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जनजातीय अंचल का निरझर मेला : जहां चर्मरोग ठीक करता है पहाड़ का पवित्र जल और इमली का पेड़ पूरी करता है मन्नत

प्रीतिमा वत्स, लेखिका और चित्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 22 Mar 2026 11:21 AM IST
सार

झारखंड के गोड्डा जिले में लगने वाला निरझर मेला आदिम संस्कृति, आस्था और प्रकृति पूजा का अनूठा संगम है जहां गंधकयुक्त गर्म जल के पवित्र तालाब में स्नान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। निरझर मेले को याद करते ही आंखों के सामने सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि रंगों का जलसा उभरने लगता है। यह मेला आदिम संस्कृति की ओर खुली हुई ऐसी खिड़की है, जिससे झांकें तो मनुष्य और प्रकृति के बीच बस एक पवित्र डुबकी का फासला नजर आता है। 

बिहार स्थित मंदार पर्वत की तलहटी में लगने वाले पापहारिणी मेले के दूसरे दिन लगता है निरझर मेला।
बिहार स्थित मंदार पर्वत की तलहटी में लगने वाले पापहारिणी मेले के दूसरे दिन लगता है निरझर मेला। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
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विस्तार
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निमझर, निरझर, नीलझर, निर्झर और डुबकी आदि कई नामों से मशहूर यह मेला आस्था के साथ स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। कुछ लोग यहां गलतियों का प्रायश्चित करने आते हैं, कुछ जश्न मनाने और कुछ उत्तम स्वास्थ्य की कामना लेकर आते हैं। झारखंड के गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट प्रखंड में लगने वाला यह मेला आमतौर पर मकर संक्रांति के दूसरे दिन लगता है। बिहार स्थित मंदार पर्वत की तलहटी में लगने वाले पापहारिणी मेले के दूसरे दिन यह मेला शुरू होता है और सिर्फ दो दिनों के लिए लगता है।

पुरखों की बातों में मेले का इतिहास

कब से लग रहा है यह मेला, किसी को नहीं पता। हमारे दादाजी को उनके दादाजी ने बताया और शायद उन्हें उनके दादाजी ने बताया होगा। यह मेेला कालखंड की उन रेखाओं पर टिका हुआ है, जो इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि पुरखों की बातों में सुरक्षित हैं। इस परंपरा के शुरू होने का सिरा हम सभी से अदृश्य है।

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यूं तो यह संथालों का मेला माना जाता है, पर गोड्डा जिले के आसपास के इलाकों से सभी जातियों के लोग यहां के पवित्र तालाब में स्नान करने आते हैं। संथाली समुदाय के लोग अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करते हैं और गैर-आदिवासी समुदाय के लोग अपनी पद्धति से। इस तरह, यह दो संस्कृतियों का मिलन-स्थल भी है, जहां सभी समुदाय के लोग बड़े ही प्रेममय वातावरण में इकट्ठे होते हैं।

'नमक' वाली पोटली

हमारे दादाजी को इस मेले में जाने का गजब उत्साह होता था। कई बार वे हमें भी साथ लेकर जाया करते थे। कपड़े, खाने का कुछ सूखा सामान, थोड़ी-सी लकड़ी के टुकड़े और नमक एक थैले में रखकर हम मेले के लिए निकल पड़ते थे। गर्म पानी के तालाब में नहाकर जब बाहर आते, तो इतना अच्छा लगता था कि उसे शब्दों में बयान करना कठिन लगता है। नहाने के बाद उस तालाब के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो जाते और अपने साथ लाया हुआ नमक उसमें प्रवाहित कर देते। इसके बाद, वहां जगह-जगह जल रही आग में अपने साथ लाई हुई लकड़ी डालते और खूब देर तक शरीर को गर्म करते।

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तालाब के पास ही इमली का एक बड़ा पेड़ है, जो हमेशा आशीष देता प्रतीत होता है। उस पेड़ के नीचे बैठकर कुछ देर प्रार्थना करते। एक आदिवासी पुजारी भी वहां अक्सर रहते थे। फिर, अपने साथ लाए खाद्य पदार्थों, जिनमें तिल के लड्डू, चिउड़ा, गुड़, लाई आदि होते, जिन्हें सभी मिल-बांटकर खाते। कभी-कभी कुछ खाद्य सामग्री मेले की दुकानों से भी खरीद लेते, जैसे - काले चने की घुघनी, धुसका, पुआ, घटरा, बरह आदि।

इमली का पेड़ और हजार उम्मीदें 

यहां मौजूद इमली के पेड़ को लेकर मान्यता है कि यह मनोकामना पूरी करने वाला वृक्ष है। कोई मन्नत माननी है तो इमली के पेड़ में एक ढेला धागे की सहायता से बांध देते हैं। मन्नत पूरी हो गई हो तो एक ढेला पेड़ से खोल देते हैं। ये जरूरी नहीं है कि ढेला वही हो, जिसे आपने बांधा है। इस तरह, इस इमली के पेड़ की जो भी निचली शाखाएं हैं, सब लाल धागे और ढेले से भरी रहती हैं। कई भक्त मन्नत पूरी होने पर तुला से नापकर भी नमक इस पवित्र तालाब में डालते हैं। मन्नतें कितनी पूरी होती हैं या नहीं होती हैं, इस पर बहुत सारी बातें हो सकती हैं, पर यहां आने वाले लोगों की आस्था और उम्मीदों को कई दशकों से मजबूती से जोड़े हुए है यह इमली का वृक्ष।

विज्ञान और लोक-विश्वास का संगम

वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां के पानी में काफी मात्रा में गंधक है, जिससे पानी गर्म रहता है और यह त्वचा के रोगों से भी निजात दिलाता है। यह प्रकृति की अपनी केमिस्ट्री है, जो बिना किसी पर्चे के सदियों से चर्मरोगों का उपचार कर रही है। तालाब के पास खाली स्थान पर मेला भी लग जाता था। जहां स्थानीय फल और खाने-पीने की कुछ चीजें मिला करती थीं। बच्चों के खिलौने वगैरह भी मिलते थे। मेले के मैदान में आदिवासी पुरुषों द्वारा मांदर, नगाड़ा और ढोल आदि पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, जिसकी लय पर थिरकती संथाली महिलाओं का नृत्य मन मोह लेता है।

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मंदार पर्वत पर
और आसपास बहने वाला 
वह दूध का झरना।
यूं ही निरंतर बहता रहे
हमारे बच्चों के लिए
और उनके बच्चों के लिए।

(संथाली गीत का हिंदी रूपांतर)

ये कलाकार नृत्य और संगीत के माध्यम से अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति से लोगों को रू-ब-रू कराते हैं। मेले में स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन-खिलौने, बांस के उत्पाद आदि भी देखने को मिलते हैं। स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि ये लोग साल भर इन हस्तनिर्मित उत्पादों की तैयारी में लगे रहते हैं और आसपास लगने वाले हर मेले में अपने उत्पाद के साथ दुकान लगाते हैं, ये इनकी कमाई का बड़ा स्रोत है।

प्रकृति की महाआरती

सुपरिचित कलाकार राजीव रंजन बताते हैं कि 'संगीत और कला तो आदिवासी समाज की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। एक ओर जहां कला रोजी-रोटी से जुड़ी है, दूसरी ओर जरा-सी फुरसत मिली नहीं कि दिल को सुकून देने वाला संगीत छेड़ देता है यह जीवंत समाज।' संथाली भाषा में संगीत की लय के साथ वे प्रकृति की पूजा करते हैं। उनकी प्रार्थना में 'स्वर्ग का परमेश्वर' और 'धरती माता' का रिश्ता उतना ही सरल है जितना एक बच्चे का अपनी मां से। वे गाते हैं कि यह सृष्टि - गाछ-वृक्ष, पशु-पक्षी, वन-पहाड़ - सब उसी की उत्पत्ति है और उसी से रक्षित है।

परंपरा के दोने और आधुनिकता का कचरा

हाल के दिनों में मेले ने विस्तार रूप ले लिया है। पास ही शिवजी का मंदिर भी है, पार्वती मां का मंदिर अभी बन रहा है। पारंपरिक पकवान और स्थानीय फलों के लिए विख्यात इस मेले में अब मैगी और चाट, मोमोज आदि भी मिलने लगे हैं। यहां भी ठंड में लोग आइसक्रीम का शौक रखने लगे हैं। सखुआ, पलाश के दोने की जगह भी पॉलिथीन की थैलियों का चलन बढ़ा है। यह आधुनिकता का वह 'कचरा' है, जो हमारी परंपरा के 'दोने' निगल रहा है। फिर भी स्थानीय लोगों की जागरूकता ने यहां की अस्मिता को बचाए रखा है।

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पवित्र जल का शाश्वत संदेश

बचपन में हमें बड़ा अजीब लगता था कि ये कैसा मेला है, जहां सिर्फ नहाने के लिए लोग जाते हैं। न तेल, न साबुन लगाते हैं और कहते हैं कि त्वचा से जुड़ी हुई सारी परेशानी इस तालाब में नहाने से दूर हो जाती है। कुछ भी हो गरम पानी का स्वच्छ तालाब हमें खूब आकर्षित करता था और आसपास की शांति बहुत ही सुकून देनेवाली थी, मानो वह कोई तपस्थली हो। 

यह जलाशय मानव निर्मित तालाब नहीं है, बल्कि पहाड़ों से निकलने वाला प्राकृतिक जलस्रोत है। इस तालाब के रखरखाव की जिम्मेदारी वहां के स्थानीय आदिवासी लोग ही करते हैं। पहाड़ियों के बीच से पानी की पतली धारा निरंतर बहती रहती है, जो एक छोटे कुंड या पोखर का रूप लेती है। आधुनिकता और परिवर्तन के दौर में भी निरझर मेला और वहां की निर्मलता आज भी वैसी ही बनी हुई है। 

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चिलचिलाती गर्मी में जब आसपास के कुएं, पोखर और नदी सब सूख जाते हैं, तब भी यह तालाब नहीं सूखता। यह 'निरझर' हमें सिखाता है कि जो स्रोत जमीन की गहराई और जनता की आस्था से जुड़े होते हैं, वे कभी रिक्त नहीं होते।  यह केवल पानी नहीं, झारखंड की जिजीविषा का प्रतीक है, जो आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक 'दूधिया झरने' की तरह बहता रहेगा। 
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