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PULSES : दलहन संकट का एक आयाम सोयाबीन की बढ़ती खेती, किसानों की आकांक्षा को समझे बिना कैसे मिलेगी आत्मिर्भरता?

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक, ठाणे Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 18 Nov 2024 02:48 PM IST
सार

दलहन उत्पादन में किसानों की बेरुखी, दालों के बढ़ते आयात और पोषण सुरक्षा के संकट का एक आयाम सोयाबीन भी है। सोयाबीन की फसल अब बाकी दालों के अनुपात में 80 प्रतिशत तक उगाई जा रही है। पिछले कई वर्षों के दौरान सोयाबीन की खेती तेजी से बढ़ी है।

दलहनी फसलों की खेती अपेक्षाकृत सस्ती और आसान रही है, मगर दलहन की जगह सोयाबीन ले रही है।
दलहनी फसलों की खेती अपेक्षाकृत सस्ती और आसान रही है, मगर दलहन की जगह सोयाबीन ले रही है। - फोटो : शिरीष खरे
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विस्तार
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महाराष्ट्र का मराठवाड़ा हो या फिर मध्य प्रदेश में महाकौशल का अंचल, भारत में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो दालों के लिए जाने जाते हैं और लंबे समय तक इन्हें दालों के कटोरे के रूप में भी पहचान हासिल होती रही है, लेकिन पिछले कई वर्षों से स्थितियां बदल रही हैं और दालों के कटोरे से दाल गायब होती जा रही है। वजह है कि खेती में जिस तरह का फसल पैटर्न चल रहा है, उसमें हम दालों की विविधता कायम नहीं रख पा रहे हैं और इसकी एक मुख्य वजह है सोयाबीन। दरअसल, इन क्षेत्रों में सोयाबीन को प्राथमिकता देने से लेकर सोयाबीन की कीमतों में गारंटी तथा काफी हद तक सरकारी संरक्षण मिलने से किसान तमाम किस्म की दालों को उगाने की बजाय सिर्फ सोयाबीन की फसल पर ध्यान दे रहे हैं। यदि महाराष्ट्र के मराठवाड़ा अंचल के जिलों की बात की जाए, तो यहां एक समय तक सोयाबीन कभी नहीं उगाई गई थी। सोयाबीन की फसल बाकी दालों के अनुपात में 80 प्रतिशत तक उगाई जा रही है और पिछले पांच वर्ष में सोयाबीन का क्षेत्र जिस तेजी से बढ़ता जा रहा है, उसे देखते हुए सवाल पैदा होता है कि मराठवाड़ा जैसे अंचल में सोयाबीन के बाद क्या दालों की दूसरी फसलों को जगह मिलेगी भी या नहीं!

तेजी से बढ़ता रहा दालों का आयात
ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारे देश का दलहन आयात 2019 से लगातार बढ़ रहा है। किसी समय विभिन्न दलहनी फसलों का अच्छा उत्पादन करने वाले भारत में वर्ष 2023-24 आते-आते दालों का आयात दोगुना हो गया है। इसी वर्ष सिर्फ एक देश ब्राजील से 20 हजार टन उड़द का आयात किया गया है। स्थिति यह है कि हम मोजाम्बिक और म्यांमार जैसे गरीब देशों से भी दालें आयात कर रहे हैं। पिछले वर्ष अकेले दाल आयात पर भारत सरकार द्वारा करीब28 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद, ऐसा क्यों है कि भारत का किसान दालें उगाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है, जो कि खाद्य और पोषण सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। इस पर विचार करने की जरूरत है। 

यह ध्यान देने वाली बात है कि खेती में रिस्क को कवर करने के लिए आमतौर पर किसान एक या दो से अधिक किस्मों की फसलें उगाते रहे हैं। लेकिन, मराठवाड़ा जैसे दाल प्रधान क्षेत्र में जो स्थिति बनी है, उसके मुताबिक मूंग, मटकी, हुलगा, ज्वार, अरहर, उड़द के क्षेत्र का किसान अब सोयाबीन नामक एक ही फसल से खेती का सारा रिस्क कवर करना चाहता है। दरअसल, खेती में यह सुझाव दिया जाता है कि यदि शुष्क भूमि खेती की समस्या है, तो मौजूदा समय में उसे हल करने के केवल दो तरीके हैं। एक तो यह कि बड़ी सिंचाई परियोजनाएं शुरू करके बड़े पैमाने पर जमीनों को बागवानी के योग्य बना लिया जाए या फिर फसल-चक्र को ध्यान में रखकर उसी के अनुरूप सीजन विशेष में उत्पादन किया जाए। यही वजह है कि अपने यहां खरीफ  सीजन का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा पारंपरिक जलवायु-अनुकूल फसलों को ध्यान में रखकर पैदा किया जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में इसमें सोयाबीन की हिस्सेदारी बढ़ रही है।
दाल
दाल - फोटो : गांव जंक्शन
समझनी होगी किसानों की आकांक्षा 
दलहन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल करने के लिए संबंधित किसानों की आकांक्षाओं को समझना होगा। साठ के दशक में 'हरित क्रांति' हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि गेहूं और चावल के उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। इससे उत्तर-भारत और खासकर पंजाब तथा हरियाणा के किसानों को अच्छी आय की गारंटी मिलने लगी। परिणामस्वरूप, खरीफ मौसम में धान और रबी मौसम में गेहूं की फसल का पैटर्न तैयार हुआ। इसका असर यह हुआ कि पूरे उत्तर भारत में दालों का रकबा तेजी से घट गया। गेहूं-चावल उगाने की जिद का संघर्ष एक अलग मुद्दा है। लेकिन, इस संदर्भ में यह नहीं भूलना चाहिए कि जो किसान आज सोयाबीन उगाता है, वह कल अरहर, मूंग और मटकी उगा रहा था। शुष्क भूमि पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर वह कल गन्ना भी ले सकता है। दरअसल, वर्तमान समय में फसल परिवर्तन इसी प्रकार हो रहा है, जिसमें हमारी पोषण की आवश्यकताओं और विविधताओं के अनुरूप खेती का लक्ष्य अनदेखा हो गया है।
अरहर की दाल
अरहर की दाल - फोटो : गांव जंक्शन
किसान क्यों उगाएं दालें?
भारत में देखा जाए तो कुल दलहन किसानों में से 10 फीसदी भी उन्नत बीजों का इस्तेमाल नहीं करते। कई किसान बाजार के 'अनाज' को बीज के रूप में उपयोग करते हैं। इसीलिए, मूंग और मटकी जैसी फसलों की पैदावार बहुत कम होती है। एक अहम बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों ने अब तक दलहन की सात फसलों में 400 से अधिक किस्मों का उत्पादन किया है। इनमें से वर्तमान में अनुशंसित किस्में 124 हैं। अब इनमें से भी कई बीज बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हैं। विसंगति यह भी है कि चना, अरहर और उड़द के कुछ बीज बिक्री के लिए उपलब्ध हैं भी; तो नीतिगत स्तर पर इन दालों के बीज उत्पादन के लिए प्रोत्साहन के एजेंडे में नहीं दिखाई देते हैं। यही वजह है कि इन फसलों को लेकर किसान इतने हतोत्साहित रहते हैं कि ऐसी फसलों की कीमत बढ़ने पर भी खेती का रकबा नहीं बढ़ाना चाहते। लिहाजा, यह मान लेना गलत है कि केवल अच्छा भाव मिलने से ही उत्पादन बढ़ेगा।

असल में इसके लिए अनुसंधान और किसानों को नीतिगत समर्थन की ज्यादा जरूरत है। पिछले दिनों कृषि मामलों के जानकारों के एक दल द्वारा मराठवाड़ा में धाराशिव जिले के किसानों से जब यह पूछा गया कि उन्हें दाल की किसी फसल पर कितनी आय मिलेगी, तो वे सोयाबीन के अलावा अन्य दलहनी फसल को उगाना पसंद करेंगे? किसानों का जवाब था - 30 हजार रुपये प्रति एकड़ जिस दाल की खेती से उन्हें मिले, तो वो उस फसल को उगा सकते हैं। उस समय उड़द 5,000 रुपये प्रति क्विंटल, मूंग 7,000 रुपये प्रति क्विंटल और तुअर 6,000 रुपये प्रति क्विंटल थी। हालांकि, उन्होंने 4,000 प्रति क्विंटल सोयाबीन का चयन किया था, क्योंकि सोयाबीन के प्रति सरकारी संरक्षण को किसान अच्छी तरह से समझ गए हैं, फिर सोयाबीन के रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना भी है और इससे आय में भी बढ़ोतरी होगी। ऐसे किसानों को कृषि जानकारों के दल ने जब यह प्रस्ताव दिया कि उन्हें कम से कम तीन दालें बोने पर सीधी सब्सिडी मिलेगी, तो क्या वे तीन दालें बोना पसंद करेंगे? इस पर किसानों का कहना था कि यदि उन्हें सब्सिडी मिलेगी, तो वे अन्य दालें बोने के लिए तैयार हैं।
सोयाबीन
सोयाबीन - फोटो : सोशल मीडिया
सोयाबीन पर चर्चा ज्यादा, पर क्यों?
सोयाबीन की कीमत न्यूनतम स्तर पर है, इसलिए इसके बाजार मूल्य के मुद्दे पर चर्चा चल रही है। जैसे ही नई सोयाबीन बाजार में आएगी, इसकी मांग बढ़ने की संभावना है। सोयाबीन अपनी उच्च उपज और न्यूनतम आय क्षमता के कारण शुष्क भूमि वाले किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण फसल मानी जाती है। अंतरराष्ट्रीय संस्था यूएसडीए के अनुमान के मुताबिक, दुनिया के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक देश; जैसे - अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना इस साल सोयाबीन का अच्छा उत्पादन होने का अनुमान लगा रहे हैं। सोयाबीन का उत्पादन थोड़ा जटिल मुद्दा है, क्योंकि अमेरिका में सोयाबीन की फसल तब होती है, जब हमारे यहां सोयाबीन में फूल आते हैं। ब्राजील की फसल जनवरी में शुरू होती है और अर्जेंटीना की सोयाबीन अप्रैल में आती है। इसीलिए, भारत जैसे देश में बदलता मौसम, पिछले साल के स्टॉक और बुवाई वृद्धि जैसे कोई भी एक कारक बाजार में उतार-चढ़ाव को ट्रिगर कर सकता है। दो साल पहले सोयाबीन की कीमत दस हजार रूपये तक थी। उस समय ब्राजील का उत्पादन उम्मीदों से काफी कम रह गया था। कहने का मतलब सोयाबीन की फसल में अन्य फसलों की तुलना में अंतरराष्ट्रीय मामलों का असर अधिक हैं। यह और बात है कि पिछले दस वर्षों की तुलना में सोयाबीन को हाल-फिलहाल कम बाजार मूल्य मिल रहा है। 

कभी अतिवृष्टि, तो कभी बीज की कमी जैसे अलग-अलग कारणों से सोयाबीन उत्पादन का मुद्दा हर साल चर्चा में रहता है। इसके बावजूद, सोयाबीन की फसल का क्षेत्रफल बढ़ रहा है। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता के मामले में हम बहुत पीछे हैं। ब्राजील 35 क्विंटल, चीन 25 क्विंटल, अमेरिका 37 क्विंटल, अर्जेंटीना-30 क्विंटल के मुकाबले भारत महज 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सोयाबीन उत्पादन करता है। वहीं, क्षेत्रफल वृद्धि के हिसाब से कुल उत्पादन में हम शीर्ष पांच देशों में हैं। सोयाबीन जैसी अन्य फसलों के क्षेत्र को एक ही फसल से कवर करना हमेशा जोखिम भरा होता है। इसीलिए, इस पर बहस हो सकती है, क्योंकि हमारे पास मूंग और मटकी जैसी अन्य दालों को भी उगाने का विकल्प है और ये दालें हमारी खाने की आदतों से लेकर उगाने की परंपरा में भी शामिल रही हैं, इसलिए ये एक अच्छा विकल्प बन सकती हैं।
सोयाबीन की खेती
सोयाबीन की खेती - फोटो : गांव जंक्शन
पोषण सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती 
भारतीय लोगों के पास पोषण सुरक्षा के लिए दालों के अलावा कोई अन्य बेहतर विकल्प नहीं है। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि भारतीय व्यक्ति के दैनिक आहार में दालें कम हो रही हैं। इसका मुख्य कारण दालों का बढ़ता बाजार मूल्य है। दरअसल, आम लोगों के आहार में प्रति व्यक्ति 80 ग्राम दाल प्रतिदिन उपलब्ध कराने के लिए हमें उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी, जो कि हासिल नहीं हो पा रही है। इसीलिए, हम वर्तमान में दालों के आयात पर भारी खर्च करते हैं। फिर भी, हालत यह है कि हम प्रति व्यक्ति 80 ग्राम का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में, वर्ष के दो सीजन में कम से कम पांच दालें उगाने वाले जो किसान हैं, उन्हें नीति और योजना में शामिल करते हुए लाभार्थी बनाया जाना चाहिए। फिर, उन्हें प्रशिक्षण भी देना चाहिए, ताकि पोषण सुरक्षा, भूमि की उर्वरता, बुवाई की योजना जैसे कई नवोन्वेषी विचारों को क्रियान्वित किया जा सके। भारत जैसे देश में दलहनी फसलों की इतनी विविधता है कि एक किसान साल भर दालें उगा सकता है। फिर, इसमें गेहूं या धान की तरह सिंचाई के लिए बांध बनाने या फसल ऋण देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि सरकार दाल उगाने वाले किसान को भी 'प्रिय' माने बस।
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