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Vegetable Prices Need To Rescue Prices Of Potatoes Onions And Tomatoes From The Vortex Of Uncertainty
Vegetable Prices: आलू, प्याज और टमाटर के भाव को अनिश्चितता के भंवर से उबारने की जरूरत
अरविंद कुमार सिंह (वरिष्ठ कृषि पत्रकार)
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 15 Mar 2025 04:00 PM IST
सार
आलू, प्याज और टमाटर राजनीतिक तौर पर सबसे अधिक संवेदनशील फसलें हैं, जिनके दामों में उतार-चढ़ाव भी अधिक होता है। इन तीनों फसलों के लिए ठोस रणनीति की दरकार है, जिससे किसानों की जिंदगी भी चलती रहे और उपभोक्ताओं को लूट से बचाया जा सके।
आलू, प्याज, टमाटर जैसा उतार-चढ़ाव आमतौर पर दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में नहीं देखने को मिलता।
- फोटो : गांव जंक्शन
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान 17 फरवरी, 2025 को जब देश में कृषि प्रगति की साप्ताहिक समीक्षा कर रहे थे, उसी रोज राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में टमाटर 10 से 20 रूपये किलो में बाजारों में बिक रहा था। चंद रोज पहले टमाटर की कीमतों में भारी गिरावट को ध्यान में रख एमपी और महाराष्ट्र में एनसीसीएफ के माध्यम से टमाटर खरीद के लिए भारत सरकार की बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) के परिवहन घटक को लागू करने का फैसला भी लिया गया था। जो हाल टमाटर का है वही आलू, प्याज और कई बार लहसुन का भी साल दो साल पर होता रहता है।
अभी कुछ समय पूर्व किसानों से टमाटर दो से पांच रुपये किलो तक में खरीदा जा रहा था। जिन किसानों ने उम्मीदों के साथ टमाटर लगाया था, उनको लागत निकालना भी कठिन हो गया। पिछले दो सालों में टमाटर उत्पादन 213.23 से 215.49 लाख टन के बीच रहा है। पर, दामों में भारी अंतर देखने को मिलता है। जुलाई 2024 में दिल्ली में टमाटर 100 से 120 रुपये किलो तक पहुंचा, जबकि आलू 40 से 50 और प्याज 50 से 55 के बीच पहुंची। मई 2020 में टमाटर 2 से 6 रुपये किलो तक बिका, पर जुलाई तक 60 से 80 रुपये किलो पर आ गया। बारिश से कई राज्यों में फसलें चौपट हुईं, तो अक्तूबर 2021 तक टमाटर 90 रुपये किलो हो गया। फिर, जनवरी 2022 के पहले सप्ताह तक टमाटर किसानों को 10 रुपये किलो दाम भी नहीं मिल रहा था। जुलाई 2023 में टमाटर फलों से भी महंगा होकर 140 और 150 पर पहुंच गया।
आलू, प्याज और टमाटर राजनीतिक तौर पर भी सबसे अधिक संवेदनशील फसलें हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
दूसरी फसलों में नहीं होता ऐसा उतार-चढ़ाव
ऐसा उतार-चढाव दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं के साथ नहीं होता। जबकि, आलू, प्याज और टमाटर जैसी फसलों के किसानों के साथ साल दो साल में ऐसी स्थिति आती रहती है। उम्मीदों के भंवर में डूबते उतराते किसान सड़कों पर टमाटर फेंकते हैं, फिर कभी टमाटर न लगाने की बात करते हैं और फिर अगले साल उम्मीदों के साथ लगा लेते हैं। दाम बढते हैं तो शहरों में दबाव बनने पर सरकार उपभोक्ताओं के साथ खड़ी होती है। पर, किसानों के लिए खास तौर बनी ऑपरेशन ग्रीन्स या टॉप स्कीम आलू, प्याज और टमाटर किसानों का दुख हरती नहीं दिखती, जिसका लक्ष्य कीमतों में उतार-चढ़ाव की मार से किसानों को बचाना था। आपरेशन ग्रीन्स 2018 में आरंभ की गई थी। उम्मीद जगी थी कि इससे किसानों को स्थिरता मिलेगी। इसके दायरे में फसलें बढ़ते-बढ़ते 22 हो गईं, पर लाभ किसी को नहीं मिल सका है।
देश की शीर्ष दस फसलों में शामिल आलू, प्याज, टमाटर
भारत की 10 शीर्षस्थ फसलों में आलू, प्याज और टमाटर शामिल हैं। ये तीनों राजनीतिक तौर पर संवेदनशील फसलें हैं, जिनकी हर रसोई में जरूरत पड़ती है। आबादी में वृद्धि के साथ इन तीनों फसलों का दायरा बढ़ा है। कई इलाकों में इनकी खेती लोकप्रिय हुई, जबकि कुछ परंपरागत इलाकों के किसानों का इससे मोहभंग भी हुआ है।
सबसे बड़े आलू उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में आलू किसानो की तबाही की कहानी साल दर साल आती रहती है। फसल आते ही दाम गिर जाते हैं, जबकि कोल्ड स्टोरेज का भी एक मजबूत तंत्र उत्तर प्रदेश में है। पर, वहां सड़कों पर आलू फेंकने की नौबत आती रहती है। वर्ष 2014 आलू किसानों के लिए बेहतर साल था, जब थोक में आलू 2200-2300 रुपये कुंतल तक था। फुटकर में कीमतें 30-40 तक पहुंची थीं। पर, 2017 में आलू 300 से 500 रुपये कुंतल तक पहुंच गया। बीच के सालों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
प्याज
- फोटो : सोशल मीडिया
प्याज किसानों का संकट
भारत प्याज की पैदावार में दुनिया के तीन शीर्ष देशों में आता है। लेकिन, सरकार प्याज के दामों पर नियंत्रण करने में नाकाम रही है। प्याज राजनीतिक मुद्दा भी बनता रहा है। जनता पार्टी के शासन में प्याज बड़ा चुनावी मुद्दा बना था। बाद में, 1998 मे दिल्ली में 60 रुपये किलो तक प्याज बिकी, जो भाजपा की पहली राज्य सरकार पर भारी पड़ी। 1998 में ही राजस्थान में प्याज के कारण भैरो सिंह शेखावत को सत्ता से बाहर होना पड़ा। अगस्त 2013 से नवंबर के बीच प्याज 20 रुपये से 80 रुपये पहुंची, तो यूपीए सरकार हिल गई। अक्तूबर 2023 के दौरान महाराष्ट्र में कई मंडियों में प्याज 55 से 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। बीच में, इसमें काफी उतार-चढाव देखने को मिले। प्याज के मामले में सरकार तत्काल सक्रिय होती है। इसके लिए बफर स्टॉक भी बनाया गया है। इससे खुदरा बिक्री के लिए स्टॉक का उपयोग होता है। कई बार महानगरों में सरकारी प्याज बिकती दिख जाती है। यह बताती है कि उपभोक्ताओं का सरकार पर कितना दबाव है, पर किसान नेपथ्य में ही रहता है।
ठोस मूल्य नीति की दरकार
ठोस मूल्य नीति का अभाव और बिचौलियों का कठोर तंत्र इन तीनों फसलों के किसानों की संपन्नता की राह में बड़ा रोड़ा बना हुआ है। उपभोक्ताओं तक पहुंचने में आलू में 8.20 फीसदी और प्याज में 7.32 फीसदी तक हानि हो चुकी होती है। टमाटर तो और जल्दी खराब होने वाली फसल है, लिहाजा उसमें और भी अधिक हानि होती है। इन तीनों फसलों में कोई मूल्य समर्थन नहीं है। न ही इन फसलों के लिए खाद्य प्रसंस्करण तंत्र मजबूत बनाया जा सका है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में ये सब्जियां बेहद खास है। कीमतें बढ़ती हैं तो आम लोगों का बजट बिगड़ जाता है।
हाल के सालों में केरल, झारखंड और मध्य प्रदेश में सब्जियों को मूल्य समर्थन देने की कुछ पहल हुई, पर वह प्रतीकात्मक ही रही। कोल्ड स्टोरेज कई राज्यों में नाकाफी हैं और जो हैं भी उनमें 95 फीसदी निजी क्षेत्र के हैं। आज देश के करीब सभी प्रमुख शहरों और कस्बों में छोटी-बड़ी 7,246 मंडियां है। हालांकि, भारत में उत्पादित कुल फल-सब्जियों में से महज 20 फीसदी का कारोबार मंडियों से होता है। फिर भी पूरे बाजार की कीमतें यहीं से तय होती हैं।
आलू प्याज
- फोटो : सोशल मीडिया
ग्रामीण हाट बाजारों का जाल
देश के ग्रामीण बाजार और हाटों में अपने उत्पादों को बेचकर छोटे किसानों का गुजारा किसी तरह चलता है। पर, 75 फीसदी ग्रामीण बाजार सप्ताह में एक बार और 20 फीसदी दो बार लगते हैं। फिर भी एक बाजार के आसपास 14 गांवों का केंद्र छोटे किसानों की एक हद तक रक्षा करता है, क्योंकि वे परिवहन लागत से बच जाते हैं। वे अपने 90 फीसदी से अधिक उत्पाद इन बाजारों में ही बेचते हैं।
हाल के सालों में कुछ राज्यों में नई कोशिशें हुईं, पर वे नजीर नहीं बन सकीं। आंध्र प्रदेश में 26 जनवरी 1999 से बिचौलियों को समाप्त करने के लिए रायतू या किसान बाजार चालू हुआ। शहरी उपभोक्ताओं को किसान खुद फल सब्जियां सीधे बेचें और आढ़तिये इसमें न घुसें, इस बाबत किसानों को परिचय पत्र मिलने के साथ राज्य सरकार की बसों में भी सुविधा मिली। उसी दौरान तमिलनाडु में "उझावर संथाई" योजना से किसानों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संपर्क बना तो किसानों को 20% ज्यादा कीमतें मिलने लगीं। महाराष्ट्र में शेतकरी बाजार योजना 2002 में आरंभ हुई। हिमाचल प्रदेश में छोटी मंडियों का प्रयोग छोटे किसानों के हक में रहा, पर यह आंदोलन नहीं बन सका। सीमित दायरे तक इसका असर रहा और सरकार उदासीन रही।
महाराष्ट्र के लासलगांव में स्थित प्याज की मंडी।
- फोटो : गांव जंक्शन
ऑपरेशन ग्रीन्स को और प्रभावी बनाने की जरूरत
ऑपरेशन ग्रीन्स की घोषणा 2018-19 के बजट में की गई तो उम्मीद जगी कि अब टमाटर, प्याज और आलू के दिन फिरेंगे। योजना में उत्पादन से भंडारण और ढुलाई तक समाहित है। पर, यह योजना किसान रेल जैसी साबित हुई, जिसका फायदा किसानों से अधिक कारोबारियों को हुआ।
वर्ष 2023 में बाजार हस्तक्षेप योजना से उत्तर प्रदेश से 10 लाख टन आलू खरीदने की मंजूरी मिली। दाम 650 रुपये कुंतल तय हुआ। यूपी में कोल्ड स्टोरेज के पास सबसे अधिक 88.14 लाख टन आलू रखने की क्षमता है, पर यहां उत्पाद रखना हर किसान के बस के बाहर है।
बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत एमएसपी की परिधि से बाहर जल्दी खराब होने वाली फसलें शामिल हैं। पर, इसमें राज्यों के अनुरोध पर भारत सरकार फैसला करती है। हानि केंद्र और राज्य मिलकर आधा-आधा बांटते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुपात 75 और 25 का है। पर, इस योजना के तहत राज्य सरकारों के लिए निधियां आवंटित नहीं होने से राज्य खास दिलचस्पी नहीं लेते। इसलिए, अनानास, मिर्च, अदरक, लहसुन, ऑइल पाम, अंगूर, प्याज, सुपारी आदि की खरीद बीच-बीच में प्रतीकात्मक हो जाती है।
आर्थिक समीक्षा 2024-25 में कहा गया है कि मूल्य निर्धारण और बाजार दक्षता में सुधार महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। किसान उत्पादक संगठनों की स्थापना और परिचालन क्षमताओं का समर्थन तथा सहकारी समितियों को कृषि बाजारों में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने में सक्षम बनाना समावेशी बाजार वातावरण को बढ़ावा देने के लिए सर्वोपरि है। यह अच्छा विचार है, पर मौजूदा तस्वीर दूरगामी रणनीति बनाने के साथ मूल्य स्थरीकरण निधि को और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताती है।
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