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आग नहीं, माटी में समाधान : पराली से बनाएं उर्वरक... किसानों को चाहिए सही तकनीक और आर्थिक मदद
डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक आईसीएआर-आईएआरआई, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sun, 18 Oct 2026 03:09 PM IST
सार
पराली जलाने पर जुर्माना और दंड से प्रदूषण की समस्या हल नहीं होगी। अत्याधुनिक तकनीक अपनाकर पराली को खेत में ही खाद में बदलना किसान और पर्यावरण दोनों के लिए बेहतर समाधान हो सकता है।
आग नहीं, माटी में समाधान, पराली से बनाएं उर्वरक
- फोटो : गांव जंक्शन
खरीफ धान की कटाई शुरू होते ही पराली जलाने की घटनाएं चर्चा में आ जाती हैं। 17 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजधानी दिल्ली के पड़ोसी राज्यों के किसानों को पराली जलाने से जुड़े मुकदमों से पूरी तरह छूट नहीं दे सकते और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को दंडात्मक प्रावधानों के प्रभावी इस्तेमाल पर विचार करना चाहिए। पराली जलाने पर जुर्माना दो एकड़ से कम जमीन के लिए ₹5,000, दो से पांच एकड़ के लिए ₹10,000 और पांच एकड़ से अधिक के लिए ₹30,000 प्रति घटना तय किया गया है। समय पर भुगतान न होने पर इसे भू-राजस्व बकाया के रूप में वसूला जा सकता है।
पराली जलाने वाले खेतों को 15 महीने के लिए रेड कैटेगरी में रखने का प्रावधान भी किया गया है, जिससे फसल बिक्री, ऋण और जमीन गिरवी रखने में दिक्कत हो सकती है। हालांकि, पर्याप्त विकल्पों के बिना केवल दंडात्मक कार्रवाई से स्थाई समाधान मुश्किल है। यह नहीं भूलना चाहिए कि यही किसान बीते छह दशकों से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में केंद्रीय भंडार के 80 प्रतिशत से अधिक योगदान और हर साल 50,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के बासमती चावल निर्यात में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इसलिए, किसानों को समस्या नहीं, समाधान का भागीदार बनाना होगा।
दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण केवल पराली से नहीं होता। वाहन, उद्योग, निर्माण की धूल, कचरा और अन्य बायोमास भी इसके स्रोत हैं। मौसम भी प्रदूषण बढ़ाता है। अक्तूबर के बाद हवाओं की दिशा और गति में बदलाव तथा सर्दियों में कम तापमान और ठहरी हवाओं से प्रदूषक नीचे जमा होने लगते हैं। इसलिए, धान किसान को अकेले प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराना सही तस्वीर नहीं है। फिर भी पराली दहन का नुकसान नकारा नहीं जा सकता। इससे वायु प्रदूषण, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। अध्ययनों के अनुसार, 10 अक्टूबर से 20 नवंबर के बीच दिल्ली के प्रदूषण में पराली दहन का योगदान 5 से 30 प्रतिशत तक हो सकता है।
किसान-हितैषी तकनीक अपनानी होगी
धान कटाई के बाद महज 20-30 दिनों में करीब 60 लाख हेक्टेयर से निकलने वाली 40-50 करोड़ क्विंटल पराली को बंडल बनाकर दूर के उद्योगों तक पहुंचाना तकनीकी व आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। स्ट्रॉ बेलर जैसी मशीनों पर बड़े निवेश के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं दिखा। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, नवंबर में दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक वर्ष 2018 के 335 से बढ़कर 2023 में 373 हो गया।
केवल पराली को खेत से बाहर निकालना पर्याप्त नहीं है। खेत में ही इसके प्रबंधन को भी प्राथमिकता देनी होगी। हरियाणा वायु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 16 अगस्त 2018 को कंबाइन हार्वेस्टर में स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम अनिवार्य करने का आदेश दिया था। इसके प्रभावी क्रियान्वयन से कटाई के दौरान ही पराली का बेहतर प्रबंधन हो सकता है। केंद्र की फसल अवशेष प्रबंधन योजना भी इन-सिटू और एक्स-सीटू दोनों उपायों को बढ़ावा देती है।
पराली से खेत में ही बनाई जाए खाद
पराली को खेत में ही मिलाकर जैविक खाद में बदलना व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। धान कटाई के बाद प्रति एकड़ 30 किलो यूरिया छिड़ककर मोल्ड बोर्ड हल या हैरो से पराली मिट्टी में मिलाई जाए तो यह करीब 45 दिनों में जैविक खाद में बदल सकती है। इक्रीसैट के पूर्व मृदा वैज्ञानिक डॉ. ओ.पी. रूपेला के अनुसार, इससे पराली में मौजूद 1.7-2.1 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1.5 प्रतिशत फॉस्फोरस और 1.4-1.6 प्रतिशत पोटेशियम संरक्षित रह सकते हैं। इससे अगली फसल की पैदावार 4-9 प्रतिशत तक बढ़ने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम से लैस कंबाइन फसल कटाई के दौरान पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में फैला देता है। ऐसे उपकरणों के प्रभावी इस्तेमाल के साथ किसानों को तकनीकी और आर्थिक सहायता देनी चाहिए। पराली का स्थाई समाधान किसान को दंडित करने के बजाय सही तकनीक, समय पर मशीन और व्यावहारिक विकल्प देने में है। किसान, सरकार और वैज्ञानिक समुदाय मिलकर ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जिसमें पराली जलाने के बजाय खेत में ही उसका उपयोग सुनिश्चित हो।
प्रदूषण में पराली का योगदान
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के अनुसार, अक्तूबर के शुरुआती दिनों में एनसीआर के प्रदूषण में पराली दहन का योगदान करीब 25 प्रतिशत तक पहुंचता है, लेकिन बाकी महीनों में यह घटकर लगभग एक प्रतिशत ही रह जाता है। यह आंकड़ा साफ करता है कि पराली दहन प्रदूषण का कोई स्थाई या मुख्य कारण नहीं है, बल्कि एक सीमित अवधि का योगदान भर है। बाकी समय प्रदूषण के असली कारण कहीं और तलाशने होंगे।
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