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Home› Lokrang› Gramyug› The Lost Taste Of Raw Mango A Journey Back To The Village Childhood And Summer Memories

ग्रामयुग : जिस दिन आम के टिकोले का लोकतंत्र खत्म हुआ, उसी दिन बचपन थोड़ा बूढ़ा हो गया...

देव प्रकाश चौधरी, लेखक एवं पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 13 Jul 2026 09:30 PM IST
सार

चिलचिलाती धूप में आम के बगीचे में जाने वाली बाल टोली में कई विशेषज्ञ थे। कोई निशाना लगाता। कोई पेड़ पर चढ़ता। बाकी बच्चे, जिनमें मैं भी शामिल था, जमीन पर खड़े रहकर इस पूरी प्रक्रिया का लोकतांत्रिक समर्थन करते और टिकोला गिरते ही उसे कब्जे में लेकर अपनी सक्रियता सिद्ध करते थे। 

टिकोले की खटास में छिपा था बचपन का सबसे मीठा स्वाद।
टिकोले की खटास में छिपा था बचपन का सबसे मीठा स्वाद। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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सच कहूं, बहुत दिनों से गांव नहीं गया। कभी-कभी फोन आता है गांव से। कोई पुराना दोस्त हँसते हुए उलाहना देता है - 'दुनिया घूम लेते हो, पर गांव आने की फुरसत नहीं मिलती? यहां अब बहुत कुछ बदल गया है। आओ कभी। जेठ लगा है। बगीचे में अभी भी दो-चार देसी आम के पेड़ बचे हैं। टिकोले याद आते हैं कि नहीं?' ...और मैं कुछ देर चुप रहता हूं; क्योंकि सच तो यह है कि टिकोले सिर्फ याद नहीं आते, वे भीतर कहीं अब भी लटके हुए हैं। मन की किसी ऊंची डाल पर। यह अलग बात है कि उस डाल तक पहुंचने के लिए अब कोई पत्थर काम नहीं आ सकता। बस शब्द ही आम के पेड़ की उस ऊंचाई तक पहुंचने की सीढ़ी बन सकते हैं। बचपन को याद करता हूं तो वह मोतिया गांव की धूल, टिकोले की गंध और दोपहर की लू में घुला-मिला सा दिखता है।

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एक उत्सव थी गांव की वह दुपहरिया 
उन दिनों हमारे लिए वक्त की जो रफ्तार थी, उसे गोड्डा से भागलपुर जाने वाली राज्य ट्रांसपोर्ट की बस 'क्रेक मेल' तय करती थी। दोपहर के डेढ़ बजे जब वह गांव के बगल से और आम के बगीचे के बेहद करीब से गुजरती, तो लगता जैसे समय का कोई पहिया घूम गया हो। उसके ड्राइवर हमारे बगल के गांव डुमरिया के थे। सड़कें भले खाली रहती हों, पर ड्राइवर साहब को हॉर्न बजाने की लत-सी थी, जैसे वह हवा में अपनी मौजूदगी का हस्ताक्षर कर रहे हों। वह बस भले बरसों से 'लेट' रही हो, लेकिन हमारे लिए उसकी आवाज समय की पुकार थी। हॉर्न बजता और हम चौकन्ने हो जाते। तब मोतिया गांव की वह दुपहरिया एक उत्सव थी हम जैसे बच्चों के लिए, जिन्होंने लू को दुश्मन नहीं, एक अवसर माना हो। लू चलती, तो घरों के भीतर बड़े-बूढ़े अपने-अपने 'निजी संविधान' और 'बंदिशों' के साथ सो जाते कि कोई बच्चा बाहर नहीं जाएगा। यह आदेश हर साल जारी होता था और हर साल टूट जाता था।

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खट्टे टिकोले और नमक का 'कॉम्बो' 
हर घर में मां समझती थीं कि बच्चा सो रहा है। बच्चा समझता था कि मां सो रही हैं।  इस पारस्परिक भ्रम ने गांव के बगीचों को बरसों तक आबाद रखा। वैसे आज भी भारतीय परिवारों की आधी शांति इसी गलतफहमी पर टिकी हुई है। मोतिया गांव के उस पुराने बगीचे में जब हम दोपहर की लू में घुसते थे, तो वह चोरी नहीं थी, वह एक 'अघोषित मौलिक अधिकार' था। घर वाले जिसे लू समझते थे, हम उसे 'साहस का तापमान' मानते थे। कभी-कभी ‘जागती हुई सोई’ दादी चिल्लाती थीं कि 'खट्टा आम नुकसान करेगा,' पर हमें पता था कि तबीयत खराब होना उस खट्टे टिकोले और नमक के 'कॉम्बो' के सामने बहुत छोटा निवेश है। वह देसी कच्चा आम, जिसे हम सब प्रेम से 'टिकोला' कहते थे, हमारे बचपन का पहला 'लोकतांत्रिक फल' था। उस पर न किसी का नाम लिखा होता था, न कोई खतौनी, न कोई नक्शा। पेड़ भले किसी का हो, पर उस पर लगा वह टिकोला हमारा था। कम से कम हम ऐसा मानते थे, और बचपन में मान लेना ही असली अधिकार होता है। 

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गांव में श्रम-विभाजन का सफल मॉडल
देसी आम के उस बगीचे जाने वाली बाल टोली में हमारे बीच कई विशेषज्ञ थे। एक था सागर। पत्थर मारने वाला। उसे आप देखते तो यही कहते कि वह कोई लड़का नहीं, चलती-फिरती गुलेल है। उसका निशाना इतना सटीक होता था कि तब लगता था कि वह बड़ा होकर बहुत बड़ा निशानेबाज बनेगा। उसका एक भी वार बेकार नहीं जाता था। पत्थर फेंकता, और टिकोला नीचे। फिर, वह ऐसे इतराता, जैसे गांव की अर्थव्यवस्था उसी के भरोसे चल रही हो। दूसरा था नवीन। वह डाल पर ऐसे फुदकता था कि गिलहरी भी शरमा जाए। वह ऊपर पेड़ की फुनगी पर पहुंचकर जब नीचे खड़े हम जैसे सामान्य बालकों को देखता, तो उसके चेहरे पर वही 'सात्विक अहंकार' होता, जो पढ़ाई के लिए मिट्टी का तेल देने वाले डीलर विनय भैया के चेहरे पर हम लोगों ने बार-बार अनुभव किया था। नवीन सीधे कार्रवाई में विश्वास रखता था और वही आम तोड़ता, जो खाने के काबिल हो। गांव में श्रम-विभाजन का यह सबसे सफल मॉडल था, जिसे किसी विश्वविद्यालय ने अब तक पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया।

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नमक की पुड़िया थी हमारी आर्थिक नीति 
देसी आम कच्चे हों तो बेहद खट्टे होते हैं। बहुत बड़े भी नहीं होते। अचार बनाने के लिए उपयुक्त। गुठली बड़ी। आम छीलने के लिए जर्दे के टीन के डब्बे का ढक्कन का इस्तेमाल होता। यह विभाग बाल सखा प्रमोद पाठक के जिम्मे था। हर चीज का पुनर्चक्रण हम लोगों की विशेषता थी। तब नमक की पुड़िया हमारी आर्थिक नीति थी। कम साधन में अधिक आनंद। दोपहर में बगीचे की रखवाली करने वाले श्यामसुंदर सिंह अक्सर सोए मिलते थे, कई बार जागे हुए भी। जब वह जाग रहे होते, तब कुछ बच्चों की ड्यूटी उन्हें गपशप में फंसाए रखने की होती थी। आज लगता है, क्या सचमुच वह सोए रहते थे, या सोने का नाटक करते थे, क्योंकि अगर वह पूरी सख्ती से रखवाली करते, तो आधे गांव का बचपन निश्चित रूप से बेरोजगार हो जाता।

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बाकी बच्चे, जिनमें मैं भी शामिल था, जमीन पर खड़े रहकर इस पूरी प्रक्रिया का लोकतांत्रिक समर्थन करते थे और टिकोला गिरते ही उसे अपने कब्जे में लेकर अपनी सक्रियता सिद्ध करते थे। पसीने से तरबतर होकर बगीचे में भटकते हुए हम सब को यह दिव्य ज्ञान मिल गया था कि जो चीज जमीन पर गिर जाए, उस पर सबसे पहले दावा करना चाहिए। तभी हम लोगों ने यह भी जान लिया था कि पसीने का ज्ञान से बहुत गहरा संबंध है। टिकोला हाथ में आते ही सिर्फ एक चुटकी नमक से पूरा बचपन खट्टा-मीठा हो जाता था। आजकल कई तरह के नमक बाजार में मिलते हैं - काला, सेंधा, हिमालय वाला, आयोडीन वाला और भी कई प्रकार के। मगर, उस समय जो नमक टिकोले पर लगता था, उसका स्वाद किसी कंपनी ने आज तक नहीं बनाया। नमक की पुड़िया खुलती, और टिकोला उसमें डुबोकर खाते ही चेहरा ऐसा बनता, जैसे किसी ने सच बोलने को कह दिया हो। आंखें सिकुड़तीं, पर हाथ रुकता नहीं था।

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बगीचे की गंध, वह अमराई की छांव 
बड़ों की आहट मिलते ही हम सब ठिठक जाते थे। धड़कनें तेज हो जाती थीं। वह भागना असल में समय को पीछे छोड़ देने की कोशिश थी। बगीचे की वह गंध, वह अमराई की छांव और पसीने से भीगी वह दुपहरिया आज भी स्मृतियों के किसी कोने में धक-धक करती है। जैसे कोई बच्चा आज भी हाथ में पत्थर लिए उस पुराने पेड़ की सबसे ऊंची टहनी को ताक रहा हो, जहां उसका सबसे प्यारा टिकोला लटका है। 

अब देसी नहीं, हाइब्रिड आम का चलन 
अब जमाना बदल गया है। अब देसी नहीं, हाइब्रिड आम का चलन है। आम के पेड़ों पर मंजर आते ही बगीचे पर पहरा बैठ जाता है। अब टिकोला तोड़ना अपराध की श्रेणी में आता है, और बचपन एक संदिग्ध गतिविधि। लड़के अब पेड़ पर नहीं चढ़ते। वे मोबाइल पर स्क्रॉल करते हैं, जहां हर चीज पहले से टूटी हुई मिल जाती है।

कभी-कभी लगता है, टिकोले खत्म नहीं हुए, बस, उनका लोकतंत्र खत्म हो गया है। हम उस पीढ़ी के लोग हैं, जिन्होंने आम खरीदा नहीं, हासिल किया था। पत्थर मारकर। दौड़कर। डांट खाकर। नमक लगाकर। सच पूछिए तो जीवन का असली स्वाद भी वही था - थोड़ी-सी चोरी, थोड़ी-सी मस्ती, थोड़ी-सी खटास और एक चुटकी नमक। इसलिए, आज उम्र के इस मोड़ पर इच्छाओं की लंबी सूची में एक चीज और जुड़ गई है, वह पुराना पत्थर, जिसे हाथ में लेते ही लगता था कि दुनिया की सबसे ऊंची डाल भी ज्यादा दूर नहीं।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
 
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