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Alphonso Mango: महाराष्ट्र के कोंकण में अल्फांसो आम पर जलवायु परिवर्तन का असर, कीमतें बढ़ने के आसार

शिरीष खरे, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक, ठाणे (महाराष्ट्र) Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 14 Apr 2025 02:45 PM IST
सार

Alphonso Mango: महाराष्ट्र के कोंकण में अल्फांसो (हापुस) आम पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ रहा है। इससे हापुस आम के उत्पादन में गिरावट की आशंका बढ़ गई है। 

मौसम की ऐसी मार हापुस यानी अल्फांसो आम पर पड़ी है कि यह आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहा है।
मौसम की ऐसी मार हापुस यानी अल्फांसो आम पर पड़ी है कि यह आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहा है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में हापुस यानी अल्फांसों आम के पेड़ों पर आमतौर पर अक्तूबर के महीने के अंत से फूल खिलने लगते हैं। यह प्रक्रिया जनवरी तक तीन चरणों में जारी रहती है। प्रथम चरण के हापुस आम जनवरी के उत्तरार्ध में बाजार में आते हैं। ये आम बहुत ऊंचे दाम पर बिकते हैं। दूसरे शब्दों में इसे आमों में भी 'राजा' का दर्जा हासिल है। दूसरे चरण के हापुस आम आमतौर पर मार्च में बाजार में पहुंचते हैं। जैसे-जैसे निर्यात गिरता है वैसे-वैसे इस किस्म के हापुस आम की कीमतें गिरने लगती हैं। तीसरे चरण के हापुस आम आमतौर पर अप्रैल में बाजार में आते हैं। चूंकि, इस मौसम में आम प्रचुर मात्रा में आते हैं, इसलिए लोकप्रिय हापुस आम आदमी की पहुंच में होते हैं। लेकिन, इस वर्ष स्थिति इसके ठीक उलट है।

इस वर्ष क्या हुआ?
कोंकण में लंबे समय तक हुई बारिश के कारण इस वर्ष हापुस आम के पेड़ों पर फूल आने की प्रक्रिया देर से शुरू हुई। कोंकण में 28 अक्तूबर तक बारिश जारी रही। इस बार वर्षा औसत से अधिक थी। इसलिए, मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रही। लिहाजा, फूल खिलने में लगभग एक महीने की देरी हुई। इसके बाद भी मौसम में उतार-चढ़ाव जारी रहा। बरसात का यह मिजाज हापुस आम की पैदावार के प्रतिकूल माना जाता है। वहीं, इस बार देर से शुरू हुई ठंड कुछ अवधि के लिए गायब हो गई। इससे हापुस आमों के विकास में बाधा उत्पन्न हुई। इन कारकों का हापुस आम की फसल पर बुरा प्रभाव पड़ा। इसलिए, इस वर्ष हापुस आम का पहला चरण बाजार में देरी से आया। मौसमी परिवर्तन के कारण इस वर्ष आम की दूसरी और तीसरी फसल भी बाजार में आने में देरी होगी। फूल आने में देरी होने से आशंका है कि हापुस का अंतिम चरण जून तक भी बाजार में नहीं पहुंच पाएगा।

बढ़ती गर्मी का क्या असर होगा?
इस साल मार्च से ही कोंकण में काफी गर्मी पड़ रही है। गर्मी का हापुस आम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस साल मार्च की शुरुआत से ही कई स्थानों पर तापमान 34 डिग्री से भी ज्यादा रहा है। हापुस आम की तासीर है कि यह ज्यादा गर्मी सहन नहीं कर पाता और पकने से पहले ही पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाता है। यही वजह है कि आमों में क्षति के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जैसे तना जलना, फल का खराब होना, छोटे फल गिरना, विकसित हो रहे आमों का रंग बदलना और आंतरिक सड़न। इसलिए, आम उत्पादक किसान इस बार डरे हुए हैं। 

अब समय आ गया है कि हापुस आम उत्पादक किसान फसल को नियंत्रित पानी देकर गर्मी से लड़ें। लेकिन, इसमें समस्या है कि आमों के बाग बहुत बड़े होते हैं और जितनी मात्रा में इन्हें पानी चाहिए उतनी मात्रा में पानी की उपलब्धता मुश्किल है। दूसरी ओर, जनवरी में रायगढ़ जिले में आम की फसल फलछेदक और थ्रिप्स कीटों से प्रभावित हुई थी। इससे आम की फसल भी प्रभावित हुई। इसलिए, हापुस आम उत्पादक किसानों को यह आशंका है कि इस साल वे केवल 40 से 45 प्रतिशत आम ही तोड़ पाएंगे।

आम का सीजन होगा छोटा 
पिछले साल फरवरी में बाजार में हापुस आमों की आमद प्रचुर मात्रा में होने लगी थी। हालांकि, इसकी तुलना में इस साल फरवरी में हापुस आम बाजार में कम मात्रा में आ रहे थे। पिछले साल मार्च में नवी मुंबई के एपीएमसी बाजार में हर दिन 40,000 से 50,000 बक्से आ रहे थे। वहीं, इस साल मार्च महीने में हर दिन मात्र तीन से चार हजार बक्से बाजार में आ रहे हैं। इसलिए, आम की कीमतें ऊंची बनी हुई थीं। चार दर्जन का एक डिब्बा चार से छह हजार रुपये में बिक रहा है। इसलिए, कहा जा रहा है कि इस साल आम का सीजन पिछले साल की तुलना में छोटा होगा। इसका एक असर यह होगा कि हापुस आम तक साधारण ग्राहकों तक पहुंच नहीं हो सकेगी।

सवा लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र प्रभावित
महाराष्ट्र कृषि विभाग के मुताबिक, कोंकण में आम की खेती एक लाख 26 हजार 241 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। मौसमी परिवर्तन से सवा लाख हेक्टेयर का क्षेत्र प्रभावित होगा। इसमें से रत्नागिरी जिले में 62,280 हेक्टेयर, सिंधुदुर्ग जिले में 33,920 हेक्टेयर, रायगढ़ जिले में 15,547 हेक्टेयर, पालघर जिले में 11,783 हेक्टेयर और ठाणे जिले में 2,711 हेक्टेयर में आम की खेती होती है। इन जिलों में सालाना 2 लाख 19 हजार 589 मीट्रिक टन से अधिक आम का उत्पादन होता है। इसमें रत्नागिरी जिले से एक लाख 32 हजार मीट्रिक टन, सिंधुदुर्ग जिले से 42 हजार, रायगढ़ से 29 हजार, पालघर से 12 हजार और ठाणे जिले से 2.5 हजार मीट्रिक टन आम का उत्पादन शामिल है। जबकि, प्रति हेक्टेयर आम की उत्पादकता 1.79 मीट्रिक टन है। 

दूसरी बार खड़ा हुआ बड़ा संकट
कोंकण के हापुस आमों पर इससे पहले वर्ष 2020-21 में कोविड-लॉकडाउन के समय भी संकट आया था और बड़े पैमाने पर आम उत्पादक किसानों को नुकसान उठाना पड़ा था। तब विदेशी विमान सेवाएं प्रभावित होने से हापुस आमों का विदेशी निर्यात बहुत सीमित हो गया था। हालांकि, खाड़ी देशों में निर्यात करने से किसान और कारोबारियों को सबसे ज्यादा मुनाफा होता है, लेकिन, कोरोना-काल में वहां से भी मांग बेहद कम होने से दोहरी मार पड़ी थी।

ज्यादातर कारोबारी हापुस आम को यात्री विमान से विदेश भेजते हैं। दरअसल, यात्री विमान से विदेशों में हापुस आम पहुंचाने पर निर्यातक कारोबारी को प्रति एक दर्जन माल पर 60 से 65 रुपये किराया देना पड़ता है। लेकिन, यही माल यदि वह मालवाहक विमान से भेजे तो उसके किराये की लागत प्रति एक दर्जन हापुस आमों पर दोगुनी या उससे भी ज्यादा यानी 120 से 140 रुपये तक हो जाती है। इसलिए, कोरोना-लॉकडाउन में जब विदेशी यात्रा विमान सेवाएं प्रभावित हुईं, तो हापुस आमों के निर्यात से जुड़े कई कारोबारी मालवाहक विमानों से हापुस आमों का माल पहुंचाने को लेकर उत्साहित नहीं दिखे।

क्या कहते हैं किसान?
कोविड-लॉकडाउन के चलते हुए नुकसान से कोंकण के हापुस उत्पादक उबर ही रहे थे कि इस वर्ष जलवायु परिवर्तन ने उन्हें फिर मुसीबत में डाल दिया है। हापुस आम के उत्पादक शैलेष जाधव बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले इस साल पैदावार आधी रहने की आशंका है। इससे आमदनी पर भी असर पड़ेगा वहीं, मई महीने में तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक से बाजार में आने वाले आमों की आवक काफी बढ़ जाती है, इसलिए हापुस आम का दाम गिरेगा। इससे सबसे ज्यादा नुकसान हापुस आम के उन उत्पादक और कारोबारियों को होगा जो पूरी तरह से इस किस्म के आमों की ही खरीदी-बिक्री पर निर्भर हैं और जिनका अधिकतम मुनाफा हापुस आमों के विदेशी निर्यात से जुड़ा है।

50 से अधिक देशों में हापुस के निर्यात पर असर
महाराष्ट्र के हापुस आम का निर्यात 50 से अधिक देशों में होता है। राज्य के कोंकण अंचल का हापुस आम निश्चित रूप से अन्य आमों की तुलना में अधिक महंगा है। अपने चमकीले पीले रंग, मधुर सुगंध, मीठे स्वाद के कारण कोंकण के आम देश के अन्य भागों में उत्पादित आमों से बेहतर माने जाते हैं। हापुस लम्बे समय तक खराब नहीं होता, इसलिए यह निर्यात के लिए आदर्श बन जाता है। केन्द्र सरकार के पेटेंट विभाग ने कोंकण के हापुस आम को 'भौगोलिक संकेत' (जीआई टैग) प्रदान किया है। 

देशभर में हापुस आम पहुंचाने के लिए किसानों के माल को कोंकण ले जाने से पहले राज्य की राजधानी मुंबई में स्थित एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) बाजार के माध्यम से खरीदा और संग्रहीत किया जाता है। यहां से हापुस आम देश के विभिन्न भागों में पहुंचाए जाते हैं। मुंबई से हापुस आमों का सबसे बड़ा निर्यात समुद्री मार्ग से सऊदी अरब, अबू धाबी और दुबई को होता है। इस वर्ष हापुस आमों की पैदावार में गिरावट होने से इन देशों को हापुस का निर्यात कम होने की आशंका है।

हापुस आम से जुड़ा एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य भी काफी प्रचलित है। 'जियोलॉजिकल इंडिकेटर्स जर्नल' में दी गई जानकारी के अनुसार, पुर्तगाली सेना में अल्फोंसो अल्बुकर्क नाम का एक अधिकारी था। उन्होंने गोवा और कोंकण में व्यापक यात्रा की। उसके द्वारा आम की किस्मों पर काफी शोध किया गया। इसी से हापुस नस्ल विकसित हुई। इसलिए, इस आम को उनके नाम यानी अल्फांसो से भी जाना जाने लगा। गोवा के ग्रामीण इलाकों में इस आम को अपुस कहा जाता है, जबकि कोंकण में इसे हापुस कहा जाता है। बाद में, यह नाम महाराष्ट्र के कोंकण के आमों के लिए प्रचलित हो गया। 

कैसे दूर होगी मुश्किल 
बड़ा सवाल ये है कि हापुस उत्पादक किसान इस संकट से निकलें कैसे? देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभावों पर किसान से लेकर सरकार और गैर-सरकारी स्तर पर फिलहाल तो समझ बनाने का दौर ही चल रहा है। ऐसी स्थिति में किसी के सामने इस संकट से निपटने के लिए कोई स्पष्टता नहीं है। 

हापुस आम के उत्पादक और कारोबारी हर साल करोड़ों का लाभ उठाते हैं और किसी वर्ष यदि उन्हें नुकसान होता है तो वह भी करोड़ों में होता है। इस वर्ष आम का उत्पादन 40 से 45 प्रतिशत तक कम होने की आशंका जताई जा रही है तो इससे होने वाला घाटा सभी को उठाना पड़ेगा। आम उत्पादकों की स्थिति भी सामान्य किसानों जैसी नहीं है, जिन्हें किसी साल फसल बर्बाद होने पर सरकार द्वारा कुछ हजार या लाख रुपये का मुआवजा मिल जाता है, जिससे कुछ हद तक उनके नुकसान की भरपाई हो जाती है। लिहाजा, हापुस उत्पादक किसानों पर जलवायु परिवर्तन एक ऐसा संकट बनकर उभरा है, जो ज्यादा जटिल है और जिसका ठीक-ठीक समाधान इस समय किसी को नहीं सूझ रहा है। 

एक बात बहुत साफ है कि जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कोंकण के इस विश्व प्रसिद्ध आम का स्वाद फीका पड़ जाएगा।
 
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