सहकारिता से स्वच्छता और हरित भविष्य
भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के दिशा-निर्देशों को संशोधित कर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन को अनिवार्य किया है। सहकारिता मंत्रालय और एनसीईएल, एनसीओएल, बीबीएसएसएल व बी-पैक्स जैसी सहकारी समितियों के जरिए अपशिष्ट प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी बढ़ाई जा सकती है, जिससे स्वच्छता एवं हरित ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। यह पहल सीओपी-28 के ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेंटीग्रेड तक कम करने के लक्ष्य का समर्थन करती है।
अपशिष्ट से हरित ऊर्जा उत्पादन करके ग्रामीण समुदायों की खाना पकाने की जरूरतें पूरी हो सकती हैं और पर्यावरण-अनुकूल बिजली आपूर्ति को बढ़ावा मिल सकता है। इसी तरह, ग्राम स्तर पर जैविक व हरी खाद निर्माण के साथ इनका उपयोग सुनिश्चित करके प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे कृषि स्थिरता में सुधार होगा।
पशुओं के अपशिष्ट का सही प्रबंधन
पशुपालन से जुड़ी गतिविधियां हवा, पानी, मिट्टी और जैव विविधता को बहुत प्रभावित करती हैं। इससे जल प्रदूषण, झीलों-नदियों में कचरे एवं पोषक तत्वों का जमाव (यूट्रोफिकेशन) और प्रवाल भित्तियों को नुकसान होता है। साथ ही, नाइट्रोजन-फॉस्फोरस प्रदूषण से बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारी होती है। पशुओं का गोबर और अपशिष्ट पीने के पानी को दूषित करता है, खासकर रोटावायरस के कारण, जो छोटे बच्चों में बीमारी और मृत्यु का बड़ा कारण है।
भारत में 80 करोड़ पशुओं की आबादी है, लेकिन 60% से ज्यादा गोबर बिना प्रबंधन के जला दिया जाता है या खुले में फेंक दिया जाता है। इससे पानी और मिट्टी खराब होती है, और कालाजार जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ता है। आमतौर पर, गोबर खुले गड्ढों में डाला जाता है, जो धूप और बारिश में क्रमशः सूखता या बह जाता है, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है। कृषि और बागवानी का कचरा भी ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण बढ़ाता है। ग्रामीण भारत में पशु अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता अभियानों की कमी एक बड़ी समस्या है।
जैविक अपशिष्ट से मीथेन फार्मिंग
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जैविक कचरे, विशेषकर गोबर को उपलों में बदलकर ईंधन के रूप में जलाया जाता है या खुले में घूरे पर फेंक दिया जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और ओजोन परत को नुकसान होता है। यह गोबर के उच्च कैलोरी मूल्य का अकुशल उपयोग है। गोबर और अन्य जैविक कचरे से अवायवीय अपघटन के जरिए मीथेन गैस बनाई जा सकती है, जो हरित ईंधन है।
एक गाय के गोबर से सालाना 225 लीटर पेट्रोल के बराबर मीथेन उत्पन्न हो सकती है, जो ग्रामीण घरों में खाना पकाने के लिए एलपीजी और केरोसिन का विकल्प बन सकती है, साथ ही लघु उद्योगों में हीटिंग ईंधन और जैविक खेती के लिए जैविक-घोल प्रदान कर सकती है।
यह 'मीथेन फार्मिंग' जीवाश्म ईंधन की जगह ले सकती है, जो 30-40 वर्षों में समाप्त हो सकते हैं। यह ग्रामीण स्वरोजगार को बढ़ावा दे सकती है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सतत योजना शुरू की है। इसने हरित अर्थव्यवस्था की एक नई खिड़की खोल दी है। यह योजना 'कचरे से कंचन' की अवधारणा को बढ़ावा देती है, जो परिवहन और हरित अर्थव्यवस्था के लिए लागत प्रभावी हरित ईंधन उपलब्ध करा सकती है।
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हरित ऊर्जा उत्पादन की प्रौद्योगिकी
गोबर से मीथेन गैस प्राप्त करना एक सरल प्रक्रिया है। जैविक अपशिष्ट (गाय का गोबर और वनस्पति पदार्थ) को इन्सुलेटेड, वायुरोधी कंटेनरों में डालकर इसे अवायवीय प्रक्रिया में डालना संभव है, जिन्हें डाइजेस्टर कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। इनमें से एक बैच-लोड डाइजेस्टर है, जिसे एक साथ भरकर सील कर देते हैं। जब कच्चा माल गैस बनाना बंद कर देता है तो इसे खाली कर दिया जाता है। दूसरा, निरंतर-लोड डाइजेस्टर, जिसमें थोड़ा-थोड़ा, नियमित रूप से निश्चित अंतराल पर गोबर या जैविक अपशिष्ट डाला जाता है ताकि गैस और बायो-स्लरी का लगातार उत्पादन होता रहे।
अपशिष्ट और पानी का मिश्रण (स्लरी) डाइजेस्टर में डालते हैं, जहां बैक्टीरिया इसे पचाते हैं, जिससे 62-65% मीथेन, 31-32% कार्बन डाइऑक्साइड, 1.5-2% हाइड्रोजन सल्फाइड और जलवाष्प युक्त गैस बनती है। कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड और जलवाष्प को क्रमशः चूने के पानी, लोहे के भराव और फिटकरी से हटाकर मीथेन को शुद्ध करते हैं। यह मीथेन खाना पकाने, हीटिंग, औद्योगिक उपयोग और सीएनजी के रूप में ऑटोमोबाइल में इस्तेमाल हो सकती है। आप यह जानकर हैरान जाएंगे कि भारत की 30.74 करोड़ गायों की आबादी का गोबर लगभग 691.65 करोड़ लीटर पेट्रोल के बराबर हरित ऊर्जा पैदा कर सकता है।
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बायोमास उत्पादन के लिए समर्पित नीति
जैविक कचरे के प्रबंधन से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कई फायदे हो सकते हैं। खाना पकाने की पुरानी विधियों को बायोगैस आधारित ईंधन में बदलकर धुएं और ग्लोबल वार्मिंग को कम कर सकते हैं। यही नहीं, बायोगैस को बढ़ावा दिया जाए तो गांवों में उज्ज्वला योजना का सरकारी बोझ घट सकता है। इसके साथ ही, बिजली पर निर्भरता भी कम हो सकती है। जैविक खेती को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होने के साथ ही फसल की गुणवत्ता और किसानों की कमाई में भी सुधार हो सकता है।
जैविक अपशिष्ट पर आधारित स्वच्छ ईंधन उत्पादन के इस मॉडल से गांव पूरी तरह स्वच्छ हो सकते हैं। इसका एक बड़ा फायदा यह है भी कि गायों को फिर से ‘गोधन’ माना जाने लगेगा। यह मॉडल सही तकनीक, स्वच्छता, जैविक खेती और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के माध्यम से ग्रामीण समुदायों को समृद्ध बना सकता है।
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यह सही है कि सरकार कृषि अवसंरचना कोष और सब्सिडी के जरिए संपीड़ित बायो-गैस इकाइयों के निर्माण को प्रोत्साहन देती है। लेकिन, देश में बायोमास उत्पादन की कोई समर्पित नीति नहीं है, जो एक बड़ी कमी है। इस कमी को दूर नहीं किया गया, तो स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जुड़े लक्ष्य पूरे नहीं होंगे और निवेश बर्बाद हो सकता है।
ग्रामीण भारत में जैविक अपशिष्ट प्रबंधन के कई फायदे हैं: