Home›Misal Bemisal›Vishesh›
Fodder Farming Earn Up To 3 5 Lakh Annually Per Acre Through Bajra Napier Fodder Sugarcane And Cactus
पशुओं का चारा, किसानों की कमाई : बाजरा-नेपियर से 3.5 लाख रुपये सालाना आय, कैक्टस से बंजर जमीन का कायाकल्प
शैलेश अरोड़ा, झांसी
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 20 Oct 2026 02:04 PM IST
सार
भारत में दुनिया की सबसे बड़ी पशु आबादी है। दुग्ध उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है, मगर डेयरी की लागत में चारा सबसे बड़ा खर्च बना हुआ है। उन्नत चारा फसलों की खेती से प्रति एकड़ सालाना 2-3 लाख रुपये तक आमदनी संभव है और जोखिम पारंपरिक फसलों से कम होता है। नई चारा फसलों, बंजर जमीन के उपयोग और चारे के अर्थशास्त्र पर झांसी स्थित आईसीएआर-आईजीएफआरआई के निदेशक डॉ. पंकज कौशल से शैलेश अरोड़ा की खास बातचीत...
पशुपालक अपने पशु पर जो खर्च करता है, उसका 60 से 70 प्रतिशत चारे पर जाता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
नेपियर, बरसीम और बाजरे के अलावा कौन-सी फसलें हैं, जो मवेशियों का दुग्ध उत्पादन बढ़ा सकती हैं?
फॉडर केन यानी चारे वाला गन्ना इसमें प्रमुखता से शामिल है। गन्ने की ये किस्में चीनी मिलों के लिए उपयुक्त नहीं होतीं, पर इनका चारा पोषण मूल्य के लिहाज से उत्कृष्ट है। यह बहुवर्षीय फसल है, जिससे साइलेज बन सकता है या हरा चारा सीधे खिलाया जा सकता है।
50×50 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई करें तो एक हेक्टेयर में 30,000 से 40,000 जड़ें लगती हैं और साल भर में कम से कम 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर चारा मिलता है। प्रति एकड़ शुरुआती खर्च करीब 70,000 से 80,000 रुपये है। तीन साल में लगभग ₹3 लाख का मूल्य वापस मिल जाता है।
चारा संस्थान में कैक्टस भी देखने को मिलता है, यह किस काम आता है?
यह कांटे से रहित जादुई कैक्टस है, जो फाइव-एफ यानी फूड, फॉडर (चारा), फ्यूल (जैव ईंधन), फर्टिलाइजर (जैविक खाद) और फैशन (वीगन लेदर) के लिए जाना जाता है। इसकी कुट्टी सीधे पशुओं को खिलाई जा सकती है। यह रेतीले, शुष्क और विषम हालात के अनुकूल है, इसलिए बंजर भूमि में हम इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
राज्य सरकारें व किसान इसे बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं। कैक्टस की कतारों के बीच हमने अंजन घास (सैंकरस सिलियरीस) लगाई है, जो सदाबहार है और कठिन परिस्थितियों में भी फलती-फूलती है। यह पूरा पैकेज अपनाएं तो यदि कोई पशु एक लीटर दूध देता है, तो वह 1.5 से 2 लीटर तक दूध दे सकता है।
क्या कैक्टस केवल राजस्थान या रेगिस्तान के लिए है?
नहीं, जहां भी ऊसर भूमि है, वहां यह अच्छा प्रदर्शन करता है। देश में करीब 96 मिलियन हेक्टेयर जमीन अल्प-उपयोग में पड़ी है, जिसके कायाकल्प के लिए ऐसी जलवायु-सहनशील फसलें सर्वोत्तम हैं। इसके एक पंजे (क्लैडोड) से 8 टुकड़े निकलते हैं। संस्थान में एक पंजा करीब ₹8 का मिलता है। इन टुकड़ों को लगाने पर साल भर में हर टुकड़े से 16 नए पंजे तक तैयार हो जाते हैं। किसान एक बार लेकर जाएं तो खुद ही अपनी नर्सरी में इसे बढ़ा सकता है।
चारा अनुसंधान संस्थान में और कौन-सी घासें हैं?
हमारे पास पूरे भारत से चारा फसलों और घासों की करीब 13,000 किस्में (जर्मप्लाज्म) सुरक्षित हैं। इनमें क्लोरस गायना (रोड्स घास) खारी मिट्टी में भी उगती है, ब्रेकेरिया जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है और गिनी घास छाया में उगती है। गिनी घास का हमने नया वेरिएंट विकसित किया है, जो भारी बायोमास देता है और जड़ों से मिट्टी को बांधकर पहाड़ी ढलानों व नहरों की मेड़ों पर कटाव रोकता है। मानव-निर्मित फसलें भी हैं, जो दुनिया में सबसे पहले हमारे संस्थान में बनी हैं।
बाजरे का उसके जंगली रिश्तेदार स्क्वेमलेटम से क्रॉस कराकर बनी चारा फसल इसका उदाहरण है, जिसे विकसित करने में 20 वर्ष का शोध लगा। यह मात्र 20 दिन की बढ़वार में तैयार हो जाती है। इस बहुवर्षीय फसल की कई बार कटाई की जा सकती है। इसे बाजरा-नेपियर की तरह काटकर खिलाया जा सकता है या सीधे चरने के लिए छोड़ा जा सकता है। बाजरा-नेपियर की तुलना में यह बहुत कम पानी में पनपती है और इसके बीज का अंकुरण 80 से 90 प्रतिशत है।
बाजरा, नेपियर और स्क्वेमलेटम को मिलाकर एक और त्रि-संकर फसल बनाई है, जिसमें 15 से 18 साल लगे। सामान्य बाजरा-नेपियर अत्यधिक सूखे और तनाव में टिक नहीं पाता। इसलिए, जंगली घास को स्ट्रेस डोनर के रूप में जोड़ा गया। यह भी दुनिया की पहली ऐसी त्रि-संकर फसल है। देश के 50 केंद्रों पर परीक्षण के बाद यह किस्म अभी दूसरे वर्ष में है और जल्द अधिसूचित होकर किसानों तक पहुंचेगी।
डेयरी में सबसे बड़ा खर्च चारे पर होता है। इसका क्या समाधान है? संतुलित पोषण का फॉर्मूला क्या है?
पशुपालक अपने पशु पर जो खर्च करता है, उसका 60 से 70 प्रतिशत चारे पर जाता है। कम लागत में बेहतर पोषण वाला हरा चारा देने से दूध की प्रति इकाई उत्पादन लागत काफी घट जाती है। हरे चारे में कार्बोहाइड्रेट वाली फसलें (घास, बाजरा, मक्का) और दलहनी फसलें (बरसीम, लूसर्न, लोबिया, स्टाइलो) दोनों होनी चाहिए।
इनका संतुलन 30:70 या 60:40 के अनुपात में रखें, ताकि पशु को ऊर्जा और प्रोटीन दोनों मिलें। खनिज और विटामिन सहित पूरा संतुलन बनने पर दूध की दैनिक उपज 10 से 20 प्रतिशत बढ़ जाती है। हमने क्षेत्र-विशिष्ट मिनरल मिक्सचर तैयार किए हैं और टोटल मिक्स्ड राशन (टीएमआर) विकसित किया है, जिसके पेटेंट की प्रक्रिया चल रही है।
संतुलित पोषण से जिस पशु के जीवन में 3 या 4 ब्यात होते थे, उसमें 1 से 2 ब्यात और बढ़ जाते हैं, यानी क्षमता लगभग डेढ़ गुना हो जाती है।
चारा बेचने के लिए एक एकड़ में बाजरा-नेपियर लगाएं तो आमदनी क्या होगी?
तीन साल के आर्थिक मॉडल में एक एकड़ की कुल लागत करीब ₹2 लाख आती है, जबकि फसल तैयार होने पर हर साल औसतन ₹3 लाख से ₹3.5 लाख की आमदनी होती है। तीन साल में ₹2 लाख के निवेश पर ₹8 से ₹9 लाख वापस आते हैं। प्रति हेक्टेयर सालाना करीब 150 टन हरा चारा मिलता है और एक बार लगाने पर 5 से 6 साल तक उत्पादन लिया जा सकता है।
क्या पेड़ों के नीचे चारा उत्पादन का भी कोई मॉडल है?
यह 'सिल्वी-पास्चर' या 'हॉर्टी-पास्चर' प्रणाली है। आमतौर पर पेड़ों के नीचे की जमीन खाली रहती है। हमारे त्रि-स्तरीय मॉडल में ऊपर पाकर, बबूल, नीम जैसे वृक्ष, बीच में प्रोटीन युक्त चारा और ईंधन देने वाली सुबबूल और नीचे अंजन घास व दलहनी 'स्टाइलो' लगते हैं। इससे प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष 10 से 15 टन ड्राई मैटर मिलता है। ₹60,000 से ₹70,000 के सालाना खर्च पर किसान ₹1 लाख से ₹1.5 लाख शुद्ध कमा सकता है। इसके अलावा, कार्बन क्रेडिट से ₹25,000 प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष अतिरिक्त आय होती है, जो फलदार वृक्ष वाले मॉडल में ₹35,000 तक पहुंच जाती है।
संस्थान के 'स्टेट फॉडर प्लान' क्या हैं?
यह हमारी सबसे बड़ी नीतिगत उपलब्धि है। हर राज्य के लिए 70 से 80 पृष्ठों का मास्टर-दस्तावेज बना है, जिसमें पशुओं की संख्या, कृषि-जलवायु क्षेत्र, चारे की कमी, उसे पाटने की तकनीकें और वर्षवार लक्ष्य व बजट दिए गए हैं। 16 राज्यों ने इसे अपना लिया है और प्रति राज्य सालाना ₹5 करोड़ से ₹100 करोड़ तक का बजट आवंटित किया है। चारागाहों का सही पुनरुद्धार हो तो देश में चारे की कमी 6 से 8 प्रतिशत तक घट सकती है। चरागाह में चरने वाले पशु खूंटे पर बंधे पशुओं से अधिक स्वस्थ और अधिक दूध देने वाले होते हैं।
चारा संस्थान के शोध का अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ता है?
केवल 13 प्रमुख किस्मों ने पिछले 15 वर्षों में भारतीय जीडीपी में ₹50,000 करोड़ से ज्यादा का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान दिया है।
किसानों और युवा उद्यमियों को संस्थान से किस तरह की सहायता मिल सकती है?
संस्थान की ओर से किसानों के लिए एक्सपोजर विजिट आयोजित की जाती है। प्रशिक्षण और तकनीक की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है। व्यावसायिक खेती, साइलेज या चारा आधारित स्टार्टअप के लिए संस्थान का एग्री-बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर (एबिक) आइडिया मूल्यांकन से लेकर बाजार से जोड़ने तक मदद करता है। किसान हेल्पलाइन नंबर 0517-2730241 पर भी संपर्क कर सकते हैं।
(यह साक्षात्कार मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।