था।
याद आती हैं रामजनम चाची
दशहरे के मेले (Dussehra Mela) की बात हो रही है और रामजनम चाची की चर्चा न हो, तो बात पूरी नहीं होगी। रामजनम चाची के घर से हमारे घर की बहुत नजदीकी रही है। चाची मुझे मेरी मां की तरह प्यार करती थीं। उनके घर बचपन में जब भी जाता था, तो वो मुझे बिना खिलाए-पिलाए नहीं भेजती थीं। आज भी जब गांव जाता हूं, उनसे मिलने जरूर जाता हूं। चाची करीब 80 वर्ष की हो गईं होंगी, लेकिन आज भी घर का सारा काम खुद कर लेती हैं। वे महिला सशक्तिकरण की एक मिसाल हैं। जब भी दशहरे का मेला लगता मैं चाची के लिए जलेबी खरीदकर जरूर ले जाता था। मेरे द्वारा जलेबी ले जाने पर चाची चहक उठती थीं, उनकी आंखों में एक गजब-सा प्यार एवं एक सुकून देखने को मिलता था।
दुर्गा माई के विसर्जन के बाद उदासी
दुर्गा मां को ट्रैक्टर की ट्रॉली पर रखकर गांव की चौहद्दी में घुमाया जाता और अंत में दाहा नदी में विसर्जित कर दिया जाता। दुर्गा मां के विसर्जन के बाद गांव में एक उदासी का माहौल छा जाता था, ठीक वैसे ही जैसे बेटी की विदाई के बाद उसके मायके में उदासी छा जाती है। इन बातों के अब 30 वर्ष गुजर गए हैं। अब न तो दुर्गा-पूजा में वह रौनक है और न ही दाहा नदी में वह पवित्रता। राज-रजनपुरा आज भी गांव की तरह ही है, बस थोड़ा शहर गांव में घुस आया है। लेकिन, दिल तो आज भी अपने गांव में ही धड़कता है।
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