मुख्यमंत्री सौर कृषि पंप योजना के तहत महाराष्ट्र में वर्ष 2019 से अब तक 3.5 लाख से अधिक सौर पंप लग चुके हैं। इस योजना ने किसानों को बिजली की निर्भरता से मुक्त किया है, लेकिन मरम्मत सेवा और भूजल दोहन जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।
किसानों और बिजली आपूर्ति का रिश्ता लंबे समय से अनंत प्रतीक्षा का रहा है। खेत में खड़ी प्यासी फसल और बिजली का इंतजार किसानों की नियति बनी रही है। रात के सन्नाटे में सांप-बिच्छू और जंगली जानवरों के खतरे के बीच सिंचाई करना उनकी मजबूरी रही है। इसी संकट के समाधान के रूप में जनवरी, 2019 में मुख्यमंत्री सौर कृषि पंप योजना शुरू की गई।
सात साल के सफर में यह योजना केवल सरकारी अनुदान का जरिया नहीं बनी, बल्कि इसने किसानों को बिजली कंपनी की निर्भरता से मुक्त करने की ठोस कोशिश की है। महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी 2026 तक राज्य में 3.5 लाख से अधिक सौर पंप लगाए जा चुके हैं।
किसान की जेब पर कम बोझ
विदर्भ और मराठवाड़ा, जहां बिजली के खंभे पहुंचाना और लाइन लॉस रोकना बड़ी चुनौती थी, वहां सौर पंपों ने खेती का गणित बदल दिया है। अब सूरज की पहली किरण के साथ ही किसान के खेत में पानी बहने लगता है।
पीएम-कुसुम योजना के साथ जुड़ी इस योजना का लक्ष्य कुल 10.45 लाख सौर पंप लगाना है, जिससे करीब दस लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा मिल सकेगी। इसका असर खेत तक ही सीमित नहीं है। कई जिलों में कृषि फीडरों पर दबाव कम हुआ है और रात में बिजली आपूर्ति का संतुलन भी बेहतर हुआ है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो एक सौर पंप की कुल लागत ढाई से तीन लाख रुपये तक है, जो किसी भी छोटे किसान की पहुंच से बाहर है।
सरकार ने यहां बड़ा दखल दिया है। सामान्य श्रेणी के किसान को केवल दस फीसदी और आरक्षित वर्ग को मात्र पांच फीसदी राशि देनी होती है और बाकी का बोझ सरकार उठाती है। इससे किसान हर महीने आने वाले बिजली बिल और बकाया की चिंता से मुक्त हो गया है। पश्चिमी महाराष्ट्र के गन्ना बेल्ट में सोलर पंप के स्थिर दबाव से ड्रिप सिंचाई का तालमेल भी बेहतर बैठ रहा है, जिससे पानी की बचत हो रही है।
पंपों की मरम्मत और सुरक्षा की चुनौती
जमीनी हकीकत में कुछ कड़वी सच्चाइयां भी हैं। सबसे बड़ी कमजोरी पंप लगने के बाद की मरम्मत सेवा से जुड़ी है। पंप का कंट्रोलर या पैनल खराब होने पर किसान को कई हफ्तों तक इंजीनियर का इंतजार करना पड़ता है।
नासिक और जलगांव जैसे जिलों में सौर पैनलों की चोरी भी बड़ी समस्या रही है। इसके साथ ही मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे जल-संकट वाले इलाकों में भूजल के अत्यधिक दोहन की आशंका भी जताई जा रही है। इसीलिए, अब सौर पंपों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
बढ़ा रोजगार, महिलाओं को भी फायदा
पुरुषों के शहरों की ओर पलायन के बाद अब महिलाएं खुद इन सौर पंपों को संचालित कर रही हैं। साथ ही, गांवों में युवाओं के लिए 'सोलर टेक्नीशियन' के रूप में रोजगार की नई संभावनाएं खुल रही हैं। कई जिलों में निजी तकनीशियन और छोटे सेवा प्रदाता सौर उपकरणों की मरम्मत का काम संभाल रहे हैं। यदि इसे संगठित रूप मिले तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए स्थाई रोजगार का अहम स्रोत बन सकता है।
अन्नदाता से ऊर्जादाता बनेंगे किसान
पीएम कुसुम योजना के तहत किसान अपनी अतिरिक्त सौर ऊर्जा ग्रिड को बेच सकेंगे। ऐसी स्थिति में खेत केवल फसल उत्पादन का नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन का भी स्रोत बनेंगे। ऐसे में किसान मानसून और बिजली कंपनी की मेहरबानी पर निर्भर अन्नदाता मात्र नहीं रहेंगे, बल्कि वे अपने लिए खुद ऊर्जा पैदा करने वाले ऊर्जादाता बनने की राह पर आगे बढ़ सकेंगे।
(यह स्टोरी मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)
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