भात की पहली ध्वनि कब सुनी? भात से हमारा पहला परिचय किसी थाली, किसी होटल, किसी विवाह-भोज से नहीं, एक लोरी गीत से हुआ। दादी-नानी की गोद में लेटे हम सुनते थे -
चंदा मामा, आरे आवा,
पारे आवा, नदिया किनारे आवा,
सोने के कटोरवा में
दूध-भात ले के आवा।
बबुआ के मुंह में घुटूक...!
घुटुक-घुटुक!
इस लोरी के साथ ही सोने-सी चमकती कटोरी में दूध-भात हमारे मुँह तक आता था। गीत में चंदा मामा, तो नदिया के पार से आते थे। पर दूध-भात यहीं घर की रसोई से आता था। गाढ़े, ललछाहूँ दूध में डूबा, दादी की उंगलियों से ठंडा होकर जिह्वा तक पहुंचता। भात यहां सिर्फ अन्न नहीं था; यह लोरी की ताल और गोद का विस्तार और दादी की उंगलियों के स्पर्श से बुनी हुई सुरक्षा की अनुभूति था।
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भात यूं ही जीवन में शामिल हुआ और हम 'भतहा' कहे जाने लगे। यह हमारी पहचान है, जैसे माटी की अपनी गंध होती है। ‘भतहा’, यानी भात खाने वाले लोग।
धान का अंकुर मिट्टी में जब अंकुरित होता है, तब वह केवल अन्न नहीं होता, सभ्यता का बीज होता है। धान से चावल और चावल से भात की यात्रा जितनी कृषि की है, उतनी ही संस्कृति की भी। भात सुपाच्य है - तरकारी स्वाद न दे, भात देगा। दाल पतली हो या गाढ़ी, भात रंग जमा देगा। साग मिले, तो भात संग मेल। भुजिया जैसी सूखी चीज भी, भात संग जमती है। माढ़-भात तो अपने आप में विशेषण है।
बचपन की स्मृतियां याद आती हैं। सुबह एक बार हम भर पेट भात खाते। स्कूल जाने से पहले। फिर, स्कूल से वापस आने पर दूध-भात। कभी प्याज की भुजरी, लाल मिर्च के अचार या टमाटर की भुजरी के साथ, कभी सत्तू या तीसी के साथ। समोसा-भात खाने की बालसुलभ जिद भी थी। इसमें भात किसी चटपटे स्वाद के साथ अलहदा स्वाद जिह्वा पर छोड़ जाता था।
भारत का भूगोल और भात
भारत का भूगोल भात के बिना अधूरा है। उत्तर से दक्षिण तक, जहां जल है, वहां धान है। असम में घी-भात, बंगाल में माछ-भात, ओडिशा में पखाल भात, दक्षिण में दही-भात, बिहार में कढ़ी-भात, सब एक ही संगीत के भिन्न राग हैं। हर क्षेत्र का भात अपने लोक सत्व में पका-सीझा है। यह केवल मनुष्यों का नहीं, देवताओं का भी अन्न है। वृंदावन के कान्हा, ग्वाल-बालकों संग कढ़ी-भात और अचार हथेली पर रखकर खाते हैं। वही सादगी, वही आत्मीयता, जिसके लिए भात जाना जाता है। बालक राम भी माखन और ओदन (दूध-भात) से मुख लपटाते हैं।
शायद यही दृश्य मानस की चौपाई में भी उतरता है-
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥
यह दृश्य केवल बाल-लीला नहीं, एक सांस्कृतिक संकेत है कि दिव्यता को सरल भात से अधिक और कुछ नहीं चाहिए।
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जनकपुर में जब राजा जनक, अपने अतिथि दूल्हे राम और बारातियों को सबसे पहले दाल, भात और घी परोसते हैं, तो यह केवल आतिथ्य नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कार की घोषणा है। देवता यदि मनुष्यों के निकट हैं, तो भात की उसी थाली पर, जिसमें प्रेम और आस्था साथ बैठते हैं। असम में घी-भात का पहला कौर लेते हुए भी लोग मानो यही अनुभव करते हैं कि यह केवल भोजन नहीं, ईश्वर की कृपा का भोग है।
आखिर, भात की जड़ें कहां हैं? प्राच्य जीवनशैली का उद्गम ब्रीहि संस्कृति में है। वही संस्कृति, जिसमें अन्न उत्सव है, श्रम पूजा है और जल-मिट्टी का संबंध सृजन का केंद्र। ब्रीहि यानी धान और थाल में भरा ओदन और पाली का भत्त ही आधुनिक आर्य भाषाओं में भात बनकर सामने आता है। दूर्वा, हल्दी और अक्षत के अर्पण की पवित्रता भी इसी ब्रीहि-आधारित संस्कार की देन है। अक्षत यानी टूटा न हुआ चावल अनंतता, अखंडता और समृद्धि का प्रतीक है। कुल या गोत्र के शुद्धि अनुष्ठान में भात वह अर्पण बनता है, जो देह की भूख से आगे बढ़कर आत्मा की तृप्ति तक जाता है।
भात का सामाजिक संबंध
भात में समाज सांस लेता है। पूर्वांचल में भात को ‘कच्ची रसोई’ कहते हैं, जिसे केवल उसके साथ साझा करते हैं, जो अपना खून हो, हमारा विशेष आत्मीय हो, हमारा ‘भवद्द’। इसीलिए, उसे हम ‘भात का भवद्द’ कहते हैं। यह भरोसे और आत्मीयता का रिश्ता है।
घर में किसी की मृत्यु हो, तीर्थ से वापसी हो या कोई पारिवारिक आयोजन - जब तक भात के भवद्द से नूने यानी नमक नहीं मिल जाते तब तक आयोजन पूर्ण नहीं होता। जैसे यज्ञ की पूर्णाहुति अंतिम आहुति से होती है, वैसे ही सामाजिक आयोजन की पूर्णता उस थाली से होती है, जिसमें भात और नमक भवद्द के साथ साझा किए जाते हैं।
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भात यहां केवल भोजन नहीं, एक ही स्वाद और एक ही लवणता में अपनापा अपनी मुहर लगाता संबंधों की पुनर्पुष्टि का माध्यम है।
धान की बालियां जब खेत में झूमती हैं, तो उनमें नमी, धूप और प्रतीक्षा के धागे एक साथ लहराते हैं। ओदन बनने की प्रक्रिया, जल, अग्नि और वायु के संतुलन का साक्ष्य है। यह धरती के पंचमहाभूतों का सस्वर संवाद है, जो रसोईघर की भाप बनकर ऊपर उठता है।
किसान जब भात का पहला कौर खाता है तो उसमें अपने श्रम की मिठास और वर्षों की आशा का सार होता है। उसकी थाली में भात नहीं, फसल का आशीर्वाद होता है। एक भूखे राहगीर की थाली में थोड़ा भात, नमक और प्याज हो तो वह राजभोज से अधिक तृप्त होता है, क्योंकि भात याद दिलाता है कि जीवन का रस सादगी में है, विलासिता में नहीं।
चूल्हे की आंच और बटुले की भाप
भात की स्मृतियों में सबसे आगे रसोई नहीं, बल्कि वह गोद है, जिसमें दादी-नानी लोरी गाते हुए दूध-भात खिलाती थीं। चूल्हे की आंच, बटुले की भाप और कटोरी का किनारा मिलकर घर की परिभाषा बनाते थे। दही-भात की ठंडक से लेकर सत्तू-भात की तासीर तक हर व्यंजन मौसम का संवाद था। मां की वह आवाज - 'भात के अदहन, डभक गइल बा' - केवल रसोई का नहीं, बल्कि जीवन का सूत्रवाक्य है।
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शहर, नौकरी और स्वाद सब बदले; पर भीतर कहीं एक थरिया भात की चाह हमेशा वैसी ही बनी रही। हालांकि, गांव-घर छूटने के साथ महानगरों में ठिकाना है, जहां भात हाशिए पर जा रहा है। चमकदार मेन्यू कार्ड, पोषण तालिकाओं, पैकेज्ड फूड, मिलेट्स, क्विनोआ और पास्ता की चर्चाओं के बीच भात का स्वाद दब-सा गया है। लेकिन, जब शरीर थकता है, और मन टूटता है तो याद उसी पुराने साथी की आती है - 'कोई गरम-गरम भात दे दे।'
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आधुनिकता में भात 'राइस' बनता जा रहा है। थाली का घरेलू ओदन अब प्लेट पर लेमन राइस, फ्राइड राइस और जीरा राइस बनकर सज गया है। इनमें स्वाद है, पर वह अपनापन नहीं, जो भूजल से सिंचे देसी भात में था। बसिया भात को अंगीठी की धीमी आंच पर तेल-नमक और हरी मिर्च के साथ भूंजकर खाने की परंपरा अब लोक स्मृति से विस्मृत होती जा रही है। गैस और माइक्रोवेव की जल्दबाजी में न वह धुआं बचा है, न वह धैर्य। अब बचा राइस सीधे फ्राइड राइस या कूड़ेदान का रास्ता पकड़ लेता है - भात को दूसरी जिंदगी देने वाली लोक-बुद्धि कहीं खोती जा रही है।
रसोई में चुपचाप पक रहा है भात
वह गांव, जहां अलग-अलग खेत के धान का भात और भुजिया का धुआं मिलकर अनकहा स्वाद रचते थे, अब केवल यादों में शेष है। पर, स्मृति का काम ही है, जो वर्तमान से छूट रहा हो, उसे भीतर सुरक्षित रख लेना। इसी भरोसे पर भात आज भी किसी न किसी रसोई में चुपचाप पक रहा है। शायद इंतजार कर रहा है कि कोई फिर से उसे ‘राइस’ नहीं, उसके असली नाम से पुकारे, ‘भात परोस द न, तनिक गरम-गरम।’
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भात केवल पेट नहीं भरता, मन भरता है। इसमें धर्म है, संस्कार है, प्रेम है, स्मृति है। किसान का स्वप्न झिलमिलाता है। मां का स्नेह उबलता है। दादी-नानी की लोरियाँ गूँजती हैं और ‘भात के भवद्द’ की हँसी बिखरी रहती है। भात, हमारी उन जड़ों की गवाही है, जो हर युग में मिट्टी से जुड़ी रहती हैं, चाहे वृंदावन की गलियां हों, असम के खेत हों, जनकपुर का राजमहल हो या हमारे अपने गांव का आंगन, जहां भी जीवन में भात है, वहां भारत है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अप्रैल 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)