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Climate Change Population Dependent On Agriculture Population Of Farmers Climate Change Control
Sustainble Farming: टिकाऊ पर्यावरण और 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की कुंजी किसानों के हाथ
पी.एस. ओझा, पूर्व राज्य समन्वयक और सदस्य संयोजक, यूपी राज्य जैव-ऊर्जा विकास बोर्ड
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 11 Aug 2025 05:41 PM IST
सार
भारत की बहुसंख्य आबादी कृषि पर निर्भर है, जहां जलवायु परिवर्तन से खेती और किसानों की आय प्रभावित हो रही है। जलवायु-अनुकूल खेती करके किसान पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य तक तेजी से पहुंचा जा सकता है।
जलवायु अनुकूल खेती का दृष्टिकोण कृषि उत्पादन बढ़ाने और पर्यावरणीय संतुलन पर केंद्रित है।
- फोटो : गांव जंक्शन
जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी की प्रमुख चुनौती है, जो केवल वैज्ञानिकों, सरकारों या पर्यावरणविदों की समस्या नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए बड़ी चुनौती है, खासकर उन किसानों के लिए, जिनका जीवन प्रकृति पर निर्भर है। भारत जैसे कृषि-आधारित देश में, जहां 70% जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, वहां किसानों की भूमिका जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण और इसके दुष्प्रभाव को कम करने में बेहद अहम है।
जलवायु परिवर्तन से तापमान वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव, सूखा, बाढ़ और चक्रवात जैसी आपदाएं बढ़ी हैं, जिससे कृषि उत्पादन अस्थिर होने के साथ ही खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है और किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। अनियमित बारिश से जहां वर्षा-आधारित खेती प्रभावित हो रही है, वहीं अत्यधिक गर्मी और सूखे से भूमि की उर्वरता घट रही है, कीट-बीमारियों का प्रकोप बढ़ा है और मित्र कीटों की संख्या कम हो रही है। यदि किसान जलवायु-अनुकूल खेती अपनाएं, तो वे अपनी आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकते हैं।
जलवायु अनुकूल खेती करें किसान
जलवायु अनुकूल खेती का दृष्टिकोण कृषि उत्पादन बढ़ाने और पर्यावरणीय संतुलन पर केंद्रित है। इसके अंतर्गत किसान ये उपाय अपना सकते हैं :
फसल विविधीकरण : एक ही फसल पर निर्भर न रहकर विभिन्न प्रकार की फसलें बोने से उत्पादन का जोखिम कम होता है।
मृदा संरक्षण : जैविक खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है, जो अधिक समय तक नमी बनाए रखती है।
कम जल उपयोग वाली फसलें : ज्वार, बाजरा, मूंग, औषधीय एवं सगंध फसलें, जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती हैं।
कृषि वानिकी : बांस की खेती को मिशन मोड में शुरू करना चाहिए, जो फर्नीचर उद्योग के लिए लकड़ी का विकल्प बन सकता है। प्रधानमंत्री ने इसे 'ग्रीन गोल्ड' की संज्ञा दी है।
जैविक और प्राकृतिक खेती पर फोकस
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी और जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। जैविक और प्राकृतिक खेती इस चुनौती से लड़ने में मदद कर सकती है। इससे न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है और पर्यावरणीय स्थिरता बनी रहती है।
जल संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनियमितता बढ़ी है। ऐसे में, किसान जल संरक्षण के ये तरीके अपनाकर इससे उपजी चुनौतियों से लड़ सकते हैं:
टपक सिंचाई : इससे पानी की बर्बादी नहीं होती और सीधे जड़ों तक पानी पहुंचता है।
वर्षा जल संचयन : तालाब, कुंड, झीलें बनाकर वर्षा जल संग्रहित किया जा सकता है।
मल्चिंग तकनीक : इससे खेत की नमी बनी रहती है और पानी की आवश्यकता घटती है।
हरित आवरण और वृक्षारोपण जरूरी
किसानों द्वारा खेतों की मेड़ों पर या खाली पड़ी जमीन पर वृक्षारोपण करने से कार्बन अवशोषण बढ़ता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में सहायता मिलती है। मिट्टी का कटाव रोका जा सकता है और प्राकृतिक आवास संरक्षित रहते हैं। किसान कृषि वानिकी (एग्रो-फोरेस्ट्री) विधि भी अपना सकते है, जिसमें फसलों और पेड़ों को एक साथ उगाया जाता है। इससे पर्यावरण और किसान दोनों को लाभ होता है।
पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय तकनीक
हमारे देश में सदियों से परंपरागत रूप से मौसम और जलवायु के अनुरूप खेती होती आई है। किसान इन पारंपरिक तकनीकों को अपनाकर जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकते हैं :
बीज संरक्षण : पारंपरिक बीज अधिक सहनशील होते हैं, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
स्थानीय किस्मों का चुनाव : फसलों की स्थानीय किस्में जलवायु के अनुकूल होती हैं। किसान इनका चयन कर सकते हैं।
चंद्र-मास या पंचांग के अनुसार बुवाई : पारंपरिक किसान मौसम के चक्रों को देखकर बुवाई करते थे, जिससे फसल पर प्राकृतिक आपदाओं का असर कम होता था।
कृषि यंत्रीकरण और सौर ऊर्जा का उपयोग
सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप और उपकरण बिजली की खपत को कम करते हैं।
कम डीजल खपत वाली मशीनें जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाली ग्रीनहाउस गैसों को कम कर सकती हैं।
सोलर एनर्जी के दुष्प्रभावों पर नियंत्रण
सोलर एनर्जी के उपयोग को नीतिगत समर्थन से गति मिली है, लेकिन वातावरण का तापमान बढ़ाने जैसे इसके नकारात्मक प्रभावों से इन्कार नहीं किया जा सकता। एग्रो फारेस्ट्री के विकास में किसानों के मिशन मोड में कार्य करने से इस समस्या पर नियंत्रण संभव है। साथ ही, सरकार को बायोमास कल्टीवेशन की नीति लागू करनी चाहिए, जो जैव ऊर्जा उद्यमों को कच्चा माल उपलब्ध कराएगा और हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने में मदद करेगा।
प्रशिक्षण और जानकारी की आवश्यकता
किसानों की भूमिका तभी प्रभावी हो सकती है, जब उन्हें उचित प्रशिक्षण और जानकारी मिले। इसके लिए, सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन जरूरी है। कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक नवीनतम तकनीकों की जानकारी पहुंचाने से भी मदद मिल सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्स और एसएमएस सेवाओं के माध्यम से मौसम पूर्वानुमान और कृषि सलाह देना भी उपयोगी हो सकता है।
प्रकृति के साथ तालमेल की तकनीक
कृषि में हाइब्रिड बीजों, पानी की बढ़ती खपत और रासायनिक उर्वरकों-कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से उर्वरता कम हुई है, भूजल स्तर नीचे गिरा और जल संसाधन दूषित हुए हैं। इन समस्याओं का समाधान आवर्तनशील कृषि में निहित है, जो सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है और पशु-पक्षी, वृक्ष, कीड़े व सूक्ष्मजीवों के प्राकृतिक क्रम को बनाए रखती है। इस पद्धति में मिश्रित खेती, सब्जी-धान्य उत्पादन, पशुपालन, मछलीपालन और बागवानी के लिए जमीन का विभाजन, जैविक खाद (गोबर, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, नाडेप) का उपयोग, सीमित सिंचाई व वर्षा जल संरक्षण, उत्पाद प्रसंस्करण और बीज संरक्षण शामिल हैं, जो खेती को टिकाऊ, प्राकृतिक अनुकूल और लाभकारी बनाता है।
कृषि तीर्थ, ग्राम बिहटा, तहसील स्याना, बुलंदशहर एक खास जगह है, जहां इस लेखक द्वारा बनाई गई 'स म क' (सह-अस्तित्व मूलक आवर्तनशील कृषि) पद्धति को सीखने और आजमाने का मौका मिलता है। यहां खेती के बाद उत्पाद को प्रमाणित करने, प्रोसेस करने और बेचने की व्यवस्था सिखाई जाती है। साथ ही, किसानों को सहकारी व्यवसाय शुरू करने के लिए कृषक उत्पादक संगठन का तरीका भी सिखाया जाता है। इसके लिए, पांच दिन का अध्ययन शिविर और एक दिन का परिचय कार्यक्रम चलाया जाता है। ट्रेनिंग के बाद, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से क्रेडिट लिंकेज कराने में भी मदद की जाती है, ताकि किसानों का उद्यम बढ़े और गांव समृद्ध हों।
सरकार, समाज और वैज्ञानिकों का सहयोग
किसानों की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। जलवायु अनुकूल बीजों और तकनीकों पर अनुसंधान, कृषि बीमा और वित्तीय सहायता योजनाएं, कार्बन क्रेडिट योजनाओं से किसानों को जोड़ने और स्थानीय स्तर पर किसान समूहों और सहकारी समितियों का गठन बड़ा बदलाव ला सकता है। ग्राम पंचायतों की भागीदारी इसमें बड़ा योगदान दे सकती है।
महिला किसानों की भूमिका को बढ़ावा
ग्रामीण भारत में महिलाएं कृषि कार्यों में पुरुषों के बराबर ही योगदान देती हैं। यदि उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूक किया जाए और नेतृत्व की भूमिका दी जाए तो सकारात्मक परिवर्तन तेजी से संभव हो सकता है।
कृषि अपशिष्ट प्रबंधन सीखें किसान
फसल काटने के बाद खेतों में पराली अथवा अन्य जैव अपशिष्टों को जलाने की प्रथा उत्तर भारत में आम है, जिससे भारी मात्रा में वायु प्रदूषण होता है। यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभदायक होगा, बल्कि आय का भी एक नया स्रोत बन सकता है।
पराली एवं अन्य कृषि तथा पशुपालन अपशिष्टों को खाद में परिवर्तित कर सकते हैं।
बायोगैस और बायोचार बनाने के लिए भी इसका उपयोग कर सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन का समाधान सामूहिक प्रयासों से संभव है। किसानों को केवल पीड़ित न मानकर परिवर्तन के वाहक के रूप में देखना होगा। वे पर्यावरण-अनुकूल खेती, जल-मृदा संरक्षण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से जलवायु प्रभाव को कम कर सकते हैं और एक समृद्ध व टिकाऊ भविष्य की नींव रख सकते हैं। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाने में तेजी आएगी।
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