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Not Malls But Villages Will Now Drive The Pace Of The Market Rural India Accounts For A 28 Share Of The 6
Festive Season: ग्रामीण भारत पर टिकी बाजार की नजर, कम बारिश से सतर्कता बढ़ी, जानिए कैसे खर्च कर रहे गांव?
अजय केडिया, बाजार विशेषज्ञ
Published by: Devesh Saraswat
Updated Tue, 20 Oct 2026 12:01 PM IST
सार
त्योहारी सीजन दस्तक दे चुका है और बाजार की निगाह इस बार गांव की गलियों और कस्बों की हाट पर है, जो कभी शहरों के चमचमाते मॉल पर टिकी रहती थी। सवाल है कि ग्रामीण भारत कैसे खर्च करता है। वहां जेब में पैसा भी है और मन में चाहत भी। पर, वर्ष 2026 में महंगाई, खाद्य कीमतों और मानसून की अनिश्चितता ने क्रयशक्ति पर दबाव भी बनाए रखा है।
त्योहारी सीजन में होने वाले कारोबार में ग्रामीण भारत अहम योगदान देता है।
- फोटो : AI
गांव की गलियों और कस्बों में लगने वाले हाट पर आज अब बाजार की निगाह टिकी है, जो कभी शहरों के चमचमाते मॉल पर रहा करती थी। वहां जेब में पैसा भी है और मन में चाहत भी। खपत बढ़ी है और गैर-खाद्य खर्च का दायरा फैला है। इसलिए, गांव और छोटे शहर उपभोक्ता बाजार के अहम केंद्र बन गए हैं। पर, वर्ष 2026 में महंगाई, खाद्य कीमतों और मानसून की अनिश्चितता ने ग्रामीण क्रयशक्ति पर दबाव भी बनाए रखा है।
दो चेहरे, एक अर्थव्यवस्था
भारत की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के दो जाने-पहचाने चेहरे हैं। एक वह इंडिया, जो बड़े शहरों के मॉल्स में दिखता है। दूसरा वह भारत, जो गांवों और छोटे बाजारों में बसता है। त्योहार पर जब कोई परिवार मिठाइयां, कपड़े या घरेलू उपकरण खरीदता है, तो वह एक बहुत बड़ी आर्थिक कहानी का हिस्सा बन जाता है। नील्सनआईक्यू के हालिया अनुमान के मुताबिक, आज भी 65 प्रतिशत से अधिक भारतीय गांवों में रहते हैं। वर्ष 2023-24 के आधिकारिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति मासिक खपत 4,122 रुपये तक पहुंच गई, जो पिछले साल से लगभग 9 प्रतिशत ज्यादा है। सबसे दिलचस्प बात यह कि इस खर्च का आधे से अधिक हिस्सा, यानी 53 प्रतिशत, गैर-खाद्य जरूरतों पर गया। ग्रामीण भारत की अहमियत इसीलिए है कि उसकी खरीदारी सिर्फ रोजमर्रा के किराना सामान तक सीमित नहीं है।
बिक्री के आंकड़ों में झलकी रौनक
गांव की मांग में आया यह सकारात्मक बदलाव अब बिक्री के आंकड़ों में साफ दिखने लगा है। नील्सनआईक्यू के अनुसार अप्रैल-जून 2025 में शहरों के बाहर एफएमसीजी वॉल्यूम में साल-दर-साल 8.4 प्रतिशत की मजबूत बढ़त दर्ज हुई, जबकि इसी अवधि में शहरों में यह वृद्धि सिर्फ 4.6 प्रतिशत रही। नाबार्ड के नवंबर 2025 के सर्वेक्षण में करीब 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने बीते साल की तुलना में खपत बढ़ने की बात कही, जबकि 42.2 प्रतिशत परिवारों ने आय में भी इजाफा बताया। औपचारिक वित्त तक पहुंच भी बढ़ी है। सर्वेक्षण के अनुसार 58.3 प्रतिशत लोगों ने अब केवल औपचारिक ऋण स्रोतों का इस्तेमाल किया, जबकि सितंबर 2024 में यह आंकड़ा 48.7 प्रतिशत था। बिक्री के ये मजबूत आंकड़े और परिवारों की राय बताते हैं कि कारोबारी घराने ग्रामीण भारत पर इतनी गहरी नजर क्यों टिकाए हैं।
रफ्तार जरा थमी, महंगाई ने बढ़ाई फिक्र
हालांकि बाजार की तेज चाल अब कुछ धीमी पड़ी है। नील्सनआईक्यू के मुताबिक अक्तूबर-दिसंबर 2025 में शहरों के बाहर वॉल्यूम ग्रोथ घटकर 2.9 प्रतिशत रह गई, फिर भी यह 2.3 प्रतिशत की शहरी वृद्धि दर से आगे रही। अगस्त 2026 में महिंद्रा ने घरेलू बाजार में 27,595 ट्रैक्टर बेचे, जो पिछले साल से 5 प्रतिशत अधिक है। शहरों के बाहर बेरोजगारी दर भी 4.3 से घटकर 4.1 प्रतिशत पर आ गई। लेकिन, रोजगार के आंकड़े यह नहीं बताते कि परिवार कितना कमा रहे हैं। अगस्त 2026 में शहरों के बाहर महंगाई दर 5.23 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिसमें खाद्य मुद्रास्फीति 6.13 प्रतिशत रही। असमान मानसूनी बारिश ने आने वाली फसल और त्योहारी खरीद शक्ति को भी थोड़ा अनिश्चित बना दिया है। 2026 की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या आय खाने-पीने की चीजों के बढ़ते दामों का बोझ उठा पाएगी।
त्योहार की झोली में सबका हिस्सा
त्योहारी पैसा सिर्फ बड़े विक्रेताओं तक नहीं रुकता, वह पड़ोस की दुकानों और सेवा देने वालों तक भी पहुंचता है। कैट के दिवाली 2025 सर्वेक्षण के अनुसार कुल कारोबार 6.05 लाख करोड़ रुपये का रहा, जिसमें 5.40 लाख करोड़ के सामान और 65,000 करोड़ की सेवाएं शामिल थीं। इस कारोबार में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी गांवों और कस्बों की रही।
पूरे देश के स्तर पर किराना-एफएमसीजी का हिस्सा 12 प्रतिशत, सोना-आभूषण का 10 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक्स का 8 प्रतिशत रहा। टिकाऊ उपभोक्ता सामान, रेडीमेड कपड़े और उपहार में से हर एक की हिस्सेदारी 7-7 प्रतिशत रही। घर की सजावट और फर्नीचर 5-5 प्रतिशत, मिठाइयां-नमकीन 5 प्रतिशत और टेक्सटाइल 4 प्रतिशत रहे। पूजा सामग्री, फल-मेवे और बेकरी को 3-3 प्रतिशत मिले, जूतों को 2 प्रतिशत और अन्य वस्तुओं को 19 प्रतिशत। कैट का गणेशोत्सव 2026 के लिए 50,000 करोड़ रुपये का अनुमान भी पूरी तरह राष्ट्रव्यापी है।
खानपान और पहनावा, फिर सपनों की सवारी
आमतौर पर परिवार सबसे पहले भोजन, मिठाइयां और कपड़े खरीदते हैं। इसके बाद अपनी आय और उपलब्ध कर्ज के हिसाब से मोटरसाइकिल, घरेलू उपकरण या कीमती आभूषणों पर गंभीरता से सोचते हैं। बढ़ते दाम खरीदारी की आदतें बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर, 2026 की दूसरी तिमाही में भारत में सोने के आभूषणों की मांग वजन के हिसाब से साल-दर-साल 15 प्रतिशत गिर गई। ऑनलाइन शॉपिंग ने विकल्प जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन एफएमसीजी में ई-कॉमर्स की 7 प्रतिशत हिस्सेदारी पूरे भारत का औसत है। ग्रामीण भारत की आकांक्षाएं उड़ान भर रही हैं। 2026 के बाजार की असली ताकत स्थानीय बिक्री, बेहतर फसल आय और खरीद शक्ति से ही पूरी तरह साफ होगी।
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