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डिजिटल गांव : फार्मर आईडी से मिलेगी खेती को नई पहचान, 10.31 करोड़ किसान हो चुके पंजीकृत

डॉ. निमिष कपूर, वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचार विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 22 Sep 2026 02:41 PM IST
सार

फार्मर आईडी किसान, उसकी जमीन और फसल की जानकारी को डिजिटल रूप से जोड़कर कृषि सेवाओं को सरल और लक्षित बनाने की दिशा में सरकार का एक बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। किसान अपनी जानकारी सही और अपडेट रखें, ताकि इस डिजिटल व्यवस्था का लाभ सही समय पर सही सेवा के रूप में उन्हें मिल सके। 
 

फार्मर आईडी को किसान की विशिष्ट डिजिटल पहचान के रूप में विकसित किया जा रहा है।
फार्मर आईडी को किसान की विशिष्ट डिजिटल पहचान के रूप में विकसित किया जा रहा है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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कल्पना कीजिए, किसान की पहचान, उसकी जमीन, खेत में खड़ी फसल और सरकार से मिलने वाली कृषि सेवाओं से जुड़ी जरूरी जानकारी एक ही डिजिटल व्यवस्था में जुड़ी हो। किसान को हर काम के लिए अलग-अलग कागज लेकर दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और सरकारी व्यवस्था भी यह समझ सके कि कौन-सा किसान किस जमीन पर खेती कर रहा है और वहां कौन-सी फसल बोई गई है।

इसी दिशा में फार्मर आईडी को किसान की विशिष्ट डिजिटल पहचान के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके पीछे एग्रीस्टैक है, जिसे कृषि क्षेत्र के लिए डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के रूप में तैयार किया जा रहा है। 3 अगस्त 2026 तक देश में 10.31 करोड़ से अधिक फार्मर आईडी बनाई जा चुकी हैं। इसी डिजिटल कृषि व्यवस्था के तहत रबी 2025-26 में 648 जिलों में डिजिटल क्रॉप सर्वे किया गया, जिसमें 31.3 करोड़ से अधिक खेत-भूखंडों की फसल संबंधी जानकारी दर्ज की गई।

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एग्रीस्टैक में जुड़ेंगे किसान, जमीन व फसल
एग्रीस्टैक का मकसद कृषि से जुड़ी बिखरी हुई डिजिटल जानकारियों को आपस में जोड़ना है। इसकी बुनियादी व्यवस्था में किसान रजिस्ट्री, भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र और फसल बुआई रजिस्ट्री सहित तीन प्रमुख डिजिटल रजिस्ट्रियां शामिल हैं।
  • किसान रजिस्ट्री : में किसान की पहचान और अन्य जरूरी विवरणों को उसकी कृषि भूमि आदि से जोड़ा जाता है। इसी के तहत फार्मर आईडी विकसित की जा रही है।
  • भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र : जमीन के डिजिटल रिकॉर्ड को उसके वास्तविक भौगोलिक स्थान से जोड़ने में मदद करते हैं। इससे यह समझना आसान होता है कि जमीन रिकॉर्ड में दर्ज खेत वास्तव में कहां स्थित है।
  • फसल बुआई रजिस्ट्री : यह जानकारी देती है कि किसी मौसम में किस खेत में कौन-सी फसल बोई गई है। इसका महत्वपूर्ण माध्यम डिजिटल क्रॉप सर्वे है, जिसमें मोबाइल आधारित सर्वेक्षण से खेत में बोई गई फसल का विवरण दर्ज किया जाता है।
इन जानकारियों को जोड़ने से खेती की अधिक व्यवस्थित डिजिटल तस्वीर तैयार हो सकती है।

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बिखरे रिकॉर्ड को जोड़ने की कोशिश
किसानों की जमीन, योजनाओं और फसल से जुड़ी जानकारी पहले से अलग-अलग सरकारी व्यवस्थाओं में मौजूद है। लेकिन, ये रिकॉर्ड हमेशा आपस में उसी तरह जुड़े नहीं होते, जैसा डिजिटल सेवाओं के लिए जरूरी है।मसलन, जमीन किस किसान के नाम है, यह भूमि रिकॉर्ड से पता चल सकता है, लेकिन उस जमीन पर इस मौसम में कौन-सी फसल बोई गई है, इसके लिए अलग जानकारी की जरूरत पड़ सकती है। इसी तरह, ऋण, बीमा, सरकारी खरीद या दूसरी सेवाओं के लिए किसान को अलग-अलग दस्तावेज और सत्यापन कराने पड़ सकते हैं। एग्रीस्टैक का उद्देश्य इसी बिखरी जानकारी को अधिक जुड़ी हुई डिजिटल व्यवस्था में लाना है, ताकि प्रमाणित जानकारी के आधार पर किसान-केंद्रित सेवाएं आसान और समयबद्ध बनाई जा सकें।

डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन से मिली गति
केंद्र सरकार ने 2 सितंबर 2024 को डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन को मंजूरी दी। इसके लिए 2,817 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 1,940 करोड़ रुपये है। मिशन के प्रमुख हिस्सों में एग्रीस्टैक, कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (केडीएसएस), मृदा उर्वरता एवं प्रोफाइल मैपिंग और डिजिटल फसल सर्वेक्षण शामिल हैं। इसका व्यापक उद्देश्य डिजिटल तकनीक और विश्वसनीय कृषि आंकड़ों के जरिए किसानों तक सेवाओं को अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाना है।

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राज्यों की भूमिका सबसे अहम
एग्रीस्टैक की तीन मूल रजिस्ट्रियां राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा विकसित और बनाए रखी जाती हैं। इसलिए यह एक संघीय डिजिटल व्यवस्था है। इसका मतलब एक ऐसी डिजिटल प्रणाली से है, जिसमें अलग-अलग स्वतंत्र 
इकाइयां (जैसे राज्य, संस्थाएं या विभाग) अपने-अपने डेटा और सिस्टम पर नियंत्रण रखते हुए भी एक साझा नेटवर्क या मानक ढांचे के जरिये आपस में जुड़ी और तालमेल में रहती हैं। यह केंद्रीकृत नहीं, बल्कि विकेंद्रीकृत और आपस में जुड़ा हुआ ढांचा है। फार्मर आईडी बनाने और भूमि रिकॉर्ड के सत्यापन में राज्य के कृषि, राजस्व और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि अलग-अलग राज्यों में पंजीकरण की प्रक्रिया, पोर्टल और सत्यापन का तरीका कुछ अलग हो सकता है।

फार्मर आईडी सिर्फ एक नंबर नहीं
फार्मर आईडी को केवल नया कार्ड या पहचान नंबर समझना सही नहीं होगा। यह किसान की डिजिटल पहचान को उसकी कृषि संबंधी जानकारी से जोड़ने वाली व्यवस्था है। इसके तहत किसान की पहचान और भूमि रिकॉर्ड के साथ बोई गई फसल, पशुधन स्वामित्व, जनसांख्यिकीय विवरण, परिवार संबंधी जानकारी तथा योजनाओं और लाभों जैसी सूचनाओं को गतिशील रूप से जोड़ा जा सकता है। भविष्य में किसान की डिजिटल पहचान उसकी खेती की वास्तविक स्थिति को समझने का आधार बन सकती है।

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योजनाओं से ऋण तक आसान हुआ रास्ता
फार्मर आईडी से किसान की पहचान, जमीन और फसल की प्रमाणित जानकारी एक जगह उपलब्ध होने पर बार-बार दस्तावेज जमा करने और सत्यापन की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि वास्तविक लाभ संबंधित राज्य और योजना के नियमों पर निर्भर करेगा। पीएम-किसान, डीबीटी और दूसरी किसान योजनाओं में पहचान और पात्रता का सत्यापन आसान हो सकता है। भूमि और फसल का डिजिटल रिकॉर्ड फसल बीमा और दावों के निस्तारण में भी मदद कर सकता है। सत्यापित भूमि संबंधी जानकारी से किसान क्रेडिट कार्ड और कृषि ऋण की प्रक्रिया सरल होने की संभावना है। वहीं फसल के डिजिटल रिकॉर्ड से एमएसपी पर खरीद को अधिक पारदर्शी और कागजरहित बनाने में मदद मिल सकती है।

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खेत की जरूरत के हिसाब से मिलेगी सलाह
जब किसान की फसल, क्षेत्र, मिट्टी और मौसम से जुड़ी जानकारी डिजिटल रूप से उपलब्ध होगी, तो स्थानीय जरूरत के हिसाब से कृषि सलाह देना आसान हो सकता है। वास्तविक फसल क्षेत्र की जानकारी से बीज, उर्वरक, कीटनाशी, भंडारण और परिवहन की बेहतर योजना बनाने में भी मदद मिल सकती है। सूखा, बाढ़ या ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित खेतों और फसलों की पहचान तथा नुकसान का आकलन भी अधिक व्यवस्थित ढंग से किया जा सकता है। डिजिटल क्रॉप सर्वे, उपग्रह आंकड़ों और फसल-कटाई प्रयोगों को साथ लेकर फसल उत्पादन का अधिक वैज्ञानिक अनुमान तैयार करने में भी मदद मिल सकती है।

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मोबाइल से ऐसे बनाएं फार्मर आईडी
  •   किसान अपने राज्य की आधिकारिक फार्मर रजिस्ट्री व्यवस्था से खुद पंजीकरण कर सकते हैं। जरूरत हो तो सीएससी, कृषि विभाग, राजस्व विभाग या अधिकृत सहायता केंद्रों की मदद भी ली जा सकती है। 
  •   यूपी में पंजीकरण के लिए आधार, आधार लिंक मोबाइल नंबर और भूमि संबंधी जानकारी जरूरी है। इसमें जिला, तहसील, गांव, खसरा/गाटा या सर्वे नंबर, रकबा और हिस्सेदारी जैसी जानकारी शामिल है।
  •   आमतौर पर आधार-ओटीपी से पहचान सत्यापन और लॉगिन के बाद किसान पंजीकरण किया जाता है। इसके बाद व्यक्तिगत और भूमि संबंधी जानकारी दर्ज या प्राप्त कर उसकी जांच करनी होती है। 
  •   संयुक्त खातेदारी में हिस्सेदारी की जानकारी विशेष रूप से सावधानी से जांचें। उपलब्ध डिजिटल प्रमाणीकरण या ई-साइन प्रक्रिया पूरी करने के बाद आवेदन जमा कर सकते है।
  •   पंजीकरण के बाद नामांकन स्थिति के जरिये आवेदन की स्थिति देखी जा सकती है। कुछ मामलों में स्थानीय स्तर पर सत्यापन भी जरूरी हो सकता है।
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जानकारी सही रखें, तभी मिलेगा पूरा फायदा
फार्मर आईडी बनाते समय आधार और भूमि रिकॉर्ड की जानकारी सही भरें। ओटीपी और पासवर्ड किसी के साथ साझा न करें और केवल आधिकारिक सरकारी पोर्टल, ऐप या अधिकृत सहायता केंद्र का इस्तेमाल करें। भूमि की खरीद-बिक्री, विरासत या बंटवारे के बाद रिकॉर्ड में बदलाव हुआ है तो फार्मर रजिस्ट्री में भी जानकारी अपडेट कराएं। फार्मर आईडी से जुड़ी व्यवस्था में किसान की सहमति और डेटा सुरक्षा महत्वपूर्ण है। आखिर डिजिटल खेती का असली उद्देश्य सिर्फ किसान को एक नंबर देना नहीं, बल्कि सही जानकारी के आधार पर सही किसान तक सही सेवा सही समय पर पहुंचाना है। किसी कठिनाई या मार्गदर्शन के लिए किसान कॉल सेंटर 1800-180-1551 पर संपर्क किया जा सकता है।

(यह स्टोरी मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)
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