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Gen Z किसान, खेती में भी स्वैग: डिग्री से ड्रोन तक... Farming को बना रहे नया स्टार्टअप और कमाई का ब्रांड

डॉ. उमाशंकर मिश्र / मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 18 Oct 2026 03:40 PM IST
सार

दुनिया भर में युवा अपने हक और बेहतर भविष्य के लिए सड़कों पर आवाज बुलंद कर रहे हैं, तो भारत के गांवों में कुछ Gen Z नौजवान खेतों में तरक्की तलाश रहे हैं। इनके एक हाथ में डिग्री है, तो दूसरे में स्मार्टफोन, जेहन में बिजनेस का आइडिया और पैरों के नीचे मिट्टी! खेत इनके सपनों के स्टार्टअप का मैदान है, जहां यह जुनूनी पीढ़ी खेती को मजबूरी या घाटे का सौदा मानने के बजाय प्रयोग, उद्यम और कमाई के नए अवसर के रूप में देखती है। ऐसे ही कुछ जोशीले Gen Z किसानों की कहानी, उन्हीं की जुबानी...

Gen Z किसान, खेती में भी स्वैग
Gen Z किसान, खेती में भी स्वैग - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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नारेबाजी, प्रदर्शन और सड़कों पर उतरकर अपने हक की आवाज बुलंद करने वाले नौजवानों की तस्वीरें अक्सर सुर्खियां बटोरती हैं, पर एक तस्वीर ऐसी भी है, जो शोर में दब जाती है। मिट्टी में सने हाथ, मोबाइल पर मौसम का पूर्वानुमान देखती आंखें और सपनों को फसल की तरह बोता हुआ जोश! यह उस Gen Z की तस्वीर है, जिसने खेती को बोझ नहीं, ब्रांड बनाने का मौका समझा है।

कभी जो खेत पिता और दादा की विरासत भर होते थे, आज वही युवाओं के लिए खेती की प्रयोगशाला और कारोबार का मैदान बन गए हैं। ड्रोन से छिड़काव, सेंसर से निगरानी, AI डैशबोर्ड से सिंचाई व पैदावार का हिसाब और सोशल मीडिया से सीधे ग्राहक तक पहुंच उनकी स्मार्ट फार्मिंग के उपकरण हैं।

कोई 200 बीघा की पारंपरिक खेती के बीच 14 बीघे में 56 किस्म के फल उगा रहा है, कोई सीए की पढ़ाई छोड़कर पॉलीहाउस में शिमला मिर्च-खीरा उगा रहा है, कोई गोबर से कमाई का नया रास्ता निकाल रहा है, कोई ड्रैगन फ्रूट उगाकर सीधे ग्राहकों तक पहुंच बना रहा है, तो कोई डेयरी को ब्रांड बनाने की तैयारी में है। आज जब अधिकतर लोग खेती को घाटे का सौदा मानते हैं, तो आत्मविश्वास से भरे येे किसान दूसरे युवाओं के लिए रोल मॉडल बनकर उभर रहे हैं। आइए, मिलते हैं ऐसे ही कुछ जोशीले Gen Z किसानों से... 
13 लाख निवेश, मंडी से बनाई दूरी, अब फार्म पर आते हैं ग्राहक
13 लाख निवेश, मंडी से बनाई दूरी, अब फार्म पर आते हैं ग्राहक - फोटो : गांव जंक्शन

13 लाख निवेश, मंडी से बनाई दूरी, अब फार्म पर आते हैं ग्राहक

मैं देवेश पांडेय, बस्ती जिले के कुठुआ गांव का रहने वाला हूं। मैंने एमकॉम और बीएड किया है। हमारे आसपास ज्यादातर किसान धान, गेहूं और गन्ने की खेती करते हैं। मैंने अलग रास्ता चुना और अपने खेत की दोमट मिट्टी व स्थानीय मौसम को देखते हुए डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट की सियाम रेड वैरायटी लगाई। मेरे खेत में ड्रैगन फ्रूट के करीब 2,440 पौधे और 610 पिलर लगे हैं। पिलर मैंने स्थानीय स्तर पर खुद बनवाए, जिससे लागत कम करने में मदद मिली।

शुरुआत में करीब 13 लाख रुपये निवेश किया। करीब 18 महीने बाद पहली फलत आई और करीब 1 से 1.5 टन उत्पादन मिला। पहली फलत से ही करीब 3 से 4 लाख रुपये की कमाई हुई। दो सीजन में शुरुआती निवेश निकल गया। मैंने अपनी उपज बेचने के लिए सिर्फ मंडी पर निर्भर रहने के बजाय सीधे ग्राहकों और रिटेल विक्रेताओं से संपर्क बनाया। ग्राहक खुद मेरे फार्म पर आकर फल खरीदते हैं, जिससे मुझे बेहतर कीमत मिल रही है।

अब डिजिटल मार्केटिंग के जरिए अपने फल को बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा हूं। मैं खेती में मुर्गी की बीट से बनी खाद का इस्तेमाल करता हूं और कीट नियंत्रण के लिए नीम तेल अपनाता हूं। मेरा लक्ष्य अगले साल करीब 6 लाख रुपये की आमदनी तक पहुंचना है। इसके लिए ड्रैगन फ्रूट के साथ प्याज और लहसुन जैसी फसलों की इंटरक्रॉपिंग करने की तैयारी है। आगे अपने खेत में पौधे तैयार कर आसपास के किसानों को उपलब्ध कराने का भी इरादा है। 


23 गायों संग देखा सपना, अब डेयरी ब्रांड बनाने की तैयारी
23 गायों संग देखा सपना, अब डेयरी ब्रांड बनाने की तैयारी - फोटो : गांव जंक्शन
23 गायों संग देखा सपना, अब डेयरी ब्रांड बनाने की तैयारी

मैं देवी शंकर सिंह, वाराणसी के डोमरी गांव से हूं। मेरा सफर खेल के मैदान से शुरू होकर डेयरी फार्म तक पहुंचा है। बचपन से पशुओं के प्रति लगाव रहा है। मेरे पिता पहले घरेलू उपयोग के लिए कुछ गायें पालते थे। उन्हें देखकर धीरे-धीरे यह व्यवसाय में बदल गया। वर्ष 2021 में मैंने डेयरी उद्योग को समझने की शुरुआत की। देश के अलग-अलग हिस्सों में निजी गोशालाओं और डेयरी फार्मों में जाकर देखा। वहां पशुओं की देखभाल, ब्रीडिंग, फीड मैनेजमेंट, दुग्ध उत्पादन और डेयरी फार्म के संचालन की बारीकियां सीखीं।

अनुभव और प्रशिक्षण के बाद अपने उपलब्ध संसाधनों के आधार पर करीब 23 गायों से डेयरी फार्म की शुरुआत की। अभी 10 गाय और खरीद रहा हूं। भरोसा बना तो उपलब्ध जमीन पर 23 गायों संग अपना डेयरी फार्म शुरू किया। आज मेरे फार्म से रोजाना करीब 40 लीटर दुग्ध का उत्पादन होता है। शुरुआत में मैं बल्क सप्लाई करता था, पर अब वाराणसी में अपने डेयरी उत्पाद अलग-अलग पैकेजिंग में लॉन्च करने की दिशा में बढ़ रहा हूं।

बेहतर ब्रीडिंग और पशु प्रबंधन पर भी काम कर रहा हूं। उत्तर प्रदेश सरकार की मिनी नंदिनी योजना में मेरा चयन भी हुआ है। मेरा लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण डेयरी उत्पादों के साथ बेहतर ब्रीडिंग और पशुपालन को बढ़ावा देना है। मेरा मानना है कि पशुओं के प्रति लगाव और सही प्रशिक्षण से डेयरी को सफल व्यवसाय बनाया जा सकता है।
14 बीघे में बाग, गेहूं-धान के बीच उगाए 56 किस्म के फल 
14 बीघे में बाग, गेहूं-धान के बीच उगाए 56 किस्म के फल  - फोटो : गांव जंक्शन
14 बीघे में बाग, गेहूं-धान के बीच उगाए 56 किस्म के फल 

मेरा नाम सनवर बिलाल है और मैं मैनपुरी के सिकंदरपुर गांव में रहता हूं। बीएससी करने के बाद मैंने नौकरी नहीं तलाशी, बल्कि खेती को कॅरिअर बना लिया। पारंपरिक खेती के साथ बागवानी में नए प्रयोग शुरू किए। मैंने खेती को वैज्ञानिक तरीके से बेहतर आमदनी का जरिया बनाने का फैसला किया। मेरे परिवार में करीब 200 बीघा जमीन पर खेती होती है, जहां धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलें अधिक उगाई जाती हैं। लेकिन, मेरा रुझान बागवानी और नई किस्मों के प्रयोग की ओर है।

मैंने 14 बीघा क्षेत्र में बागवानी शुरू की है, जिसमें 56 किस्मों के फल लगाए हैं। इनमें आम की अलग-अलग किस्मों के साथ मियाजाकी, केसर, केला, कस्तूरी, रेड अमला, लोकाट, अनार, डोरसेट और आलूबुखारा जैसी किस्में शामिल हैं। मैं कश्मीरी एप्पल बेर पंतनगर यूनिवर्सिटी से डेमो में लेकर आया और उसे बाग में लगाया। फलों की वैरायटी, उत्पादन क्षमता और स्थानीय परिस्थितियों में उनके प्रदर्शन को देखकर मैं आगे विस्तार की योजना बना रहा हूं।

अभी उत्पादन बड़े व्यावसायिक स्तर पर नहीं है, इसलिए तैयार फल आसपास के लोगों और गांव में भी उपलब्ध कराए जाते हैं। बाग में करीब 55-56 नए पौधे भी लगाए गए हैं, जिन्हें आगे उत्पादन के हिसाब से बढ़ाने की तैयारी है। अब सरकारी मदद से मैं पॉलीहाउस में उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा हूं। 
सीए की किताबें बंद करके पॉलीहाउस का दरवाजा खोला
सीए की किताबें बंद करके पॉलीहाउस का दरवाजा खोला - फोटो : गांव जंक्शन
सीए की किताबें बंद करके पॉलीहाउस का दरवाजा खोला

मैं अभय तायल, कासगंज जिले के गोरा गांव से हूं। बीकॉम के बाद मैं सीए की पढ़ाई कर रहा था, लेकिन इसी बीच मैंने खेती में कुछ नया करने की ठान ली। परिवार की जमीन पहले बंटाई पर दी जाती थी। मैंने खुद इसकी कमान संभाली और इसे आधुनिक तरीके से करने का फैसला किया। आज मैं करीब 7 बीघा जमीन पर खेती कर रहा हूं, जिसमें करीब 4 एकड़ का पॉलीहाउस शामिल है। पॉलीहाउस में दो एकड़ में खीरा और दो एकड़ में लाल-पीली शिमला मिर्च की खेती कर रहा हूं।

नियंत्रित वातावरण में संरक्षित खेती और बेहतर उत्पादन हासिल करने की कोशिश है। मेरी खेती में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का खास महत्व है। ड्रिप से पौधों की जरूरत के अनुसार सीधे जड़ों तक पानी पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है। इससे पानी और खर्च दोनों की बचत होती है। गर्मी के मौसम में पॉलीहाउस के अंदर तापमान नियंत्रित रखने के लिए फॉगर और स्प्रिंकलर सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं।

फॉगर से नमी और तापमान नियंत्रित करने में मदद मिलती है। स्प्रिंकलर का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार करते हैं। इस तरह, सिंचाई और तापमान प्रबंधन को तकनीक की मदद से नियंत्रित किया जाता है। फसल की निगरानी, समय पर सिंचाई, तापमान प्रबंधन और श्रमिकों की उपलब्धता लगातार चुनौती बनी रहती है। इसके बावजूद इस खेती से करीब 18-20 लोगों को सीधा रोजगार मिल रहा है। 
मिट्टी और गोबर दोनों को बनाया कमाई का जरिया 
मिट्टी और गोबर दोनों को बनाया कमाई का जरिया  - फोटो : गांव जंक्शन
मिट्टी और गोबर दोनों को बनाया कमाई का जरिया 

मैं तारेश सैनी, राजस्थान के अलवर जिले की कठूमर तहसील के कानेती गांव का रहने वाला हूं। मेरे पूर्वज भी खेती करते आए हैं। मैंने दूसरे युवाओं की तरह नौकरी तलाशने के बजाय खेती को अपना कॅरिअर बना लिया। मेरे खेत में नींबू और बेर का बगीचा है। इसके साथ ही, कई सब्जियां और अन्य फसलें भी उगाता हूं। मैं मोबाइल पर गूगल की मदद से मौसम की जानकारी लेता रहता हूं ताकि फसलों के देखरेख के लिए जरूरी उपाय समय रहते किए जा सकें।

उसी के अनुसार, फसलों में दवा और खाद देता हूं। खेती से फिलहाल अच्छा मुनाफा मिल रहा है। करीब पांच बीघा जमीन पर खेती के साथ अब मैं इससे जुड़े नए काम भी कर रहा हूं। करीब छह महीने पहले मैंने गाय के गोबर से मूर्तियां और अन्य उपयोगी उत्पाद बनाने का काम शुरू किया। इसकी प्रेरणा मुझे एक टूर के दौरान मिली, जहां मैंने ऐसे उत्पाद देखे और उनके बारे में जानकारी जुटाई। इसके बाद, मैंने अपने गांव में ये उत्पाद बनाना शुरू कर दिया। 

यह अब अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन चुका है। अब किसान मेलों में जाकर मैं स्टॉल लगाकर इन्हे बेचता हूं। अपने बड़े भाई की मदद से अब मैं इसे इंटरनेट के जरिए बेचने की योजना बना रहा हूं। मेरा मानना है कि खेती को छोटा काम समझने की जरूरत नहीं है। मेहनत, लगन और नई सोच के साथ युवा खेती और उससे जुड़े कामों को अपनाकर अच्छा रोजगार और व्यवसाय खड़ा कर सकते हैं।
जेन Z किसान
जेन Z किसान - फोटो : गांव जंक्शन
कौन हैं  Gen Z किसान?

जेन जी किसान यानी Generation Z के वे युवा, जो खेती-किसानी को अपना पेशा बना रहे हैं। यह माना जाता है कि जेन जी किसानों की रुचि स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ड्रोन, सेंसर और एआई जैसी तकनीकों को खेती में अपनाने में अधिक हो सकती है। खेती को व्यवसाय की तरह देखने वाले युवाओं की संख्या भी इस सूची में कम नहीं है। सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि ब्रांडिंग, प्रोसेसिंग, डायरेक्ट मार्केटिंग और ऑनलाइन बिक्री को ये स्मार्ट किसान तरजीह देते हैं।

नई जानकारी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता इन युवा किसानों की सबसे अधिक है। कृषि विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ YouTube, Instagram और अन्य डिजिटल माध्यमों से सीखना इनका शगल है। जलवायु और टिकाऊ खेती को लेकर सजगता भी देखने को मिलती है।

पानी, मिट्टी, जैव विविधता और खेती की पर्यावरणीय लागत जैसे मुद्दों पर भी इनकी अच्छी समझ है। खेती में नई फसलों, नए बाजारों और वैकल्पिक आय के रास्ते तलाशने को ये युवा हमेशा तैयार रहते हैं। काम और जीवन के संतुलन को महत्व देना भी ये बखूबी जानते हैं। तभी खेती को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पसंदीदा स्वतंत्र कॅरिअर के रूप में देखते हैं।
भारत में विश्व के सर्वाधिक Gen Z 
भारत में विश्व के सर्वाधिक Gen Z  - फोटो : सोशल मीडिया
भारत में विश्व के सर्वाधिक Gen Z 

जेनरेशन Z, जिसे Zoomers कहते हैं, वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों का जनसांख्यिकीय समूह है। यह मिलेनियल्स और जेनरेशन अल्फा के बीच की पीढ़ी है और वर्ष 2026 में इसकी आयु 14 से 29 वर्ष के बीच है। इसी पीढ़ी को संक्षिप्त में  Gen Z (जेन जी) कहते हैं। सही अर्थों में पहली ‘डिजिटल नेटिव’ पीढ़ी के रूप में Gen Z स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और लगातार इंटरनेट कनेक्टिविटी के बीच बड़ी हुई है।

संयुक्त राष्ट्र के जनसांख्यिकीय विश्लेषणों के अनुसार, भारत में कुल जेन जी की आबादी 40 से 50 करोड़ के बीच है। यह दुनिया की सबसे बड़ी जेन जी आबादी है। सरकारी नीतियों में 15-29 वर्ष के लोगों को युवा माना गया है। इस आधिकारिक युवा ब्रैकेट की बात करें, तो इसमें जेन जी की आबादी लगभग 37 करोड़ है। भारत की वर्तमान युवा आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह 'जेन जी' से ही बना है। भारत के आगामी चुनावों और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से देखें तो देश के कुल योग्य मतदाताओं (18+ आयु) में से लगभग 29.2% (यानी हर 3 में से 1 वोटर) जेन जी श्रेणी से आता है।
सिर्फ जज्बे नहीं, आंकड़ों की कहानी
सिर्फ जज्बे नहीं, आंकड़ों की कहानी - फोटो : गांव जंक्शन
सिर्फ जज्बे नहीं, आंकड़ों की कहानी

वर्ष 2021 के एक अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका के किसान परिवारों में पले-बढ़े करीब 89 फीसदी Gen Z युवा खेती में बने रहना चाहते हैं। इनमें से सिर्फ 54 फीसदी युवा पुराने ढर्रे पर खेती चलाना चाहते हैं। वहीं, स्प्रेडशीट, रिटर्न और नए मॉडल पर नई पीढ़ी के शेष युवाओं का भरोसा अधिक देखा गया। भारत की तस्वीर इससे उलट रही है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के अध्ययन ने इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के 41,000 से ज्यादा ग्रामीण परिवारों के आंकड़ों का विश्लेषण कर पाया कि वर्ष 2005 से 2012 के बीच किसानों के बच्चों के खेती अपनाने की संभावना 21.1 प्रतिशत घट गई।

यह माना गया कि बेहतर शिक्षा के साथ युवाओं का रुझान मोटी कमाई वाली नौकरियों की ओर बढ़ा है। लोकनीति के 2017 के सर्वे में पाया गया कि शिक्षा बढ़ने के साथ युवाओं की खेती में दिलचस्पी घट जाती है। जहां अमेरिका में ज्यादातर किसान-पृष्ठभूमि के Gen Z युवा किसी न किसी रूप में कृषि से जुड़े रहना चाहते हैं, वहीं भारत में पढ़े-लिखे ग्रामीण युवाओं का रुझान परंपरागत खेती से दूर होता दिखाई देता है। यही वह विरोधाभास है, जिसे तोड़ते हुए कुछ भारतीय Gen Z युवा अब खेती को नए सिरे से, नए मॉडल के साथ अपना रहे हैं।
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