MGNREGA: मनरेगा गांव और गरीबों का बड़ा सहारा, बदलते समय के साथ रोजगार गारंटी योजना में बदलाव की जरूरत
अरविंद कुमार सिंह, अरविंद कुमार सिंह वरिष्ठ कृषि पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sun, 13 Apr 2025 06:28 PM IST
सार
मनरेगा से गरीबों को रोजगार ही नहीं मिला, बल्कि गांवों में स्थायी परिसंपत्तियों के सृजन के साथ-साथ महिलाओं तथा कमजोर तबकों का सशक्तिकरण भी इस योजना से हुआ है। बदलते समय के साथ मनरेगा (MGNREGA) की आभा बरकरार रहे, लिहाजा इसमें कुछ बदलाव अपेक्षित हैं।
गांवों में पात्र लोगों को 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा के दो दशक पूरे हो रहे हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
आजादी के बाद बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक बदलावों के बावजूद, भारत मुख्यतः गांवों का देश बना हुआ है। खाद्य सुरक्षा (Food Security) और अर्थव्यवस्था दोनों में ग्रामीण भारत (Rural India) की अहम भूमिका है। खेती-बाड़ी (Agriculture), पशुपालन (Animal Husbandry), मछलीपालन (Fisheries), वानिकी (Forestry), छोटे व मंझोले उद्योग और ग्रामोद्योग (Rural Industry) गांवों का आधार बने हुए हैं। इसके बावजूद, छोटे किसानों से लेकर खेतिहर मजदूरों (farm workers) को गांवों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण नगरों की ओर पलायन (Rural Migration) करना पड़ता है। बाढ़ (Flood), सूखा (Drought) और आपदाओं (Natural Disasters) से जूझती खेती फिलहाल जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के बढ़ते जोखिम की चपेट में है। ऐसे में, चुनौती और बढ़ गई है।
ग्रामीण इलाकों (Rural Area) के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। पर, दो दशकों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) ने अपनी सर्वाधिक उपयोगिता साबित की है। संसद से मंजूरी के बाद, 7 सितंबर, 2005 को मनरेगा अधिसूचित हुई और इसका विधिवत शुभारंभ 2 फरवरी, 2006 को आंध्र प्रदेश के वंदलापल्ली गांव से हुआ। आरंभ 200 जिलों से हुआ, पर अप्रैल 2008 से यह योजना देश के सभी ग्रामीण इलाकों तक पहुंच गई। मनरेगा से पहली बार न्यूनतम रोजगार की कानूनी गारंटी मिली। कोरोना संकट और आपदाओं में सबसे प्रभावी साधन के रूप में यह योजना उभरी है। लॉकडाउन के बाद शहरों से जब लाखों मजदूर अपने गांवों में वापस लौटे तो मनरेगा ने राह दिखाई। हालांकि, मनरेगा आरंभ से आलोचनाओं के घेरे में भी रही, पर विशिष्टताओं के कारण यह लोकप्रिय होती गई। संसद और विधान सभाओं में लगातार इस पर चर्चा होती है। अधिक धन आवंटन की मांग होती है।
ऐसे शुरू हुआ सफर
मनरेगा की पृष्ठभूमि में 11वीं योजना का दस्तावेज था। इसमें गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे 30 करोड़ से अधिक लोगों की चिंताएं निहित थीं। वर्ष 1989 में जवाहर रोजगार योजना आरंभ हुई, जो प्रभावी नहीं रही। उससे पहले महाराष्ट्र में एक रोजगार गारंटी योजना आरंभ हुई थी, जो सीमित दायरे में थी। इनसे सबक लेकर काफी मंथन के बाद यूपीए सरकार ने मनरेगा से संबंधित विधेयक लोकसभा में 21 दिसंबर, 2004 को प्रस्तुत किया। फिर, कल्याण सिंह की अध्यक्षता वाली ग्रामीण विकास की संसदीय समिति ने लंबी पड़ताल के बाद जून, 2005 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसने इसे आजादी के बाद के सबसे महत्वपूर्ण विधानों में से एक माना।
मनरेगा का कवरेज 740 जिलों, 7,187 ब्लॉकों और 2,68,927 ग्राम पंचायतों में फैल चुका है।
- फोटो : सोशल मीडिया
व्यय के साथ बढ़े लाभार्थी
मनरेगा पर बढ़ते व्यय के साथ इसके लाभार्थियों का आधार और कवरेज क्षेत्र भी बढ़ता रहा है। वर्ष 2007-08 में 15,856 करोड़ रुपये मनरेगा पर खर्च किए गए। यह रकम 2020-21 में बढ़कर 1,11,170 करोड़ हो गई। वर्ष 2024-25 में 86 हजार करोड़ का प्रावधान था, जो मौजूदा वित्त वर्ष में भी बरकरार है। मनरेगा का कवरेज भी धीरे-धीरे बढ़ता हुआ 740 जिलों, 7,187 ब्लॉकों और 2,68,927 ग्राम पंचायतों में फैल चुका है।
योजना की चुनौतियां
कई खूबियों के साथ इसमें कुछ चुनौतियां भी उभरी हैं, जिसमें निधियों का समय पर जारी न होना, मजदूरी में देरी, मजदूरी में वृद्धि न होना और कामों के विस्तार में ठहराव आदि शामिल हैं। हाल में, ग्रामीण विकास की संसदीय समिति ने 2025-26 की अनुदान मांगों की पड़ताल करते हुए अपनी रिपोर्ट में मजदूरी में असमानता, निगरानी और उपस्थिति प्रणाली, भुगतान में देरी जैसे मसलों पर गौर करते हुए इसकी निधियों में ठहराव पर चिंता प्रकट की। समिति ने कहा कि मनरेगा उन ग्रामीण गरीबों के परिवार का अंतिम सहारा है, जिनके पास आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है। मनरेगा मांग आधारित योजना है, जिसे ध्यान में रख पर्याप्त बजटीय आवंटन होना चाहिए। साथ ही, विभिन्न राज्यों के बीच मजदूरी की विषमताओं को भी दूर किया जाना चाहिए।
समिति ने कहा कि यह केंद्रीय योजना है, लिहाजा राज्यों में एक समान मजदूरी दर को बनाना असंभव बात नहीं होगी। मौजूदा बजट का 27.26% या 23,446 करोड़ रुपये की मजदूरी और सामग्री मद में लंबित देनदारी को समिति ने चिंताजनक माना है और राज्यों के साथ मिलकर समाधान निकालने की बात कही है। साथ ही, मनरेगा के कामों की अवधि 100 से 150 दिन करने की जोरदार सिफारिश की गई है। हाल में, यूपीए की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राज्यसभा में मनरेगा के कामों की अवधि 100 से 150 दिन करने और दैनिक मजदूरी 400 रुपये करने की मांग की है।
वैसे तो सरकार ने हाल के सालों में मनरेगा में तकनीक के साथ पारदर्शिता बढाने काम किया है। पर, कई चुनौतियां कायम हैं। यह भी गौर करने की बात है कि मनरेगा वहीं पर अधिक प्रभावी हैं, जहां जनभागीदारी बेहतर है और पंचायतें मजबूत हैं। फिर भी मनरेगा के आरंभ से खेती के पीक सीजन में मजदूरों की किल्लत, घटिया और कमजोर परिसंपत्तियां बनने, बिना अनुमति के मशीनों के उपयोग जैसी समस्याएं बरकरार हैं। फिर भी मनरेगा उपयोगी साबित हुई। विश्व बैंक ने इसे ग्रामीण क्षेत्रों का क्रांतिकारी कार्यक्रम माना है। वर्ष 2020 में नीति आयोग के एक अध्ययन में पाया गया कि मनरेगा की स्थायी परिसंपत्तियों से बेहतर जल सुरक्षा, मृदा संरक्षण, उच्चतर भूमि उत्पादकता के माध्यम से गरीबों को आजीविका सुरक्षा हासिल हुई है।
ग्रामीण इलाकों में साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी देती है मनरेगा योजना।
- फोटो : क्रिएटिव कॉमन्स
खेती और मनरेगा के बीच समन्वय
वैसे तो मनरेगा में 262 तरह के कार्यों की अनुमति है। ऐसे नए कामों को इसमें जोड़ने की मांग उठ रही है, जो खेती की लागत कम करें। वैसे तो इसके 164 काम कृषि और संबद्ध क्षेत्रों से जुड़े हैं, जिससे छोटे किसानों को भी काफी मदद मिल रही है। सामूहिक भंडारण सुविधाएं, गरीबों के लिए मकान, स्वच्छता, पशुपालन और मत्स्यपालन का आधार बनाने, आंगनवाड़ी केंद्र और खेल के मैदान बनने जैसे कामों से भी फायदा हो रहा है। एक और बड़ी सफलता मिशन अमृत सरोवर के रूप में मिली है, जिसके कारण पहले चरण में देश में 68,000 से अधिक अमृत सरोवर बनाए गए हैं। पर, तकनीकी मामलों में ग्राम पंचायतों के कमजोर होने के कारण निर्माण की गुणवत्ता चिंता का विषय है। टिकाऊपन के लिहाज से सृजित परिसंपत्तियों की जियो टैगिंग 2016-17 से आरंभ की गई है। पर, गुणवत्ता के साथ मनरेगा की सृजित परिसंपत्तियों के रखरखाव पर ध्यान देने के लिए ठोस रणनीति और एक स्थायी तंत्र बनाने की जरूरत है।
महिलाएं और कमजोर तबकेः मनरेगा की रीढ़
मनरेगा में, वर्ष 2019-20 में 54.79% भागीदारी महिलाओं की थी, जो 2023-24 में 58.89 % हो गई। वैसे तो मनरेगा अधिनियम में एक-तिहाई महिलाओं का पंजीकरण जरूरी है, पर महिलाएं आरंभ से ही मनरेगा में अग्रणी भूमिका में हैं। केरल में तो उनकी भागीदारी 89.80 % तक है। पर, गुजरात में अभी 46.99 % भागीदारी महिलाओं की है। जेंडर और सामाजिक सशक्तिकरण में अन्य सभी योजनाओं की तुलना में मनरेगा सबसे प्रभावी है। महिलाओं के आगे आने से ग्रामीण परिवारों के जीवन स्तर में बदलाव आया है।
इसी तरह, दलित और आदिवासी तबकों का प्रतिनिधित्व भी मनरेगा में 36% से 37 % के बीच है। छोटे और सीमांत किसानों की निजी भूमि पर होने वाले कामों से उनकी खेती की लागत घटी। स्वयं सहायता समूहों के भवनों से लेकर ग्रामीण संपर्क बढ़ाने समेत कई कामों से गांवों का फायदा हुआ। 2015-16 में भयावह सूखे के दौर में कई इलाकों में मनरेगा से बड़ी संख्या में तालाब, कुएं और चेकडैम बने। मनरेगा से भूजल स्तर में सुधार के साथ कई सकारात्मक संकेत मिले हैं। बिहार, झारखंड तथा छत्तीसगढ जैसे राज्यों से मजदूरों का पलायन थमा है। इसके फायदे को देखकर ही 43वें भारतीय श्रम सम्मेलन में मनरेगा की तर्ज पर शहरी रोजगार योजना शुरू करने की मांग भी उठी।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने वर्ष 2013-14 के खरीफ मूल्य नीति में श्रम लागत में सालाना 20% की तेज बढ़ोतरी का संकेत किया था। यह गौर करने की बात है कि देश में 2 हेक्टेयर से कम यानी सीमांत और छोटी जोतों वाले किसानों की तादाद 86% तक हो चुकी है। फिर भी मनरेगा से औसतन सालाना पांच करोड़ के आसपास श्रमिक जुड़े हुए हैं।
मनरेगा में स्थायी परिसंपत्तियों के लिए सरकार ही नहीं, ग्राम पंचायतों को भी अधिक सजगता और सतर्कता की दरकार है।
- फोटो : गांव जंक्शन
बदलते समय के साथ बदलाव की जरूरत
दो दशक की मनरेगा की यात्रा तमाम उतार-चढावों के बावजूद काफी प्रेरक मानी जा सकती है। मनरेगा ने खेतिहर और दिहाड़ी मजदूरों के बीच का अंतर समाप्त कर दिया है। इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के एक अध्ययन में मनरेगा को आजादी के बाद भारत का सबसे भरोसेमंद कार्यक्रम माना है।
मनरेगा की तमाम खूबियों में एक है प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़े काम। खास तौर पर जल संरक्षण के कामों का असर दिख रहा है। अगर इसके साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जुड़े खतरों से लड़ने के उपायों को जोड़ दिया जाए और आवारा व जंगली पशुओं से फसलों को बचाने के लिए फेंसिंग परियोजना भी समाहित कर ली जाए तो यह और उपयोगी हो सकती है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के लिए यह बेहतर सुभीता होगी कि दो दशकों के इसके तमाम पक्षों की समीक्षा करने के साथ इसे और उपयोगी बनाने के लिए कुछ ठोस रणनीति बनाए।
मनरेगा में स्थायी परिसंपत्तियों के लिए सरकार ही नहीं, ग्राम पंचायतों को भी अधिक सजगता और सतर्कता की दरकार है। तकनीक से लैस नौजवानों के स्वयंसेवी संगठनो को इसकी निगरानी में लगाकर पंचायतें इसके कामों को अपने लिए व्यापक हितैषी बना सकती हैं। यही अकेली योजना है, जिसमें ग्रामसभा तय करती है कि कौन-सा काम करना है। लिहाजा, यह योजना सलीके से हो, तो ग्रामीण भारत के कायाकल्प का आधार बन सकती है।
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