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Cotton Crisis: संकट में सफेद सोना, दुविधा में किसान, कपास की खेती से भंग हो रहा मोह

अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ कृषि पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 11 Aug 2025 05:01 PM IST
सार

बीटी कपास के बीज सामान्य से 200 गुना महंगे हैं। नकली बीजों के गिरोह भी सक्रिय हैं। पहले कीटों से 2 से 5 फीसदी फसल हानि होती थी, जो उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से 25 फीसदी से अधिक हो गई है। कपास से किसानों का मोहभंग हो रहा है और वस्त्र उद्योग में भी बेचैनी है।

कपड़ा कपास से बनता है, जिसकी खेती 60 लाख से ज्यादा किसान कर रहे हैं।
कपड़ा कपास से बनता है, जिसकी खेती 60 लाख से ज्यादा किसान कर रहे हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए, ‘टीम कॉटन’ के गठन के साथ वर्ष 2030 तक कपास आयात बंद करने का एलान किया है। कोयम्बटूर में हुई हालिया बैठक में कृषि मंत्री ने माना कि बीटी कपास पर वायरस अटैक से उत्पादन घट रहा है। लक्ष्य तय करके वायरस-प्रतिरोधी उन्नत बीज किसानों तक पहुंचाने, उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने जैसे कई मुद्दों पर काम करना है। भारत सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 5 साल के लिए कपास उत्पादकता मिशन भी घोषित किया है, जिसके क्रियान्वयन का जिम्मा कृषि अनुसंधान तंत्र और वस्त्र मंत्रालय पर है। इन प्रयासों को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। सवाल बीटी कपास पर भी हैं, जिनकी बदौलत कपास सफेद सोना बना, पर अब नई चुनौती सामने खड़ी है। इसीलिए, नई रणनीति बनानी पड़ रही है।

रोटी, कपड़ा और मकान हमारी सबसे बड़ी जरूरते हैं। कपड़ा कपास से बनता है, जिसकी खेती 60 लाख से ज्यादा किसान कर रहे हैं। कपास की बदौलत करीब 10 करोड़ लोगों को कपड़ा उद्योग में काम मिला है। कपास का आर्थिक योगदान व्यापक है। कपास के रेशे से वस्त्र और बीज से खाद्य तेल बनता है। कपास का हर अवशेष किसी न किसी काम आता है। देश में फिलहाल प्रति व्यक्ति कपड़ा उपलब्धता 34 मीटर है, जिसे वर्ष 2030 तक 47 मीटर तक ले जाना होगा। 

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भारत का विश्व में 24% कपास का योगदान देता है। लेकिन, हमारी औसत उपज 445 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जबकि विश्व का औसत 800 किग्रा है। केंद्र सरकार का प्रयास है कि वर्ष 2030 तक हमारी उत्पादकता भी विश्व औसत पर पहुंचे। हालांकि, इसके पहले 12वीं योजना के अंत तक 452 लाख गांठ कपास उत्पादन का लक्ष्य था, पर वहां तक हम नहीं पहुंचे। फरवरी, 2000 में टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन बना था, तब हमारी कपास उत्पादकता 300 किग्रा प्रति हेक्टेयर थी। तबसे अब तक विकास हुआ, पर कई चुनौतियां भी बढ़ी हैं। 

पुरातन खेती, आधुनिक तकनीक
कपास की उत्पत्ति भारत में ही हुई और हड़प्पा निवासियों ने इसकी पैदावार आरंभ की। हमारे यहां से ही 327 ई.पू. में कपास यूनान और उसके बाद चीन तथा दूसरे देशों में पहुंची। देश में कपास की खेती आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, म.प्र., महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तमिलनाडु में होती है। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने कपास उत्पादकता बढ़ाने के लिए इन राज्यों में सर्वोत्तम पद्धतियों पर जोर देने की परियोजना आरंभ की है। 

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अंग्रेजी राज में, भारत में बेहतरीन कपास प्रजातियां और शानदार हस्तशिल्पी थे। उनके उत्पादों की दुनिया में ख्याति थी। वर्ष 1788 में, गवर्नर जनरल के पास लंकाशायर के टेक्सटाइल उद्योग की जरूरतों के लिए उन्नत प्रजातियों से कपास उत्पादन बढ़ाने की रणनीति बनाने के लिए लंदन से कहा गया। वर्ष 1921 में भारतीय केंद्रीय कपास समिति (आईसीसीसी) का गठन उत्तम विधियों और प्रजातियों के विकास के लिए हुआ। फाइबर की गुणवत्ता में सुधार के साथ 70 कपास प्रजातियों का विकास उस दौरान हुआ। अंग्रेजी राज में अपने हितों को लेकर अंग्रेजों ने काम किया। 

जीन क्रांति से उत्पादन को उड़ान
आजादी के बाद, 1950 में 'अधिक कपास उपजाओ अभियान' शुरू हुआ, जब वस्त्र उत्पादन सरकारी प्राथमिकता बना। 1966 में कपास विकास निदेशालय और 1976 में नागपुर में केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान स्थापित हुआ। 1970 में हाइब्रिड एच-4 ने कपास उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की। वर्ष 2002-03 में बीटी कपास की शुरुआत के बाद, महिको और मोनसेंटो की ट्रांसजेनिक तकनीक और प्रचार रणनीति से 2020-21 तक 94% कपास क्षेत्र बीटी कपास के अंतर्गत आ गया।

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इस दौरान देसी प्रजातियां और कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से तैयार प्रजातियां विलुप्त हो गईं। बीटी कपास से किसानों की आमदनी बढ़ी, पर सबसे अधिक फायदा बीज कंपनियों का हुआ। वर्ष 2006-07 में 218 लाख गांठ कपास उपज के साथ भारत ने अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया में दूसरा नंबर हासिल कर लिया। कपास क्षेत्र चरम सीमा तक पहुंचा, पर उपज बढ़ने की जगह घटती जा रही है।
आजादी के बाद 1947-48 में कपास उत्पादन केवल 23 लाख गांठ था, जो 1992-93 तक 1.30 करोड़ गांठ हो गया। बीटी कपास के आने के बाद 2013-14 में उत्पादन 398 लाख गांठ के शिखर पर पहुंचा, लेकिन इसके बाद गिरावट शुरू हुई। 2024-25 में उत्पादन 306.92 लाख गांठ रहा, जबकि वस्त्र उद्योग को प्रतिवर्ष 315 लाख गांठ की आवश्यकता है। एक गांठ का वजन लगभग 170 किलोग्राम होता है।

चिंता की बात यह है कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच पांच बार कपास उत्पादन घटा है। एक दशक की औसत वृद्धि दर महज 0.25% रही। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के अध्ययन से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कपास के बालगार्ड-1 और बालगार्ड-2 किस्म पर कीट प्रकोप और जलवायु परिवर्तन जैसे कारणों से कपास की उपज गिर रही है। 

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गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र में कपास की घटती 
उत्पादकता से किसानों का मोहभंग हो रहा है। बीटी कपास के बीज सामान्य बीजों से 200 गुना महंगे हैं और नकली बीजों का गिरोह सक्रिय है। बीटी कपास की लोकप्रियता का कारण कीट नियंत्रण था, लेकिन 166 से अधिक कीट-व्याधियों के कारण फसल हानि 2-5% से बढ़कर 25% से अधिक हो गई है। इससे किसानों और वस्त्र उद्योग में बेचैनी है।

वाजिब दाम का सवाल 
पिछले 25 वर्षों में कपास उत्पादन में बेशक सफलता मिली, लेकिन कपास क्षेत्रों में ही किसानों की आत्महत्याएं सबसे अधिक रहीं। कपास मौसम 1 अक्तूबर से 30 सितंबर तक चलता है। सरकार ने 2025-26 के लिए मध्यम रेशे वाली कपास का एमएसपी 7710 रुपये और लंबे रेशे वाली कपास का एमएसपी 8110 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। 1970 में स्थापित भारतीय कपास निगम (सीसीआई) कपास खरीदता है, जो वस्त्र मंत्रालय के तहत काम करता है।

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वर्ष 2011 में किसानों को खुले बाजार में 7000 रुपये और 2022 में 12000-13000 रुपये मिले, लेकिन दाम अमेरिकी बाजार पर निर्भर करते हैं। किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं कि कपास के दाम कम होने पर भी कपड़े के दाम बढ़ते हैं। गौर करने की बात है कि वर्ष 1971-72 में, कपास 300 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि सोना 193 रुपये प्रति 10 ग्राम। आज एमएसपी की तुलना में दाम का सहज अंदाजा लगा सकते हैं। कपास की चुनाई में 25% श्रम लागत लगती है। केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मुंबई ने कई तकनीकें विकसित कीं, लेकिन ये खेतों तक नहीं पहुंचीं। कपास की गुणवत्ता भी एक बड़ी चुनौती है।

कपड़ा उत्पादन और किसान
बहुत से वैज्ञानिक वकालत करते हैं कि यह कपास उत्पादक किसानों के हित में होगा कि वे कपड़ा बनाकर बेचें। 65 किलो रूई से 400 मीटर कपड़ा बनता है, जिससे 200 शर्ट बन सकती हैं। एक शर्ट 170 से 250 रुपये में बिके तो भी किसानों को 10,000 की जगह 50,000 रुपये की आय हो सकती है। पर, किसानों के लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा।

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एचटीबीटी पर टिकीं उम्मीदें
कपास उत्पादन में भविष्य की उम्मीदें (एचटीबीटी) पर टिकी हैं। यह आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) शाकनाशी-सहिष्णु बीटी कपास की अगली पीढ़ी है। इससे उत्पादकता दोगुनी तक हो सकती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने इसे संतोषजनक बताते हुए व्यावसायिक खेती की सिफारिश की है। महाराष्ट्र, गुजरात एवं आंध्र प्रदेश के कुछ जिलों में अवैध तरीके से इसकी खेती हो रही है और इस बाबत खबरें भी सरकार के पास हैं। लेकिन, इसकी मंजूरी से लेकर जमीन पर इसका क्या असर होता है, यह फिलहाल अभी देखना होगा।
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