महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए भारत में पहला ऐसा राज्य बनने का गौरव प्राप्त किया है, जिसने पशुधन और मुर्गीपालन को कृषि का दर्जा प्रदान किया है। यह निर्णय महाराष्ट्र मंत्रिमंडल द्वारा लिया गया है, जिसकी घोषणा राज्य की पशु-संवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने विधानसभा में की है।
महाराष्ट्र सरकार के इस अभूतपूर्व कदम से राज्य के 76 लाख से अधिक पशुपालक और मुर्गीपालक परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद की जा रही है। यह निर्णय न केवल राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा, बल्कि पशुपालन से जुड़े लोगों के लिए नए अवसर भी खोलेगा। सरकार का अनुमान है कि इस नीति से राज्य को सालाना 7700 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी।
पशुधन और मुर्गीपालन को कृषि का दर्जा देने का अर्थ है कि अब इन क्षेत्रों को कृषि के समान सुविधाएं और लाभ प्राप्त होंगे। अब तक पशुपालन और मुर्गीपालन मुख्य रूप से कृषि के ही सहायक व्यवसाय के रूप में देखा जाता था, जिसके चलते पशुपालकों को सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और ऋण सुविधाओं में सीमित पहुंच मिलती थी। लेकिन, इस नए दर्जे के साथ पशुपालकों को कई तरह के लाभ मिल सकेंगे। नीति आयोग की 2021 की सिफारिशों के अनुरूप यह कदम पशुपालकों के आर्थिक जोखिम को कम करेगा।
पशुपालकों को लाभ ही लाभ
पशुपालक भी अब कृषि क्षेत्र के लिए उपलब्ध सब्सिडी का लाभ उठा सकेंगे। वहीं, बिजली और पानी जैसे संसाधनों पर कम टैरिफ लागू होने से उनकी लागत में कमी आएगी। दूसरा, संस्थागत ऋण की उपलब्धता सुलभ हो जाएगी। इससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों से सस्ते और आसान ऋण प्राप्त करने का दरवाजा खुलेगा, जिससे पशुपालक अपने व्यवसाय का विस्तार कर सकेंगे।
बाजार और बुनियादी ढांचे तक पशुपालकों की पहुंच भी बढ़ेगी, जिससे उन्हें फायदा होगा। इस निर्णय से पशुधन और मुर्गीपालन से संबंधित उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और बुनियादी ढांचे का विकास होगा। इसके अलावा, आर्थिक सशक्तिकरण होगा, क्योंकि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसका असर पशुपालकों की आय में पर पड़ेगा और वे पहले से अधिक सशक्त होंगे।
यह कदम पशुधन के संरक्षण और उन्नत नस्लों के विकास को भी प्रोत्साहित करेगा। पशुपालकों को उन्नत तकनीकों और प्रशिक्षण तक पहुंच मिलने से उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा में भी सुधार होने की संभावना बढ़ गई है।
महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में पशुधन और मुर्गीपालन का महत्वपूर्ण योगदान बाकी कई राज्यों की तुलना में अधिक है। राज्य में दूध, अंडे, मांस और अन्य पशु-आधारित उत्पादों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। इस क्षेत्र को कृषि का दर्जा देने से न केवल उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय और स्थायी आजीविका को भी बढ़ावा मिलेगा। विशेष रूप से, छोटे तथा सीमांत किसानों को जो अपनी आय के लिए पशुपालन पर निर्भर हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
बेशक यह निर्णय क्रांतिकारी है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियां भी हो सकती हैं। जैसे कि जागरूकता की कमी। बड़ी संख्या ऐसे पशुपालकों की है, जिनको इस नई नीति के लाभ और प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं है। इस नीति को सफल बनाना है तो राज्य के ग्रामीण अंचल में इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है।
राज्य में पशुपालकों के लिए दूसरी चुनौती बुनियादी ढांचे की कमी है। दरअसल, राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवा, चारे की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच में सुधार की जरूरत है।
तीसरी प्रमुख चुनौती वित्तीय समावेशन से संबंधित है। इसके लिए, छोटे पशुपालकों को बैंकों और वित्तीय संस्थानों तक पहुंच सुनिश्चित कराने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को स्थानीय प्रशासन, सहकारी समितियों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करना होगा। साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और मोबाइल एप्स के माध्यम से पशुपालकों को योजना और संसाधनों की जानकारी प्रदान करने की पहल की जानी चाहिए।
राज्य के पशुपालकों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। कोल्हापुर जिले के एक छोटे पशुपालक सुकेश जाधव ने इस बारे में बातचीत करते हुए बताया कि यह निर्णय गांव में उनकी हैसियत बढ़ाएगा, क्योंकि अभी तक उन्हें किसान नहीं माना जाता था। किसान का मतलब होता था, जिसके पास जमीन हो। अब ऐसे पशुपालक जिनके पास जमीन नहीं हैं, वो भी किसान माने जाएंगे, तो इस तरह से इज्जत देने के लिए वे सरकार को धन्यवाद ही कहेंगे।
पशुपालकों का कहना है कि यदि उन्हें सस्ती बिजली और ऋण मिलेगा तो उनका तो फायदा ही होगा, क्योंकि इससे उनका तो खर्च भी कम होगा और जरूरत पड़ने पर लोन मिलने से वे दूसरी तरह की मुसीबतों से बचेंगे। हालांकि, सुकेश जैसे कई पशुपालकों की यह मांग भी है कि इसके लिए गांव स्तर तक जाकर बताना चाहिए और लाभ सुनिश्चित करने चाहिए, नहीं तो पशुपालकों को किसान का दर्जा कागज पर ही रह सकता है।
गेमचेंजर बनेगा महाराष्ट्र का मॉडल
महाराष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद में पशुसंवर्धन का 24 प्रतिशत योगदान है। यह आंकड़ा इस राज्य में पशुधन का महत्व बताता है। यहां पशुधन न केवल आर्थिक संपत्ति है, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा है। दूध, मांस, अंडे, ऊन और खाद के अलावा बैल आज भी कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 20वीं पशुधन गणना के अनुसार, राज्य में लगभग 1.9 करोड़ पशुधन हैं, जिनमें 1.4 करोड़ गाय-बैल और 56 लाख भेड़-बकरी शामिल हैं। इसके अलावा, मुर्गीपालन में करीब 85.18 करोड़ मुर्गियां हैं, जो अंडा और मांस उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
पुणे जिला आधुनिक पोल्ट्री फार्मिंग के लिए जाना जाता है। यहां बड़े पैमाने पर मुर्गीपालन इकाइयां और डेयरी फार्म स्थापित हैं, जो शहरी और ग्रामीण मांग को पूरा करते हैं। इसके अलावा, कोल्हापुर और सांगली जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी मुर्गीपालन तेजी से बढ़ रहा है।
नासिक जिले में डेयरी उद्योग का मजबूत आधार है, विशेष रूप से गाय और भैंस के दूध का। यह जिला दुग्ध उत्पादन और सहकारी डेयरी मॉडल में भी अग्रणी है। इसके अलावा, पश्चिमी महाराष्ट्र की बात करें तो कोल्हापुर की गोकुल दुग्ध सहकारी समिति पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मराठवाड़ा में अहमदनगर जिले के गोवर्धन ब्राह्मण जैसे समुदाय गाय पालन में योगदान देते हैं। इसी तरह, लातूर और आसपास के मराठवाड़ा क्षेत्र में भेड़-बकरी पालन अधिक होता है। यह इलाका स्थानीय नस्लों जैसे उस्मानाबादी बकरी के लिए प्रसिद्ध है। दूसरी तरफ, विदर्भ में अधिकतर छोटे किसान बैलों के जरिए खेती करते हैं।
कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक
महाराष्ट्र में कृषि और पशुपालन का संबंध गहरा और परस्पर पूरक है, क्योंकि ये दोनों क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। जैसा कि आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि यहां गाय, भैंस, बकरी और मुर्गीपालन बड़े पैमाने पर होता है। यही कारण है कि दूध, मांस, अंडे और चमड़े जैसे उत्पाद ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाते हैं। दरअसल, पशुपालन किसानों के लिए जोखिम प्रबंधन का साधन है। फसल खराब होने पर पशुधन आय का वैकल्पिक स्रोत प्रदान करता है।
महाराष्ट्र का यह कदम राज्य की अर्थगति को बढ़ा सकता है। इसमें महाराष्ट्र पशुधन विकास मंडल अहम भूमिका निभा सकता है। यह मंडल 2002 में स्थापित हुआ था, जो पशुओं की देसी नस्लों जैसे देवणी, खिल्लार, पंढरपुरी आदि का संरक्षण करता है और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है। यह स्वायत्त संस्था बेरोजगार पशु चिकित्सकों को रोजगार के अवसर भी प्रदान करती है।
देखना यह है कि महाराष्ट्र का यह कदम अन्य राज्यों के लिए मिसाल बन सकता है या नहीं! यदि महाराष्ट्र का यह नया मॉडल सफल होता तो जाहिर है कि देश के बाकी राज्य भी इसे जरूर अपनाएंगे, जिससे भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खासकर पशुपालन क्षेत्र में एक नया युग शुरू हो सकता है। पशुधन और मुर्गीपालन को कृषि का दर्जा देने से न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। देखा जाए तो यह नीति सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है, जो ग्रामीण समुदायों के सशक्तिकरण और गरीबी उन्मूलन की दिशा में बड़ा कदम है।