विज्ञापन
Home› Gaon Post› Drishtikon› From Flood To Resource How Village Water Budgets Can Make Rural India Drought Proof

बाढ़ को बनाएं बरकत की सीढ़ी : गांव-गांव जल बजट से सधेगी सूखे की चुनौती, पानीदार बनेगा ग्रामीण भारत

पी.एस. ओझा, पूर्व राज्य समन्वयक, यू.पी. राज्य जैव-ऊर्जा विकास बोर्ड Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 20 Oct 2026 05:27 PM IST
सार

बाढ़ व सूखा पानी की चुनौती के दो चेहरे हैं, जिसका समाधान बड़ी परियोजनाओं में नहीं, बल्कि गांवों की सक्रिय भागीदारी में छिपा है। पंचायतें जल-बजट बनाएं, महिलाएं व किसान जल-प्रहरी बनें और बाढ़ के अतिरिक्त पानी को सूखे का सामना करने के लिए सहेजा जाए, तो गांव जल-सुरक्षित और जलवायु-सहनशील बन सकते हैं।

असमान बारिश, भूजल के बेतहाशा दोहन, सिकुड़ते जलस्रोतों और तालमेल की कमी से संकट गहराया है।
असमान बारिश, भूजल के बेतहाशा दोहन, सिकुड़ते जलस्रोतों और तालमेल की कमी से संकट गहराया है। - फोटो : गांव जंक्शन
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जल मानव जीवन, कृषि, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास का आधार है, मगर भारत के सामने एक विचित्र विडंबना खड़ी है। कहीं पानी की अधिकता बाढ़ बनकर तबाही लाती है, तो कुछ ही महीनों बाद वही क्षेत्र सूखे और जल के अभाव से जूझने लगते हैं।

वर्षा का असमान वितरण, भूजल का अंधाधुंध दोहन, जलस्रोतों का क्षरण और विभागीय समन्वय की कमी इस समस्या को और गहरा बना रही है। जरूरत इस बात की है कि हम इस विरोधाभास को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखें। इसके लिए सरकारी योजनाओं से आगे बढ़कर जनभागीदारी को केंद्र में लाना होगा।

ये भी पढ़ें : उत्तर प्रदेश में बाढ़ का स्थाई समाधान - बांस, वेटीवर और कृषि-वानिकी से सुरक्षित होंगे खेत, समृद्ध होंगे किसान

जल-तनाव की सच्चाई समझनी होगी
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता वर्ष 2021 में घटकर लगभग 1,486 घन मीटर रह गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार 1,700 घन मीटर से कम उपलब्धता को ही जल-तनाव की स्थिति माना जाता है। दूसरी ओर, घरेलू और बुनियादी जरूरतों के लिए हर व्यक्ति को प्रतिदिन 50 से 100 लीटर पानी चाहिए। ये आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि अब सिर्फ पानी उपलब्ध कराने से काम नहीं चलेगा। पानी को बचाना, उसे संजोना और न्यायसंगत ढंग से बांटना उतना ही जरूरी हो गया है।

ये भी पढ़ें : एफपीओ नेटवर्क के जरिये पराली प्रबंधन से ऊर्जा उत्पादन के साथ बढ़ सकती है किसानों की आय

बाढ़-सूखे का विरोधाभास तोड़ना होगा
एक ही क्षेत्र में बाढ़ और सूखे का कुचक्र बीते कुछ वर्षों में बढ़ा है। गंगा बेसिन जैसे क्षेत्रों में यह विडंबना सबसे स्पष्ट दिखती है। वर्षा ऋतु में नदियां उफनती हैं, फसलें डूबती हैं, सड़कें-पुल टूटते हैं और पेयजल स्रोत दूषित हो जाते हैं। लेकिन, रबी की सिंचाई के समय तक भूजल स्तर इतना गिर जाता है कि नलकूप भी साथ छोड़ देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठाना जरूरी है कि क्या बाढ़ के समय बहकर व्यर्थ जाने वाले पानी को सुरक्षित रखकर सूखे के महीनों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता? यही सोच भविष्य की जल नीति की नींव बननी चाहिए।

बाढ़ नियंत्रण नहीं, प्रबंधन जरूरी
बड़े बांध और तटबंध ही बाढ़ का इकलौता जवाब नहीं हो सकते। गांव के स्तर पर समुदाय खुद कई काम कर सकता है। बाढ़-प्रवण क्षेत्रों का सामुदायिक मानचित्रण, नालों और जलनिकासी मार्गों की नियमित सफाई, तालाबों व प्राकृतिक जलधारण क्षेत्रों का संरक्षण और बाढ़ से पहले ही सुरक्षित पेयजल स्रोतों की पहचान इन कामों में शामिल हैं। बाढ़ के बाद कुओं की सफाई और जल गुणवत्ता जांच को भी गांव की दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। इससे समुदाय सिर्फ राहत लेने वाला नहीं, बल्कि आपदा-प्रबंधन का सक्रिय भागीदार बनेगा।

ये भी पढ़ें : कार्बन सिंक निर्माता बनेंगे किसान, जागरूक होकर जलवायु परिवर्तन से लड़ेंगे जंग, साथ में कमाई भी करेंगे

पानी की हर बूंद का होना चाहिए हिसाब
सूखा सिर्फ कम बारिश का नतीजा नहीं, बल्कि मिट्टी की नमी, भूजल स्तर और स्थानीय जल-प्रबंधन की कमी का मिला-जुला असर है। भारत के शुद्ध सिंचित क्षेत्र का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा भूजल पर निर्भर है, इसलिए इसका अंधाधुंध दोहन खतरनाक साबित हो सकता है।

नए ट्यूबवेल खोदने के बजाय खेत-तालाब, चेकडैम, परकोलेशन टैंक, पुराने तालाबों का पुनर्जीवन और ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाना कहीं अधिक टिकाऊ रास्ता हो सकता है। हर गांव अपना जल-बजट बनाए और इसका हिसाब रखे कि कितना पानी उपलब्ध है, कितना खर्च हो रहा है और कितना पुनर्भरित किया जा सकता है। यही जल-अनुशासन की पहली सीढ़ी होगी।

ये भी पढ़ें : टिकाऊ पर्यावरण और 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की कुंजी किसानों के हाथ

सिर्फ नल नहीं, टिकाऊ जलस्रोत चाहिए
स्वच्छ पेयजल की चुनौती सिर्फ घर तक पाइप पहुंचाने से हल नहीं हो सकती। पर्याप्त मात्रा, तय गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति तीनों साथ चलने चाहिए। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन जैसे तत्वों के साथ ही सतही जल में जैविक प्रदूषण की आशंका भी बनी रहती है। इसलिए, गांव के स्तर पर ही नियमित जल गुणवत्ता जांच को अनिवार्य बनाना होगा। साथ ही, पंप, पाइपलाइन और बिजली आपूर्ति के रखरखाव की जिम्मेदारी भी स्थानीय स्तर पर तय करनी होगी।

ग्राम पंचायत बने जल सुरक्षा की धुरी
हर गांव में ग्राम पंचायत या ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति को जल सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। वार्षिक जल-बजट तैयार करना, सभी जलस्रोतों का रिकॉर्ड रखना, भूजल स्तर की निगरानी करना, पेयजल गुणवत्ता की नियमित जांच कराना और बाढ़-सूखा दोनों के लिए पहले से आकस्मिक योजना बनाना - ये सब काम पंचायत स्तर की नियमित कार्ययोजना का हिस्सा बनने चाहिए, तभी जल प्रबंधन सरकारी योजना से आगे बढ़कर सच्चे अर्थों में ग्राम विकास योजना का प्रभावी हिस्सा बन पाएगा।

ये भी पढ़ें : ग्रामीण भारत में जैविक अपशिष्ट प्रबंधन - समर्पित बायोमास नीति से कचरा बनेगा कंचन, स्वच्छ-समृद्ध होंगे गांव

महिलाओं को जल सुरक्षा की जिम्मेदारी
पानी की कमी और गुणवत्ता का सबसे सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। इसलिए, उन्हें जल प्रबंधन में सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका देनी चाहिए। प्रशिक्षित महिलाएं फील्ड टेस्टिंग किट से पानी की जांच कर सकती हैं और दूषित जल की सूचना दे सकती हैं। महिलाएं स्कूलों व आंगनवाड़ी केंद्रों में हाथ धोने, साफ-सफाई और स्वच्छ पानी के इस्तेमाल जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकती हैं। जल जीवन मिशन के तहत कई राज्यों में महिलाओं को इस दिशा में पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। अब जरूरत इस मॉडल को हर गांव तक पहुंचाने की है।

किसान और एफपीओ बनें जल-प्रहरी
खेती पर जल संकट का सबसे गहरा असर पड़ता है, इसलिए किसानों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को जल प्रबंधन में सक्रिय भागीदार बनाना जरूरी है। फसलों में पानी की जरूरत का सही आकलन, सामूहिक सूक्ष्म सिंचाई, जल-बचत तकनीकों का प्रशिक्षण और फसल विविधीकरण जैसे कदम एफपीओ के माध्यम से आसानी से लागू किए जा सकते हैं। स्वयं सहायता समूह भी जल गुणवत्ता, स्वच्छता और घरेलू जल संरक्षण की जागरूकता फैलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इससे जल संरक्षण को आजीविका से भी जोड़ा जा सकेगा।

ये भी पढ़ें : डिजिटल गांव - फार्मर आईडी से मिलेगी खेती को नई पहचान, 10.31 करोड़ किसान हो चुके पंजीकृत

बाढ़ का पानी बने सूखे का सहारा
भारत की जल नीति में सबसे बड़ा बदलाव यही होना चाहिए कि बाढ़ के अतिरिक्त पानी को सूखे के समय काम आने वाला संसाधन बनाया जाए। किसी ऐसे गांव की कल्पना कीजिए, जहां अत्यधिक बारिश का पानी सीधे नदी में बहने के बजाय खेत-तालाबों और सामुदायिक पुनर्भरण संरचनाओं में पहुंचे, वहां से भूजल पुनर्भरित हो और बाद में सिंचाई-पशुपालन में काम आए। निचले इलाकों में मत्स्य पालन और अन्य एक्वाकल्चर गतिविधियों को जोड़कर किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया भी दिया जा सकता है। इस तरह, बाढ़ और सूखे का साझा समाधान हो सकता है।

योजनाओं के अभिसरण से सफलता 
जल संकट किसी एक विभाग या योजना से हल नहीं हो सकता। पेयजल के लिए जल जीवन मिशन, वर्षा जल संचयन के लिए जल शक्ति अभियान, जलग्रहण विकास के लिए मनरेगा, कृषि जल दक्षता के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और आजीविका के लिए स्वयं सहायता समूह और एफपीओ - सभी को मिलाकर हर ग्राम पंचायत के लिए एक इंटीग्रेटेड विलेज वाटर सिक्योरिटी प्लान तैयार किया जाए तो जल सुरक्षा की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

ये भी पढ़ें : पुआल से बनेगा बायोचार, मिट्टी की सेहत सुधरेगी, कार्बन क्रेडिट से बढ़ेगी किसान की कमाई

जल-आंदोलन से बनेगी बात 
भविष्य की जल नीति को सिर्फ सरकारी परियोजनाओं की कड़ी नहीं, बल्कि जनभागीदारी आधारित जल आंदोलन का रूप देना होगा। हर पंचायत में जल-बजट बनाना चाहिए, जलस्रोतों का जीआईएस-आधारित रिकॉर्ड रखा जाए, नियमित जल गुणवत्ता जांच हो और महिलाओं-युवाओं को जल संरक्षण का स्थानीय प्रशिक्षक बनाया जाना चाहिए। बाढ़, सूखा और स्वच्छ पेयजल तीन अलग समस्याएं नहीं, बल्कि एक ही जल-तंत्र की परस्पर जुड़ी कड़ियां हैं। 

ये भी पढ़ें : अब AI करेगा खेतों की चौकीदारी, बीमारी और कीटों के प्रकोप से पहले ही किसानों को मिल जाएगा अलर्ट

यदि वर्षा के अतिरिक्त पानी को सहेजा जाए, भूजल का विवेकपूर्ण इस्तेमाल हो, तालाब पुनर्जीवित हों और हर गांव अपना जल-बजट खुद बनाए, तो जल संकट की तीव्रता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जल सुरक्षा सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि पंचायत, किसान, महिला, युवा और हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। बाढ़ के पानी को संकट नहीं, संसाधन बनाने की यह सोच ही भारत के गांवों को जल-सुरक्षित और जलवायु-लचीला बना सकती है।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)

 
विज्ञापन
विज्ञापन