विज्ञापन
Home› Misal Bemisal› Vishesh› Basmati Beyond Aroma Gi Tag Quality Water Saving Farming And Higher Farmer Incomes

साक्षात्कार : हर खुशबूदार चावल बासमती नहीं होता, विरासत और गुणवत्ता की मुहर जरूरी - डॉ. अशोक कुमार सिंह

डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 20 Oct 2026 12:39 PM IST
सार

भारत ने वर्ष 2025-26 में 65 लाख टन से अधिक बासमती चावल का निर्यात किया, जिसका मूल्य 50 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा आंका गया। दुनिया के करोड़ों लोगों की थाली में महकने वाले बासमती चावल की कई किस्मों के जनक, पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह से डॉ. उमाशंकर मिश्र ने बासमती की पहचान, जीआई टैग और किसानों की आय बढ़ाने को लेकर विस्तार से बातचीत की...

बासमती किंग के नाम से विख्यात पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह
बासमती किंग के नाम से विख्यात पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह - फोटो : गांव जंक्शन
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

  • बासमती चावल आखिर इतना खास क्यों है, और क्या इसे कहीं भी उगा सकते हैं?

हर खुशबूदार चावल बासमती नहीं होता, पर बासमती की सभी किस्में खुशबूदार होती हैं। बासमती चावल के दाने की लंबाई करीब 6.7 मिमी या उससे अधिक होनी चाहिए, जो पकने पर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है। यह कुछ किस्मों में लगभग एक इंच तक होती है। बासमती पकने के बाद खिला रहता है और चिपकता नहीं है।

इसके पीछे एमाइलोज नामक तत्व की भूमिका होती है। लगभग 22% एमाइलोज होने पर चावल खिला-खिला बनता है, 25% से अधिक होने पर कड़ा पकता है और 20% से कम होने पर चिपक जाता है। बासमती के स्वाद व सुगंध को शब्दों में नहीं बता सकते, इसे खाकर ही अनुभव कर सकते हैं।

बासमती भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारत के लिए प्रकृति की अनूठी देन है, जो अपने स्वाद व सुगंध के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसकी गुणवत्ता तभी आती है, जब ये किस्में विशेष जलवायु और मिट्टी में उगाई जाएं। इसलिए, इसकी खेती के लिए सात राज्य चिह्नित किए गए हैं।

जम्मू-कश्मीर के तीन जिले (जम्मू, कठुआ व आर.एस. पुरा), हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 30 जिले और उत्तराखंड इन क्षेत्रों में शामिल हैं। केवल इन्हीं क्षेत्रों में उगाया गया चावल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आधिकारिक रूप से बासमती के नाम से बेचा जा सकता है। 
  • बासमती के जिन भौगोलिक क्षेत्रों का आपने जिक्र किया, उन्हें जीआई टैग मिला है। कई और राज्य भी जीआई टैग की मांग कर रहे हैं। यह मांग कितनी तार्किक है?

भौगोलिक संकेतक (जीआई) के लिए वस्तु का उस क्षेत्र से कुछ बुनियादी जुड़ाव होना जरूरी है। पहला, क्षेत्र के साथ उसका इतिहास जुड़ा हो। यह इतिहास 20-25 साल में नहीं, सैकड़ों साल में बनता है। बासमती का उल्लेख वारिस शाह की ‘हीर रांझा’ में भी मिलता है, जो लगभग 1700-1800 के आसपास लिखी गई। दूसरा, आम लोगों के मन में उस उत्पाद और क्षेत्र को लेकर गहरी छवि होनी चाहिए, जैसे- लोग देहरादून या अमृतसर के चावल को ही बासमती मानते हैं, चेन्नई के चावल को नहीं। तीसरा, विशेष गुणवत्ता, जो तभी आती है, जब फसल निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में उगाई जाए।
 
बासमती भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारत के लिए प्रकृति की अनूठी देन है।
बासमती भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर भारत के लिए प्रकृति की अनूठी देन है। - फोटो : गांव जंक्शन
  • पूसा संस्थान ने बासमती की दर्जनों किस्में विकसित की हैं। इस यात्रा में बासमती में अब तक क्या सुधार हुए हैं?

पारंपरिक किस्में (देहरादूनी बासमती, बासमती-370, टाइप-3, तरावड़ी बासमती, बासमती-217 और 386) गुणवत्ता और खुशबू में लाजवाब रही हैं। लेकिन, इनके पौधे ऊंचे (करीब डेढ़ मीटर) होते हैं, ये 155-160 दिन में पकती हैं और इनका तना कमजोर होता है, जिससे ये गिर जाती थीं। पैदावार भी केवल 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी। वर्ष 1968 के आसपास डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने बासमती की गुणवत्ता को अधिक उपज वाली प्रजातियों में लाने के लिए ब्रीडिंग कार्य शुरू किया।

वर्ष 1989 में पहली अर्ध-बौनी किस्म पूसा बासमती-1 आई, जिसकी पैदावार 60-70 क्विंटल तक थी। किसान इसे ‘कर्जा-फाड़ बासमती’ कहने लगे। धीरे-धीरे बासमती उत्पादन में क्रांति आ गई। रकबा बढ़ने के साथ पत्ती का झुलसा और झोंका रोग भी बढ़ा। वर्ष 2003 में पूसा बासमती 1121 आई, जिसका चावल पकने पर 22-23 मिमी लंबा होता है, जो होटल उद्योग के लिए बहुत उपयोगी रही। इसके बाद, पूसा बासमती 1401 (30-32 क्विंटल प्रति एकड़ उपज) और करीब 120 दिन में तैयार होने वाली पूसा बासमती-1509 (25 क्विंटल प्रति एकड़ उपज) जैसी किस्में आईं।

पूसा संस्थान ने कई रोग-रोधी किस्में विकसित की हैं, ताकि दवा की जरूरत और अवशेष दोनों खत्म हो सकें। इनमें उन्नत पूसा बासमती-1 (2007, झुलसा-रोधी), 1637 (2016, झोंका-रोधी), 1718 (1121 का सुधार) और 1728 (1401 का सुधार) शामिल हैं। साथ ही, 1847 (1509 का सुधार), 1885 (1121 का सुधार) और 1886 जैसी किस्में आईं, जो झुलसा और झोंका दोनों रोगों से मुक्त हैं। आज पूसा बासमती-1718 की 4-5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र और पूसा बासमती 1509 की करीब 7-8 लाख हेक्टेयर रकबे में खेती हो रही है। कम अवधि वाली किस्मों (1692, 1509, 1847) के बाद किसान मटर, आलू, प्याज या मक्का लगाते हैं, जिससे फसल गहनता और आमदनी बढ़ती है।
 
डीएसआर मशीन से धान की सीधी बुवाई।
डीएसआर मशीन से धान की सीधी बुवाई। - फोटो : AI Image
  • धान की खेती में पानी की खपत बहुत होती है। इसमें संतुलन कैसे बना सकते हैं?

रोपाई विधि से एक किलो चावल पैदा करने में करीब 3,000 लीटर पानी लगता है। 1970 के दशक में पंजाब में पानी 10 मीटर गहराई पर था, जो अब औसतन 25 मीटर तक गिर गया है। हरियाणा और पश्चिमी यूपी की भी यही स्थिति है। इसलिए, रोपाई छोड़कर सीधी बीजाई (डायरेक्ट सीडेड राइस यानी डीएसआर) अपनानी होगी।

धान की सीधी बीजाई से प्रति एकड़ 4,500-5,000 रुपये का रोपाई खर्च बचता है और पानी की करीब 35% बचत होती है। मीथेन उत्सर्जन कम होने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 30-35% कमी आती है। किसानों के अब तक इसे कम अपनाने की मुख्य वजह खरपतवार रही है। रोपाई में शुरुआती 15 दिन खेत में भरा पानी खरपतवारों को दबा देता है।

सीधी बीजाई में खरपतवार निकालने में मजदूरी और खर्च बढ़ जाता है। इसके समाधान के लिए पूसा बासमती 1985 (1509 का सुधार) और 1979 (1121 का सुधार) जैसी किस्में विकसित की गई हैं। इन पर खरपतवारनाशी इमेजाथापायर बेअसर रहती है, जबकि वह खरपतवारों को मार देती है। 
1509 व 1692 जैसी कम अवधि वाली किस्मों की रोपाई जून में न करके 15 जुलाई तक करें, ताकि पकने का समय ठंडे मौसम में पड़े और खुशबू पूरी आए।
1509 व 1692 जैसी कम अवधि वाली किस्मों की रोपाई जून में न करके 15 जुलाई तक करें, ताकि पकने का समय ठंडे मौसम में पड़े और खुशबू पूरी आए। - फोटो : गांव जंक्शन
  • बौनी किस्मों के स्वाद और गुणवत्ता में पारंपरिक किस्मों की तुलना में क्या कुछ फर्क भी आया है?

पौधों के प्रजनन में बासमती के गुणों के मानकों से समझौता किए बिना कोशिश रहती है कि नई किस्में पहले से बेहतर हों। जैसे पकने के बाद चावल की लंबाई पारंपरिक किस्मों (तरावड़ी, टाइप-3, देहरादूनी) में 14 मिमी से ज्यादा नहीं होती थी, जबकि नई किस्मों में यह 22-24 मिमी तक जाती है। हां, खुशबू में नई किस्मों में थोड़ी कमी आई है। चावल की खुशबू 2-एसिटाइल-1-पायरोलिन नामक वाष्पशील यौगिक से आती है, जो ज्यादा तापमान में दाने में टिकने के बजाय हवा में उड़ जाता है।

पारंपरिक किस्में नवंबर में पकती हैं और उनमें फूल 10 अक्तूबर के बाद आता है, जब दाना भरते समय दिन-रात का तापमान कम रहता है। नई किस्में कम अवधि की होने से अक्तूबर के पहले सप्ताह तक कट जाती हैं, जब तापमान कुछ ज्यादा होता है। इसलिए, खुशबू थोड़ी कम रह जाती है। इसका उपाय यह है कि 1509 व 1692 जैसी कम अवधि वाली किस्मों की रोपाई जून में न करके 15 जुलाई तक करें, ताकि पकने का समय ठंडे मौसम में पड़े और खुशबू पूरी आए। पर, किसानों को दूसरी फसल भी लेनी होती है, इसलिए इसमें थोड़ी समस्या रहती है।
पराली से एग्रो-बायोमास उत्पाद बना सकते हैं।
पराली से एग्रो-बायोमास उत्पाद बना सकते हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
  • पराली के निस्तारण का सही और सस्ता तरीका क्या हो सकता है?

फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना में सात-आठ वर्षों में 1,600-1,700 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। एक्स-सीटू विधि में पराली खेत से बाहर ले जाकर सीएनजी, बिजली, ब्रिकेट व चारा उत्पादन के साथ ही मशरूम की खेती में भी उपयोग होती है। वहीं, कुछ मशीनें जड़ों से काटकर पराली को कतार में गिरा देती हैं, जिसे लोग खेत पर ही 3-4 हजार रुपये प्रति एकड़ देकर खरीद रहे हैं।

इन-सीटू विधि में कंबाइन के साथ एसएमएस लगाकर पराली टुकड़ों में खेत में बिखेरी जाती है और हैप्पी सीडर या सुपर सीडर से बुआई होती है। सैटेलाइट निगरानी के अनुसार, पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं वर्ष 2018-19 में एक लाख से अधिक थीं, जो घटकर पिछले साल 25 से 30 हजार रह गईं। दिल्ली के प्रदूषण में पराली एक घटक हो सकती है, पर निर्माण और वाहन जैसे 
कई और कारण भी जिम्मेदार हैं।
सामान्य बासमती की 900 डॉलर प्रति टन तक कीमत होती है, जबकि जैविक बासमती 1,400-1,500 डॉलर तक बिकता है।
सामान्य बासमती की 900 डॉलर प्रति टन तक कीमत होती है, जबकि जैविक बासमती 1,400-1,500 डॉलर तक बिकता है। - फोटो : AI Image
  • क्या धान उत्पादन करने के लिए प्राकृतिक खेती का कोई सफल मॉडल है, जिसे बड़े स्तर पर अपनाया जा सके?

जैविक बासमती की खेती व निर्यात हो रहा है और इसका दाम भी लगभग दोगुना है। सामान्य बासमती की 900 डॉलर प्रति टन तक कीमत होती है, जबकि जैविक बासमती 1,400-1,500 डॉलर तक बिकता है। इसमें रोग-रोधी किस्मों (1847, 1885, 1886, 1718, 1637) की भूमिका अहम है।

एक हेक्टेयर में 6 टन धान के साथ लगभग 6 टन पराली भी बनती है यानी कुल 12 टन बायोमास। बायोमास में करीब 1% नाइट्रोजन होने से प्रति हेक्टेयर लगभग 120 किग्रा नाइट्रोजन खेत से निकल जाती है। इसे गोबर की खाद, ढैंचा, मूंग, लोबिया और जैव उर्वरकों (पीएसबी, केएसबी, नाइट्रोजन मोबिलाइजर) से लौटाया जा सकता है, जिससे मिट्टी स्वस्थ रहेगी। 
ग्रो-इंडिगो कंपनी ने हाल ही में करीब 17 करोड़ रुपये का पहला कार्बन क्रेडिट लगभग 60 हजार किसानों में बांटा है।
ग्रो-इंडिगो कंपनी ने हाल ही में करीब 17 करोड़ रुपये का पहला कार्बन क्रेडिट लगभग 60 हजार किसानों में बांटा है। - फोटो : सोशल मीडिया
  • कार्बन क्रेडिट से किसान अतिरिक्त कमाई कैसे करें, इसका ढांचा कितना विकसित है?

पराली न जलाने, सीधी बीजाई, लेजर लेवलिंग और सूखा-रोधी किस्मों जैसी पद्धतियों से मीथेन उत्सर्जन घटता है और किसान को कार्बन क्रेडिट मिलता है। ग्रो-इंडिगो कंपनी ने हाल ही में करीब 17 करोड़ रुपये का पहला कार्बन क्रेडिट लगभग 60 हजार किसानों में बांटा है। ह

वाईजहाज व खानपान जैसे विभिन्न उद्योग अपने कार्बन फुटप्रिंट की भरपाई के लिए ये क्रेडिट खरीदते हैं, जिसका पैसा अंत में किसानों तक पहुंचता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में पराली न जलाने से एक क्रेडिट बनता है, जिसका अंतरराष्ट्रीय मूल्य करीब 15-30 डॉलर है। सभी रीजनरेटिव पद्धतियों से 8-10 क्रेडिट यानी अधिकतम 25-30 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर आय संभव है। व्यावहारिक रूप से 15-20 हजार रुपये तो मिलते ही हैं।
 
जीनोम एडिटिंग से इच्छित गुण में सटीक बदलाव होता है और ऐसी किस्में जीएम श्रेणी में नहीं आतीं।
जीनोम एडिटिंग से इच्छित गुण में सटीक बदलाव होता है और ऐसी किस्में जीएम श्रेणी में नहीं आतीं। - फोटो : AI
  • खेती में एआई और जीनोम एडिटिंग जैसी तकनीकें कैसे काम आएंगी?

एआई का उपयोग खरपतवार, पोषक तत्व व कीट प्रबंधन के साथ ही रोगों के पूर्वानुमान, भंडारण और सिंचाई प्रबंधन में बढ़ रहा है। जैसे सेंसर वाला ड्रोन खेत के जिस कोने में तेला या चेपा कीट है, वहीं दवा छिड़केगा, जिससे दवा और रासायनिक अवशेष दोनों कम होंगे। जीनोम एडिटिंग से इच्छित गुण में सटीक बदलाव होता है और ऐसी किस्में जीएम श्रेणी में नहीं आतीं। जीनोम एडिटिंग से धान की दो किस्में विकसित हुई हैं - पूसा डीएसटी राइस-1, जो एमटीयू 1010 का सुधरा रूप है और कमला, जो सांबा मसूरी किस्म का सुधरा हुआ रूप है। कमला किस्म की पैदावार सांबा मसूरी से करीब 20% ज्यादा है और वह लगभग 20 दिन पहले पक जाती है।
 
किसान खुद भी बीज उत्पादन कर सकते हैं।
किसान खुद भी बीज उत्पादन कर सकते हैं। - फोटो : AI Image
  • किसान खुद बीज उत्पादन कैसे कर सकते हैं, इसमें आईसीएआर क्या सहायता देता है?

कृषक सहभागिता बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत पूसा संस्थान के 120 किमी के दायरे (गाजियाबाद, बुलंदशहर, सोनीपत, पानीपत आदि) के प्रगतिशील किसान संस्थान की देखरेख में बीज उगाते हैं, जिसे संस्थान प्रोसेस और पैक करके किसानों को देता है।

इस कार्यक्रम से जुड़े किसानों की आर्थिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा, इलाज और उनके रहन-सहन में पिछले 10 वर्षों में बड़ा सुधार आया है। दूसरे किसान भी प्रेरित हुए हैं। एफपीओ के जरिए भी बीज उत्पादन कराने की योजना है और सहकारिता मंत्रालय की भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड में तो किसान बीज उत्पादक के साथ शेयरधारक भी होंगे।
 

(यह साक्षात्कार मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
विज्ञापन
विज्ञापन