विज्ञापन
Home› Misal Bemisal› Vishesh› Farmer Community Is At The Center Of Politics Ignoring Farmers Can Keep Them Away From Power

FARMERS & POLITICS: राजनीति के केंद्र में कृषक समुदाय, किसानों की अनदेखी कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल

शिरीष खरे, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 19 Dec 2024 11:03 AM IST
सार

सोयाबीन से लेकर कपास, प्याज, गन्ना और बागवानी फसलों के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। सरकार की प्राथमिकताओं पर फोकस करें, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कोई भी दल यहां किसानों को अनदेखा करके सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। 

चुनावी नतीजों से स्पष्ट है कि कोई भी दल किसान को अनदेखा करके यहां सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता।
चुनावी नतीजों से स्पष्ट है कि कोई भी दल किसान को अनदेखा करके यहां सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। - फोटो : गांव जंक्शन
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

देश के सबसे अमीर राज्यों में गिना जाने वाला महाराष्ट्र बीते दिनों राज्य में हुए चुनाव और इसके परिणामों के चलते काफी चर्चा में रहा है। बात चाहे लाडली बहना योजना से गरीब महिलाओं को मिलने वाली करीब 1500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद की हो, या फिर सोयाबीन की खरीद से लेकर सोयाबीन और कपास सहित अन्य फसलों के उचित दाम एवं रियायती योजनाओं की हो, चुनाव के केंद्र में कहीं-न-कहीं किसान या उसका परिवार ही रहा। आखिरकार, किसान और उसके परिवार को तरह-तरह से राहत या फिर उसका आश्वासन देकर राज्य की महायुति गठबंधन ने सत्ता में वापसी सुनिश्चित कर ली। राजनीतिक दलों के चुनावी अभियान और सरकार की प्राथमिकताओं पर फोकस करें; तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कोई भी दल किसान को अनदेखा करके यहां सत्ता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। 'नाबार्ड अखिल भारतीय ग्रामीण आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट' से पता चलता है कि महाराष्ट्र में 59 प्रतिशत ग्रामीण परिवार जीवन-यापन के लिए कृषि निर्भर हैं। इसीलिए, महाराष्ट्र के चुनाव में खेती का महत्व ज्यादा है। यह पृष्ठभूमि राजनीतिक कथा और सार्वजनिक भावना को प्रभावित कर सकती है और इस बार भी ऐसा ही हुआ है।

सोयाबीन और कपास किसानों को मदद
पिछले साल खरीफ सीजन के दौरान कपास और सोयाबीन की कम कीमतों के कारण किसानों को होने वाले आर्थिक नुकसान के अंतर को पाटने के लिए राज्य सरकार ने सोयाबीन और कपास उगाने वाले दो हेक्टेयर खेत तक के छोटे किसानों को पांच हजार रुपये की दर से सहायता दी थी। वहीं, केंद्र सरकार ने खाद्य तेल पर आयात शुल्क बढ़ाने का फैसला किया, ऐसा इसलिए कि सीजन के शुरू होते ही सोयाबीन की कीमतों में बढ़ोतरी हो सके, जिसका लाभ किसानों को मिल सके। इसके अलावा, सरकार द्वारा नेफेड के माध्यम से गारंटी मूल्य पर 1.3 लाख टन सोयाबीन खरीदने का भी निर्णय लिया गया। लेकिन, एफएक्यू गुणवत्ता के मापदंड में नमी की मात्रा 12 प्रतिशत से कम होने के कारण अधिकांश किसानों को विक्रय केन्द्र से लौटना पड़ा। अंततः सरकार ने निर्णय लिया कि 15 प्रतिशत तक नमी होने पर भी किसानों से खरीदी की जाएगी।

सोयाबीन की गारंटीशुदा खरीद के लिए 26 जिलों में 532 खरीद केंद्र स्वीकृत किए गए। चुनाव से कुछ दिन पहले 16 नवंबर तक 2 लाख से अधिक किसानों का पंजीयन किया जा चुका था। पहले चरण के लिए राज्य सरकार का खरीद लक्ष्य 10 लाख मीट्रिक टन रखा गया और 13 हजार मीट्रिक टन सोयाबीन की खरीद हुई। इसी तरह, राज्य में कपास की खरीद भारतीय कपास निगम के माध्यम से की गई और इसके लिए 121 खरीद केंद्र स्वीकृत किए गए। 16 नवंबर तक राज्य में करीब 55 हजार क्विंटल कपास की खरीद हो चुकी थी। इसी तरह, खुले बाजार में कृषि वस्तुओं की कीमतें गारंटीकृत मूल्य से नीचे गिर जाती हैं, तो किसानों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है। इस नुकसान को पाटने के लिए भावांतर योजना है, जिसमें कृषि उपज के बाजार मूल्य और गारंटीकृत दर के अंतर मूल्य को किसानों के बैंक खाते में जमा किया जाता है। चुनाव प्रचार के दौरान महायुति के नेताओं द्वारा आश्वासन दिया जा रहा था कि जल्द ही अंतर वाली राशि किसानों के खाते में जमा की जाएगी।

सोयाबीन इतना अहम क्यों?
महाराष्ट्र के 70 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में सोयाबीन प्रमुख फसल है। मराठवाड़ा के छत्रपति संभाजीनगर, जालना जिले की कुछ तहसीलों के अलावा अन्य छह जिलों में भी यही नकदी फसल है। विदर्भ में भंडारा और गोंदिया सहित अन्य जिलों में कटाई की अवधि यानी अक्तूबर-नवंबर के दौरान सोयाबीन की बिक्री कृषि में कारोबार के सबसे बड़े स्रोतों में से एक कही जा सकती है। इस बार भी राज्य में खरीफ सीजन के समय 50 लाख हेक्टेयर से अधिक सोयाबीन बोया गया था। गौर करने वाली बात यह भी है कि मराठवाड़ा जैसे सूखाग्रस्त इलाकों में सोयाबीन की बुवाई कई गुना बढ़ गई। कृषि विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद सोयाबीन यहां की प्रमुख नकदी फसल बन गई है। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ऑडियो-विजुअल माध्यम से कुछ सोयाबीन किसानों से बातचीत की। इसके बाद, पीएम नरेंद्र मोदी ने भी विधानसभा चुनाव में सोयाबीन की कीमत 6,000 रुपये प्रति क्विंटल करने की घोषणा कर दी। लेकिन, बात यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में कहा था कि वह सरकार में आई तो सोयाबीन किसानों को सात हजार रुपये का भाव देगी।
सोयाबीन
सोयाबीन - फोटो : सोशल मीडिया
पांच महीने में बदल गई तस्वीर 
लोकसभा चुनाव के दौरान मौसम की मार के चलते किसान मुसीबत और निराशा के दौर से गुजर रहा था। ऐसी परिस्थिति में उसने सरकार के खिलाफ अपना वोट देकर रोष जताया था। किसानों की प्रतिक्रिया को सत्ताधारी गठबंधन सरकार ने खतरे की घंटी के रूप में लिया और किसानों को संतुष्ट करने की दिशा में प्रयास किए गए। लिहाजा, नतीजे सत्ताधारी महायुति गठबंधन के लिए सुखद रहे।
थोड़ा पीछे जाकर देखें; तो जुलाई 2018 से जुलाई 2019 की अवधि में महाराष्ट्र के कई हिस्से सूखे की स्थिति का सामना कर रहे थे।

लंबे सूखे के साये में अक्तूबर 2019 को भी महाराष्ट्र राज्य के विधानसभा चुनाव हुए थे। सबसे अधिक प्रभावित मराठवाड़ा क्षेत्र और पड़ोसी अहमदनगर और सोलापुर जिलों में 11 लाख से अधिक मवेशियों को आश्रय देने के लिए सरकारी सब्सिडी वाले चारा-शिविर सितंबर के अंत तक काम कर रहे थे। जानवरों को साबुत गन्ना भी खिलाया जाता था, जिसका रेट मिलों द्वारा चारे के रूप में दिए जाने वाले रेट से अधिक था। वहीं, अप्रैल से मई 2024 के बीच भी लोकसभा चुनाव के दौरान तस्वीर ज्यादा अलग नहीं थी। साल 2023 में, महाराष्ट्र में दक्षिण-पश्चिम (जून-सितंबर) और उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्तूबर-दिसंबर) का मौसम था। फिर, जनवरी-फरवरी 2024 में शीतकालीन बारिश हुई और मार्च की शुरुआत में पारा 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया। लेकिन, इस साल जब विधानसभा चुनाव आया, तो उस समय राज्य में खेती को प्रभावित करने वाले मौसम और खेती की तस्वीर एकदम अलग थी।

20 नवंबर, 2024 को महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के सभी चार मौसम उपविभागों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, विदर्भ, मराठवाड़ा, मध्य महाराष्ट्र और कोंकण में अतिरिक्त मानसूनी बारिश हुई। इससे राज्य के प्रमुख जलाशयों जैसे जयकवाड़ी, भीमा, मुला और पेंच को पूरी तरह से भरने में मदद मिली और इससे आगामी रबी (सर्दी-बसंत) फसल के मौसम के लिए भी उम्मीद जगी। इसी से समझा जा सकता है कि किसान पर संकट के बादल हटते ही किस तरह सत्ताधारी महायुति गठबंधन सरकार पर भी संकट के बादल हट गए थे। 

..तो कोई कैसे करे किसान को अनदेखा?
सभी राजनीतिक दलों ने सोयाबीन किसानों पर ज्यादा फोकस किया था, क्योंकि चुनाव के साथ सोयाबीन का सीजन भी चल रहा था। महाराष्ट्र में गन्ना सबसे महत्वपूर्ण फसल मानी जाती है। गन्ने की खेती पश्चिमी महाराष्ट्र के अहमदनगर, पुणे, सतारा, सोलापुर, सांगली और कोल्हापुर जिले में तो होती ही है, निकटवर्ती मराठवाड़ा डिवीजन के उस्मानाबाद, लातूर और बीड जिलों में भी गन्ने की खेती की जाती है। यही वजह है कि सरकार ने गन्ने के लिए उचित और किफायती दर की घोषणा की है और चीनी मिलों के काफी विरोध के बावजूद निर्धारित दर का भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया। महाराष्ट्र ज्वार, प्याज, अंगूर और अनार के उत्पादन में भी पहले स्थान पर है।

गुजरात के बाद यह दूसरा कपास उत्पादक राज्य भी है। महाराष्ट्र को चना उत्पादक राज्य के तौर पर भी जाना जाता है। इसके साथ ही, पूरे राज्य में ज्वार की खेती मुख्य खाद्यान्न के रूप में की जाती है। वहीं, दूध उत्पादन में गुजरात के बाद महाराष्ट्र सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। इस मामले में पश्चिमी महाराष्ट्र के सभी जिले दूध उत्पादन को एक बड़े कारोबार के रूप अपना चुके हैं, जहां सहकारी डेयरियों की अच्छी स्थिति है। बागवानी फसलों में प्याज, टमाटर, संतरे और अंगूर के लिए उत्तरी महाराष्ट्र विशेषकर नासिक, केले के लिए जलगांव, अनार के लिए सोलापुर, हल्दी के लिए सांगली और आम के लिए कोंकण अंचल का रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगढ़ प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हंै।
विज्ञापन
विज्ञापन