25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक आपातकाल में मानवाधिकारों के उल्लंघन, जबरिया नसबंदी जैसे मुद्दे गांव-देहात में खूब छाए रहे। लेकिन, आपातकाल लागू होने का बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम भी लागू किया, जिसके केंद्र में गांव-देहात ही थे।
आपातकाल के 50 साल पर कई पक्षों पर चर्चा हो रही है। बीते पांच दशकों में आपातकाल के दमन, संवैधानिक मामलों और अन्य बहुत से सवालों पर काफी साहित्य उपलब्ध है। कई पुस्तकें छप चुकी हैं। लेकिन, आपातकाल लागू होने का बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम भी लागू किया था, जिसके कारण 1977 के आम चुनावों में अंधड़ के बाद भी कांग्रेस एक हद तक अपना ग्रामीण आधार बनाए रखने में सफल रही और 34.52 फीसदी वोटों को बनाए रखकर लोक सभा की 154 सीटें जीती और मुख्य विपक्षी दल बनी रही। अगर उत्तर भारत जैसी दशा पूरे देश में होती तो उसके लिए 50 सीटें हासिल करने में भी दिकक्त होती। लेकिन, दक्षिण भारत और कई अन्य इलाको में खास तौर पर ग्रामीण आधार वाले इलाको में कांग्रेस ने अपने अस्तित्व को बचाए रखा।
राजनीति का केंद्रबिंदु बना ग्रामीण भारत
25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक आपातकाल में मानवाधिकारों के उल्लंघन, जबरिया नसबंदी जैसे मुद्दे देहात में छाए रहे। यही नहीं, लंबे समय कृषि मंत्री रहे बाबू जगजीवन राम ने फरवरी 1977 के पहले सप्ताह में कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बना ली थी। फिर भी, ग्रामीण भारत में कांग्रेस के असर को जनता पार्टी के दिग्गज नेताओं खास तौर पर चौधरी चरण सिंह ने बखूबी समझ लिया था। इस कारण उनकी पार्टी लोक दल के चुनाव चिह्न का उपयोग जनता पार्टी ने किया। उनके कारण जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को सबसे अधिक प्राथमिकता मिली। चौधरी चरण सिंह जब कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने तो ग्रामीण पुनरूत्थान मंत्रालय की स्थापना भी की थी।
20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा
इंदिरा गांधी ने 1 जुलाई 1975 को 20 सूत्री कार्यक्रम घोषित किया, जिसका असली केंद्र गांव-देहात ही थे। गरीबी उन्मूलन तथा वंचित लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए इस कार्यक्रम में रोजगार, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, कृषि और भूमि सुधार, सिंचाई, पेयजल, कमजोर वर्गों का संरक्षण और सशक्तिकरण, उपभोक्ता संरक्षण, पर्यावरण आदि जैसे विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को शामिल किया गया था। उसके पहले 1967 में इंदिरा गांधी का 10 सूत्री कार्यक्रम भी काफी लोकप्रिय रहा था, जिसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण और भूमि सुधार जैसे दो बेहद अहम मुद्दे समाहित थे।
इस कार्यक्रम का केंद्रबिंदु ग्रामीण गरीबी पर प्रहार था। इसके लिए, वर्षा आधारित कृषि के लिए रणनीति, अधिक उपज के लिए बेहतर सिंचाई सुविधा, भूमि सुधार, ग्रामीण मजदूरों के लिए विशेष कार्यक्रम, शुद्ध पेयजल, सभी के लिए स्वास्थ्य, दो बच्चों का आदर्श, शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार, दलितों और आदिवासियों के हक में अहम कदम, महिलाओं के लिए समानता के साथ नए अवसर, बेघर लोगों के लिए आवास, गंदी बस्तियों का सुधार, वनरोपण, पर्यावरण संरक्षण, उपभोक्ताओं का हित संरक्षण, ग्रामीण ऊर्जा और उत्तरदायी प्रशासन जैसे 20 बिंदुओं को समाहित किया गया। कई राज्यों में क्षेत्रीय स्तर पर कुछ काम आरंभ हुए और बंधुआ मजदूरों की मुक्ति को भी गंभीरता से एजेंडे में लिया गया।
दूसरे राजनीतिक दलों का भी समर्थन
20 सूत्री कार्यक्रम के साथ जनता पार्टी ने भी छेड़छाड नहीं की। यही नहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इसका समर्थन किया था। आचार्य विनोबा भावे ने 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा के बाद ही कहा था कि देश में जो अनुशासन पर्व आया है, उसका पूरा उपयोग जनता के हित में, खास तौर पर किसानों और आर्थिक लिहाज से पिछड़े तबकों के लिए होना चाहिए। इन कार्यक्रमों को लेकर उस दौरान सरकारी तंत्र काफी चुस्त था और प्रगति देखी गई। पर, गांवो में खास तौर पर उत्तर भारत की नसबंदी की घटनाओं के कारण आपातकाल में कांग्रेस को भारी कीमत चुकानी पड़ी।
20 सूत्री कार्यक्रम को बहुत सलीके से तैयार किया गया था और इसमें कई संशोधन भी हुए। यूपीए सरकार में, वर्ष 2006 में इसमें आर्थिक सुधारों के लिहाज से अन्य मदों को समाहित कर कुल 65 मदों को जोड़ा गया। इस तरह, गरीबी उन्मूलन, उत्पादकता बढ़ाने और विषमता दूर करने में यह मददगार रहा। बंधुआ मजदूरी से निजात दिलाने का काम पहली बार सरकार के एजेंडे में आया, जिसका मनोवैज्ञानिक असर ग्रामीण जमींदारों पर पड़ा। कई जगहों पर यह प्रथा समाप्त हुई और मजदूरों का शोषण रूका।
जारी रही गेहूं उत्पादन में आई क्रांति
यह भी उल्लेखनीय बात है कि आपातकाल के पहले इंदिरा गांधी के शासनकाल में ही भारत के खेती-बाड़ी के इतिहास में 1970-71 में 10.80 करोड़ टन अन्न उत्पादन का रिकार्ड बना था। उसी साल सरकार ने विदेशों से अन्न मंगाना बंद किया था और खाद्यान्न मामलों में आत्मनिर्भरता का एक नया दौर आया था। चार सालों में गेहूं उत्पादन में आई क्रांति को हरित क्रांति नाम मिला था। आपातकाल में यह गति जारी रही। कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में भी इंदिरा गांधी ने काफी प्रयास किया और संसाधन प्रदान किया था। खाद्य सुरक्षा की एक मजबूत बुनियाद उस दौरान रखी गई।
उल्लेखनीय बात यह है कि 1975 में दिल्ली में परेड ग्राउंड में एक अलग अंदाज में 20-सूत्रीय सामाजिक और आर्थिक कार्यक्रम को समाहित कर दशहरा मनाया गया। अनुशासन, समय की पाबंदी का अभियान भी चला। ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में भी सरकारी दफ्तर समय पर खुलने लगे थे। बसें और रेलगाड़ियां समय पर आने-जाने लगी थीं और अपराध में भी गिरावट दर्ज हुई थी।
बदल गई राजनीति, गांव-देहात पर बढ़ा फोकस
वास्तविकता यह है कि इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम के असर को देखते हुए, जनता पार्टी के शासनकाल में नीतियों को लेकर काफी सजगता बरती गई। नवंबर 1977 में आर्थिक नीति दस्तावेज बनाने के लिए मधु लिमये के संयोजन में एक समिति बनी, जिसने चुनाव घोषणापत्र के विभिन्न बिंदुओं की प्राथमिकताओं पर विस्तार से मंथन किया। इस समिति में चंद्रशेखर, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम, अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडिज, पीलू मोदी, बीजू पटनायक, अशोक मेहता शामिल थे। जनता पार्टी सरकार का खेती-बाड़ी, गांव-देहात पर खास जोर था, पर कामों की गति धीमी थी। कई विवादों के कारण सरकार का काफी समय झगड़े सुलझाने में लग रहा था।
1977 में पराजय के बाद कांग्रेस ने पहला उप-चुनाव मई 1978 में आजमगढ़ लोकसभा के लिए विजय हासिल की, जो ग्रामीण दबदबे वाला इलाका था। मोहसिना किदवई के प्रचार के लिए इंदिरा गांधी वहां गईंं। रामनरेश यादव के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर कांग्रेस की जीत से जनता पार्टी की काफी किरकिरी हुई, क्योंकि उस समय रामनरेश यादव मुख्यमंत्री थे।
यही नहीं, नवंबर 1978 में इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र चिकमंगलूर में विजय हासिल की, जबकि उनको हराने के लिए सारे दिग्गज जनता पार्टी नेता लगे हुए थे।
आपातकाल में इंदिरा गांधी के ग्रामीण आधार वाले कार्यक्रम 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर जाने के बाद हुए सातवीं लोक सभा के चुनाव में काम आए, जब घोषणापत्र में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने 1977 में जब सरकार छोड़ी तो आधुनिक कृषि, दो करोड़ टन का खाद्यान्न का सुरक्षित भंडार छोड़ा था। पर, जनता पार्टी ने अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया।
1980 में ग्रामीण आधार के चलते ही कांग्रेस इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 353 सीटों पर विजयी रही, जबकि सत्ता में बैठी जनता पार्टी महज 31 सीटें जीत सकी। 33 महीनों के बाद, 14 जनवरी, 1980 को राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रही थीं।