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Dussehra 2026: कहीं रावण बाबा की पूजा, तो कहीं गागली युद्ध... दशहरे पर इन गांवों में नहीं जलता दशानन का पुतला

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 19 Oct 2026 02:35 PM IST
सार

मध्य प्रदेश के रावण गांव में लंकापति को ग्राम देवता मानकर पूजा जाता है, तो उत्तराखंड के जौनसार-बावर में दो गांवों के लोग सदियों पुरानी पश्चाताप की परंपरा निभाते हैं। कहीं शादी का पहला निमंत्रण रावण बाबा को दिया जाता है, तो कहीं अरबी के तनों और घास के गोलों से गागली युद्ध होता है। देशभर में रावण दहन के बीच ये अनूठी परंपराएं दशहरे के अलग-अलग सांस्कृतिक रंग दिखाती हैं।

दशहरे पर इन गांवों में नहीं जलता दशानन का पुतला
दशहरे पर इन गांवों में नहीं जलता दशानन का पुतला - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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देशभर में विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन भारत के कुछ गांवों में दशहरा मनाने की परंपरा बिल्कुल अलग है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के रावण गांव में लोग रावण का दहन करना अशुभ मानते हैं और उन्हें अपने ग्राम देवता के रूप में पूजते हैं। वहीं, उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के उद्पाल्टा और कुरोली गांवों में रावण दहन के बजाय गागली युद्ध की रस्म निभाई जाती है। इन दोनों परंपराओं के पीछे अलग-अलग मान्यताएं और सदियों पुरानी लोककथाएं जुड़ी हैं।
मध्य प्रदेश : रावण गांव में ग्राम देवता हैं लंकापति
मध्य प्रदेश : रावण गांव में ग्राम देवता हैं लंकापति - फोटो : AI Image
मध्य प्रदेश : रावण गांव में ग्राम देवता हैं लंकापति
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले की नटेरन तहसील में स्थित रावण गांव में विजयादशमी पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। ग्रामीण रावण दहन को अशुभ मानते हैं। उनके लिए रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि ग्राम देवता और इष्ट देव हैं। गांव के लोग उन्हें श्रद्धा से ‘रावण बाबा’ कहते हैं और किसी भी मांगलिक कार्य से पहले उनकी पूजा करते हैं।

गांव के बीचोंबीच परमारकालीन प्राचीन मंदिर में रावण बाबा की करीब 12 फीट लंबी प्रतिमा विश्राम मुद्रा में स्थापित है। मंदिर में सुबह-शाम आरती और पूजा-अर्चना होती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रावण बाबा के आशीर्वाद से शुभ कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं।

शादी का पहला निमंत्रण रावण बाबा के नाम
गांव में किसी के घर विवाह हो, नया वाहन खरीदा जाए या कोई धार्मिक अनुष्ठान हो, सबसे पहले रावण बाबा की पूजा की जाती है। विवाह तय होने पर शादी का पहला निमंत्रण पत्र भी उन्हीं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद प्रतिमा की नाभि में तेल चढ़ाकर मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।

रावण बाबा के प्रति ग्रामीणों की आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गांव के कुछ ब्राह्मण परिवार खुद को रावण का वंशज मानते हैं। यहां के युवा अपनी गाड़ियों पर ‘जय लंकेश’ लिखवाते हैं और शरीर पर भी लंकेश के चित्र या टैटू बनवाते हैं।

दशहरे पर पूजा, रामायण पाठ और भंडारा
स्थानीय पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में रावण बाबा ने इसी स्थान पर एक शक्तिशाली दैत्य का घमंड तोड़ा था। इसके बाद वे यहां विश्राम मुद्रा में स्थापित हुए। इसी प्रतिमा से गांव की पहचान रावण गांव के रूप में जुड़ी। ग्राम रावण और बमोरी के सरपंच प्रतिनिधि राजेश धाकड़ के मुताबिक, गांव की पहचान इस प्राचीन प्रतिमा से है। यहां कोई भी व्यक्ति रावण दहन देखने बाहर नहीं जाता और न ही गांव में रावण का पुतला जलाया जाता है।

दशहरे पर गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता है। काम के सिलसिले में बाहर रहने वाले लोग भी मंदिर पहुंचकर पूजा में शामिल होते हैं। मंदिर परिसर में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और महाभंडारे का आयोजन किया जाता है। मंदिर के पुजारी नरेश तिवारी के अनुसार, रावण बाबा प्राचीन काल से यहां विराजमान हैं और भक्त उनसे मन्नतें मांगने आते हैं। ग्रामीण गोविंद नारायण तिवारी बताते हैं कि शादी के समय तेल-हल्दी का पहला निमंत्रण भी बाबा को दिया जाता है। दशहरे पर विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और महाप्रसाद के लिए पहुंचते हैं।
 
उत्तराखंड : रावण दहन के बजाय होता है गागली युद्ध
उत्तराखंड : रावण दहन के बजाय होता है गागली युद्ध - फोटो : AI Image
उत्तराखंड : रावण दहन के बजाय होता है गागली युद्ध
उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के उद्पाल्टा और कुरोली गांवों में दशहरा मनाने का तरीका अलग है। यहां रावण दहन की जगह ‘गागली युद्ध’ होता है। इस परंपरा में दोनों गांवों के लोग अरबी के तनों, जिन्हें स्थानीय भाषा में गागली कहा जाता है, और घास-फूस के गोलों से सांकेतिक युद्ध करते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत दो चचेरी बहनों रानी और मुन्नी की दुखद मौत के बाद पश्चाताप के तौर पर हुई थी। बताया जाता है कि एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। हादसे के लिए मुन्नी को जिम्मेदार ठहराकर उसे ताने दिए गए। इससे आहत होकर मुन्नी ने भी उसी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। दोनों बहनों की मौत की याद और पश्चाताप से जुड़ा यह अनुष्ठान पीढ़ियों से निभाया जा रहा है।

दुर्गा अष्टमी से शुरू होती है अनुष्ठान की तैयारी
इस परंपरा के तहत दुर्गा अष्टमी से ही दोनों बहनों की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। उन्हें घास, दूब और फूलों से सजाकर पूजा जाता है। दशहरे के दिन इन प्रतिमाओं को गांव के पास स्थित उसी कुएं में विसर्जित किया जाता है, जिससे यह लोककथा जुड़ी हुई है।

इसके बाद उद्पाल्टा और कुरोली के ग्रामीण गागली युद्ध की रस्म निभाते हैं। पहले इस युद्ध में लाठी-डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब अरबी के तनों और घास के गोलों को एक-दूसरे पर फेंककर इसे सांकेतिक रूप में किया जाता है।

इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। युद्ध की रस्म पूरी होने के बाद ग्रामीण उद्पाल्टा के पंचायती आंगन में एकत्र होते हैं। यहां पारंपरिक नाच-गाने और मेल-मिलाप के साथ उत्सव मनाया जाता है।

दशहरे के अलग-अलग रंग, लोकआस्था की अनूठी विरासत
मध्य प्रदेश के रावण गांव में रावण बाबा की पूजा और उत्तराखंड के जौनसार-बावर में गागली युद्ध, दोनों ही परंपराएं दिखाती हैं कि भारत में त्योहारों का स्वरूप स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं के साथ किस तरह बदलता है। एक जगह रावण को ग्राम देवता मानकर हर शुभ काम में याद किया जाता है, तो दूसरी जगह दो बहनों की स्मृति और पश्चाताप से जुड़ा अनुष्ठान निभाया जाता है।

जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, वहीं इन गांवों में यह पर्व अपनी विशिष्ट लोकपरंपराओं, सामुदायिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था को सहेजने का अवसर भी है।
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