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बानुछापर : न गांव, न शहर - डिजिटल भिखारी से आरबीआई गवर्नर तक कहानियों का अनोखा खजाना

आशीष कुमार अंशु, स्वतंत्र पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 13 Dec 2025 07:55 PM IST
सार

बानुछापर उन सपनों का गांव है, जिन्हें रेल की पटरियां शहर व देहात में बांटती हैं। खेत-खलिहानों, नदियों और जंगलों के बजाय इस गांव की आत्मा यहां के लोग हैं। यह गांव सिखाता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब हम जाति, धर्म, वर्ग जैसे बंधनों से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करें। 

रेल की पटरियां बांटती हैं, लोग जोड़ते हैं - बानुछापर की समावेशी कहानी
रेल की पटरियां बांटती हैं, लोग जोड़ते हैं - बानुछापर की समावेशी कहानी - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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रेल की पटरियां उस गांव को दो हिस्सों में बांटती हैं - एक तरफ शहर की चमक-दमक दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ देहात की सादगी। बानुछापर कभी आम गांवों जैसा नहीं रहा। जहां गांव का नाम सुनते ही खेतों, बैलगाड़ियों और खलिहानों की तस्वीर उभरती है, वहां यह गांव थोड़ा सा अलग रहा है। पिन कोड 845438 वाला बानुछापर गांव अपनी शांत सड़कों, हरे-भरे खेतों और दर्जन भर तालाबों के लिए जाना जाता है। दरअसल, बेतिया के पश्चिम चंपारण जिले में बसा बानुछापर न तो पूरी तरह गांव है, न ही शहर। गांव के लोग और उनकी कहानियां बानुछापर की असली पहचान हैं। ये कहानियां - गर्व, संघर्ष, सपनों और थोड़ी मस्ती से बुनी गई हैं। 

बानुछापर, जो न गांव था, न ही शहर

बानुछापर कभी आम गांवों जैसा नहीं रहा। जहां गांव का नाम सुनते ही खेतों, बैलगाड़ियों और खलिहानों की तस्वीर उभरती है, वहां यह गांव थोड़ा अलग है। रेलवे की पटरियां इसे शहर से जोड़ती थीं। एक कदम इस पार, तो आप गांव में; एक कदम उस पार, तो शहर में। इस अनोखी भौगोलिक बनावट ने बानुछापर को एक अलग पहचान दी। गांव की आबादी पिछले दस सालों में कई गुना बढ़ी है। पहले जहां गांव के मूल निवासियों की आवाज गूंजती थी, अब बाहरी लोग - किराएदार और प्रवासी - यहां की गलियों में ज्यादा दिखते हैं। गांव के पुराने लोग इन्हें उन्हीं नजरों से देखते हैं, जैसे - दिल्ली में बिहारियों को देखा जाता है। ‘ये लोग हमारे गांव को बदल रहे हैं’, एक बुजुर्ग ने चाय की टपरी पर तुनकते हुए कहा था। लेकिन, बदलाव समय का नियम है और बानुछापर इससे अछूता नहीं है।

समावेशी तरीके से मुखिया का चुनाव 

बानुछापर न केवल अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है, बल्कि सामाजिक समरसता की मिसाल भी पेश करता है। यहां हर वर्ग के लोग मिलजुल कर रहते हैं और सामुदायिक निर्णयों में सभी की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। बानुछापर की एक उल्लेखनीय विशेषता इसके मुखिया का चुनाव भी है। गांव में मैथिल ब्राह्मणों की बहुलता के बावजूद, ग्रामीणों ने एक ऐसे व्यक्ति को मुखिया चुना, जिनकी जाति से केवल उनका परिवार ही गांव में निवास करता था। यह निर्णय गांव के लोगों की उदारता और सामाजिक एकजुटता को दर्शाता है। यह घटना इस बात का प्रमाण भी है कि बानुछापर में जातिगत सीमाएं केवल औपचारिकता तक सीमित हैं, और गांव का नेतृत्व चुनते समय योग्यता और विश्वास को यहां प्राथमिकता दी जाती है।

दुर्गा पूजा में सामुदायिक भागीदारी

बानुछापर का दुर्गा पूजा उत्सव पूरे जिले में अपनी भव्यता और सामुदायिक भागीदारी के लिए प्रसिद्ध है। हर साल इस उत्सव से पहले गांव में एक समिति का गठन होता है, जिसमें ग्रामीण सर्वसम्मति से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, और सचिव का चुनाव करते हैं। यह प्रक्रिया पारदर्शी और सामूहिक सहमति पर आधारित होती है, जो गांव की एकता को मजबूत करती है। पिछली बार जब मैं वहां दुर्गा पूजा के दौरान मौजूद था, दीपक पटेल को समिति का अध्यक्ष चुना गया। यह चयन भी गांव की समावेशी सोच को दर्शाता है, जहां जाति या वर्ग से ऊपर उठकर योग्यता को महत्व दिया जाता है।

मामाजी का जल्लाद वाला रोल 

बानुछापर की गलियों में एक और नाम गूंजता है - प्रकाश झा, मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक, जिनका ननिहाल यही गांव है। उनकी फिल्मों और धारावाहिकों ने न सिर्फ बॉलीवुड में, बल्कि गांव में भी खूब चर्चा बटोरी। उनके धारावाहिक विद्रोह का एक हिस्सा बानुछापर में फिल्माया गया। गांव के कई लोग इस धारावाहिक का हिस्सा बने, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा हुई उनके सगे मामाजी की। प्रकाश झा ने अपने मामाजी को विद्रोह में जल्लाद की भूमिका दी। गांव में आज भी लोग हंसते हुए बताते हैं, 'मामाजी का जल्लाद वाला रोल देखकर हम सब हैरान रह गए। वो तो इतने सीधे-सादे इन्सान थे, लेकिन पर्दे पर ऐसा डरावना रोल किया कि सब दंग रह गए!’

गांव की मिट्टी से निकले सितारे 

बानुछापर की कहानी सिर्फ आज की नहीं, बल्कि बीते कल की भी है। लक्ष्मी कांत झा, जो 1967 से 1970 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे, इसी गांव की मिट्टी के लाल थे। गांव में आज भी उनकी कहानियां बुजुर्गों की जुबान पर चढ़ी हुई हैं। लोग बताते हैं कि जब लक्ष्मी कांत झा गांव आते थे, तो चंपारण के बड़े-बड़े जमींदार अपनी बग्घी दो किलोमीटर पहले छोड़कर पैदल उनसे मिलने आते। उनका रुतबा ऐसा था कि लोग उनके सामने झुकते थे, लेकिन वे हमेशा जमीन से जुड़े रहे।

आजादी के बाद अविभाजित बिहार के टॉप पुलिस अधिकारियों में शुमार सी.एम. झा भी यहीं के थे। उनकी कहानियां गांव के बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। समय के बदलावों के साथ बानुछापर ने गर्व के नए क्षण भी गढ़े हैं। 'पुलिसवाले अच्छे लेखक नहीं हो सकते’, इस धारणा को बानुछापर के केशव भारद्वाज ने तोड़ दिया है। दिल्ली पुलिस की डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी फोर्स में इंस्पेक्टर के तौर पर कार्यरत केशव ने अपनी भोजपुरी किताब 'रेड लाइट' से तहलका मचा दिया। 'रेड लाइट' बेस्टसेलर बन गई। कभी प्रकाशकों ने उनकी किताबें छापने से नकार दी थीं, आज वही प्रकाशक उनके पास खुद आते हैं। केशव कहते हैं, 'मैंने अपने गांव की मिट्टी की खुशबू को अपनी लेखनी में उतारा है। ये कहानियां मेरे गांव की हैं, मेरे अपने लोगों की हैं।' 

इस साल, गांव के मृणाल किशोर झा ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि छोटे-से गांव से निकलकर भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं। मृणाल ने चिकित्सा-स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय योग्यता सह प्रवेश परीक्षा (2025) में ऑल इंडिया स्तर पर चौथी रैंक हासिल कर पूरे गांव का नाम रोशन किया है। 

जब धर्मसंकट में उलझ गया पूरा गांव 

वर्ष 2004 का लोकसभा चुनाव बानुछापर के लिए एक अनोखा पल लेकर आया। बेतिया सीट से रघुनाथ झा और प्रकाश झा दोनों मैदान में थे। रघुनाथ झा का गांव से गहरा नाता था। उन्होंने लिचवानी में आकर गांव वालों से समर्थन मांगा। लेकिन, जब प्रकाश झा मैदान में उतरे, तो गांव दो धड़ों में बंट गया। लोग जानते थे कि प्रकाश झा शायद चुनाव न जीतें, फिर भी गांव के ज्यादातर लोगों ने उनका साथ दिया। एक ग्रामीण ने कहा, 'वो हमारे गांव का बेटा है, भले ही जीते या हारे, हमारा दिल उसके साथ है।’ यह घटना आज भी गांव की चौपाल की चर्चाओं का हिस्सा है।

गांव में डिजिटल भिखारी 

बानुछापर का बेतिया रेलवे स्टेशन गांव की धड़कन है। यहीं रहता था राजू, जिसे लोग देश का पहला डिजिटल भिखारी कहते थे। राजू की कहानी अनोखी थी। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के समय उसका खाना-पीना रेलवे की पैंट्रीकार में मुफ्त था। लालू के जाने के बाद भी यह परंपरा चली। राजू रेलवे का ‘गोद लिया बच्चा’ बन गया था। उसका मोबाइल और डिजिटल भुगतान का तरीका देखकर लोग हैरान रह जाते। पिछले साल राजू का निधन हो गया, लेकिन उसकी कहानियां आज भी रेलवे स्टेशन की चाय की टपरी पर गूंजती हैं।

बानुछापर की आत्मा हैं यहां के लोग

बानुछापर की कहानी लिखना आसान नहीं है। यह गांव न तो खेत-खलिहानों से परिभाषित होता है और न ही नदियों एवं जंगलों से इसकी पहचान है। इस गांव की आत्मा तो इसके लोग हैं - लक्ष्मी कांत झा, सी.एम. झा, प्रकाश झा, केशव भारद्वाज, मृणाल किशोर झा और राजू जैसे किरदार। ये वो लोग हैं, जिन्होंने बानुछापर को सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि कहानियों का खजाना बनाया।

बानुछापर की कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो सामाजिक बदलाव और समावेशिता में विश्वास रखता है।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के नवंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया  है) 
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