हिमालय की तराई में बसा चंपारण अपनी कई बातों के लिए खास है। इतिहास में, खासकर स्वतंत्रता संग्राम के समय इसकी भूमिका इसे उल्लेखनीय बनाती है। मोहनदास करमचंद गांधी को सबसे पहले ‘महात्मा’ चंपारण के लोगों ने ही कहा। सत्याग्रह आंदोलन जो चंपारण से शुरू हुआ था, उससे सभी परिचित हैं, और इस बात से भी कि ‘नील की खेती’ इस आंदोलन की सबसे बड़ी वजह रही।
नील से धान तक का सफर
जरा रुकिए! चंपारण की भूमि, इसकी नदियां, जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां सिर्फ नील की खेती के लिए ही मुफीद नहीं थीं। नील के बाद चंपारण जिस खेती के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, वह है धान! जी हाँ, वही धान जो वास्तविक धन है - धन-धान्य! वही जो प्रमुख अन्न है - अन्न-धन!
मिट्टी और धान की खासियत
चंपारण की मिट्टी धान के लिए सबसे ज्यादा मुफीद है। एक समय था, जब बहुत कम कृषि संसाधनों के बावजूद चंपारण में धान की पैदावार इतनी अधिक होती थी कि तब के भोजपुरी कवि बृजबिहारी प्रसाद ‘चूर’ ने धान और चंपारण पर यह कविता लिखी, जो आज भी गर्व से पढ़ी-सुनी जाती है:
चंपारण के लोग हंसेला
नरकटियागंज देखीं गल्ला
मंगर सनीचर हाट के हल्ला
कीनी बासमती के चाऊर
अन्न उंहवा ना मिली बाउर
भात बाने बटुला महकेला
चंपारण के लोग हंसेला
चंपारण का राजा मरचा चिउरा
आज चंपारण के इसी विशिष्ट ‘मरचा धान के चिउरा’ पर बात होगी, जो सिर्फ और सिर्फ पश्चिमी चंपारण में ही मिलता है। यह अपनी मीठी सुगंध और मनभावन स्वाद के कारण प्रसिद्ध है। यूं तो धान की कई किस्में हैं, जो अपने आप में खास हैं। बासमती सुगंधित धान है, पूरे देश में इसकी अपनी पहचान है, मगर बासमती का चिउरा नहीं बनाते। यह सिर्फ चावल के लिए होता है।
मरचा धान की खासियत यह है कि इसे भात के चावल के लिए नहीं, बल्कि चिउरा के लिए ही उगाया जाता है। बिहार का मुख्य और आधारभूत भोजन भात है। पूरे बिहार में (शहरी और आधुनिक नौकरीपेशा लोगों को छोड़कर) गांव, देहात और कस्बों में भात ही मुख्य भोजन है। रसोई में चावल की उपस्थिति उतनी ही सुदृढ़ और अनिवार्य है, जितना भोजन में स्वाद। इसीलिए, धान की बहुतायत वाले चंपारण में सुबह का नाश्ता हो या शाम का स्नैक्स, सब में चावल से बनी चीजें शामिल हैं।
चंपारण का रेडी-टू-ईट खजाना
चंपारण में शायद ही कोई घर ऐसा होगा, जहां चावल के बराबर चिउरा, भूजा (चावल के मुरमुरे) की खपत न हो। रसोई में ये तीनों चीजें अनिवार्य हैं। चिउरा-भूजा से चटपटे व्यंजन बनते हैं। चिउरा अकेला ही कई चीजों के साथ संगत करता है - चिउरा-दही, दूध, अचार, घी, सब्जी, गुड़, चीनी, बताशा, भूनकर, तलकर, भिगोकर, पोहा बनाकर, प्याज के साथ... जो स्वाद चाहिए, सबमें ढलने को तैयार!
यहां नेह-नातों से जुड़ा है चिउरा
चंपारण में सुबह का शाही नाश्ता दही-चिउरा है। शादी-ब्याह, बड़े भोज में यह परंपरा का हिस्सा होता है। चिउरा इतना सम्मानित है कि विवाह के न्योते में भर-भरकर भेजा जाता है। फल-मिठाई के साथ चिउरा आज भी पर्व-त्योहार पर बेटी-बहन के घर भेजने का रिवाज है। बाढ़ जैसी आपदा में चिउरा-मिठाई देकर लोग पीड़ितों की मदद करते हैं। चिउरा नेह-नाता जोड़ने, बनाने और बनाए रखने का अचूक मंत्र है।
मरचा चिउरा की दुर्लभ किस्में
यूं तो चिउरा किसी भी धान से बन सकता है, फिर भी कुछ ही किस्में चिउरा के रूप में मान्य हैं। सहज, सुलभ और टिकाऊ चिउरा महीनों खराब नहीं होता, इसलिए हाट-बाजार में सबसे ज्यादा मांग में रहता है। जैसे फलों का राजा आम है, वैसे ही चिउरा में राजा का रुतबा ‘मरचा के चिउरा’ को दिया जाता है। कतरनी का महीन लंबा चिउरा, बाबाधाम का पतला हवा में उड़ जाने वाला, तालु में सेट होने वाला चिउरा हो या रोज के खाने में चावल के बराबर उपयोग होने वाला पंकज का चिउरा - सब मरचा के चिउरा से पीछे चलते हैं। यह खास ही नहीं, खासमखास है। अपनी मीठी और बेहतरीन सुगंध के कारण ही यह अति विशिष्ट है, और सरकार को जब चेतना हुई तो अब इसे जीआई टैग भी मिल गया है। यह सत्याग्रह की धरती के श्रम-आग्रह रखने वाले चंपारण का मान भी है।
भोजपुरी में मरचा चिउरा के दीवाने लोग इसकी विशिष्टता बखानते हुए कहते हैं-
“जो काम लाखों रुपये दे के नहीं होता हो, वो एक झोरा मरचा चिउरा देने से हो जाएगा।”
धान की बालियों में सजे गोल मोती
यह अति विशिष्ट मरचा धान अपने स्वाद, सुगंध के लिए ही नहीं अपने रूप में भी खास है। खेत में जाइए तो लगेगा प्रकृति ने धान की बालियों में छोटे-छोटे गोल मोती सजा दिए हैं और आप धान के खेत में नहीं, मोती के खेत में खड़े हैं। अपनी मीठी सुगंध के कारण ही ये बेशकीमती नहीं है, बल्कि अपनी खेती के लिए भी ये पश्चिमी चंपारण का गर्व भरा मान है, क्योंकि इसके लिए जैसी मिट्टी, हवा, पानी और भगौलिक परिस्थितियां चाहिए, वो बस पश्चिमी चंपारण के ही कुछ हिस्सों में मिलती है।
“चंपारण के अलावा किसी और जमीन पर मरचा धान में वो सुगंध नहीं आएगी। इस धान में सुगंध नारायणी नदी के जल से है!”
तीन पीढ़ियों से धान, चावल, चिउरा व्यवसायी और कृषक जितेन्द्र जायसवाल कहते हैं - मरचा धान के चिउरा कूटने को अब आधुनिक मशीनें भी आ गई हैं। इसके बावजूद, यह चिउरा दूसरे चिउरा से न केवल ऊंचे दाम में बिकता है, बल्कि कहना चाहिए कि हाथो हाथ तुरंत खत्म भी हो जाता है। इसी कारण मरचा धान की की खेती के लिए भूमि का कम होना, खेती में कृत्रिम रसायनों का प्रयोग नहीं करने से उपज का कम होना और दूसरी जगह की मिटटी में इसकी उपज न के बराबर होना - इसे बहुमूल्य बनाता है।
अनमोल किस्म –‘सुरुका का चिउरा’
इसकी एक अनमोल किस्म है - ‘सुरुका का चिउरा’। ‘सुरुका’ मतलब पौधों से ही सीधे बालियों को चुन-चुनकर तोड़ना। यह चाय की पत्तियां तोड़ने जैसा है। धान के दाने परिपक्व होने से जरा पहले तोड़े जाते हैं। भोजपुरी में इसे ‘सुरुकना’ कहते हैं। जब प्रकृति में पूरी नमी हो, बालियां रात भर ओस से भीगी और फूली हों (चिउरा बनाने के लिए धान को अलग से भिगोना ना पड़े), तब मुंह-अंधेरे सुरुक के लाया जाता है और तुरंत ओखल, ढेंकी या मशीन में कूट दिया जाता है। इस सुरुका का चिउरा का दिव्य स्वाद आज की पीढी के गिनती के भाग्यशाली लोगों को मिला होगा। कारण? इसका समय दस से बारह दिन का ही होता है, और हर साल यह संयोग बने, ये भी जरूरी नहीं है। जलवायु परिवर्तन इसका सबसे बड़ा कारण है। यह धान कूटते समय सुगंध से पास-पड़ोस और राहगीर समझ जाते हैं कि मरचा का चिउरा कूटा जा रहा है - इसकी सुगंध इसके स्वाद का पता देती है। अधपके दानों का स्वाद और सुगंध और भी मीठा हो जाता है, जब वे ढेंकी या ओखल से निकलते हैं। चिउरा बनाने की प्रकिया में ‘भूनना’ भी होता है, जो सुरुका के चिउरा में नहीं किया जाता। इससे सुरुका के चिउरा का सुगंध और स्वाद बढ़ जाता है। स्वादप्रेमी, लोलुप जिह्वा वाले भोजन भट्ट लोगों की स्वादग्रंथियां इसकी सुगंध मात्र से अति सक्रिय हो जाती हैं। चूंकि संयोग से यह बहुत कम बन पाता है, इसलिए जब भी ये सुरुका का चिउरा आता है, तो बस मुठ्ठी-मुठ्ठी भर ही प्रसाद की तरह बांटा जाता है - बस अपने खास लोगों में। बदलती जलवायु में तो सुरुका का चिउरा और भी दुर्लभ होता जा रहा है।
मरचा धान के चिउरा का पूरा-पूरा स्वाद लेने के लिए आप इसे कच्चा ही खाइए, तभी इसकी मिठास अधिक समझ आएगी आपको। सुगंध का हाल तो ये है कि जिस कमरे में इस चिउरा का झोला रखा जाता है, वो कमरा ही महकने लगता है। ट्रेन या बस में रखो तो जानकार लोग (निस्संदेह स्वाद के मारे चंपारण के लोग) समझ जाते हैं कि साथ में कोई मरचा का चिउरा लेकर जा रहा है। आप इससे इन्दौरी पोहे बनाइए या पंजाबी; इसकी सुगंध बरकरार रहती है। भूनकर या तलकर खाइए तब भी इसका स्वाद अलग और बेमिसाल होता है। पर, मैं तो यही कहूंगी कि इसको एक बार हम चंपारण के लोगों की तरह पेड़ा के साथ कच्चा ही खाकर देखिए। फिर तो अगले मौसम में (दीवाली से शुरू होता है) आप टिकट कटा रहे होंगे नरकटियागंज के लिए...।