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Gm Crops National Policy Should Include Aspects Like Biodiversity Sustainable Technology And Climate Change
जीएम फसलें : राष्ट्रीय नीति में शामिल होने चाहिए जैव विविधता, टिकाऊ तकनीक और जलवायु परिवर्तन जैसे पहलू
अरविंद कुमार सिंह (वरिष्ठ कृषि पत्रकार)
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 13 Feb 2025 06:28 PM IST
सार
बढ़ती आबादी के लिए अगले 20 सालों में कृषि उत्पादन 70 फीसदी बढ़ाने की चुनौती है, तो जैव विविधता से जुड़े खतरे भी हैं। छोटे किसानों के लिए किफायती टिकाऊ तकनीक चाहिए, तो जीएम पर ठोस नीति बनाते समय जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को भी ध्यान में रखना होगा।
सरकार नहीं चाहती कि बीज कंपनियों का एकाधिकार हो जाए, और किसान उन पर आश्रित हो जाएं।
- फोटो : गांव जंक्शन
आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के हालिया बयान के बाद इसको लेकर फिर चर्चा छिड़ गई है। उन्होंने कहा, जब तक सारी आशंकाओं का समाधान न हो जाए, हमने उस तरफ नहीं जाने का फैसला किया है। यह बयान उस दौर में आया है, जबकि जीएम फसलों पर राष्ट्रीय नीति बनाने को लेकर मंथन जारी है।
कृषि मंत्री की बात का निचोड़ यह है कि सरकार नहीं चाहती कि बीज कंपनियों का एकाधिकार हो जाए, और किसान उन पर आश्रित हो जाएं। हालांकि, जीएम फसलों के मामले में असली प्राधिकार भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय का है। लेकिन, कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारें इसका सबसे अहम पक्ष हैं। इस कारण कृषि मंत्री का बयान कई मायनों में अहम है। वहीं, कृषि वैज्ञानिकों में इसे लेकर दो मत हैं। एक पक्ष की राय यह है कि दो दशकों में जीएम तकनीक को लेकर जो काम हुआ, वह इस बयान से प्रभावित होगा और वैज्ञानिकों का मनोबल गिरेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई 2024 को जब जीएम फसलों को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने की बात कही, तभी से सरकार की दुविधा बढ़ी है।
- फोटो : गांव जंक्शन
करीब दो दशकों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई 2024 को जब जीएम फसलों को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने की बात कही, तभी से सरकार की दुविधा बढ़ी है और विरोधी और समर्थक दोनों व्यापक रूप से सक्रिय हो गए हैं। ‘जीएम फ्री इंडिया’ और आरएसएस के किसान संगठन भारतीय किसान संघ ने राष्ट्रीय नीति बनाने में किसानों और अन्य हितधारकों की राय को शामिल करने की मांग तेज की है। भारतीय किसान संघ ने तो अरसे से यह लाइन ले रखी है कि भारत में जीएम फसलों की जरूरत नहीं है। इससे जैव विविधता को खतरा होगा और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सांसदों को ज्ञापन देकर इस पर चर्चा की मांग के साथ संघ ने नया बीज कानून बनाने के लिए भी सरकार पर दबाव बनाया है।
जीएम पर असमंजस
जीएम फसलों को मंजूरी देने वाली जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने नियमों में संशोधन कर व्यक्तिगत या व्यावसायिक हित का खुलासा करना जरूरी कर दिया है। वर्ष 2022 में, जेईएसी ने जब जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती के मामले में कदम आगे बढ़ाया था, तभी से विवाद तेज हुआ। जीएम सरसों के पैरोकारों का दावा था कि अगले दो सालों में देश में जीएम सरसों लहलहाने लगेगी और उत्पादन में 30 फीसदी बढ़ोतरी होगी। उसी दौरान स्वदेशी जागरण मंच ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर समिति के कामकाज पर सवाल उठाया था।
फिर भी बीटी कपास की मंजूरी के लंबे अंतराल के बाद जब जीएम सरसों का रास्ता खुल रहा था, तो जीएम के पैरोकारों को उम्मीद जगी थी कि अब दर्जन भर प्रतीक्षारत फसलों का भविष्य भी तय हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जीएम सरसों के विरोध को निराधार बताते हुए कहा कि भारत पहले से ही इससे उत्पादित तेल का आयात कर रहा है। पर, जीएम फूड्स रेगुलेशन 2021 आया तो किसान संगठनों की आपत्ति के बाद सरकार ने सफाई देते हुए कहा कि देश में जीएम खाद्य फसलों को अनुमति नहीं मिलेगी।
इन बातों से यह तो साफ है कि सरकार जीएम फसलों पर दुविधा में है। बीटी कपास का मुद्दा अलग था। पर, खाद्य फसलें स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी हैं। इसीलिए, विशालकाय बीज कंपनियों के दबाव के बावजूद दो दशकों में नरेंद्र मोदी सरकार ही नहीं, डॉ मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भी संभलकर चलती रही है। पर, अनुसंधान जारी रहने के बावजूद मंजूरी का मसला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।
भारत में जीएम फसलों में बीटी कपास गैर खाद्य फसल है, जिसकी मंजूरी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में मिली थी।
- फोटो : सोशल मीडिया
आशंकाओं के बीच जीएम फसलें
जीएम फसलों का 90% हिस्सा 6 देशो में है, जिसमें से अमेरिका में 40%, ब्राजील में 23% जबकि भारत में 6% और चीन में महज 2% है। भारत में जीएम फसलों को लेकर नीतिगत अनिर्णय के कारण सरकार दो कदम आगे बढ़कर तीन कदम पीछे हट जाती है। यूपीए-2 शासन के आखिरी दौर में 10 खाद्य फसलों के परीक्षण की मंजूरी मिली। पर, विवादों के तेज झोंके में कदम पीछे खींचने पड़े। वर्ष 2010 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने बीटी बैंगन की पैरवी की, पर फील्ड ट्रायल को मंजूरी नहीं मिली। यूपीए सरकार ने 2011 में जीएम फसलों की प्रायोगिक खेती में राज्य सरकारों से अनुमति लेना अनिवार्य करके इस मुद्दे को और पेचीदा बना दिया।
संसदीय समितियों की पड़ताल
सरकारी दुविधा के पीछे दो अहम संसदीय समितियों की गहन पड़ताल भी आड़े आ रही है। सबसे पहले कृषि संबंधी स्थायी समिति ने 2013-14 में इसकी पड़ताल के बाद कई सवाल उठाए थे। वर्ष 2017-18 में विज्ञान-प्रौद्योगिकी, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय संबंधी समिति ने अधिक उपज, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए सुरक्षित और इसके कीट रोधी होने जैसे दावों को भ्रामक बताते हुए, जांच की कोई सक्षम और सख्त नियामक प्रक्रिया विकसित नहीं करने पर सरकार को आड़े हाथों लिया था। समिति की राय थी कि तकनीक विकसित करने वालों के दावे पर ही कैसे भरोसा किया जा सकता है।
बीटी कपास के बाद उलटी गिनती शुरू
भारत में जीएम फसलों में बीटी कपास गैर खाद्य फसल है, जिसकी मंजूरी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में मिली थी। तब खुद भाजपा में अंतर्विरोध इसे लेकर उसी तरह थे, जैसे यूपीए के शासन में दिखे। मोनसेंटो और महिको 1996 से बीटी कपास के विकास में लगी थीं। उन्होंने कपास में ऐसा जीन प्रतिरोपित किया, जिससे कीट प्रकोप को रोकने की क्षमता थी। बीटी बीज सामान्य बीजों से 200 गुना तक महंगे थे। लेकिन, कीट नियंत्रण में अपनी उपयोगिता के चलते बीटी कपास की लोकप्रियता ने पारंपरिक किस्मों और वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 250 किस्मों को करीब गायब ही कर दिया। बीटी कपास ने परंपरागत खेती का पैटर्न भी बदला। कपास इलाकों में किसानों की आत्महत्याएं और उनके कर्ज के दलदल में फंसने की बातें भी छिपी नहीं हैं। वहीं, बीजों की भारी मांग के कारण कंपनियां मालामाल हुईं। बीज मनमाने महंगे रहे और नकली बीजों की भी भरमार रही।
जीएम फसलों के बीज अभी भी बहुसंख्य किसानों की पहुंच से दूर हैं।
- फोटो : सोशल मीडिया
महंगे बीज और गरीब किसानों की दिक्कतें
जीएम फसलों के बीज महंगे होने के नाते छोटे किसानों की पहुंच से दूर हैं। इनका दोबारा उपयोग संभव नहीं है, जबकि भारत ही नहीं; तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में किसान अपनी उपज से बचाए बीजों से अपना काम चलाते हैं।
भविष्य की खाद्य सुरक्षा का सवाल
वर्ष 1985 में पूसा में जैव प्रौद्योगिकी केंद्र स्थापित होने के बाद इस दिशा में गति भविष्य की तैयारियों के लिहाज से तेज हुई। हाल में, सरकार जैविक खेती और प्राकृतिक खेती पर जोर दे रही है। पर, क्या इससे खाद्य सुरक्षा संभव होगी? देश में बढ़ती आबादी के मद्देनजर कई वैज्ञानिक जीएम फसलों की वकालत कर रहे हैं। भविष्य में खेती की मौजूदा करीब 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन बढ़ने की जगह घटेगी ही। इसलिए, नई तकनीक का सहारा लेना होगा। पर, इससे जैव विविधता पर भी खतरा पैदा हो सकता है।
दुनिया के कुल 2.4 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र के साथ भारत ज्ञात वैश्विक जैव विविधता में करीब आठ फीसदी का योगदान करता है। प्रकृति ने भारत को 45,000 प्रजातियों के पौधे दिए हैं, जिसमें से 18,000 पुष्पीय पौधे हैं। इन प्रजातियों में कुछ चंद इलाकों तक सीमित हैं, जबकि कुछ देश के करीब हर हिस्से में मिलते हैं। जीएम फसल उगाने पर परागण से हमारी अपनी प्रजातियों में भी घालमेल होगा और हमारी जैव विविधता खतरे में पड़ेगी। पर, जीएम फसलों के पैरोकारों का दावा है कि 2047 तक भारत को अगर विकसित राष्ट्र बनाना है तो कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों, स्मार्ट उपकरणों के साथ कई उपायों की दरकार होगी। हमें जीएम और जीनोम एडिटिंग तकनीकों की मदद लेनी ही पड़ेगी।
सवाल बहुत हैं, पर भविष्य को लेकर सरकार दुविधा में है। नीति निर्माताओं के साथ कृषि वैज्ञानिक और किसान संगठन भी एकमत नहीं है। जबकि, बढ़ती आबादी के साथ अगले 20 सालों में हमें उत्पादन 70 फीसदी बढ़ाना होगा। छोटे किसानों को केंद्र में रखकर हमें कम लागत वाली अधिक टिकाऊ तकनीक की भी आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को भी हमें जीएम फसलों से जुड़ी ठोस राष्ट्रीय नीति बनाते समय ध्यान में रखना होगा।
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