सावन की दस्तक के साथ भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों का लोक बदलने लगता है। पूरे अंग प्रदेश की धरती बिहुला-विषहरी पूजा की आहट से गुंजायमान होने लगती है। यह आहट धीरे-धीरे उत्सव में बदल जाती है। भारत के सोलह महाजनपदों में शुमार यह अंग प्रदेश इतिहास की गहराइयों में रचा-बसा है। इसका पहला उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है, बौद्ध ग्रंथों में भी इसका नाम दर्ज है, और महाभारत के अनुसार आज के भागलपुर, मुंगेर, संथाल परगना (झारखंड) तथा पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से इसी भूभाग का हिस्सा थे, जिसकी राजधानी चंपा थी और जिसके सिंहासन पर कभी महावीर कर्ण विराजमान हुए थे।
विषहरी और मनसा देवियों की मान्यता
अंग के प्रमुख उत्सव के रूप में बिहुला-विषहरी की पूजा आज भी होती है। लोक का मानना है कि विषहरी शिव की मानस पुत्री हैं, जो पांच बहनों में सबसे बड़ी हैं; फिर मैना, दिति, जया और पद्मा हैं। भगवान शिव की जटा से इनका जन्म होने के कारण लोक मान्यताओं में ये पांच देवियां शिव की मानस कन्या यानी मनसा के नाम से पुकारी जाती हैं। इस लोक कला में चित्र पहले नहीं बनता। पहले लोककथा जन्म लेती है। रंग बाद में आते हैं।
इस उत्सव में कहीं बांस की मंजूषा गढ़ी जा रही होती है, तो कहीं कूची में गुलाबी, पीले-हरे रंग घुल रहे होते हैं। कोई बच्चा नाग की लहरदार देह बनाना सीख रहा होता है, तो कोई बुजुर्ग बिहुला की कथा सुनाते हुए आंखों में विश्वास भर रहा होता है। यही मंजूषा कला की सबसे बड़ी पहचान है।
भारत की कई लोककलाएं प्रकृति, ऋतुओं या देवी-देवताओं से जुड़ी हैं। लेकिन, मंजूषा कला एक पूरी लोकगाथा के भीतर सांस लेती है। उसका हर रंग, हर रेखा और हर आकृति बिहुला-विषहरी की कथा का एक शब्द है। इसलिए, मंजूषा को समझना केवल चित्र समझना नहीं है। यह अंग प्रदेश की लोक-चेतना को पढ़ने जैसा है।
चांदो सौदागर और बिहुला की अमर गाथा
लोककथा कहती है कि भागलपुर के अनन्य शिव भक्त सौदागर चांदो को सपने में विषहरी देवी ने अपनी और चारों बहनों की पूजा करने को कहा। पूजा के दौरान नाग देवी विषहरी के साथ ढेर सारे केंचुए, छिपकली, केकड़े, मेंढक और अन्य कीट-पतंगे भी आ गए, जिससे खिन्न होकर चांदो ने पूजा करना स्वीकार नहीं किया। क्रोधित विषहरी ने सर्पदंश से उनके पुत्रों को मार डाला, और विवाह की पहली रात उनके सबसे छोटे बेटे बाला की भी सर्पदंश से मृत्यु हो गई।
बाला की पत्नी बिहुला ने मृत्यु को अंतिम सत्य नहीं माना। उसने बांस और कागज की मंजूषा बनवाई। उसमें पति को रखा। चंपा नाला से होते हुए गंगा की धारा पर देवताओं के लोक तक निकल पड़ी। उसके प्रेम, तप और विश्वास से देवता पिघल गए और बाला को जीवनदान मिल गया। उनकी पत्नी सती बिहुला के नाम से जानी गईं और तब से विषहरी की पूजा पूरे अंग प्रदेश में प्रतिष्ठित हो गई।
ऐसा कहते हैं कि उस यात्रा में जो नाव का उपयोग किया गया था, वह मंजूषा के आकार की थी। उस नाव पर चित्र उकेरने का काम लहसन नामक माली ने किया था। वही चित्र आगे मंजूषा कला की पहचान बने।
मंजूषा कला के प्रतीक और व्याकरण
मंजूषा कला का अपने प्रतीक और अपना ही व्याकरण है। चम्पापुरी को चम्पक पुष्प के पेड़ से पहचाना जाता है, चांदो सौदागर की पहचान पगड़ी और चन्द्रकार तिलक है, बाला को उस पुरुष-आकृति से दर्शाते हैं, जिसके पैरों के पास मुंह खोले सर्प का चित्र हो। इंद्र को दाएं हाथ में कड़कती बिजली थामे आकृति से दर्शाया जाता है। बिहुला खुले बालों में मंजूषा या नागिन के साथ दिखाई देती हैं, तो विषहरी देवी के एक हाथ में कलश और दूसरे हाथ में सर्प, या दोनों हाथों में सांप के प्रतीक दिख सकते हैं। वहीं, देवी मैना के दाहिने हाथ पर मैना बैठी होती है।
इस कला की रेखाएं सांप की तरह लहराती-बलखाती आगे बढ़ती हैं। मंजूषा में मानव आकृतियां अंग्रेजी के ‘एक्स’ जैसी बनती हैं और कुछ पात्रों को छोड़कर प्रायः एक आंख वाली होती हैं। मानव आकृतियों की आंखें बड़ी होती हैं और चेहरे के साथ कान नहीं होते। मर्द आकृति मूंछ और शिखा से पहचानी जाती है और महिला की पहचान छाती के उभार के लिए दो वृत बनते हैं। पुरूष की गर्दन मोटी होती है और स्त्री की पतली। गर्दन बनाने के लिए आधे वृत की तरह कई रेखाएं खींची जाती हैं। फिर भी मंजूषा का यह व्याकरण हिंदी के व्याकरण जैसा अडिग नहीं है।
सदियों की यह परंपरा कुछ खोकर, कुछ नया पाकर बहती रही है, क्योंकि लोक-कला बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढालना बखूबी जानती है। लोक का एक स्वाभाव यह भी है कि जो छूट गया, उसे कौन याद रखे। पर, इतने बदलावों के बीच भी इसकी आत्मा नहीं बदली। इसकी रेखाएं हिचकिचाती नहीं, वे बहती हैं; शरीर सरल रेखाओं से रचा जाता है, पर भाव सदा गहरे रहते हैं।
नाग से नाव तक हर प्रतीक की अपनी भाषा
मंजूषा कला में नाग केवल सर्प नहीं हैं, बल्कि वे जीवन और मृत्यु के बीच का सेतु हैं। बिहुला केवल स्त्री नहीं, लोक की अदम्य आस्था है। नाव केवल यात्रा नहीं, संघर्ष का प्रतीक है। मंजूषा केवल बांस की पेटी नहीं। यह स्मृतियों का घर है, जहां लोक अपने विश्वास सुरक्षित रखता आया है।
यहां यथार्थ से ज्यादा प्रतीक का महत्व है। हर पात्र अपनी पहचान लिए रहता है। नाग, सूर्य, चंद्र, कमल, बांस, लहर, बेल और फूल मिलकर चित्र की भाषा बनाते हैं। इस कला में खाली जगह प्रायः नहीं छोड़ी जाती। पूरा फलक बेल-बूटों, नागों, फूलों और लहरदार रेखाओं से भर जाता है। यह सजावट नहीं, बल्कि लोक का स्वभाव है।
ज्यादातर लोक कलाओं का यही स्वाभाव है कि उसके कैनवास पर खाली जगह लगभग न के बराबर होती है। मंजूषा के रंगों का भी अपना व्याकरण है। गुलाबी जीवन और उल्लास का रंग है, तो पीला मंगल और श्रद्धा का। हरा रंग धरती की हरियाली, उर्वरता व नए जीवन का प्रतीक है, जो चित्र की लय रचता है। कहीं-कहीं गुलाबी जीवन की ऊर्जा और उत्सव का स्पर्श देता है। ये रंग प्रकृति की नकल नहीं करते, बल्कि लोक के विश्वासों को दृश्य रूप देते हैं।
जब तक लोक है, तब तक रहेगी मंजूषा
मंजूषा के चित्र देखते हुए लगता है जैसे कोई लोकगीत आंखों के सामने खुल रहा हो। रेखाएं गाती हैं। रंग बोलते हैं। आकृतियां कथा सुनाती हैं। यह कला कभी केवल चित्रकला नहीं रही। यह लोक-स्मृति की जीवित परंपरा बनी रही। आज इस कला को सिर्फ दीर्घाओं तक पहुंचाने से अधिक जरूरत इसे सहेजने और घरों में फिर से स्थापित करने की है। तभी हर साल त्योहारों में बांस की मंजूषा पीढ़ी दर पीढ़ी सजती रहेगी।
वैसे लोक-कला और लोक संस्कृति की यह प्रकृति होती है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती रहती है। लोक-कला तब तक जीवित रहती है, जब तक वह लोक के जीवन में रहती है। मंजूषा आखिर रंगों से बनी एक कथा ही तो है। ऐसी कथा जो सदियों से भागलपुर और उसके आसपास की मिट्टी, गंगा की धारा और अंग प्रदेश की स्मृतियों में बहती चली आ रही है। शायद यह लोक की उदारता भी है कि बिहुला के हठ, उसकी आस्था और जिजीविषा को याद रखने के लिए अंग प्रदेश का लोक हर साल बिहुला-विषहरी पर्व मनाता है।
लोक को जब भी बिहुला याद आती हैं, तो साथ में पूजी जाती हैं विषहरी। जब भारतीय लोग श्रावण शुक्ल पंचमी को ब्रह्मा द्वारा शेषनाग को दिए गए वरदान और प्रसाद के स्मृति पर्व के रूप में नागपंचमी मना रहे होते हैं, तो उस समय अंग प्रदेश में बिहुला-विषहरी की पूजा को एक उत्सव के रूप में देखते हैं लोग। इस उत्सव में रंग भरती है मंजूषा कला।
चक्रवर्ती देवी की अनमोल विरासत
वर्ष 1999 में चम्पानगर की चर्चित लोककलाकार चक्रवर्ती देवी से इस लेखिका की भेंट हुई, जिन्होंने मंजूषा कला को अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समर्पित कर दिया था। उन्हें रंग भरने के लिए कभी पेंसिल स्केच की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उन्हीं के बताए व्याकरण पर आगे का काम टिका रहा। समय के साथ इस शैली में भी बदलाव आया। पहले जहां रेखाएं सिर्फ बिहुला-विषहरी की कथा कहती थीं, वहीं अब उसी ग्रामर और तीन रंगों के माध्यम से कई अन्य लोककथाएं भी कही जाने लगी हैं, बशर्ते रंगों और रेखाओं का मूल व्याकरण न बिगड़े।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अगस्त 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)