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MAHARASHTRA : ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वरदान बनेगा नया सहकारी कानून, गांवों की तरक्की को मिलेगी नई उड़ान

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 18 Jun 2025 07:06 PM IST
सार

विश्व बैंक ने महाराष्ट्र की प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के प्रदर्शन को सराहा है। यह वैश्विक मान्यता महाराष्ट्र के सहकारी मॉडल की विश्वसनीयता को उजागर करती है और भविष्य में इसके टिकाऊ विकास और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

महाराष्ट्र में सहाकारित कानून में सुधार के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की गई है।
महाराष्ट्र में सहाकारित कानून में सुधार के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की गई है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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बात 12 मई, 2025 की है, जब महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक ने मुंबई के यशवंतराव चव्हाण केंद्र में अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम आयोजित किया था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस दौरान राज्य के सहकारी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने की पहल के बारे में बात करते हुए सहकारी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए नए सुधारों का प्रस्ताव रखा। उन्होंने महाराष्ट्र में सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करने के लिए नया कानून लाने की मंशा जाहिर की। फडणवीस ने खुलासा किया कि सरकार दो विशेषज्ञ समितियों का गठन करेगी। इनमें से एक समिति सहकारी समिति अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव करेगी, ताकि इसे समकालीन आवश्यकताओं के साथ संरेखित किया जा सके। दूसरी समिति, सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने वाली रणनीतियों की सिफारिश करेगी। यदि ऐसा होता है तो यह महाराष्ट्र के सहकारी क्षेत्र में एक बड़ा नीतिगत बदलाव होगा। सरकार का दावा है कि उसके इस कदम से उन सहकारी बैंकों को सशक्त बनाया जाएगा, जिन्होंने अच्छे प्रशासन और परिचालन दक्षता का प्रदर्शन किया है। ऐसे बैंकों को राज्य सरकार सरकारी खातों का प्रबंधन करने की अनुमति देने तक पर विचार कर रही है।

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हाशिए के लोगों के लिए वरदान बनेगा नया सहकारिता कानून
केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी इस दौरान मुख्यमंत्री फडणवीस के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए एक व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। गडकरी ने अपने अनुभव से बताया कि जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हिचकिचा रहे थे, तब राज्य के सहकारी बैंकों से मिली शुरुआती फंडिंग की बदौलत ही वे सहकारी चीनी मिल स्थापित करने में सक्षम हुए।



विश्व बैंक ने महाराष्ट्र में प्राथमिक कृषि ऋण समितियों को सराहा 
महाराष्ट्र में सहकारी समितियों ने छोटे पैमाने के उद्यमियों, किसानों और हाशिए के समुदायों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महाराष्ट्र में सहकारी आंदोलन का एक समृद्ध इतिहास है। यही वजह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। इसके अंतर्गत केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ही सहकारी क्षेत्र को सक्रिय रूप से बढ़ावा देती आई हैं। हालांकि, महाराष्ट्र की लगभग आधी सहकारी समितियां हाउसिंग सोसाइटी हैं। इनके कामकाज को भी सुव्यवस्थित करने के लिए सुधारों पर बल दिया जा रहा है। साथ ही, विश्व बैंक ने अपनी हालिया समीक्षा में राज्य की प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के मजबूत प्रदर्शन को स्वीकार किया है। यह वैश्विक मान्यता महाराष्ट्र के सहकारी मॉडल की विश्वसनीयता को रेखांकित करती है और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
 


क्यों जरूरी है सहकारिता कानून में सुधार?
राज्य के सहाकारिता क्षेत्र में अनियमितताएं बढ़ी हैं। इन अनियमितताओं में शामिल या उसके लिए जवाबदेह लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जाती रही है। लेकिन, राजनीतिक दखल के कारण जवाबदेही तय करने में चुनौती आती है। 

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सहकारी आंदोलन की उपलब्धियों का उचित मूल्यांकन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी तंत्र की जरूरत है। ऐसा किए बिना निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करना और गलतियों के दोहराव को रोकना कठिन होगा। सहकारी संस्थाओं में राजनीतिक वर्चस्व और अनियमितताओं को महाराष्ट्र के जाने-माने किसान नेता शरद जोशी ने बहुत पहले भांप लिया था। उन्होंने कहा था, 'सहकारी क्षेत्र की सफलता जरूरी नहीं है कि सहकारी आंदोलन की सफलता हो। संभव है कि यह सहकारी समिति का नेतृत्व करने वाले नेता की सफलता तक सीमित रह जाए।'

यही वजह है कि सहकारी क्षेत्र के तहत सुधारों की कड़ी में अब कंपनी अधिनियम और सहकारी अधिनियम के तत्वों को मिलाकर सशक्त कानून बनाने की मांग हो रही है। लिहाजा, गडकरी का तर्क है कि आधुनिक समय में सहकारी आंदोलन की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए कानूनी सुधार आवश्यक हैं। उन्होंने राज्य से सहकारी क्षेत्र में मेहनती योगदानकर्ताओं को पुरस्कृत करने और इसके प्रावधानों का गलत फायदा उठाने वालों को दंडित करने का भी आग्रह किया है। 
 


फायदे क्या-क्या हैं?
नए कानून से सहकारी क्षेत्र में सुधार के जरिए समाज को कई लाभ होने की उम्मीद है। अव्वल तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। इससे संस्थाओं के कार्यक्षेत्र और अधिकार बढ़ाए जा सकेंगे, जिससे ये संस्थाएं विशेष रूप से डेयरी और कृषि क्षेत्र के साथ-साथ ग्रामीण आबादी की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लिहाजा, ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी पलायन को कम करने में मदद मिलेगी।

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किसानों को बीज, उर्वरक और उपकरणों के लिए सस्ते ऋण प्रदान करने वाली प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटियों की भूमिका मजबूत होगी। जिससे कृषि उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। नए कानून के जरिए डिजिटल प्रक्रियाओं और समवर्ती ऑडिट जैसे प्रावधानों से सहकारी संस्थाओं में वित्तीय अनियमितताएं कम हो सकती हैं। वहीं, सहकारी बैंक और संस्थाओं में संचालक मंडलों की जवाबदेही बढ़ाई जा सकती है, जिससे भ्रष्टाचार और मनमानीपूर्ण तरीके से किए जाने वाले कारोबार पर अंकुश लगेगा। 

नए कानून के प्रभावी होने के बाद कहा जा रहा है कि इसके चलते सहकारी क्षेत्र में सुधार होने से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और किसान-उत्पादक कंपनियों के माध्यम से रोजगार सृजन की संभावना अधिक है। 


सहकारी संस्थाओं को आधुनिक तकनीक और प्रबंधन प्रथाओं से जोड़कर उन्हें प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है। यह विशेष रूप से चीनी कारखानों और डेयरी जैसे क्षेत्रों में लाभकारी होगा, जो महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण हैं। वहीं, छोटे किसानों और ग्रामीण महिलाओं को सहकारी समितियों के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण के लिए अधिक अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, स्वयं सहायता समूहों को भी बढ़ावा मिलेगा, जो ग्रामीण महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करते हैं। 



नए कानून की एक बड़ी विशेषता राजनीतिक हस्तक्षेप में कमी बताई जा रही है, जिससे सहकारी संस्थाएं अधिक लोकतांत्रिक और सदस्य-केंद्रित बन सकेंगी। लेकिन, इस कानून को लागू करते समय एक सावधानी भी बरती जानी चाहिए। यह सावधानी सहकारी सिद्धांतों की रक्षा की है। कोई भी नया कानून बनाते और उसे लागू करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि सुधारों के दौरान सहकारी आंदोलन के मूल सिद्धांतों, जैसे- स्वैच्छिकता और लोकतांत्रिक नियंत्रण को नुकसान तो नहीं पहुंचेगा!

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क्यों अहम है महाराष्ट्र की सहकारिता?
महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन भारत के सबसे जीवंत और प्रभावशाली सहकारी आंदोलनों में से एक रहा है। यह आंदोलन विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने, सामाजिक-आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने में सफल रहा है। महाराष्ट्र की सहकारी सफलता की कहानी कई क्षेत्रों तक फैली हुई है, जिसमें चीनी उत्पादन, डेयरी, क्रेडिट, खाद एवं बीज वितरण, मत्स्य पालन और गृह-निर्माण सोसायटियां शामिल हैं। 



महाराष्ट्र को भारत की 'चीनी राजधानी' कहा जाता है और इसका श्रेय राज्य के सहकारी चीनी कारखानों को ही जाता है। वसंतदादा पाटिल सहकारी चीनी मिल और इसके जैसे अन्य मिलों ने न केवल चीनी उत्पादन में क्रांति लाई, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक स्थिरता भी प्रदान की। 1950-60 के दशक में शुरू हुए इन कारखानों ने पश्चिमी महाराष्ट्र के किसानों को संगठित किया और उन्हें गन्ना उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। आज महाराष्ट्र में 200 से अधिक सहकारी चीनी कारखाने हैं, जो देश के चीनी उत्पादन में बड़ा योगदान करते हैं।

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महाराष्ट्र में डेयरी सहकारिता ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जैसे कि वारणा डेयरी और गोकुल डेयरी (कोल्हापुर) ने दूध उत्पादन और प्रसंस्करण में सहकारी मॉडल को सफल बनाया। महानंद डेयरी (मुंबई) और आसपास के क्षेत्रों में दूध आपूर्ति का एक प्रमुख केंद्र है। इसके चलते डेयरी सहकारी समितियों ने छोटे और सीमांत किसानों को संगठित किया। दूध संग्रह केंद्र और प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना ने ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित आय सुनिश्चित की। डेयरी कारोबार में महिलाओं को भी स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से शामिल किया गया, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है। 



महाराष्ट्र में सहकारी बैंक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। इन बैंकों की कम ब्याज दरों और लचीली शर्तों ने छोटे किसानों और व्यवसायियों को काफी लाभ पहुंचाया। इसी तरह, गृह-निर्माण सहकारी समितियों ने विशेष रूप से मुंबई और पुणे जैसे शहरी क्षेत्रों में मध्यम वर्ग को किफायती आवास उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे सामाजिक स्थिरता बढ़ाने में काफी मदद मिली है। महाराष्ट्र में सहकारिता को सफल बनाने में लोकतांत्रिक ढांचे, सरकारी समर्थन, स्थानीय नेतृत्व और आर्थिक समावेशन की अहम भूमिका रही है। 

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बनेगा नया सहकारिता कानून
महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 राज्य की सहकारी संस्थाओं को नियंत्रित करता है। इसे अपडेट करने के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की गई है। यह समिति सहकारी कानून में संशोधन के सुझाव देगी, ताकि सहकारी क्षेत्र ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में प्रभावी भूमिका निभा सके। समिति सहकारी कानून और कंपनी अधिनियम के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए सुझाव देगी, ताकि सहकारी संस्थाएं अधिक पारदर्शी और कुशल बन सकें। संशोधन का उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को नई जरूरतों, जैसे- ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन, रोजगार सृजन और डिजिटल प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने, के अनुरूप बनाना है। 97वे संविधान संशोधन ने सहकारी संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया। इसी आधार पर महाराष्ट्र में 2013 से संशोधित सहकारी कानून लागू है। नया कानून इस ढांचे को मजबूत करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र सहकारी बैंकों, चीनी कारखानों, डेयरी और गृह-निर्माण संस्थाओं तक विस्तृत होगा।

उम्मीद की जानी चाहिए कि सहाकरिता को मजबूत करने में नए कानून मददगार होंगे, जिससे ग्रामीण आबादी को सशक्त बनाया जा सकेगा। 


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