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पुआल से बनेगा बायोचार : मिट्टी की सेहत सुधरेगी, कार्बन क्रेडिट से बढ़ेगी किसान की कमाई

डॉ. निमिष कपूर, वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचार विशेषज्ञ Published by: Devesh Saraswat Updated Sun, 19 Apr 2026 04:34 PM IST
सार

हर साल 15 करोड़ टन फसल अवशेष जलाने से हवा जहरीली और मिट्टी कमजोर होती है, लेकिन इसी अवशेष से बना बायोचार खेत में मिलाने पर पैदावार 25 प्रतिशत तक बढ सकती है, ग्रीनहाउस गैसें 75 प्रतिशत तक घट सकती हैं और किसान कार्बन क्रेडिट बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी कमा सकते हैं।

किसान पुआल से करेंगे कमाई।
किसान पुआल से करेंगे कमाई। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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उत्तर भारत के खेतों में अक्तूबर-नवंबर में धान का पुआल जलाने से हर साल धुएं का गुबार उठने लगता है। धान, गेहूं, मक्का और कपास जैसी प्रमुख फसलों की कटाई के बाद देश में हर साल लगभग 15 करोड़ टन फसल अवशेष निकलते हैं। खरीफ फसलों की कटाई के बाद जल्दी गेहूं बोने के लिए खेत की तैयारी, मजदूरों की कमी और मशीनों का खर्च बचाने के लिए किसान पुआल जला देते हैं। इससे हवा जहरीली होती है, मिट्टी की उर्वरता घटती है और जलवायु संकट बढ़ता है। अगर किसान पुआल से बायोचार बनाएं तो उन्हें कमाई का नया जरिया मिल सकता है। बायोचार न सिर्फ मिट्टी के जैविक तत्वों को सक्रिय रखता है, बल्कि यह ग्रीनहाउस गैसों को भी नियंत्रित करता है और किसान को कार्बन क्रेडिट दिलाकर उनकी आमदनी बढ़ा सकता है।

क्या होता है बायोचार
धान के पुआल, गेहूं की डंठल या कपास के अवशेष जैसे फसलों के कचरे को जब कम ऑक्सीजन में 350 से 700 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर धीमी और नियंत्रित आंच में पकाते हैं तो काला, हल्का और छिद्रयुक्त पदार्थ बनता है, जिसे बायोचार कहते हैं। इसे कम ऑक्सीजन की मौजूदगी में बनाते हैं ताकि अवशेष पूरी तरह जलकर राख न बन जाएं। इस प्रक्रिया में अवशेषों का नाजुक जैविक हिस्सा नष्ट हो जाता है और केवल मजबूत कार्बन ढांचा बचता है। देखने में कोयले जैसा लगने वाला बायोचार मिट्टी में मिलकर दशकों-सदियों तक टिका रहता है। बायोचार न तो आसानी से जलता है और न ही मिट्टी के सूक्ष्मजीव इसे जल्दी तोड़ पाते हैं। जबकि, गोबर की खाद या कम्पोस्ट कुछ ही सालों में गल जाती है, लेकिन बायोचार कार्बन को मिट्टी में दीर्घकाल तक सुरक्षित रखता है। इसीलिए, वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन से लड़ने का शक्तिशाली हथियार मानते हैं।

ग्रीनहाउस गैसों में कमी
बायोचार खेती से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसके उपयोग से धान के जलभराव वाले खेतों की मीथेन गैस औसतन 20 प्रतिशत और नाइट्रस ऑक्साइड 13.1 प्रतिशत तक कम हो सकती है। बायोचार की छिद्रयुक्त सूक्ष्म संरचना मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर देती है, जो इन खतरनाक गैसों को बनने से रोक देते हैं। नतीजा यह होता है कि ये गैसें हवा को प्रदूषित करने के बजाय मिट्टी के भीतर ही नियंत्रित हो जाती हैं। अमेरिकी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की शोध पत्रिका पीएनएएस (2025) में प्रकाशित 438 अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के विश्लेषण के अनुसार, लगातार कुछ वर्षों तक बायोचार के उपयोग से फसलों की औसत पैदावार 10.8 प्रतिशत तक बढ सकती है। नाइट्रस ऑक्साइड में कमी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कार्बन डाइऑक्साइड से लगभग 300 गुना अधिक शक्तिशाली गैस है। इसके अलावा, बायोचार मिट्टी में कार्बन को दीर्घकाल तक सुरक्षित बनाए रखता है, जिससे मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है और जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने में भी मदद मिलती है।

खेत में बायोचार बनाने का यूरोपीय मॉडल
यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स ने बायोचार को सीधे खेतों में उपयोग करने का व्यावहारिक मॉडल पेश किया है। इसमें पुआल और गोबर जैसे अवशेषों को अलग-अलग भट्टियों में बायोचार में बदला जाता है ताकि पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके और फसल अवशेष से अधिकतम लाभ लिया जा सके। मध्यम आकार के फार्म में इस तरह सालाना लगभग 300 टन बायोचार उत्पादन संभव है, जिससे लगभग 350 टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष कार्बन स्थायी रूप से मिट्टी में सुरक्षित कर सकते हैं। अध्ययन में पाया गया कि गोबर को बायोचार प्रणाली में शामिल करने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 75 प्रतिशत तक कम हो सकता है। साथ ही, बायोचार उत्पादन से निकलने वाली अतिरिक्त गर्मी फार्म की अन्य जरूरतों में इस्तेमाल कर कुल ऊर्जा दक्षता भी बढ़ाई जा सकती है।

पंजाब और यूपी की मिट्टी में चमत्कार
इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल एंड एनवायरनमेंटल रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन में सामने आया है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश की अधिकांश मिट्टी में जैविक तत्व 0.5 प्रतिशत से भी कम बचा है। बायोचार को व्यावहारिक समाधान के रूप में परखने पर पाया गया कि प्रति हेक्टेयर 5–10 टन बायोचार मिलाने पर गेहूं और धान की पैदावार 10–25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह फायदा केवल पोषण से नहीं, बल्कि मिट्टी की बदली हुई संरचना से आया क्योंकि मिट्टी अधिक भुरभुरी, नमी पकड़ने वाली और जडों के लिए अनुकूल बन गई थी। पर्यावरणीय लाभ भी कम उल्लेखनीय नहीं रहे। बायोचार से ग्रीनहाउस गैसों में 30–50 प्रतिशत तक कमी आई और रासायनिक खाद की जरूरत 20–30 प्रतिशत घट गई, जिससे किसानों की जेब पर सीधा असर पड़ा। इसके अलावा, बायोचार की छिद्रयुक्त संरचना मानसूनी बारिश में बह जाने वाले पोषक तत्वों को भी मिट्टी में बांधे रखती है, जिससे पौधों को समय पर पोषण मिलता है।

कार्बन बाजार से जोड़ने की तैयारी
अध्ययनों में पाया गया है कि भारत में फसल अवशेष का बड़ा हिस्सा बायोचार में बदला दें, तो हर साल लगभग 10 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष कार्बन स्थायी रूप से मिट्टी में कैद कर सकते हैं। यह मात्रा भारत के मौजूदा वन-कार्बन सिंक से लगभग ढाई गुना ज्यादा है। इसका मतलब है कि जंगल एक साल में जितना कार्बन सोखते हैं, उससे कहीं अधिक कार्बन खेती के अवशेषों से मिट्टी में सुरक्षित कर सकते हैं। यही वजह है कि बायोचार को 2026 के भारत के कार्बन बाजार से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। किसानों को पुआल से बायोचार बनाकर खेत में इस्तेमाल करने पर कार्बन क्रेडिट मिलेगा, जिसे कंपनियां खरीदेंगी, जिससे किसानों को फसल के अलावा आय का नया अवसर भी मिलेगा।

कार्बन क्रेडिट से किसानों की कमाई
भारत में कपास की खेती जलवायु परिवर्तन की मार सबसे पहले झेलती है और अनियमित बारिश, बढती गर्मी तथा पानी की कमी से इसकी पैदावार सीधे प्रभावित होती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए 2025–26 में बेटर कॉटन इनिशिएटिव और जलवायु-तकनीक कंपनी प्लानबू ने गुजरात और महाराष्ट्र के 75 से अधिक कपास किसानों के साथ एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। किसानों को सिखाया गया कि कटाई के बाद बचे डंठल और लकड़ी को जलाने के बजाय बायोचार में कैसे बदलें। खेतों के पास लगाई गई तीन पोर्टेबल भट्टियों से 375 टन अवशेष से 60–70 टन बायोचार धुआं-रहित तरीके से तैयार हुआ। इस पायलट परियोजना का लक्ष्य तीन स्तंभों पर टिका था – मिट्टी की सेहत, पानी की बचत और कार्बन क्रेडिट। तैयार बायोचार को ग्लोबल आर्टिसन सी-सिंक मानकों के तहत पंजीकृत किया जा रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय प्रणाली है, जो मिट्टी में कार्बन के स्थायी भंडारण का मापन, प्रमाणन और बाजार में ट्रेडिंग सुनिश्चित करती है, जो छोटे किसानों को कार्बन क्रेडिट अर्जित कर अतिरिक्त कमाई का मौका देती है।

कहां और कैसे बने, तो मिलेगा फायदा
बायोचार का असर एक जैसा नहीं होता – यह मिट्टी की किस्म, फसल और बनाने के तरीके पर निर्भर करता है। वर्ष 2026 में शोध पत्रिका फ्रंटियर्स ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड इंजीनियरिंग में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र, मध्य भारत और कुछ पूर्वी क्षेत्रों की काली मिट्टी वाले धान के खेतों में बायोचार सबसे ज्यादा कारगर रहा, क्योंकि इसे मिलाने से भारी मिट्टी में हवा और पानी का संतुलन सुधरता है और मीथेन उत्सर्जन कम हो जाता है। अध्ययन का दूसरा अहम निष्कर्ष यह था कि यदि बायोचार बनाने में सौर ऊर्जा, बायोगैस या अन्य स्वच्छ ईंधन का उपयोग किया जाए तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20–40 प्रतिशत तक अतिरिक्त कमी कर सकते हैं।

विज्ञान को जमीन से जोड़ने की जरूरत
नीतिगत स्पष्टता और इच्छाशक्ति हो तो पुआल बायोचार बनकर मिट्टी उपजाऊ करेगा, जलवायु सुरक्षित करेगा और कार्बन क्रेडिट, खाद व पानी की बचत के जरिए किसानों की आमदनी भी बढाएगा। सही नीति पर अमल हो तो भारतीय कृषि उत्पादक होने के साथ-साथ जलवायु-अनुकूल और आर्थिक रूप से सशक्त भी बन सकती है।


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