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कार्बन सिंक निर्माता बनेंगे किसान : जागरूक होकर जलवायु परिवर्तन से लड़ेंगे जंग, साथ में कमाई भी करेंगे

पी.एस. ओझा, पूर्व राज्य समन्वयक और सदस्य संयोजक, यू.पी. राज्य जैव-ऊर्जा विकास बोर्ड Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 08 Sep 2025 08:23 PM IST
सार

किसान केवल अन्नदाता नहीं रहे, अब वे 'कार्बन सिंक निर्माता' बन रहे हैं। टिकाऊ खेती और वनीकरण अपनाकर किसान कार्बन को अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन से जंग में योगदान दे सकते हैं। साथ ही, कार्बन क्रेडिट अर्जित करके अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं। 

कार्बन क्रेडिट का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे, इसके लिए किसानों को जागरूक करना जरूरी है।
कार्बन क्रेडिट का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे, इसके लिए किसानों को जागरूक करना जरूरी है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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लवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए कार्बन क्रेडिट, सीक्वेस्ट्रेशन और कार्बन सिंक जैसे विषय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में छाए हैं। टिकाऊ खेती और वनीकरण जैसी गतिविधियां अपनाकर किसान कार्बन सिंक निर्माता बन सकते हैं, वे जलवायु परिवर्तन से लड़ने में अहम योगदान दे सकते हैं और कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त कमाई भी कर सकते हैं।

'कथा से क्रांति' शृंखला में सहारनपुर, शामली और हरिद्वार की किसान गोष्ठियों में एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक ने दावा किया कि उन्होंने अन्य राज्यों में किसानों को कार्बन क्रेडिट का लाभ दिलाया, पर कुछ गहन सवाल पूछे जाने पर वो जवाब नहीं दे पाए। इसलिए, किसानों को जागरूक करने के साथ ही फार्मर प्रोड्यूसर संगठनों को भी सही मार्गदर्शन की जरूरत है।

कार्बन क्रेडिट को ऐसे समझें किसान  
कार्बन क्रेडिट एक ऐसी प्रणाली है, जो ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन) का उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देती है।  
  • 1 कार्बन क्रेडिट का मतलब है- 1 टन कार्बन डाइऑक्साइड या समतुल्य ग्रीनहाउस गैस को वातावरण में जाने से रोकना।  
  • कोई कंपनी या संगठन पेड़ लगाकर, नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर, पवन) अपनाकर या उत्सर्जन कम करके कार्बन क्रेडिट अर्जित करता है।  
  • ये क्रेडिट बाजार में खरीदे-बेचे जा सकते हैं, ताकि ज्यादा प्रदूषण करने वाली कंपनियां इन्हें खरीदकर अपने उत्सर्जन की भरपाई कर सकें।

कार्बन क्रेडिट कारोबार और फायदे  
  • पर्यावरण संरक्षण: प्रदूषण घटाने वाली परियोजनाओं, जैसे- बायोगैस प्लांट, सोलर पावर, वनीकरण को कार्बन क्रेडिट दिए जाते हैं।
  • आर्थिक लाभ: किसान, उद्योग या एफपीओ आय के लिए कार्बन क्रेडिट बेच सकते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार: विकसित देश विकासशील देशों से कार्बन क्रेडिट खरीदते हैं। 
  • सरकारी योजनाएं: भारत सरकार भी कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं को बढ़ावा देती है, ताकि ग्रामीण स्तर पर लोग आय अर्जित कर सकें।

कार्बन सिंक और कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन
कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन प्रक्रियामें वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) हटाकर प्राकृतिक या कृत्रिम भंडारों में संग्रहित किया जाता है, ताकि जलवायु परिवर्तन को रोका जा सके। वहीं, कार्बन सिंक वह स्थान या तंत्र होता है, जो CO₂ को अवशोषित और संग्रहित करता है। 


प्रकृति में ऐसे चलता है कार्बन चक्र  
  • पेड़-पौधे और जंगल – प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन को अपनी जड़ों, तनों और पत्तियों में संग्रहित करते हैं।
  • कार्बनिक पदार्थ और सूक्ष्मजीव मिट्टी में कार्बन को लंबे समय तक स्टोर करते हैं।
  • महासागर अपने भीतर काफी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोख लेते हैं।

मानवीय क्रियाकलापों से कार्बन प्रवाह 
  • उद्योगों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को विशेष तकनीक से कैप्चर करके भूमिगत चट्टानों में स्टोर किया जाता है।
  • जैव ऊर्जा उत्पादन कार्यक्रमों में पौधों से ऊर्जा बनाने के दौरान निकली कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करके स्टोर किया जाता है।
  • डायरेक्ट एयर कैप्चर : मशीनों व फिल्टर तकनीक से हवा से सीधे कार्बन डाइऑक्साइड खींचकर भूमिगत रूप से संग्रहित की जाती है। 

किसान ऐसे कर सकते हैं कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन  
  • वृक्षारोपण और कृषि वानिकी : किसान खेत की मेड़ या बंजर भूमि पर वृक्ष लगाकर कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने में योगदान दे सकते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और नमी भी बढ़ती है।
  • मिट्टी में कार्बन संग्रह : जैविक खाद, फसल अवशेष प्रबंधन और शून्य जुताई जैसी विधियां अपनाकर मिट्टी में कार्बन स्टोर कर सकते हैं।
  • बायोचार का उपयोग : कृषि अपशिष्ट को जलाकर बायोचार बनाना और उसे मिट्टी में मिलाने से कार्बन डाइऑक्साइड मिट्टी में संग्रहित रहती है।
  • टिकाऊ खेती : कम रासायनिक खाद, अधिक जैविक खाद, जल संरक्षण और फसल चक्र अपनाकर किसान कार्बन उत्सर्जन घटा सकते हैं और इसका अवशोषण बढ़ा सकते हैं।
  • पशुपालन/डेयरी : गोबर गैस प्लांट (बायोगैस डाइजेस्टर) से पशु अपशिष्ट प्रबंधन कर सकते हैं। 
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कार्बन क्रेडिट प्रणाली है ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देती है।
कार्बन क्रेडिट प्रणाली है ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देती है। - फोटो : गांव जंक्शन
कार्बन क्रेडिट में किसानों की भूमिका 
  • कार्बन क्रेडिट कमाना : जब किसान टिकाऊ कृषि, बायोचार, वनीकरण या कृषि वानिकी से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड कम करते हैं, तो उन्हें कार्बन क्रेडिट मिल सकते हैं।
  • अतिरिक्त आय : किसान कार्बन क्रेडिट्स को राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। झारखंड की बिरसा हरित योजना इसका उदाहरण है।
  • कंपनियों से साझेदारी : बड़ी कंपनियां, जो अपने उत्सर्जन की भरपाई करना चाहती हैं, किसानों से कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं। इससे किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है।
यहां किसानों के लिए कार्बन क्रेडिट पाने की प्रक्रिया क्रमवार दी गई है। दो रास्ते हैं, जिन्हें अपनाकर किसान इस मुहिम का हिस्सा बन सकते हैं। इनमें स्वैच्छिक कार्बन बाजार और उभरता हुआ इंडियन कार्बन मार्केट/कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजनाएं शामिल हैं, जो धीरे-धीरे विस्तृत हो रहा है। 


(1) स्वैच्छिक कार्बन बाजार 
  • गतिविधि चुनें : कार्बन क्रेडिट गतिविधियों में कृषि वानिकी/वृक्षारोपण, मिट्टी में कार्बन बढ़ाना - जैसे शून्य या कम जुताई, कवर क्रॉप, अवशेष प्रबंधन या बायोचार उपयोग शामिल है। बांस, लेमनग्रास, खस, कैमोमाइल, तुलसी, मसाले और मिलेट्स जैसी फसलें लाभकारी हैं, जो अतिवृष्टि, सूखा और जलभराव में भी आय दे सकती हैं।
  • समूह बनाएं/एग्रीगेटर से जुड़ें : अकेले किसान के लिए लागत व कागजी काम बढ़ जाता है। एफपीओ, स्वयं सहायता समूह, एनजीओ, राज्य विभाग या प्रोजेक्ट-डेवेलपर के साथ समूह बनाकर काम शुरू करें, ताकि माप-तौल, रजिस्ट्रेशन और सत्यापन सामूहिक रूप से हो सके।
  • मानक और पद्धति तय करें : किसी मान्य रजिस्ट्री बाजार में उपलब्ध वीसीएस या गोल्ड स्टैंडर्ड में से किसी व्यवस्था का चयन करें। उसी से मिलती पद्धति भी चुनें, जो बताएगी कि आधार कैसे बनेगा, कितनी निगरानी चाहिए, क्रेडिट कैसे मिलेंगे।
  • आधार-रेखा और पात्रता जांच : कार्बन परियोजनाओं में स्थायित्व (कार्बन का लंबे समय तक सुरक्षित रहना) और लीकेज (कार्बन उत्सर्जन का परियोजना क्षेत्र से बाहर रिसाव) जैसे नियमों की जांच की जाती है। यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि कार्बन क्रेडिट केवल उन गतिविधियों को मिलें, जो वास्तविक और अतिरिक्त पर्यावरणीय लाभ देती हैं, न कि सामान्य प्रथाओं का हिस्सा हों। 
  • दस्तावेज एकत्र करें : भूमि रिकॉर्ड, सहमति-पत्र, खेत की सीमाएं (जीपीएस मैप), पहले से अपनाई जा रही प्रथाएं, प्रशिक्षण-रजिस्टर, नर्सरी/इनपुट बिल आदि की जरूरत पड़ेगी। एग्रीगेटर या डेवेलपर इसकी सूची देगा।
  • प्रोजेक्ट डिजाइन व रजिस्ट्रेशन : चुने हुए मानक की वेबसाइट / रजिस्ट्री पर प्रोजेक्ट रजिस्टर करें; परियोजना डिजाइन दस्तावेज में गतिविधि, क्षेत्र, लाभार्थी, निगरानी योजना, कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य संभावित कटौती आदि दर्ज होते हैं। 
  • अमल और निगरानी : पंजीकरण के बाद तय प्रथाएं अपनाएं, जिनमें जीरो टिलेज, क्रॉप कवर, पेड़ लगाना एवं उनका संरक्षण और मिट्टी में बायोचार मिलाने जैसी गतिविधियां शामिल हैं। निगरानी भी साथ ही करनी होती है। खेत की निगरानी एवं गतिविधि का रिकॉर्ड रखा जाता है। तय पद्धति के अनुसार, मिट्टी परीक्षण, प्लॉट माप, रिमोट-सेंसिंग एवं एप-आधारित डाटा दर्ज किया जाता है।
  • थर्ड-पार्टी वेरिफिकेशन : मान्यता-प्राप्त स्वतंत्र संस्था परियोजना के डाटा की जांच करती है। सफल होने पर रजिस्ट्री क्रेडिट जारी करती है। 
  • क्रेडिट बेचना और भुगतान : कार्बन क्रेडिट मार्केटप्लेस / ब्रोकर / कॉर्पोरेट ऑफटेक को बेचे जाते हैं। राजस्व का शेयर-एग्रीमेंट पहले से तय रखें (किसान/ एफपीओ/ डेवेलपर/ माप-तौल लागत आदि)। भारत में बायोचार ऑफटेक का एक उदाहरण गूगल-वीएआरएएच समझौता है। 

(2) इंडियन कार्बन मार्केट 
भारत सरकार ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम और भारतीय कार्बन बाजार का ढांचा बनाया है, जिसमें ऊर्जा दक्षता ब्यूरो नोडल एजेंसी है। वर्ष 2024-25 में इसके नियम अधिसूचित हुए हैं। ऑफसेट मैकेनिज्म भी विकसित हो रहा है, जो भविष्य में कृषि और भूमि-आधारित गतिविधियों के लिए रास्ता खोल सकते हैं। एनएससीआईसीएम, जीसीआई, सीईआरसी, ऊर्जा मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय जैसे संगठन भी कार्बन क्रेडिट और सीक्वेस्ट्रेशन से किसानों को लाभ पहुंचाने में योगदान दे रहे हैं। 

परियोजनाओं के लिए औसत दरें
  • सॉयल कार्बन/टिकाऊ खेती: $3–7 / टन
  • वनीकरण/ पुनर्वनीकरण: $5–15 / टन
  •  बायोचार: $20–30 / टन (सर्वाधिक दाम)
  • बायोगैस/मीथेन में कमी: $7–12 प्रति टन
  • अभी किसान मुख्यतः स्वैच्छिक कार्बन बाजार (वीसीएम) से जुड़ रहे हैं। किसानों को राजस्व शेयरिंग समझौतों में भुगतान चक्र, न्यूनतम मूल्य और अवधि स्पष्ट रखनी चाहिए। 

कुछ जरूरी सुझाव 
धान की खेती से उच्च कार्बन उत्सर्जन और पानी की खपत होती है। 54% वैश्विक आबादी चावल पर निर्भर है, जल संरक्षण और उत्सर्जन नियंत्रण के निर्णय सतर्कता से लेने होंगे। सतत विकास लक्ष्य-13 के साथ पौष्टिक भोजन, स्वच्छ पानी, कुपोषण मुक्ति और हरित ऊर्जा पर ध्यान देना जरूरी है। वन कटाई के बदले 10 गुना वृक्षारोपण का मानक है, लेकिन वृक्षारोपण और वनीकरण के अंतर को समझकर योजनाएं बनानी होंगी। विभागीय समन्वय में सुधार भी जरूरी है।
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